नई दिल्ली: केंद्रीय पर्यावरण मंत्रालय ने 1981 और 1974 के वायु एवं जल प्रदूषण से जुड़े कानूनों के तहत उद्योगों की स्थापना और संचालन के लिए दिशानिर्देशों में संशोधन किया है.
इस संशोधन के कई बदलावों में से एक यह सुनिश्चित करता है कि उद्योगों – जिनमें अत्यधिक प्रदूषण फैलाने वाले उद्योग भी शामिल हैं – को अब इन अधिनियमों के तहत मिली मंजूरी को बार-बार नवीनीकरण (रिन्यूअल) नहीं कराना होगा, और अब उन्हें स्थापना और संचालन दोनों की अनुमति प्राप्त करने के लिए कम समय तक इंतजार करना होगा.
मंत्रालय के अनुसार, इस कदम का मुख्य उद्देश्य उद्योगों के लिए व्यापार को आसान बनाना है. हालांकि, यह एक ऐसा कारण है जिसका हवाला सरकार ने अतीत में कई मौजूदा पर्यावरण कानूनों को कमजोर करते समय दिया है.
मंत्रालय का दावा है कि यह संशोधन ‘पर्यावरण अनुपालन को मजबूत करेगा’, लेकिन पर्यावरणविदों ने द वायर को बताया कि भारत में वर्तमान में कार्यान्वयन और प्रवर्तन को लेकर मौजूद चिंताओं को देखते हुए यह दावा संदिग्ध है, खासकर प्रदूषण से निपटने के मामले में.
उद्योगों के लिए दिशानिर्देश
उल्लेखनीय है कि प्रदूषण को रोकने और सीमित करने के लिए उद्योगों को संयंत्र स्थापित करने और संचालन करने के लिए वायु (प्रदूषण निवारण एवं नियंत्रण) अधिनियम, 1981 और जल (प्रदूषण निवारण एवं नियंत्रण) अधिनियम, 1974 के तहत अनुमति लेनी होती है.
ये अनुमतियां उद्योग की श्रेणी के अनुसार अलग-अलग होती हैं – लाल, नारंगी, हरा या सफेद. लाल श्रेणी के उद्योग वे हैं जिनका प्रदूषण सूचकांक 60 या उससे अधिक है; इस श्रेणी में सबसे अधिक प्रदूषण फैलाने वाले उद्योग आते हैं. नारंगी श्रेणी में वे उद्योग शामिल हैं जिनका प्रदूषण सूचकांक 41-59 है.
केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के मुताबिक, प्रदूषण सूचकांक – जो 0 से 100 तक होता है, उच्च मान पर्यावरण पर उच्च प्रदूषण भार को दर्शाता है – उद्योगों द्वारा उत्पन्न उत्सर्जन (वायु प्रदूषक), अपशिष्ट (जल प्रदूषक), खतरनाक अपशिष्ट और उनके द्वारा उपभोग किए गए संसाधनों की मात्रा पर निर्भर करता है.
वायु और जल अधिनियमों में उन कार्यों का उल्लेख है जो केंद्र और राज्य सरकारों को – अपने-अपने राज्य प्रदूषण नियंत्रण बोर्डों या प्रदूषण नियंत्रण समितियों के माध्यम से – यह सुनिश्चित करने के लिए करने होते हैं कि उद्योग नियमों का अनुपालन करें.
उदाहरण के लिए, केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के अनुसार पर्यावरण मानकों के अनुपालन की पुष्टि के लिए विशेष प्रशासनिक नियंत्रण बोर्ड (एसपीसीबी/पीसीसी) को लाल, नारंगी और हरे रंग की श्रेणियों के उद्योगों का न्यूनतम 6 महीने, 1 वर्ष और 2 वर्ष के अंतराल पर निरीक्षण करना अनिवार्य है. उद्योगों को एसपीसीबी से स्थापना की अनुमति (सीटीई) और संचालन की अनुमति (सीटीओ) जैसे परमिट प्राप्त करने होते हैं.
पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्रालय ने वायु (प्रदूषण निवारण एवं नियंत्रण) अधिनियम, 1981 और जल (प्रदूषण निवारण एवं नियंत्रण) अधिनियम, 1974 के तहत अनुमति प्रदान करने, अस्वीकार करने या रद्द करने के लिए दिशानिर्देश क्रमशः 29 और 30 जनवरी, 2025 को अधिसूचित किए.
