रूसी कच्चे तेल की खरीद पर रोक: ट्रंप के कार्यकारी आदेश के भारत पर गंभीर असर होगा

अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने एक कार्यकारी आदेश जारी कर भारतीय सामानों पर लगाए गए 25% टैरिफ को घटाकर 18% करने का ऐलान इस शर्त पर किया है कि भारत रूस से कच्चे तेल का प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष आयात बंद करेगा और अमेरिका से ऊर्जा उत्पादों की खरीद बढ़ाएगा. ट्रंप का यह आदेश भारत के लिए कई रणनीतिक, आर्थिक और भू-राजनीतिक जोखिम पैदा करता है.

इस फ़ाइल फोटो में दाईं ओर राष्ट्रपति भवन में 25 फ़रवरी 2020 को अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के साथ प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी हैं. पृष्ठभूमि में 5 दिसंबर 2025 को राष्ट्रपति भवन में रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन के औपचारिक स्वागत के दौरान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी. (फोटो: पीटीआई)

नई दिल्ली: अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने इस हफ़्ते एक कार्यकारी आदेश जारी कर भारतीय सामानों पर लगाए गए 25% दंडात्मक टैरिफ को घटाकर 18% करने का ऐलान किया. लेकिन यह राहत इस शर्त पर दी गई कि भारत रूस से कच्चे तेल का प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष आयात बंद करेगा और अमेरिका से ऊर्जा उत्पादों की खरीद बढ़ाएगा.

भले ही मोदी सरकार ने इसे व्यापारिक रियायत के रूप में पेश किया हो, लेकिन यह आदेश भारत के लिए कई रणनीतिक, आर्थिक और भू-राजनीतिक जोखिम पैदा करता है. 

भारत के लिए इसके प्रमुख जोखिम और असर इस प्रकार हैं:

रणनीतिक स्वायत्तता पर सवाल

भारत ने लंबे समय से गुटनिरपेक्ष (non‑aligned) विदेश नीति अपनाई है, जिसे ‘रणनीतिक स्वायत्तता’ कहा जाता है, यानी अमेरिका, रूस, यूरोप और एशियाई देशों के साथ संतुलित रिश्ते. ट्रंप के आदेश में सार्वजनिक रूप से यह दावा किया गया है कि भारत ने ‘रूसी तेल का प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष आयात रोकने की प्रतिबद्धता जताई है,’

हालांकि नई दिल्ली ने अब तक इस दावे पर कोई आधिकारिक बयान नहीं दिया है.

टैरिफ में राहत पाने के लिए अमेरिकी शर्तों को स्वीकार करके मोदी सरकार अपनी रणनीतिक स्वायत्तता के मूल सिद्धांत से समझौता किया हुआ दिखाई देता है, खासकर तब, जब इस प्रतिबद्धता को अमेरिका के राष्ट्रीय सुरक्षा उपायों का हिस्सा बताकर पेश किया गया है.

अगर रूस को लगे कि भारत वॉशिंगटन के बहुत करीब जा रहा है, तब इससे रक्षा और ऊर्जा जैसे क्षेत्रों में लंबे समय से चले आ रहे सहयोग पर असर पड़ सकता है, जिसमें सैन्य उपकरण, परमाणु ऊर्जा और अंतरिक्ष सहयोग शामिल हैं. भू-राजनीतिक रूप से यह आदेश बहुध्रुवीय दुनिया में भारत की स्वतंत्र भूमिका को सीमित करता है.

रूस की संभावित प्रतिक्रिया

रूस दशकों से भारत का अहम सुरक्षा साझेदार रहा है. अमेरिकी दबाव में रूस से तेल खरीद घटाने का फैसला, जो मॉस्को के लिए एक बड़ा राजस्व स्रोत है, दोनों देशों के रिश्तों में तनाव ला सकता है.

