बंगनामा: बांकुड़ा के मिट्टी के घोड़े की गौरव गाथा

1952 में पांचमुड़ा गांव के रासबिहारी कुंभकार को बांकुड़ा के मिट्टी के घोड़े के लिए राष्ट्रपति पुरस्कार से सम्मानित किया गया. इसके साथ ही आरंभ हुई बांकुड़ा के घोड़े की राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय पहचान की यात्रा. देश में सेंट्रल कॉटेज इंडस्ट्रीज इम्पोरियम ने इसे अपना प्रतीक चिह्न बनाया, और विदेशों में भी हस्तशिल्प के चाहने वालों के बीच पहुंचा दिया. ऐसे यह सुंदर, लंबी गर्दन वाला कलात्मक मिट्टी का घोड़ा भारतीय हस्तकला का प्रतिनिधि बन गया.

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मिट्टी के इस लाल घोड़े का घर बांकुड़ा ज़िले के गांव-देहात के रास्तों का किनारा है या फिर यहां के तिराहों-चौराहों का कोई कोना. (फोटो साभार: Wiki/Footlooseinme)

1970 की दशक में मन्ना दे ने बांग्ला में प्रणव राय द्वारा लिखा एक गाना गाया था,

बांकुड़ार घोड़ा, माटिर घोड़ा, रांगा शोनार रंगे रांगा.
चोख दुटो ओर कालो माटिर, दौड़ाय ना कोनो छन्दे भांगा.
(बांकुड़ा का घोड़ा, मिट्टी का घोड़ा, सुनहरे लाल में रंगा हुआ है.
काली मिट्टी की आंखें इसकी, बिन लय तोड़े दौड़ रहा है.)

इस गीत की अंतिम पंक्ति है:

बांकुड़ार घोड़ा, माटिर घोड़ा, बांग्लार माटीर अहंकार जे.
(बांकुड़ा का घोड़ा, मिट्टी का घोड़ा, बंगाल के मिट्टी का है गौरव.)

बांकुड़ा के मिट्टी के घोड़े की गौरव गाथा का आरंभ बीसवीं शताब्दी की शुरुआत में अवश्य ही हो चुका था क्योंकि तभी से बंगाल के जाने-माने कवि इसके बारे में लिखने लगे थे. हालांकि शिशुओं के लिए गुरुदेव रवींद्रनाथ ठाकुर ने भी ‘बांकुड़ा घोड़ा’ नामक एक बाल गीत लिखा था इस विषय में शायद पहल सतेंद्रनाथ दत्त ने 1912 में की थी. उसके बाद तो कितने ही बांग्ला साहित्यकारों ने हस्तकला के इस नायाब नमूने को पद्य और गद्य में दिखाया है, सराहा है. कइयों ने इसे अपनी कल्पनाओं या भावनाओं की उड़ान का वाहन भी बनाया है.

1952 में पांचमुड़ा गांव के रासबिहारी कुंभकार को बांकुड़ा के मिट्टी के घोड़े के लिए राष्ट्रपति पुरस्कार से सम्मानित किया गया. इसके साथ ही आरंभ हुई बांकुड़ा के घोड़े की राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय पहचान की यात्रा. देश में सेंट्रल कॉटेज इंडस्ट्रीज इम्पोरियम ने इसे अपना प्रतीक चिह्न बनाकर बड़े शहरों में तो इसे प्रचलित कर ही दिया, विदेशों में भी हस्तशिल्प के ग्राहकों और चाहने वालों के बीच पहुंचा दिया. यह सुंदर, सुडौल, लंबी गर्दन वाला कलात्मक मिट्टी का घोड़ा भारतीय हस्तकला का प्रतिनिधि बन गया.