मंत्रालय के अनुसार, ये दिशानिर्देश एक समान अनुमति तंत्र स्थापित करते हैं, जिसमें ‘अनुमति और प्राधिकरण प्राप्त करने के लिए एक सरल, एकल-चरणीय प्रक्रिया’ शामिल है, और उद्योग की श्रेणी (लाल, नारंगी या हरा) के आधार पर एक निर्दिष्ट अवधि के भीतर अनुमति प्रदान करने या अस्वीकार करने के लिए समयसीमा निर्धारित करते हैं.
इस संबंध में केंद्रीय पर्यावरण मंत्रालय ने बुधवार (28 जनवरी) को घोषणा की कि उसने वायु और जल अधिनियमों के तहत इन समान सहमति दिशानिर्देशों में संशोधन किया है (जैसा कि पिछले वर्ष जनवरी में अधिसूचना द्वारा निर्दिष्ट किया गया था).
मंत्रालय ने एक प्रेस विज्ञप्ति में कहा, ‘इस कदम का उद्देश्य प्रक्रियात्मक देरी को कम करना और पर्यावरण प्रशासन को मजबूत करना है. पिछले वर्ष जारी किए गए दिशानिर्देश स्थापना की अनुमति (सीटीई) और संचालन की अनुमति (सीटीओ) देने, अस्वीकार करने या रद्द करने के लिए एक समान ढांचा प्रदान करते हैं. ये दिशानिर्देश देश भर में अनुमति प्रबंधन में एकरूपता, पारदर्शिता और जवाबदेही सुनिश्चित करते हैं.’
अलग-अलग परमिट की आवश्यकता नहीं
नए संशोधनों में एक मुख्य बदलाव यह है कि अब एसपीसीबी (प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड) वायु और जल अधिनियमों के तहत स्वीकृतियों के साथ-साथ विभिन्न अपशिष्ट प्रबंधन नियमों के तहत प्राधिकरणों को कवर करने वाली ‘एकीकृत अनुमतियां’ जारी करने के लिए एक ही आवेदन पर कार्रवाई कर सकते हैं.
मंत्रालय ने 28 जनवरी को अपने बयान में कहा, ‘एकीकृत स्वीकृतियों से कई आवेदनों की आवश्यकता कम हो जाती है, अनुमोदन की समय सीमा कम हो जाती है, और निगरानी, अनुपालन और निरस्तीकरण के लिए मजबूत प्रावधान यथावत बने रहते हैं.’
इसमें आगे कहा गया है, ‘संशोधनों का उद्देश्य पर्यावरण सुरक्षा उपायों को बनाए रखते हुए अनुमोदन प्रक्रियाओं को तेज, स्पष्ट और अधिक कुशल बनाना है, साथ ही राज्य प्रदूषण नियंत्रण बोर्डों (एसपीसीबी) और प्रदूषण नियंत्रण समितियों (पीसीसी) को सहमति आवेदनों पर कार्रवाई करने और निरीक्षण करने में सहायता करना है.’
एक और बड़ा बदलाव यह है कि संशोधन के अनुसार, एक बार किसी उद्योग को संचालन की अनुमति (सीटीओ) मिल जाने के बाद, यह परमिट रद्द होने तक वैध रहेगा. पहले सीटीओ को नियमित जांच के बाद नवीनीकृत कराना पड़ता था.
मंत्रालय के बयान में कहा गया है, ‘इससे बार-बार नवीनीकरण की आवश्यकता समाप्त हो जाती है, कागजी कार्रवाई कम हो जाती है, उद्योगों पर अनुपालन का बोझ कम हो जाता है और औद्योगिक संचालन की निरंतरता सुनिश्चित होती है.’
अन्य बदलावों में लाल श्रेणी के उद्योगों को अनुमति देने की प्रक्रिया का समय 120 दिनों से घटाकर 90 दिन कर दिया गया है.
