कभी विपक्ष को कुछ न समझने वाली मोदी सरकार अब उससे कैसे पार पाएगी

बजट सत्र में विपक्ष के लगातार सवालों के बाद मोदी सरकार अपनी भरपूर तल्ख़ी के बावजूद नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी पर ठीक से आक्रामक तक नहीं हो पा रही: विशेषाधिकार हनन प्रस्ताव लाने का मंसूबा बांधा, जो टूट गया, क्योंकि सरकार को अचानक याद आया कि अभी तो उन्होंने लोकसभा की विशेषाधिकार हनन समिति ही नहीं बनाई, प्रस्ताव लाए तो भला उसे भेजेंगे कहां?

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बजट सत्र के दौरान भारत-अमेरिका ट्रेड डील को लेकर विपक्षी नेताओं ने लगातार प्रदर्शन किया था. (फोटो: पीटीआई)

2014 के लोकसभा चुनाव में भारतीय जनता पार्टी के प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार नरेंद्र मोदी अपनी परंपरागत हिंदुत्ववादी छवि के विपरीत विकास पुरुष का चोला धारण करके मैदान में उतरे तो, ‘मोदी आने वाला है’ के हजारों करोड़ के अभियान के बावजूद, कई प्रेक्षकों की निगाह में उनके मंजिल तक पहुंचने की राह में एक बहुत बड़ी बाधा थी: मतदाताओं के हिंदुत्ववादी (जिनका भाजपा के प्रति झुकाव सर्वथा स्पष्ट था) और विकास के आकांक्षी समूहों के बीच की ‘दूरी’.

और यह दूरी इतनी बताई जाती थी कि कुछ प्रेक्षकों को लगता था कि न मोदी उनके अंतर्विरोधों को हल कर पाएंगे, न ही उन्हें एक साथ साध पाएंगे. भाजपा के अंदर और बाहर के कई जानकारों की निगाह में उनका ऐसा कर पाना लगभग असंभव था.

लेकिन मोदी ने इस असंभव को इतने चमत्कारिक ढंग से संभव कर दिखाया कि हर हाल में उन्हें रोकने का दावा कर रहे दलों की इतनी भी हैसियत नहीं बची कि उनके बीच का कोई सदस्य लोकसभा में विपक्ष का नेता बन सके.

2019 के लोकसभा चुनाव में भी इन दलों की यह दुर्दशा घटने के बजाय बढ़ी ही- ऐसे में भाजपा को यह गुमान होना ही था कि अब जटिल से जटिल अंतर्विरोध भी मोदी के करिश्मे की राह नहीं रोक सकते. इसलिए उसने उनको सौ मर्जों की एक दवा मान लिया और वे खुद भी ऐसी गलतफहमी के शिकार हो गए. लेकिन 2024 के लोकसभा चुनाव में भूलुंठित विपक्ष भले ही उनको बेदखल नहीं कर पाया, ‘चार सौ पार’ के उनके मंसूबे को मटियामेट करके साधारण बहुमत से भी पहले 240 सीटों पर रोक दिया.

देश के सबसे ज्यादा लोकसभा सीटों वाले राज्य उत्तर प्रदेश में तो उनका करिश्मा इस तरह खत्म हुआ कि वे उसकी अस्सी सीटों में आधी से ज्यादा हार गए और वाराणसी में खुद हारते-हारते बचे.

नतीजा यह हुआ कि विपक्ष की हनक लौट आई और उसने लोकसभा में अपना (विपक्ष का) नेता भी पा लिया. फिर तो जल्दी ही कई हलकों में यह भी कहा जाने लगा कि गत दो लोकसभा चुनावों में विपक्ष की खस्ता हालत के कारण उनका जो सौभाग्य अखंड होने की ओर बढ़ चला था, खंड-खंड हो चला है.