बांकुड़ा के मिट्टी के घोड़े अब मध्य वर्ग के बैठकखानों की ताखों से बढ़ कर लोकशिल्प के संग्राहकों के निजी संग्रहों और सावर्जनिक संग्रहालयों में अवस्थित होने लगे. यह घोड़ा इतना ही लोकप्रिय हुआ कि पहले तो अपने ज़िले में ही इसे लकड़ी तथा धोकरा धातु में बनाया जाने लगा तथा फिर अन्य ज़िलों और राज्यों में भी ‘बांकुड़ा के घोड़े’ बनने लगे. बात इस हद तक बढ़ी इसके मूल संरक्षण के लिए राज्य सरकार को भौगोलिक संकेत चिह्न (जीआई) के लिए आवेदन करना पड़ा जो इसे 2018 में प्राप्त हुआ. पर पके मिट्टी के इस लाल घोड़े का घर बांकुड़ा ज़िले के गांव-देहात के रास्तों का किनारा है या फिर यहां के तिराहों-चौराहों का कोई कोना.

अगर आप कभी घूमते-घामते बांकुड़ा ज़िला आते हैं तो गांवों के समीप सड़क के किनारे आपको जगह-जगह पर एक अनोखा दृश्य दिखेगा. आप भांप जाएंगे कि यह मंदिर न होते हुए भी पूजा स्थल है.

अगस्त 1993 में, जब मैं स्थानांतरित हो कर बांकुड़ा ज़िले में अतिरिक्त ज़िला मजिस्ट्रेट (एडीएम) एवं ज़िला परिषद के अतिरिक्त कार्यकारी पदाधिकारी के पद पर आया तो मैंने भी एक विशाल आम के वृक्ष के तले ऐसा ही दृश्य देखा. पेड़ के तने को घेरे चबूतरे पर मुझे किसी देवी या देवता की मूर्ति न दिखी, दिखे दो-तीन रोली लिप्त घड़े तथा पकी मिट्टी के बने कुछ अपरिष्कृत हाथी और कई छोटे-बड़े घोड़े. घोड़ों की संख्या ज़्यादा थी तथा उनमें से अधिकतर मात्र चार-छह इंच ऊंचे थे. उनका आद्य सहज खिलौने जैसा आकार ही बता रहा था कि वे घोड़े हैं.

इनके अलावा चबूतरे के बीच में कुछ और डेढ़ से दो फुट ऊंचे घोड़े भी दिखे जिनकी लंबी गर्दन और शरीर पर किया गया सुंदर काम बता रहा था कि ये बांकुड़ा के जग परिचित घोड़े हैं. यह मनसा देवी का स्थान या बांग्ला में कहें तो ‘मनशार थान’ था. जैसा कि पिछले स्तंभ में मैंने उल्लेख किया है. मनसा देवी की पूजा पश्चिम तथा दक्षिण बंगाल में बहुत प्रचलित है और वहां की लोक संस्कृति को भी विस्तारित रूप से प्रभावित करती है. यह मिट्टी का घोड़ा भी शायद इस संस्कृति का एक अंश था.

हर जगह एक ही तरह के मिट्टी के घोड़े नहीं दिखते

बांकुड़ा में जब कुछ महीने बीत गए और मैं ज़िले के अलग-अलग इलाक़ों से परिचित होता गया, तीन प्रश्न मेरे मन में घर कर गए. एक, मनसा थानों पर तो भिन्न क़द काठी के घोड़े दिखते ही हैं, वे स्थानीय देवी-देवताओं, जैसे धर्म ठाकुर, की मूर्तियों के समक्ष भी उपस्थित रहते हैं. पर क्यों? मनसा देवी के थानों या अन्य पूजा वेदियों पर उनकी मौजूदगी का क्या कारण था? वहां उनकी भूमिका क्या थी?

दूसरी बात जो मेरे ध्यान में आई वह यह कि ज़िले में हर जगह एक ही तरह के मिट्टी के घोड़े नहीं दिखते थे. कम से कम तीन विशिष्ट आकार के घोड़ों को चिह्नित किया जा सकता था. पहला तो तालडांगरा ब्लॉक के पांचमुड़ा ग्राम का सुपरिचित लंबे गले वाला अलंकृत घोड़ा. दूसरा, बांकुड़ा के आसपास मिलने वाला मुख्यतः सेंदरा गांव में बनने वाला एक सुगठित सौम्य सूरत वाला घोड़ा जिसकी गर्दन बहुत लंबी न थी. और तीसरा, सोनामुखी ब्लॉक में ही देव-थानों पर पाया जाने वाला एक दांत दिखाता, उग्र-मुख घोड़ा जिसका शरीर बलिष्ठ तथा जिसकी मुद्रा अक्रामक थी.