मंत्रालय के अनुसार, उद्योगों का स्थान निर्धारण अब ‘साइट-विशिष्ट पर्यावरण मूल्यांकन’ द्वारा नियंत्रित होगा, जिसमें जल निकायों, बस्तियों, स्मारकों और पारिस्थितिक रूप से संवेदनशील क्षेत्रों से निकटता जैसी स्थानीय, साइट-विशिष्ट विशेषताओं को ध्यान में रखा जाएगा.
मंत्रालय का कहना है कि अधिसूचित औद्योगिक संपदाओं या क्षेत्रों में स्थित सूक्ष्म एवं लघु उद्यमों को स्व-प्रमाणित आवेदन प्रस्तुत करने पर स्थापना की अनुमति स्वतः ही स्वीकृत मानी जाएगी, क्योंकि भूमि का पर्यावरणीय दृष्टिकोण से मूल्यांकन पहले ही किया जा चुका है.
संशोधनों के अनुसार, एसपीसीबी अधिकारियों के अलावा पर्यावरण ऑडिट नियम, 2025 के तहत प्रमाणित पंजीकृत पर्यावरण ऑडिटकर्ता भी स्थल का दौरा कर उद्योगों के अनुपालन का सत्यापन कर सकते हैं.
मालूम हो कि पिछले साल अगस्त में केंद्रीय पर्यावरण मंत्रालय द्वारा प्रकाशित नियमों में कहा गया था कि निजी एजेंसियां भी एक नई पर्यावरण ऑडिट डेजिग्नेटेड एजेंसी के माध्यम से मान्यता प्राप्त कर सकती हैं.
हालांकि, विशेषज्ञों ने इस पर चिंता जताई थी. विधि सेंटर फॉर लीगल पॉलिसी में जलवायु और पारिस्थितिकी तंत्र के प्रमुख देबादित्यो सिन्हा ने मोंगाबे-इंडिया को बताया था कि यदि पर्यावरण ऑडिट डेजिग्नेटेड एजेंसी को स्वतंत्र नहीं रखा जाता है, तो उस पर उद्योग या सरकार के दबाव में झुकने का खतरा है.
मंत्रालय के बयान के अनुसार, संशोधनों से ‘निरंतर निगरानी, विश्वास-आधारित शासन और एक समान राष्ट्रीय सहमति तंत्र के माध्यम से पर्यावरण संरक्षण के साथ-साथ व्यापार करने में आसानी’ में संतुलन स्थापित होता है.
प्रवर्तन एक मुद्दा है
हालांकि, पर्यावरण संरक्षणवादी देबी गोयनका ने द वायर को बताया कि वायु और जल अधिनियमों के तहत ये संशोधन, जैसा कि केंद्रीय पर्यावरण मंत्रालय दावा करता है, कई कारणों से ‘पर्यावरण शासन को मजबूत’ करने की संभावना नहीं रखते हैं.
गोयनका ने कहा कि पिछले साल जनवरी में अधिसूचित दिशानिर्देशों में एक ऑनलाइन सतत निगरानी प्रणाली का उल्लेख है, जो उद्योगों के लिए संचालन की अनुमति प्राप्त करने के लिए अनिवार्य है, लेकिन वास्तविक समय की निगरानी विफल हो रही है.
केंद्रीय पर्यावरण मंत्रालय की पर्यावरण मूल्यांकन समिति के पूर्व सदस्य गोयनका ने कहा कि कार्यान्वयन का मुद्दा है, और वास्तविक डेटा प्राप्त करना मुश्किल है, जिसमें सेंसर के साथ छेड़छाड़ या नियमित रखरखाव न करने से होने वाली गड़बड़ी न हो.
गोयनका ने सवाल उठाया, ‘वास्तविक समय की निगरानी के लिए मौजूदा अधिकांश प्रणालियां काम नहीं कर रही हैं, तो वे इससे काम करने की उम्मीद कैसे कर सकते हैं?’
उन्होंने केंद्र सरकार द्वारा शहरों में वायु गुणवत्ता सूचकांक के औसत आंकड़े देने का उदाहरण दिया, जबकि ऐसे सूचकांक के औसत आंकड़े काम नहीं करते हैं.
