2050 तक दोगुनी हो सकती है बेहद गर्मी का सामना करने वाली आबादी, भारत सर्वाधिक प्रभावित देशों में शामिल: अध्ययन

ऑक्सफोर्ड विश्वविद्यालय के वैज्ञानिकों द्वारा किए गए एक अध्ययन का अनुमान है कि 2010 में 1.54 अरब (23 प्रतिशत) लोगों की तुलना में सदी के मध्य तक लगभग 3.8 अरब लोग, जो दुनिया की आबादी का लगभग 41 प्रतिशत है, ख़तरनाक गर्मी की स्थिति का सामना करेंगे. इस स्थिति में भारत सबसे अधिक प्रभावित देशों में शामिल होगा.

(प्रतीकात्मक फोटो साभार: Eric/Flickr CC BY NC ND 2.0)

नई दिल्ली: ऑक्सफोर्ड विश्वविद्यालय के वैज्ञानिकों द्वारा किए गए एक अध्ययन में चेतावनी दी गई है कि जीवाश्म ईंधनों के लगातार उपयोग के कारण वर्ष 2050 तक अत्यधिक गर्मी का सामना करने वाली दुनिया की आबादी का प्रतिशत 2010 के स्तर की तुलना में दोगुना हो सकता है. इस स्थिति में भारत सबसे अधिक प्रभावित देशों में शामिल होगा.

यह अध्ययन पर्यावरण अध्ययन की अग्रणी अंतरराष्ट्रीय पत्रिका नेचर सस्टेनेबिलिटी में प्रकाशित हुआ है. रिपोर्ट के एक लेखक ने इसे ‘घटरे की घंटी’ बताया है.

अध्ययन का अनुमान है कि 2010 में 1.54 अरब (23 प्रतिशत) लोगों की तुलना में, सदी के मध्य तक लगभग 3.8 अरब लोग, जो दुनिया की आबादी का लगभग 41 प्रतिशत है, खतरनाक गर्मी की स्थिति का सामना करेंगे.

अत्यधिक गर्मी का अर्थ है असामान्य रूप से गर्म मौसम की वह अवधि, जिसमें तापमान कई दिनों तक 32 डिग्री सेल्सियस से ऊपर बना रहता है.

द टेलीग्राफ के अनुसार, अध्ययन के प्रमुख लेखक जीसस लिज़ाना ने कहा, ‘भारत, नाइजीरिया, इंडोनेशिया, बांग्लादेश, पाकिस्तान और फिलीपींस ऐसे देश होंगे जहां अत्यधिक गर्मी में रहने वाली आबादी सबसे अधिक होगी. इन देशों में लोग 3,000 से अधिक कूलिंग डिग्री डेज़ (सीडीडी) की स्थिति में रहेंगे.’

कूलिंग डिग्री डेज़ उस ऊर्जा की मात्रा को दर्शाते हैं, जो घरों के भीतर सुरक्षित तापमान बनाए रखने के लिए आवश्यक होती है. रिपोर्ट के अनुसार, ‘3,000 से अधिक सीडीडी का मतलब है साल भर लंबे समय तक तीव्र गर्मी.’

लिज़ाना ने कहा, ‘हमारा अध्ययन दिखाता है कि ठंडक और ताप की मांग में अधिकांश बदलाव 1.5 डिग्री सेल्सियस की सीमा तक पहुंचने से पहले ही हो जाते हैं. आने वाले पांच वर्षों में कई घरों में एयर कंडीशनर लगाने की जरूरत पड़ सकती है, लेकिन यदि वैश्विक तापमान 2 डिग्री तक पहुंचता है तो उसके बाद भी तापमान बढ़ता ही रहेगा.’