जब ‘सौभाग्य’ सोया

इन दिनों उनके ‘घिर और डर’ जाने को लेकर देश की संसद में और उसके बाहर जो बातें कही जा रही हैं, उनके पीछे की अंतर्कथा कुल मिलाकर इतनी ही है. लेकिन इस कथा को तब तक ठीक से नहीं समझा जा सकता, जब तक यह न समझ लिया जाए कि किसी भी जीवंत लोकतंत्र में विपक्ष (जो सत्तापक्ष जितना ही अनिवार्य व अपरिहार्य माना जाता है क्योंकि सत्ता पक्ष की तरह ही वह भी जनता द्वारा ही चुना जाता है) की कमजोरी या अनुपस्थिति में सत्तापक्ष के निरंकुश होते व तानाशाही की ओर बढ़ते देर नहीं लगती.

तब और, जब सत्तारूढ़ दल का अपना कोई समृद्ध लोकतांत्रिक इतिहास न रहा हो और उस पर अपनी वैसी कोई विरासत बचाने की जिम्मेदारी न हो. मोदी की पिछली दो केंद्र सरकारें भी इस बात की खुल्लमखुल्ला ताईद करती हैं.

हम जानते हैं कि उनको हमारे लोकतंत्र को ‘बहुमत द्वारा चुने गए सबके शासन’ (जो उन लोगों की आवाज का भी प्रतिनिधित्व करता है, जिन्होंने सत्ता पक्ष को वोट नहीं दिया) के बजाय ‘बहुसंख्यकों के आक्रामक शासन’ में बदल देने में कतई कोई ‘असुविधा’ नहीं हुई. क्योंकि विपक्ष दृढ़ प्रतिज्ञ होकर संसद में और उसके बाहर उनको कठघरे में खड़ी करने, अपने सवालों के उत्तर पाने, जनता के प्रति जवाबदेह बनाने और उनकी विफलताओं को उजागर करने में समर्थ नहीं था.

वैकल्पिक नीतियां और विकल्प पेश करने को कौन कहे, यह विपक्ष सरकारी विधेयकों पर बहस में उनकी खामियां उजागर कर गहन समीक्षा के बिना कानून बनाने तक से भी नहीं रोक पा रहा था. उसकी इस कमजोरी ने आम लोगों की राजनीतिक असहायता को भी कम से कम इस मायने में बहुत बढ़ा दिया था कि उनके पास सरकारों के विरुद्ध अपनी बात रखने के लिए कोई सशक्त मंच ही नहीं बचा था.

तब किसी राजनीति विज्ञानी का यह कथन बार-बार सार्थक हो रहा था कि सशक्त विपक्ष के बिना लोकतंत्र एक ऐसे वाहन की तरह हो जाता है जिसमें ‘ब्रेक’ नहीं होते और वह कभी भी अनियंत्रित होकर अधिनायकवाद में बदल सकता है.

अनादर की कीमत

लेकिन लोकतांत्रिक मूल्यों और शुचिताओं के लिहाज से देखें, तो आज की तारीख में इससे नरेंद्र मोदी, उनकी सरकार और जमात को विपक्ष से ज्यादा नुकसान हुआ दिखाई देता है. इस नुकसान की ही परिणति है कि लगातार तीसरी बार सरकार बना लेने के बावजूद उनको, उनके मंत्रियों, सांसदों और कार्यकर्ताओं को विपक्ष और उसकी असहमतियों का आदर करने या उनसे ‘निपटने’ का समुचित अभ्यास नहीं हो पाया है. इसलिए न वे उनके प्रति अपनी असहिष्णुता छोड़ पाते हैं, न छिपा.

इसी के चलते उनके निकट विपक्ष द्वारा की गई छोटी-बड़ी हर आलोचना, वह कितनी भी विचार या नीति आधारित या लोकतांत्रिक क्यों न हो, ‘राष्ट्र-विरोधी’ हो जाती है और हर विरोध देशद्रोह. उनको अपना हर विरोधी देश की संप्रभुता व अखंडता को नुकसान पहुंचाता, नकारात्मक राजनीति करता और व्यवधान पैदा करता लगता है.