मैंने ज़िले में भी पांच-छह फुट ऊंचे पांचमुड़ा के घोड़े देखे थे परंतु सेंदरा और सोनामुखी के घोड़ों को तीन-साढ़े तीन फुट से ऊंचा होते नहीं देखा. सच मानें तो अब अधिकतर थानों पर नए घोड़े पांचमुड़ा के ही दिखते थे. जैसे सेंदरा और सोनामुखी के घोड़े रेस हार गए हों. पांचमुड़ा के घोड़ों के बचे और बने रहने की वजह क्या है?

(फोटो: अरेंजमेंट)

तीसरी बात जो मेरे ज़ेहन में सवाल बन कर बैठ गई वह थी: बांकुड़ा के घोड़े की गर्दन इस क़दर लंबी क्यों और कैसे हो गई?

हर पूजा स्थल पर घोड़े की उपस्थिति के बारे में जब मैंने लोगों से पूछा तो उन्होंने मुस्कराते हुए इस पुराने रिवाज के बारे में मुझे बताया: यह मनौती या मन्नत प्रथा का ही एक उदाहरण है. ग्रामीण अंचल में लोंगों के बीच मनसा तथा अन्य स्थानीय देवी-देवताओं के लिए असीम श्रद्धा है. इसलिए वह अपनी छोटी से छोटी समस्या के समाधान या बड़ी से बड़ी मनोकांक्षा की पूर्ति के लिए उन्हीं के पास जाते हैं. ये परेशानी परिवार में किसी की बीमारी भी हो सकती है या कोई आपस की अनबन, या फिर अभिलाषा नए बैल के लिए हो सकती है या फिर सूने आंगन में बच्चे के लिए. देवी-देवता के सामने अपनी मांग रखकर लोग वादा करते हैं कि उनकी परेशानी मिट जाने पर या उनकी मनोकामना पूरी हो जाने पर वह उनके थान पर एक जोड़ा घोड़ों का चढ़ावा चढ़ाएंगे.

यहां मेरे मन में प्रश्न जगा कि आख़िरकार घोड़ा क्यों हाथी क्यों नहीं? जैसा मैंने पहले कहा है मनसा थानों पर मिट्टी के हाथी भी दिखते थे पर उनकी संख्या निम्न रहती थी. बांकुड़ा के जंगलों में हाथियों की कमी न थी लेकिन इस पूरे क्षेत्र में घोड़ों का नामोनिशान न था. फिर भी जन-गण की नज़र में घोड़े अधिक मूल्यवान थे? कई लोगों से बात करने के पश्चात मुझे इसके दो कारण समझ में आए.

जनमानस में घोड़ा शक्ति, गति और प्रभुत्व का प्रतीक था

एक तो ज़िले के इतिहास से जुड़ा था: बंगनामा 37 में मैंने संक्षेप में चर्चा की थी कि अंग्रेज़ों से पूर्व मराठा (बांग्ला में ‘बरगी’) सेनाओं ने बिष्णुपुर राज पर कई बार आक्रमण कर इस ज़िले को तहस-नहस कर दिया था. पश्चिमी तथा दक्षिण बंगाल के निवासियों के मन में 18वीं शताब्दी के मध्य में होने वाले इन फुर्तीले ‘बरगी’ हमलों के ‘नायक’ उनके घोड़े ही थे जो उनका घर, खेत, खलिहान, सब कुछ रौंद कर तबाह करते हुए बिजली की तरह आते थे और फिर उसी गति से लौट जाते थे.

उन आघातों की वजह से दो सौ पचास वर्षों के बाद भी बांकुड़ा के जनमानस में घोड़ा शक्ति, गति और प्रभुत्व का प्रतीक था. घोड़े के बहुमूल्य होने का दूसरा कारण था इसका दुष्प्राप्य होना.