अगर रूस इसे अमेरिकी दबाव के आगे झुकना माने, तब वह भारत को रक्षा आपूर्ति, आधुनिक तकनीक और हथियारों के संयुक्त उत्पादन में प्राथमिकता देने पर पुनर्विचार कर सकता है. इससे पनडुब्बियों, एस-400 मिसाइल सिस्टम और अन्य अत्याधुनिक सैन्य प्रणालियों जैसे अहम क्षेत्रों में भारत के विकल्प कमजोर पड़ सकते हैं.

अमेरिकी निगरानी तंत्र का जोखिम

इस कार्यकारी आदेश में यह भी कहा गया है कि अमेरिका का वाणिज्य, विदेश और वित्त विभाग यह निगरानी करेगा कि भारत ने रूसी तेल का आयात वाकई बंद किया है या नहीं. साथ ही, अगर भारत फिर से रूसी तेल खरीदता है तब टैरिफ दर फिर से बढ़ाई जा सकती हैं.

हाल के वर्षों में अमेरिकी व्यापार नीति में बार-बार बदलाव देखे गए हैं. ऐसे में भारत को बार-बार शर्तों का पालन करने और दोबारा बातचीत के दबाव का सामना करना पड़ सकता है. किसी भी कथित उल्लंघन से टैरिफ दोबारा लग सकते हैं, जिससे व्यापारिक भरोसा, द्विपक्षीय व्यापार स्थिरता और लंबी अवधि की सप्लाई चेन योजनाएं प्रभावित होंगी.

ऊर्जा सुरक्षा पर खतरा और बढ़ती लागत

भारत अपनी कच्चे तेल की जरूरतों का करीब 90% आयात करता है. रियायती रूसी तेल ने वैश्विक कीमतों में उतार-चढ़ाव के दौरान भारत को बड़ी राहत दी है. 2022 के बाद कई बार रूस से रोज़ाना 12 लाख बैरल से ज्यादा तेल खरीदकर भारत ने अपना आयात बिल काफी कम किया है.

अब इस आदेश के तहत ऐसी खरीद घटाने या बंद करने से भारत को पश्चिम एशिया या अमेरिका से महंगा तेल खरीदना पड़ सकता है. अमेरिकी तेल आम तौर पर महंगा होता है और उसकी आपूर्ति में लॉजिस्टिक सीमाएं भी हैं. इससे पेट्रोल-डीजल की कीमतें बढ़ सकती हैं, चालू खाते का घाटा बढ़ सकता है और सब्सिडी या महंगाई नियंत्रण को लेकर सरकार पर अतिरिक्त दबाव पड़ सकता है.

इसके अलावा, आपूर्ति अनुबंधों में अचानक किया गया बदलाव रिफाइनरियों की मौजूदा संरचना को बाधित कर सकता है, क्योंकि भारत की कई रिफाइनरियां रूसी कच्चे तेल की भारी किस्मों को प्रोसेस करने के अनुरूप तैयार की गई हैं. बाज़ार-आधारित रणनीति के बजाय बाहरी दबाव में आपूर्ति का अचानक बदलाव भारत की ऊर्जा व्यवस्था में ढांचागत कमजोरियां पैदा कर सकता है.

कुल मिलाकर, ट्रंप का यह कार्यकारी आदेश भले ही भारत को छोटी अवधि के लिए टैरिफ राहत देता हो, लेकिन इसके बदले लंबी अवधि के गंभीर जोखिम सामने आते हैं. इनमें ऊर्जा सुरक्षा की कमजोरियां, विदेश नीति की स्वतंत्रता पर दबाव, रूस के साथ रिश्तों में संभावित तनाव, अमेरिकी निगरानी तंत्र का खतरा और बड़े आर्थिक समझौते शामिल हैं.

इन फैसलों का पूरा असर इस बात पर निर्भर करेगा कि मोदी सरकार इन शर्तों और देश के व्यापक राष्ट्रीय हितों व भू-राजनीतिक लक्ष्यों के बीच कैसे संतुलन बनाती है.