17 फरवरी को दिल्ली विश्वविद्यालय ने परिसरों में विरोध प्रदर्शन, सार्वजनिक जुलूस और सभा पर एक महीने का प्रतिबंध लगा दिया. इसका कारण यह बताया गया कि यह परिसर में शांति और व्यवस्था बनाए रखने के उद्देश्य से किया गया है. बाद में इसका विरोध विभिन्न छात्रसंघ संगठनों ने किया, वही दिल्ली विश्वविद्यालय शिक्षक संघ ने सामाजिक और सांस्कृतिक कार्यक्रमों के लिए छूट देने की अपील की. यह मुद्दा राष्ट्रीय मीडिया में चर्चा का विषय बना.
आपको यह जानकर आश्चर्य होगा कि इलाहाबाद विश्वविद्यालय में इस तरह अघोषित प्रतिबंध पिछले सितंबर से लागू हैं, जहां सभी तरह की छात्र गतिविधियों के लिए अनुमति अनिवार्य कर दी गई है. और इसी अनुमति की आड़ में यह अघोषित प्रतिबंध लागू है.
‘अनुमति’ शब्द का प्रयोग आमतौर पर सहमति के लिए किया जाता है. सहमति इस अवधारणा का कानूनी रूप है, जिसमें दूसरे पक्ष को स्वीकृति दी जाती है. दरअसल मामला यही है कि ‘अनुमति’ की आड़ में यह अघोषित प्रतिबंध इलाहाबाद विश्वविद्यालय में लागू है जिस पर राष्ट्रीय मीडिया और स्थानीय मीडिया दोनों चुप हैं.
इसे समझने के लिए एक ‘फील्ड वर्क’ किया गया, जिससे यह तथ्य सामने आया.
विश्वविद्यालय का एक नोटिस
इलाहाबाद विश्वविद्यालय ने 8 सितंबर, 2025 को एक नोटिस जारी कि जिसमें इलाहाबाद विश्वविद्यालय के प्रशासनिक ढांचे और परिसर के भीतर होने वाली गतिविधियों पर नियंत्रण की स्पष्ट अभिव्यक्ति थी. इस नोटिफिकेशन के माध्यम से यह स्पष्ट किया गया है कि विश्वविद्यालय परिसर के भीतर किसी भी प्रकार की सामूहिक गतिविधि- चाहे वह रैली हो, सार्वजनिक बैठक हो, सांस्कृतिक या खेल आयोजन हो, अथवा किसी तरह का जागरूकता कार्यक्रम, अब स्वस्फूर्त या बिना अनुमति के आयोजित नहीं किया जा सकता.
इस आदेश का मूल उद्देश्य परिसर में होने वाली गतिविधियों को प्रशासनिक निगरानी के दायरे में लाना था. विश्वविद्यालय यह सुनिश्चित करना चाहता था कि किसी भी आयोजन से शैक्षणिक वातावरण प्रभावित न हो, कानून-व्यवस्था की स्थिति न बिगड़े और संस्थान की गरिमा बनी रहे. इसलिए यह अनिवार्य कर दिया गया कि ऐसे किसी भी कार्यक्रम से पहले ‘सक्षम प्राधिकारी’ से पूर्व अनुमति ली जाए.
यहां ‘सक्षम प्राधिकारी’ शब्द महत्वपूर्ण है, क्योंकि इसका अर्थ है कि अंतिम निर्णय विश्वविद्यालय प्रशासन के विवेक पर निर्भर करेगा. यानी अनुमति देना या न देना किसी अधिकार के रूप में नहीं, बल्कि प्रशासनिक आकलन के आधार पर तय होगा.
अधिसूचना का दूसरा महत्वपूर्ण पक्ष यह है कि बिना अनुमति आयोजित किसी भी कार्यक्रम को सीधे तौर पर ‘अनाधिकृत’ माना जाएगा. इसका तात्पर्य यह है कि ऐसे आयोजनों को न केवल वैधता नहीं मिलेगी, बल्कि प्रशासन उन्हें रोकने या प्रतिबंधित करने के लिए स्वतंत्र होगा.
यह प्रावधान छात्रों, संगठनों और अन्य समूहों को यह संकेत देता है कि परिसर में गतिविधियों की स्वतंत्रता पूर्णतः निरंकुश नहीं है, बल्कि वह संस्थागत नियमों और प्रशासनिक सहमति के अधीन है.
यह नोटिस अघोषित रूप में परिसर में ‘अनुमति’ की आड़ की में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर पूर्ण प्रतिबंध को लागू करती है. बीते तीन फरवरी को इलाहाबाद विश्वविद्यालय में दो छात्र समूहों के बीच हुई घटना के बाद जब घटनास्थल पर कुलानुशासक पहुंचे तब वह बार-बार वहां बैठकर परिचर्चा कर रहे छात्रों से सवाल कर रहे थे कि क्या आपने यहां परिचर्चा करने की अनुमति ली थी?
