इन दिनों महात्मा गांधी नित्य वंदित और नित्य निंदित एक साथ हैं. बरसों से चली आ रही ग्रामीण रोज़गार की एक व्यापक योजना से उनका नाम हटा दिया गया है. उन्हें लेकर लगातार झूठ और दुर्व्याख्याएं आम हैं और सुप्रचारित हैं. ऐसे में पुरुषोत्तम अग्रवाल की एक नई पुस्तक राजकमल से आई है ‘मज़बूती का नाम महात्मा गांधी’, जो ‘विवेक की छन्नी’ से गांधी जी के विचारों, आचरण आदि की पड़ताल करती, उन्हें नई प्रासंगिकता के साथ प्रस्तुत करती है और उन्हें हमारे समय के संदर्भ में जांचती-परखती है.
पुरुषोत्तम के अनुसार, हमारा समय ऐसा है कि उसमें ‘सूचना क्रांति का युग मूर्खता-महिमा भी युग बन गया है’; ‘अभूतपूर्व समृद्धि का यह समय अभूतपूर्व विषमता का भी समय’ बन गया है; ‘अपने देश में यह रंग-बिरंगी धार्मिकता के अभूतपूर्व उभार का भी समय है और भयानक क्रूरताओं के साधारणीकरण का भी.’
पुस्तक में सात अध्याय हैं जिनमें ‘मज़बूती का नाम महात्मा गांधी’, ‘ना, हम तो सात हैं’, ‘ईश्वर सत्य है’ से ‘सत्य ही ईश्वर है तक, ‘निरीश्वरवादी की नैतिकता’, ‘हिंदू, सनातन, हिंदुत्व’, ‘अपरिभाषेय नहीं तपस्वी’ आदि शीर्षकों के अंतर्गत विचार किया गया है. तथ्य-संदर्भ-उद्धरण सभी प्रामाणिक रूप से दिए गए हैं पर यह एक अकादेमिक पुस्तक नहीं, एक नैतिक दस्तावेज़ है.

यह किसी गांधीवादी नहीं एक सजग ज़िम्मेदार बेचैन साहित्यकार की पुस्तक है जिसने पहले कबीर पर बहुत मूल्यवान काम किया है और अब हमारे समय में संभव कबीर-तत्व को प्रखरता और गहरी समझ से हमारे सामने ला रहे हैं.
आज जब नाशवाद घर के अंदर घुस चुका है और आस्था को ही सत्य की सर्वोच्च अभिव्यक्ति मानकर तथ्यों के स्थान पर भावनाएं रखी जा रही हैं तब पुरुषोत्तम यह सवाल उठाते हैं कि गांधी जी बीते वक़्त के अवशेष हैं या भविष्य की संभावना? इन दिनों धर्म को लेकर व्यापक उत्साह और अनुष्ठानपरकता के सिलसिले में यह याद करने की ज़रूरत है कि गांधी जी धर्म के वैचारिक स्थापत्य के प्रति क़तई उदासीन नहीं थे.
उन्होंने कहा कि ‘मैं गीता समेत हरेक धर्मग्रंथ को अपने विवेक की कसौटी पर आंकता हूं. अपने तर्कबोध से ऊपर किसी धर्मग्रंथ को नहीं जाने दे सकता.’ यह भी जोड़ा कि ‘सार्वभौम स्वीकृति के लिए हर धर्म की हर बात को तर्क और सार्वभौम न्याय के कठोर परीक्षण से गुज़रना ही पड़ेगा. किसी ग़लत काम की सफ़ाई में यह नहीं कहा जा सकता कि इस काम को किसी धर्मशास्त्र की स्वीकृति प्राप्त है.’
उन्होंने यह भी कहा: ‘कुरान की अपनी शिक्षाएं भी आलोचना से परे नहीं मानी जा सकतीं. आलोचना सच्चे धर्मशास्त्रों को समृद्धतर ही करती है. आखि़रकार, क्या ईश्वरोक्त है, क्या नहीं, हमारे पास तय करने का अकेला आधार हमारा तर्कबोध ही तो है.’
पुरुषोत्तम ने उचित ही यह कहा है कि ‘हिंदू ही नहीं, सभी धर्मों में, भारतीय ही नहीं, सभी परंपराओं में हिंसा के प्रति विचित्र व्यामोह पाया जाता है.’ उनके अनुसार गांधी जी ‘वे पहले विचारक हैं जिन्होंने पवित्र कही जाने वाली हिंसा को भी प्रश्नविद्ध किया’. यह प्रश्नांकन स्वयं हिंदू परंपरा में है- ‘महाभारत’ जो एक युद्ध काव्य है अपने आरंभ और अंत दोनों में कहता है: अहिंसा परमोधर्मः.
गांधी जी के यहां अहिंसा साहस की अभिव्यक्ति है, कायरता की नहीं. पुरुषोत्तम ‘राजनीति के हिंदूकरण और हिंदुओं के सैनिकीकरण मॉडल पर जो नया भारत बन रहा है’, उसकी संवेदना की बुनावट को भारतीय और हिंदू परंपरा का निषेध बताते हुए यह बताते हैं कि महाभारत में भीष्म पितामह धर्म के सिलसिले में जो ‘सनातन धर्म’ बताते हैं वे हैं: अहिंसा, सत्य, अक्रोध, तप, दान, संयम, बुद्धि-शुद्धता, ईर्ष्या का अभाव और शील.