आख़िरकार कौड़ी हो या सोना, दोनों का मूल्य उनकी आपेक्षिक सुलभता पर निर्भर करता आया है. इन्हीं दो कारणों के चलते बांकुड़ा के गांवों में हर पूजा स्थल में आपको प्रचुर संख्या में मिट्टी के छोटे, बड़े या विशाल घोड़े मिल जाएंगे. थान पर उनकी उपस्थिति व संख्या उन देवी-देवता के प्रभाव तथा उनकी साख का भी सूचक है.

पांचमुड़ा के घोड़े के उत्तरजीविता का जो प्रथम कारण जान पड़ा वह था राष्ट्रीय स्तर पर उसे पहचाना जाना तथा उसकी पूर्ववर्ती प्रसिद्धि. इसके बाद स्वाभाविक था कि पांचमुड़ा के कारीगरों और उनके उत्पाद की मांग बढ़ेगी परंतु सेंदरा और सोनामुखी के घोड़ों का एक अपना सौंदर्य और आकर्षण था. उनका रेस में पीछे रह जाने का कारण कुछ और भी था.

मंदिर में चढ़ावे के तरह ही श्रद्धालु अपनी आमदनी के अनुपात ही मनौती का मिट्टी का घोड़ा भी चढ़ाते हैं. सबसे छोटे रूखे आधार रूप घोड़े किसी गरीब की बड़ी आकांक्षा की पूर्ति का चिह्न हो सकते हैं या फिर किसी समृद्ध खेतिहर की छोटी सी चाहत का फलन. लेकिन ऊंचे, लंबी गर्दन वाले घोड़े किसी समर्थ परिवार का ही सूचक हो सकते हैं. बड़े घोड़ों के साथ एक और चुनौती थी.

उन्हें वही कुम्हार बना सकते थे जिनके पास बड़ी कृतियों को पकाने की क्षमता थी. इसीलिए साधारणतः तीन फुट से बड़े घोड़े नहीं दिखते थे. साथ ही इतने बड़े मिट्टी के घोड़ों को दूर तक ढोने की एक अलग ही कठिनाई थी.

न तो मनुष्य के कष्टों की कोई निर्धारित हद है और न ही उसकी महत्वकांच्छाओं की परिसीमा, पर इनके अनुपात मन्नत के लिए विशाल घोड़ों की मांग को कैसे पूरा किया जाए. इस गुत्थी को सुलझाया पांचमुड़ा के कुम्हारों ने-  पहले तो घोड़े के गले को लंबा करके और फिर उसे धड़ से जुदा करके. यानी उन्होंने घोड़े के शरीर को दो भाग में तैयार किया और फिर उन्हें अलग-अलग आग में पकाने का अभ्यास आरंभ किया. घोड़े का सिर और लंबा गला, जो उसकी काया को विशाल बना देता था, एक भाग था और उसका बाक़ी शरीर और टांगें दूसरा भाग.

घोड़े के कान और पूंछ पहले से ही अलग से बनाए और पकाए जाते थे. इस तरह छह- सात फुट ऊंचे घोड़े बनाए जा सके जिनके शरीर और गले को अलंकृत कर उन्हें विशाल ही नहीं बल्कि सुंदर भी बनाया जा सकता था. इस प्रकार घोड़े के दो भागों को अलग अलग पैक कर ज़िले में ही नहीं दूर-दूर तक देश और विदेश में भी भेजना संभव हो गया. ताज्जुब की बात यह नहीं कि बांकुड़ा के घोड़े की गर्दन जिराफ़ के गले की तरह लंबी है, दाद देने वाली बात तो यह है कि इतनी लंबी गर्दन के बावजूद यह घोड़ा इतना सजीला है.

बांकुड़ा के घोड़े के शरीर के दो भागों का सामंजस्यपूर्ण आकार ही इनका सौंदर्य है और इनके रचनाकारों की कला का जादू.

(चन्दन सिन्हा पूर्व भारतीय प्रशासनिक सेवा अधिकारी, लेखक और अनुवादक हैं.)

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