अनुमति देने वाला ‘सक्षम प्राधिकारी’ कौन होगा?
इस सवाल को लेकर विश्वविद्यालय प्रशासन के बीच में कोई सहमति या नियम तय नहीं है. अनुमति लेने की पूरी प्रक्रिया से यह बात उभरकर सामने आई. एक उदाहरण से समझिए. कुछ छात्रों ने तय किया कि हम एक ‘एकल कविता पाठ’ का आयोजन परिसर में करेंगे और इसके लिए विश्वविद्यालय प्रशासन से अनुमति लेंगे. अनुमति पत्र में स्पष्ट तौर पर लिखा गया कि कवि कौन है? क्या कर रहा है? ताकि किसी भी तरह से विश्वविद्यालय प्रशासन को अनुमति न देने का कोई बहाना न मिले.
सबसे पहले छात्र कुलानुशासक कार्यालय पहुंचे तो वहां कहा गया कि इस तरह की अनुमति के लिए ‘सक्षम प्राधिकारी’ रजिस्ट्रार हैं, आप वहां जाइए. इसके बाद वह रजिस्ट्रार आफिस गए. उन्होंने तीन दिन बाद बताया कि आपका आवेदन हमने डीन, कला संकाय को भेज दिया है, वह अनुमति देंगे. जब छात्र डीन, कला संकाय पहुंचे तो वहां से कहा गया कि हमने आपका आवेदन हिंदी विभाग को भेज दिया.
जब उनसे पूछा गया कि आपने उसे हिंदी विभाग क्यों भेजा तो जवाब आया कि कविता पाठ था इसलिए हमने हिंदी विभाग भेज दिया. छात्रों ने कहा कि इस कविता पाठ का हिंदी विभाग से कोई लेना-देना नहीं है बल्कि हम इसे परिसर में किसी अन्य जगह करना चाहते हैं.
इसके बाद उनका जवाब था कि परिसर में तो आपको इजाजत नहीं मिल सकती है, इसलिए कि परिसर में किसी भी तरह की गतिविधि के लिए अनुमति के जरूरत होती है. इस पर छात्रों ने सवाल किया कि अनुमति ही तो लेने आए हैं. इस पर उनका कहना था कि जब विश्वविद्यालय प्रशासन ने किसी गतिविधि के लिए कोई कार्यस्थल तय ही नहीं किया तो हम आपको कार्यक्रम कहां करने लिए अनुमति दें?
छात्रों ने कहा कि एक लॉन ही वह जगह बचती है, जहां छात्र बैठकर आपस में कोई सांस्कृतिक गतिविधियां कर सकते हैं. उन्होंने पूरी तरह से मना करते हुए कहा कि नहीं, लॉन में किसी भी तरह की गतिविधि पर कुलपति ने रोक लगा रखी है.
इस पर जब छात्रों ने डीन, कला संकाय के कार्यालय में कार्यरत अधिकारियों से सवाल किया कि अगर विश्वविद्यालय की तरफ से परिसर में किसी तरह की गतिविधि पर रोक लगाने का आदेश जारी किया है तो वह आदेश उपलब्ध कराएं? इस पर उनका जवाब आया कि आप रजिस्ट्रार कार्यालय जाकर पता कीजिए, आदेश वहां से जारी हुआ है.
जब छात्रों रजिस्ट्रार कार्यालय में जाकर इस बाबत जानना चाहा तो वहां से कहा गया कि नहीं, रजिस्ट्रार कार्यालय से ऐसा कोई आदेश जारी नहीं हुआ है. अगर डीन, कला संकाय कार्यालय ऐसा कह रहा है तो उनसे आदेश मांगिए. हम नहीं दे सकते. पुनः छात्र डीन, कला संकाय जाकर उन्हें रजिस्ट्रार कार्यालय का जवाब बताया तो वहां से जवाब आया कि आप कल आइए हम आपको आदेश की प्रति दे देंगे. अभी हमारे पास उपलब्ध नहीं है. छात्र अगले दिन भी गए लेकिन फिर वही जवाब मिला कल आइए. छात्र फिर गए तो कहा गया कि फाइल दबी हुई है, ढूंढने में समय लगेगा.
इसके बाद भी छात्र जाते रहे, लेकिन आदेश की प्रति नहीं मिली. दरअसल, ऐसा कोई आदेश जारी ही नहीं हुआ था और इसकी पुष्टि रजिस्ट्रार कार्यालय ने की.