एक और समस्या है कर्मचारियों की कमी है
गोयनका के अनुसार, ‘अगर आप महाराष्ट्र में उद्योगों की संख्या और महाराष्ट्र प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड में कर्मचारियों की संख्या देखें, तो उनके लिए साल में एक बार भी लाल श्रेणी के उद्योगों का निरीक्षण करना शारीरिक रूप से असंभव है.’
गोयनका ने कहा कि प्रवर्तन में घोर कमी है. इसलिए ज़मीनी स्तर पर इससे वास्तव में क्या फर्क पड़ता है? एक स्वतंत्र एजेंसी द्वारा जांच-पड़ताल और सत्यापन की व्यवस्था होनी चाहिए.
गोयनका ने आगे कहा कि इसमें निश्चित रूप से भ्रष्टाचार भी है. कुछ राज्य प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड देश के सबसे भ्रष्ट विभागों में से हैं.
उन्होंने द वायर को बताया, ‘मैंने ऐसे मामले सुने हैं जहां कंपनियां बोर्ड को नमूने देती हैं लेकिन उनकी कभी जांच नहीं होती. तो फिर यह जबरन वसूली का जरिया बन जाता है.’
दोहरा मापदंड?
मंत्रालय द्वारा ‘व्यापार करने में सुगमता’ सुनिश्चित करने के लिए समान सहमति दिशानिर्देशों में किए गए संशोधन केंद्रीय पर्यावरण मंत्री भूपेंद्र यादव द्वारा भारत की अर्थव्यवस्था के लिए व्यापार करने में सुगमता के महत्व के बारे में कही गई बातों के अनुरूप हैं.
हाल ही में 19 दिसंबर को नई दिल्ली में आयोजित कन्फेडरेशन ऑफ रियल एस्टेट डेवलपर एसोसिएशंस ऑफ इंडिया (CREDAI) के राष्ट्रीय सम्मेलन 2025 में यादव ने कहा था कि व्यापार करने में सुगमता ‘पर्यावरण सुरक्षा उपायों की कीमत पर नहीं आ सकती, न ही पर्यावरण संरक्षण अनावश्यक देरी का कारण बनना चाहिए.’
सम्मेलन में यादव ने रियल एस्टेट क्षेत्र से ऊर्जा-कुशल डिजाइन, चक्रीय निर्माण पद्धतियों और हरित भवनों को अपनाने का आग्रह किया था. ऊर्जा उपयोग, जल खपत, अपशिष्ट उत्पादन, वायु गुणवत्ता और शहरी तापे पर रियल एस्टेट क्षेत्र के प्रभाव को देखते हुए यादव ने कहा था कि रियल एस्टेट क्षेत्र भारत की जलवायु प्रतिबद्धताओं के लिए केंद्रीय महत्व रखता है, जिसमें 2070 तक नेट ज़ीरो लक्ष्य भी शामिल है.
उन्होंने इस क्षेत्र से जलवायु-लचीली शहरी योजना को अपनाने का आह्वान किया, जिसमें बाढ़-प्रतिरोधी लेआउट, गर्मी-अनुकूल सामग्री, हरित आवरण में वृद्धि और टिकाऊ गतिशीलता समाधान शामिल हैं.
हालांकि, गोयनका ने कहा कि प्रदूषण कम करने और जलवायु परिवर्तन से निपटने के लिए उठाए गए कदमों की तमाम बातों के बावजूद केंद्र सरकार प्रदूषण और नीति के मामले में अपने वादों पर खरी नहीं उतरती.
हाल ही में केंद्रीय पर्यावरण मंत्रालय ने कोयले से चलने वाले अधिकांश ताप विद्युत संयंत्रों को फ्लू-गैस डीसल्फराइजेशन सिस्टम लगाने से छूट दी है.
जैसा कि द वायर ने अपनी रिपोर्ट में बताया था कि पिछले साल जुलाई में मंत्रालय द्वारा जारी अधिसूचना की काफी आलोचना हुई क्योंकि यह तकनीक ताप विद्युत संयंत्रों से निकलने वाले 90% से अधिक सल्फर को उसके स्रोत पर ही हटाने में मदद करती है.
गोयनका ने कहा, ‘इसके परिणाम क्या होंगे? प्रदूषण तो बढ़ेगा ही. सरकार प्रदूषण को बढ़ने दे रही है.’
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