इतना ही नहीं, प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) व केंद्रीय जांच ब्यूरो (सीबीआई) जैसी एजेंसियों और यूएपीए व एफसीआरए जैसे कानूनों की मार्फत विपक्ष के दमन पर आमादा रहने की उनकी आदत भी जाने का नाम नहीं ही ले रही. वे असहमत पत्रकारों, गैर-सरकारी संगठनों और सिविल सोसायटी को भी नहीं बख्श रहे. उनकी निहित स्वार्थी बहुसंख्यकवादी विचारधारा उनको अनवरत विविधता के पोषक विचारों को राष्ट्रीय एकता के लिए खतरा मानने की ओर लिए जा रही है.

इतना ही नहीं, मोदी अब हमारे पहले ऐसे प्रधानमंत्री बन गए हैं, जो विपक्ष के सवालों के जवाब देने के बजाय संसद में और उसके बाहर लगातार उसे कोसते और उसके विरुद्ध चार्जशीटें बनाते रहते हैं. कभी कहते हैं कि वह देश की छवि खराब करने और विकास में बाधा डालने में लगा हुआ है और कभी यह कि वह भ्रष्टाचार और तुष्टीकरण के खिलाफ लड़ाई में बाधक बन रहा है.

उनको यह मानने में भी असुविधा होती है कि संसद में तब तक किसी सार्थक विचार-विमर्श की ओर नहीं बढ़ा जा सकता, जब तक विपक्ष की भूमिका को इस रूप में स्वीकार न किया जाए कि उसका तो काम ही संसद और जनता के बीच सेतु बनकर बहसों और चर्चाओं की मार्फत यह सुनिश्चित करना है कि सरकार अपने कार्य कलापों में संतुलित व पारदर्शी रहे, जवाबदेहियों से न भाग सके, संवैधानिक सीमाओं के भीतर रहे और अपने अधिकारों का सदुपयोग करे.

आचार्य नरेंद्र देव से सीखते!

यों, वे चाहते तो इस बात को, कि लोकतंत्र में विपक्ष कितना महत्वपूर्ण होता है, इस तथ्य से समझ सकते थे कि स्वतंत्रता के बाद भारतीय समाजवाद के पितामह आचार्य नरेंद्रदेव कांग्रेस की सरकारों के विपक्ष के निर्माण को अपरिहार्य मानकर उसे बनाने का अपना उद्देश्य पूरा करने के लिए कांग्रेस से अलग हो गए थे.

1948 में नासिक में कांग्रेस सोशलिस्ट पार्टी के सम्मेलन में उन्होंने यह कहते हुए कि लोकतंत्र में प्रभावी विपक्ष आवश्यक है, न सिर्फ कांग्रेस बल्कि उसके टिकट पर जीती गई अपनी विधानसभा की सीट भी छोड़ दी थी.

यह एक दुर्लभ उदाहरण था, जिसमें उन जैसे विचारवान नेता ने विपक्ष बनाने के लिए सत्ता दल से इस्तीफा दे दिया था. यह और बात है कि इसके बाद अपने फैसले पर मतदाताओं की मोहर लगाने के लिए वे अपनी छोड़ी विधानसभा सीट पर उपचुनाव लड़े तो कांग्रेसियों द्वारा बुरी तरह लांछित किए और हरा दिए गए थे, जिससे पता चलता है कि इन दिनों विपक्षी दल के रूप में कांग्रेस सत्तारूढ़ भाजपा द्वारा जिस निरादर की वह शिकायत करती है, उसकी परंपरा शुरू करने में उसका भी योगदान रहा है.

बहरहाल, मोदी और उनकी सरकार अब जिस स्थिति से दो चार हैं, वह और कुछ नहीं, उनकी पिछले सालों की अलोकतांत्रिक व गैरजिम्मेदार कारस्तानियों की ही स्वाभाविक परिणति है. इस परिणति के पीछे विपक्ष कम, विपक्ष को अवांछनीय मानकर उसकी कमजोरी को अपना सौभाग्य समझने, उससे निभाने के अभ्यास से परहेज़ करने व हमेशा उसे चित करने के ही फेर में रहने की उनकी बुरी आदत ज्यादा है.

याद कीजिए, गत लोकसभा चुनाव से चंद दिनों पहले तक कई राज्यों के विधानसभा चुनावों में येन-केन प्रकारेण हासिल की गई जीतों की बिना पर वे ‘कोई हमारा क्या कर लेगा’ के अकड़भरे मोड में थे और अपने जाए किसी भी अंतर्विरोध की फ़िक्र नहीं कर रहे थे- बावजूद इसके कि उनकी सरकार का बहुमत उनकी पार्टी के अकेले दम पर नहीं है और उसके संतुलन का आधार बहुत नाज़ुक है.