इसका सीधा-सा अर्थ यह निकलता है कि विश्वविद्यालय प्रशासन ने बड़ी चालाकी से सांप भी मार दिया और लाठी भी नहीं टूटी. प्रशासन ने बड़ी चालाकी से परिसर के भीतर अघोषित रूप से अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर प्रतिबंध लगा दिया है. यहां देखने पर आपको तकनीकी रूप से लगेगा कि विश्वविद्यालय प्रशासन तो बस चाहता है कि छात्र किसी तरह की गतिविधि से पहले सक्षम प्राधिकारी से अनुमति लें. लेकिन सारा मामला इसी अनुमति पर फंस जाता है क्योंकि विश्वविद्यालय प्रशासन के पास छात्रों की गतिविधियों के लिए कोई जगह निर्धारित नहीं है तो वह अनुमति किस स्थान के लिए दें?
विश्वविद्यालय प्रशासन कहने को ए+ ग्रेड हासिल कर लिया लेकिन छात्रों को गतिविधियों से लिए एक स्थान तक मुहैया नहीं करा पा रहा है.
इसके साथ ही विगत दिनों हुई घटना के बाद से विश्वविद्यालय प्रशासन इतना सतर्क हो गया कि उसने कैंपस में किसी भी तरह की गतिविधियों को तत्काल रोकने के लिए प्रत्येक लॉन में गार्डों की तैनाती कर दी है, जो छात्रों को हमेशा निगरानी में रखते हैं. विश्वविद्यालय प्रशासन अनुमति नहीं दे रहा है और बिना अनुमति आप लॉन में दस की संख्या में औपचारिक रूप से बैठ भी नहीं सकते हैं. परिसर के भीतर विरोध प्रदर्शन तो बहुत दूर की बात हो गई है.
हमेशा नहीं थे ऐसे हालात
कुछ वर्ष पहले विश्वविद्यालय ने जीएन झा छात्रावास के सामने विवेकानंद छात्र गतिविधि केंद्र की नई इमारत बनवाई. उद्घाटन के समय उम्मीद जगी कि छात्रों को अभिव्यक्ति के लिए बड़ा मंच मिलेगा, लेकिन वहां केवल कुछ पुस्तक प्रदर्शनियां और प्रशासनिक कार्यक्रम ही हुए, छात्र गतिविधियां नहीं. बाद में विज्ञान परिषद का भवन नाम बदलकर हरिवंश राय बच्चन गतिविधि केंद्र किया गया, पर वह भी छात्रों के लिए उपलब्ध नहीं है. तिलक भवन में सांस्कृतिक कार्यक्रम के लिए 20 हजार रुपये शुल्क वसूले जाते हैं. छात्र के लिए इतनी बड़ी रकम देकर कोई सांस्कृतिक कार्यक्रम करना संभव नहीं है.
मान लें कि शुल्क दे भी दिया गया तो विषय को बकायदा सर्विलेंस की प्रक्रिया से गुजरना होगा और जाहिर है कि सत्ता या विश्वविद्यालय प्रशासन के विरोध में आयोजित किसी भी तरह के कार्यक्रम के लिए यह जगह नहीं मिलेगी.
पहले विश्वविद्यालय में छात्रों की गतिविधियों के लिए कई स्थान सहज रूप से उपलब्ध थे – परिसर के लॉन और छात्रसंघ भवन का सभागार मुफ्त में मिला जाया करते थे. निराला आर्ट गैलरी का निराला सभागार किफायती दरों पर मिल जाता था. लेकिन साल 2020 के बाद ये स्थान धीरे-धीरे छात्रों की पहुंच से बाहर होते गए. छात्रसंघ भवन का सभागार बंद कर दिया गया और लॉन में होने वाली गतिविधियों पर रोक लगने लगी.
8 सितंबर 2025 को जारी एक नोटिस में किसी भी कार्यक्रम के लिए प्रशासनिक अनुमति अनिवार्य कर दी गई. अब इसी के आधार पर मौखिक रूप से अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता सीमित कर दी गई है, जबकि न तो कोई स्पष्ट ‘सक्षम प्राधिकारी’ निर्धारित है और न ही छात्र गतिविधियों पर औपचारिक प्रतिबंध का कोई लिखित आदेश.
इस परिप्रेक्ष्य में देखें तो दिल्ली विश्वविद्यालय में एक महीने के धरना-प्रदर्शन पर लगी रोक भी इलाहाबाद विश्वविद्यालय में अभिव्यक्ति पर कायम व्यापक नियंत्रण के सामने मामूली प्रतीत होती है. लंबे समय से परिसर में बिना प्रशासनिक हस्तक्षेप के कोई विरोध जुलूस, सभा या सांस्कृतिक कार्यक्रम आयोजित नहीं हो सका है.
विडंबना यह है कि परिसर में विजय देवनारायण साही की कविताओं और वेद-उपनिषदों की सूक्तियों के माध्यम से अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का संदेश प्रदर्शित किया गया है, जबकि व्यवहार में प्रशासन संवैधानिक अधिकारों और उन्हीं आदर्शों का उल्लंघन करता दिखता है.
(लेखक इलाहाबाद स्थित जीबी पंत सामाजिक विज्ञान संस्थान में शोध छात्र हैं.)
