यूपी: ‘हाफ एनकाउंटर’ पर हाईकोर्ट ने पुलिस को चेताया, कहा- सज़ा देना अदालतों का काम

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने यूपी ज़िला पुलिस प्रमुखों को चेताते हुए कहा कि अगर सुप्रीम कोर्ट के एनकाउंटर संबंधी दिशानिर्देशों का सख़्ती से पालन नहीं हुआ, तो उनके ख़िलाफ़ अवमानना कार्रवाई की जाएगी. कोर्ट ने जोड़ा कि पुलिसकर्मी अक्सर आरोपियों के पैरों में गोली मारकर उन्हें घायल कर देते हैं ताकि 'सोशल मीडिया पर प्रसिद्धि' या समय से पहले पदोन्नति मिल सके, पर दंड देना न्यायपालिका का काम है.

(प्रतीकात्मक फोटो साभार: Youth For Human Rights Documentation)

नई दिल्ली: इलाहाबाद हाईकोर्ट ने उत्तर प्रदेश के जिला पुलिस प्रमुखों को चेतावनी दी है कि अगर सुप्रीम कोर्ट के एनकाउंटर संबंधी दिशानिर्देशों का सख्ती से पालन नहीं किया गया, तो उनके खिलाफ अवमानना की कार्रवाई की जाएगी.

लाइव लॉ की रिपोर्ट के मुताबिक, जस्टिस अरुण कुमार देशवाल ने यह चेतावनी देते हुए कहा कि पुलिसकर्मी अक्सर आरोपियों के पैरों में गोली मारकर उन्हें घायल कर देते हैं ताकि ‘सोशल मीडिया पर प्रसिद्धि’ मिल सके या समय से पहले पदोन्नति हासिल की जा सके. अदालत ने इस चलन, जिसे आम बोलचाल में ‘हाफ एनकाउंटर’ कहा जाता है, पर कड़ी आपत्ति जताई और कहा कि दंड देने का अधिकार न्यायपालिका के क्षेत्र में आता है, न कि कार्यपालिका के.

पीठ ने कहा, ‘भारत एक लोकतांत्रिक देश है. इसे भारत के संविधान की भावना और निर्देशों के अनुसार चलाया जाना चाहिए, जो विधायिका, कार्यपालिका और न्यायपालिका की भूमिकाओं को स्पष्ट रूप से अलग-अलग करता है.’

सख्त अनुपालन

अदालत ने स्पष्ट किया कि यदि उनके क्षेत्राधिकार में सुप्रीम कोर्ट के पीपुल्स यूनियन फॉर सिविल लिबर्टीज (पीयूसीएल) बनाम महाराष्ट्र राज्य (2014) मामले में तय किए गए दिशानिर्देशों का उल्लंघन होता है, तो पुलिस अधीक्षक (एसपी), वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक (एसएसपी) और पुलिस आयुक्त व्यक्तिगत रूप से अवमानना के लिए जिम्मेदार होंगे.

यह आदेश उस मामले में पारित किया गया जिसमें पुलिस मुठभेड़ में गंभीर रूप से घायल हुए एक आरोपी की जमानत अर्जी स्वीकार की गई. अदालत ने नोट किया कि मौजूदा मामले में किसी भी पुलिसकर्मी को चोट नहीं आई थी, जिससे ‘हथियारों के इस्तेमाल की आवश्यकता और अनुपात’ पर सवाल खड़े होते हैं.

नए दिशानिर्देश

यह कहते हुए कि उत्तर प्रदेश में पुलिस अक्सर अनिवार्य प्रक्रियाओं की अनदेखी करती है, पीठ ने ऐसे मामलों में छह खास निर्देश जारी किए, जहां किसी आरोपी को गंभीर चोट आती है:

एफआईआर दर्ज करना: अगर पुलिस फायरिंग में किसी आरोपी या किसी व्यक्ति को गंभीर चोट लगती है, तो पुलिस पार्टी का प्रमुख एफआईआर दर्ज करेगा. जांच सीबीसीआईडी या किसी अन्य थाने की टीम द्वारा की जाएगी, जो कम से कम पुलिस पार्टी के प्रमुख से एक रैंक ऊपर के अधिकारी की निगरानी में होगी.

नाम लिखने की प्रक्रिया: एफआईआर में आरोपी/संदिग्ध की श्रेणी में शामिल पुलिसकर्मियों के नाम लिखना जरूरी नहीं है; केवल टीम का नाम (जैसे एसटीएफ या नियमित पुलिस) लिखना पर्याप्त होगा.

चिकित्सीय सहायता: घायल व्यक्ति को तुरंत चिकित्सा सहायता दी जाएगी और फिटनेस प्रमाणपत्र मिलने के बाद मजिस्ट्रेट या मेडिकल अधिकारी द्वारा उसका बयान दर्ज किया जाएगा.

न्यायिक निगरानी: जांच पूरी होने के बाद रिपोर्ट सक्षम अदालत को भेजी जाएगी, जो पीयूसीएल फैसले में तय प्रक्रिया के अनुसार आगे की कार्रवाई करेगी.

तुरंत इनाम नहीं: किसी एनकाउंटर के तुरंत बाद समय से पहले पदोन्नति या वीरता पुरस्कार नहीं दिए जाएंगे. ऐसे इनाम तभी सुझाए जाएंगे जब पुलिस प्रमुख द्वारा गठित समिति संदेह से परे बहादुरी साबित कर दे.

शिकायत निवारण: अगर घायल व्यक्ति का परिवार यह पाता है कि तय प्रक्रिया का पालन नहीं हुआ है या जांच निष्पक्ष नहीं है, तो वे सत्र न्यायाधीश के पास जा सकते हैं. सत्र न्यायाधीश को शिकायत के गुण-दोष पर विचार करने और निवारण करने का अधिकार होगा.

अदालत ने आगे निर्देश दिया कि यदि पीयूसीएल दिशानिर्देशों का गंभीर उल्लंघन होता है, तो सत्र न्यायाधीश मामले को हाईकोर्ट के पास भेज सकते हैं ताकि जिला पुलिस प्रमुख के खिलाफ अवमानना की कार्रवाई शुरू की जा सके. आवेदक की ओर से कुसुम मिश्रा ने पक्ष रखा था.