लेकिन अब, जब पिछले ग्यारह-बारह सालों के सत्ताकाल के उनके सारे किए और कहे के अंतर्विरोध खासे गहरे होकर उनके ऊपर ही घहरा रहे हैं (जिससे, बकौल राहुल गांधी: उनकी आंखों में डर दिखाई देने लगा है) तब भी उनकी सबसे बड़ी विडंबना यही है कि वे उसके लिए अपने सिवा किसी और को जिम्मेदार नहीं ठहरा सकते.

गजब की बेबसी

उनकी बेबसी देखिए कि न वे पूर्व थलसेनाध्यक्ष मनोज मुकुंद नरवणे को ( जिनकी ‘फोर स्टार्स ऑफ डेस्टिनी’ नामक किताब के एक उद्धरण मात्र से विपक्ष के नेता ने तथाकथित राष्ट्रवाद की उनकी सारी पूंजी उनसे छीन ली है) गलत ठहरा पा रहे हैं, न ही अपने मित्र अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप को जो आपरेशन सिंदूर रुकवाने का दावा करते करते यह तक कहने लगे हैं कि वे मोदी का राजनीतिक करिअर बर्बाद नहीं करना चाहते. (यानी दुश्मन न करें, दोस्त वैसा काम करने लगा है.)

बहुचर्चित एपस्टीन फाइलों को तो, जो अभी पूरी तरह खुलनी बाकी हैं, गलत सिद्ध करने की कोई गुंजाइश ही नहीं है. लेकिन गलत तो वे विपक्ष के नेता राहुल गांधी को भी सिद्ध नहीं कर पा रहे हैं, जो उनकी ‘नरेंदर सरेंडर’ से आगे बढ़कर यहां तक कह रहे हैं कि अमेरिका से ट्रेड डील में मोदी ने भारतमाता को बेच दिया है.

हद तो यह कि मोदी अपनी भरपूर तल्खी के बावजूद राहुल पर ठीक से आक्रामक तक नहीं हो पा रहे: विशेषाधिकार हनन प्रस्ताव लाने का मंसूबा बांधते हैं और तोड़ देते हैं. एक प्रेक्षक के अनुसार, इसलिए कि अचानक उनको याद आता है कि अभी तो उन्होंने लोकसभा की विशेषाधिकार हनन समिति ही नहीं बनाई है, प्रस्ताव लाए तो भला उसे भेजेंगे कहां?

शायद इसे ही कहते हैं, बोया पेड़ बबूल का, तो आम कहां से होय या अब पछताए होत का, चिड़िया चुग गई खेत. और चिड़िया इस तरह खेत चुग गई है कि वे बेचारे अमेरिका से बहु-प्रतीक्षित ट्रेड डील का ‘श्रेय’ तक नहीं ले पा रहे.

ऐसे में आगे देखने की सबसे बड़ी बात यही होगी कि इस स्थिति के पार पाने के लिए वे आगे क्या करते हैं? जैसा कि राहुल का दावा है, अगर वे डरे हुए हैं तो बहुत संभव है कि उस डर के पार जाने के लिए कोई अप्रत्याशित कदम उठाकर और डर पैदा करने लग जाएं.

लेकिन यह रास्ता अपनाने से उनके अंतर्विरोध और गहरा सकते हैं और मुश्किलें और बढ़ सकती हैं.‌ अतीत में अनेक ऐसी मिसालें हैं, जब डरे हुए सत्ताधीशों ने इस राह पर जाकर अपना भी बहुत बुरा किया, अपने देश का भी. लेकिन क्या इसकी विपरीत राह चुनकर मोदी खुद को अपने ‘अनभ्यास’ का शिकार बनाने की सोच भी सकते हैं? शायद नहीं. कोई भी सत्ताधीश अपनी सत्ता इस तरह सरेंडर नहीं करता.

(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं.)