नई दिल्ली: सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार से जलवायु कार्यकर्ता सोनम वांगचुक के खराब स्वास्थ्य को ध्यान में रखते हुए उनकी हिरासत पर पुनर्विचार करने को कहा है.
मालूम हो कि रेमन मैग्सेसे पुरस्कार से सम्मानित जलवायु कार्यकर्ता सोनम वांगचुक कड़े राष्ट्रीय सुरक्षा कानून के तहत सितंबर 2025 से जेल में हैं. उन्हें उस समय हिरासत में लिया गया था जब लद्दाख को राज्य का दर्जा देने और संविधान की छठी अनुसूची में शामिल करने की मांग को लेकर हुए प्रदर्शन हिंसक हो गए थे.
रिपोर्ट के मुताबिक, सोनम वांगचुक की पत्नी गीतांजलि आंगमो ने 26 सितंबर, 2025 को उनकी गिरफ्तारी को चुनौती दी है. यह गिरफ्तारी लद्दाख को राज्य का दर्जा देने, इसे छठी अनुसूची में शामिल करने और अन्य लंबे समय से चली आ रही मांगों को लेकर हुए प्रदर्शनों के हिंसक होने के बाद हुई थी.
वांगचुक राजस्थान के जोधपुर केंद्रीय जेल में बंद हैं, जो उनके घर लेह से लगभग 1,400 किलोमीटर दूर है. बार-बार पेट दर्द की शिकायत के बाद आंगमो ने वांगचुक की विशेषज्ञ डॉक्टर से जांच कराने के लिए आवेदन दिया था. उन्होंने अदालत से मासिक स्वास्थ्य रिपोर्ट मांगी थी और अदालत ने पिछले सप्ताह जेल अधिकारियों को निर्देश दिया था कि सरकारी जेल से किसी विशेषज्ञ डॉक्टर द्वारा उनकी जांच सुनिश्चित की जाए.
जस्टिस अरविंद कुमार और जस्टिस पीबी वराले की पीठ ने 4 फरवरी को सुनवाई समाप्त होने पर पूछा, ‘क्या सरकार इस पर पुनर्विचार कर सकती है? नजरबंदी का आदेश 26 सितंबर को पारित किया गया था. लगभग पांच महीने बीत चुके हैं. उनकी स्वास्थ्य स्थिति निश्चित रूप से अच्छी नहीं है और उम्र संबंधी अन्य कारक भी हैं.’
अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल केएम नटराज ने जवाब दिया कि यह सरकार के लिए भी चिंता का विषय है और वे इस संबंध में निर्देश प्राप्त करेंगे.
लाइव लॉ के अनुसार, नटराज ने यह भी तर्क दिया कि वांगचुक ने लेह जिला मजिस्ट्रेट द्वारा पारित हिरासत आदेश को बरकरार रखने वाले राज्य सरकार और सलाहकार बोर्ड के बाद के आदेशों को चुनौती नहीं दी.
उन्होंने कहा कि हिरासत प्राधिकरण द्वारा आदेश पारित होने के बाद एनएसए के तहत विभिन्न जांच प्रक्रियाएं होती हैं ताकि यह सुनिश्चित किया जा सके कि बंदी के साथ उचित व्यवहार किया जाए.
पीठ ने टिप्पणी की थी कि यदि हिरासत आदेश में कानूनी खामियां हैं, तो इसे रद्द किया जा सकता है और इसके साथ ही राज्य और सलाहकार बोर्ड के सभी बाद के आदेश भी रद्द हो जाएंगे.
नटराज ने तर्क दिया कि हिरासत एक वैध आधार पर भी मान्य हो सकती है, और कपिल सिब्बल के इस दावे का खंडन किया कि आदेश में कोई विचार-विमर्श नहीं किया गया था और यह केवल पुलिस की सिफारिशों की कॉपी था.
केंद्र सरकार ने इससे पहले सर्वोच्च न्यायालय को बताया था कि वांगचुक ने युवाओं से आग्रह किया था कि यदि लद्दाख की छठी अनुसूची का दर्जा देने की मांग को अस्वीकार कर दिया जाता है, तो वे नेपाल, बांग्लादेश और श्रीलंका में युवा नेतृत्व वाले आंदोलनों से प्रेरणा लें. सरकार ने यह भी दावा किया कि वांगचुक द्वारा सरकार को ‘वे’ और लद्दाख के लोगों को ‘हम’ कहना ही राष्ट्रीय सुरक्षा अधिनियम (एनएसए) लागू करने के लिए ‘पर्याप्त’ था.
