नई दिल्ली: अमेरिका के ट्रेजरी विभाग के तहत काम करने वाले ऑफिस ऑफ फॉरेन एसेट्स कंट्रोल (ओएफएसी) ने अडानी एंटरप्राइजेज के खिलाफ ईरान पर लगे अमेरिकी प्रतिबंधों के संभावित उल्लंघन को लेकर औपचारिक जांच शुरू की है. यह जांच कथित रूप से ईरानी ऊर्जा उत्पादों, खासकर लिक्विफाइड पेट्रोलियम गैस (एलपीजी) के आयात से जुड़ी बताई जा रही है.
इस कदम के साथ ही अमेरिका में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के करीबी माने जाने वाले इस भारतीय समूह पर नियामकीय दबाव और बढ़ गया है.
कंपनी को 4 फरवरी, 2026 को ईमेल के माध्यम से एक नोटिस (रिक्वेस्ट फॉर इंफॉर्मेशन – आरएफआई) मिला, जिसके बाद इस जांच की पुष्टि हुई. आम तौर पर ओएफएसी लंबित जांचों को सार्वजनिक नहीं करता, लेकिन इस मामले में कंपनी को अपने नियामकीय दायित्वों के तहत भारतीय शेयर बाजारों को इसकी जानकारी देनी पड़ी. यही वजह है कि जांच का विवरण सार्वजनिक हो सका.
अडानी समूह के अनुसार, ओएफएसी उन लेन-देन की पड़ताल कर रहा है जो अमेरिकी वित्तीय संस्थानों के जरिए किए गए और जिनका प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष संबंध ईरान या उन व्यक्तियों से हो सकता है, जो अमेरिकी प्रतिबंधों के दायरे में आते हैं. अमेरिकी कानून के तहत यदि कोई विदेशी कंपनी ईरान के ऊर्जा क्षेत्र को महत्वपूर्ण सहायता या समर्थन देती पाई जाती है, तो उस पर कड़ी कार्रवाई हो सकती है. इसमें अमेरिकी वित्तीय प्रणाली से बाहर किए जाने जैसी सख्त सजा भी शामिल है.
अमेरिकी संघीय अधिकारी विशेष रूप से जून 2023 से अब तक हुई खेपों (शिपमेंट) की जांच कर रहे हैं. यह कार्रवाई अमेरिका की उस व्यापक रणनीति का हिस्सा मानी जा रही है, जिसके तहत तथाकथित ‘शैडो फ्लीट’ पर शिकंजा कसा जा रहा है. ‘शैडो फ्लीट’ उन टैंकर जहाजों के नेटवर्क को कहा जाता है, जो जहाज-से-जहाज तेल हस्तांतरण और ट्रांसपोंडर बंद रखने जैसे तरीकों से प्रतिबंधित तेल के वास्तविक स्रोत को छिपाने की कोशिश करते हैं.
हालांकि, आरएफआई जारी किया जाना एक सामान्य प्रशासनिक प्रक्रिया है और इसे दोष सिद्धि नहीं माना जाता, लेकिन इससे यह संकेत जरूर मिलता है कि अमेरिकी एजेंसियों को प्रारंभिक स्तर पर पर्याप्त आधार मिले हैं. इसी के तहत कंपनी से आंतरिक दस्तावेज, वित्तीय रिकॉर्ड और शिपिंग से जुड़ा डेटा मांगा गया है, ताकि यह तय किया जा सके कि किसी प्रकार का उल्लंघन हुआ या नहीं.
10 फरवरी, 2026 तक अमेरिकी सरकार ने इस मामले में अडानी एंटरप्राइजेज को स्पेशली डिज़िग्नेटेड नेशनल्स (एसडीएन) सूची में शामिल नहीं किया है और न ही कोई जुर्माना लगाया है. ओएफएसी की जांचें आम तौर पर गोपनीय प्रशासनिक प्रक्रिया के तहत चलती हैं और ट्रेजरी विभाग आमतौर पर तब तक उनकी पुष्टि नहीं करता, जब तक कोई समझौता न हो जाए या दंड तय न कर दिया जाए.
यह जांच ऐसे समय में सामने आई है जब समूह पहले से ही अमेरिका में एक और गंभीर कानूनी मामले का सामना कर रहा है. एक अलग मामले में अमेरिकी न्याय विभाग और सिक्योरिटीज़ एंड एक्सचेंज कमीशन गौतम अडानी और समूह के अन्य वरिष्ठ अधिकारियों के खिलाफ 265 मिलियन डॉलर के कथित भ्रष्टाचार के मामले की जांच रहे हैं.
नवंबर 2024 में न्यूयॉर्क के ईस्टर्न डिस्ट्रिक्ट के अमेरिकी अटॉर्नी कार्यालय द्वारा आरोपपत्र सार्वजनिक किए जाने के बाद इस मामले ने औपचारिक रूप लिया. आरोपियों पर सिक्योरिटीज़ धोखाधड़ी, वायर फ्रॉड और आपराधिक साजिश के आरोप लगाए गए हैं. संघीय अभियोजकों का दावा है कि सौर ऊर्जा परियोजनाओं के ठेके हासिल करने के लिए भारतीय सरकारी अधिकारियों को भारी रिश्वत दी गई और बाद में अरबों डॉलर की पूंजी जुटाने के लिए अमेरिकी निवेशकों को गुमराह किया गया.
जनवरी 2026 के अंत में इस मामले की सुनवाई आगे बढ़ी, जब आरोपित अधिकारियों ने कानूनी समन स्वीकार कर लिया. इससे अमेरिकी अदालतों के साथ लगभग एक वर्ष से चला आ रहा प्रक्रियात्मक गतिरोध समाप्त हुआ. यदि आरोप सिद्ध होते हैं, तो संबंधित व्यक्तियों को लंबी अवधि की जेल और भारी आर्थिक दंड का सामना करना पड़ सकता है.
कुल मिलाकर, प्रतिबंधों से जुड़ी नई जांच और पहले से चल रहा आपराधिक मामला – दोनों मिलकर अमेरिका में अडानी समूह के सामने गंभीर कानूनी चुनौतियां खड़ी कर रहे हैं.