अध्ययन की सह-लेखक और प्रोफेसर राधिका खोसला ने कहा, ‘हमारे निष्कर्ष एक गंभीर चेतावनी हैं. 1.5 डिग्री सेल्सियस की सीमा पार करना शिक्षा, स्वास्थ्य, पलायन और कृषि से लेकर हर क्षेत्र पर अभूतपूर्व असर डालेगा. लगातार गर्म होते दिनों की इस प्रवृत्ति को पलटने का एकमात्र स्थापित रास्ता नेट-ज़ीरो आधारित सतत विकास है. यह बेहद ज़रूरी है कि राजनेता इस दिशा में फिर से नेतृत्व संभालें.’

2015 में हुए पेरिस जलवायु समझौते के बावजूद – जिसका उद्देश्य वैश्विक तापमान वृद्धि को औद्योगिक-पूर्व काल की तुलना में 1.5 डिग्री सेल्सियस (अधिकतम 2 डिग्री) तक सीमित रखना था – दुनिया का औसत तापमान पहले ही 1.5 डिग्री के बेहद करीब पहुंच चुका है.

रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि ‘अत्यधिक ठंडे क्षेत्रों में रहने वाली वैश्विक आबादी का प्रतिशत 14 प्रतिशत से घटकर 7 प्रतिशत रह सकता है क्योंकि भविष्य में बहुत कम स्थान अत्यधिक ठंडे रह जाएंगे.’

रिपोर्ट इस बात पर जोर देती है कि भारत उन देशों में शामिल है जहां वैश्विक तापवृद्धि के परिदृश्यों में अत्यधिक गर्मी का सामना करने वाली आबादी सबसे अधिक होगी.

रिपोर्ट में कहा गया, ‘ये निष्कर्ष भारत की आबादी की अत्यधिक गर्मी के प्रति बढ़ती संवेदनशीलता को रेखांकित करते हैं और बढ़ते तापमान के प्रभावों से निपटने के लिए लक्षित अनुकूलन और शमन रणनीतियों की आवश्यकता को दर्शाते हैं.’

भारतीय प्रबंधन संस्थान (आईएसबी), हैदराबाद के प्रोफेसर और जलवायु विशेषज्ञ अंजल प्रकाश ने कहा, ‘ऑक्सफोर्ड का यह अध्ययन एक महत्वपूर्ण जलवायु मोड़ को दर्शाता है. यदि जीवाश्म ईंधनों पर निर्भरता तेजी से कम नहीं की गई, तो अत्यधिक गर्मी – जो पहले से ही जानलेवा है -2050 तक मौजूदा वैश्विक आबादी के दोगुने लोगों के लिए खतरा बन सकती है, खासकर भारत जैसे संवेदनशील देशों में.’

उन्होंने आगे कहा, ‘घनी आबादी और कमजोर बुनियादी ढांचे वाले ये क्षेत्र स्वास्थ्य, कृषि और अर्थव्यवस्था के लिए गंभीर खतरे पैदा करते हैं, जिससे असमानता और बढ़ेगी.’

प्रकाश ने यह भी जोड़ा, ‘भारत, विशेषकर उसका उत्तरी हिस्सा, ऐसे रुझानों को दिखाता है जहां हीट वेव्स वायु प्रदूषण की समस्या को और गंभीर बना देती हैं. त्वरित कार्रवाई बेहद जरूरी है -इसके लिए नवीकरणीय ऊर्जा को तेजी से अपनाना, हरित वित्त और जलवायु सीओपी प्रतिबद्धताओं के अनुरूप न्यायसंगत नीतियां आवश्यक हैं. किसी भी तरह की देरी अपूरणीय परिणाम ला सकती है.’

अध्ययन के अनुसार, सेंट्रल अफ्रीकन रिपब्लिक, नाइजीरिया, दक्षिण सूडान, लाओस और ब्राज़ील में प्रति व्यक्ति ठंडक की आवश्यकता में सबसे अधिक वृद्धि होने की संभावना है. वहीं, कनाडा, रूस, फ़िनलैंड, स्वीडन और नॉर्वे में प्रति व्यक्ति हीटिंग (ताप) की आवश्यकता में सबसे अधिक कमी आएगी, क्योंकि इन क्षेत्रों में मौसम तेज़ी से गर्म होगा.