गांधी जी ने अल्पसंख्यकों की आशंकाओं को ख़ारिज करने के बजाय उन्हें दूर करने की कोशिश की, लेकिन अपने प्रस्थान-बिंदुओं से हटे बग़ैर.’ न तो हिंदू सांप्रदायिक होने आरोपों से डर कर उन्होंने रामराज्य की संकल्पना त्यागी, न मुस्लिम तुष्टीकरण के आरोपों के भय से ‘ईश्वर अल्लाह तेरे नाम’ को छोड़ा’. उनकी कोशिश भारतीय समाज के सभी तबकों को राष्ट्रीय आंदोलन में साथ लेने की थी.
बंटवारे के बाद, अपने जीवन के अंतिम उपवास को लेकर जब उनसे पूछा गया कि उपवास किसके विरुद्ध है तो उनका उत्तर था: ‘हिंदुस्तान के हिंदुओं और सिखों के विरुद्ध और पाकिस्तान के मुसलमानों के’.
सावरकर के बारे में पुरुषोत्तम ने उनके अनेक तर्क और वक्तव्य उद्धृत करते हुए कहा है कि ‘उनके लेखन, भाषण, आंदोलन की धार जितनी ब्रिटिश शासन के विरुद्ध, उससे सैकड़ों गुना ज़्यादा राष्ट्रीय आंदोलन के, ख़ासकर गांधी जी के विरुद्ध. जिन्नाह की तरह वे भी गांधीग्रंथि के ग्रस्त हो चुके थे.’
वे अरुण शौरी का यह मत उद्धृत करते हैं: ‘सावरकर ने (ब्रिटिश राज से) काम आने का जो वादा किया था, निभाया. क़दम-क़दम पर कांग्रेस की निंदा की, जो ब्रिटिश राज के लिए बहुत सुविधादायक थी. भारत छोड़ो आंदोलन की जमकर खिल्ली उड़ाई जो ब्रिटिश राज के लिए बहुत सुविधाजनक थी. युद्ध प्रयासों में बहुत मदद पहुंचाई, जो ब्रिटिश राज के लिए बहुत सुविधाजनक थी.’
सावरकर का हिंदुत्व बलात्कार जैसे जघन्य अपराध को राजनीतिक उपकरण के तौर पर देखने तक, इस उपकरण का उपयोग न करने की आलोचना की. पुरुषोत्तम लिखते हैं: ‘बलात्कारी और बलात्कृता की धार्मिक पहचान देखकर निंदा करने, न करने की जो प्रवृत्ति इन दिनों देखी जा रही है, जेल से सज़ा पूरी किए बिना बलात्कारियों की रिहाई और नायकों की तरह उनके स्वागत के जो दृश्य दीख पड़ रहे हैं, उनका कुछ संबंध स्त्री को व्यक्ति नहीं केवल प्रतीक और बलात्कार को जघन्य अपराध नहीं, स्वीकार्य राजनैतिक कर्म मानने वाली इस सावरकरीय सोच से जुड़ता है या नहीं?’
यह पुस्तक हमें अपना समय और गांधी को बेहतर समझने में मदद तो करती है- वह गहरे स्तर पर हमें उस खो गई ‘विवेक की छन्नी’ खोजने की ओर उकसाती है जिसके साथ गांधी जी विचार और कर्म करते थे.
तथागत सम्मान
तथागत न्यास के बारे में मुझे कुछ पता नहीं था. वह कई बरसों से उत्तरप्रदेश, बिहार, छत्तीसगढ़ आदि राज्यों के कुछ अंचलों में वंचित वर्गों के बच्चों को शिक्षा और रोज़गार दिलाने के क्षेत्र में सक्रिय है. उसने हाल ही में हिंदी के वरिष्ठ कवि-कथाकार-आलोचक-अध्यापक रामदरश मिश्र के नाम पर दो पुरस्कार स्थापित किए हैं.
ये पुरस्कार उन लेखकों के लिए हैं जिनकी मातृभाषा हिंदी नहीं और जिन्होंने हिंदी साहित्य के क्षेत्र में उपलब्धि हासिल की है. पहला सम्मान मलयालम भाषा ए. अरविन्दाक्षन और अरुणाचल में सक्रिय जमुना बीनी को, एक वरिष्ठ और एक युवा लेखक को दिए गए.
हिंदी भाषा और साहित्य को ग़ैर-हिंदी भाषी लेखकों द्वारा दिए गए अवदान की लंबी परंपरा रही है. अब तक शायद ही ऐसी कोई संस्था रही है जो इसी अवदान को, वरिष्ठ और युवा दो स्तरों पर, पुरस्कृत करती हो. अव्वल तो यह हिंदी की ओर से एक तरह का कृतज्ञता-ज्ञापन है. दूसरे, इधर हिंदी को लेकर फिर से कुछ दुराशयी विवाद हुए हैं उनके प्रसंग में यह हिंदी की सशक्त समावेशिता का इज़हार भी.
रामदरश जी के नाम पर इन पुरस्कारों की स्थापना इसलिए भी उचित है कि वह एक वरिष्ठ कवि की स्मृति को कुछ स्थायी और ठोस रूप देती है जिन्होंने कई दशक ग़ैर हिंदी क्षेत्र गुजरात में बहुप्रशंसित हिंदी भाषा और साहित्य का अध्यापन किया था. उनसे हिंदी सीखने वालों में गुजराती के शीर्ष कवि और मूर्धन्य चित्रकार गुलाम मोहम्मद शेख शामिल रहे हैं जो उनको कृतज्ञतापूर्वक याद करते हैं.
