…जब प्रकाश बदलता है

कभी-कभार | अशोक वाजपेयी: फ्रेंच कला में प्रकाश को लेकर एक विशेष आग्रह दिखाई देता है. ऐसा लगता है कि प्रकाश को जितना लक्ष्य किया गया है, उतना कहीं और नहीं हुआ. इसे लेकर रज़ा कहते थे कि कि यहां प्राकृतिक रूप से जो प्रकाश है, उसमें भी लगातार फेरबदल होता रहता है, और कलाकारों ने उसे पकड़ने की कोशिश की है.

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'आम तौर पर हम जब कहते हैं कि मौसम बदल रहा है, तो हम तापमान और हवा के संदर्भ में कहते हैं. हम यह नहीं कहते कि प्रकाश अब दूसरा होने वाला है.' (पेंटिंग: एसएच रज़ा की 'सूर्य एंड नागा, साभार- Laasya Art)

इस 22 फरवरी 2026 को सैयद हैदर रज़ा 104 बरस के हुए होते. पेरिस में उनके अंतिम वर्षों में काफ़ी समय उनके साथ बिताता था. इस दौरान उनसे बातचीत होती रहती थी. उसमें से कुछ रिकॉर्ड हुई थी. बाक़ी याद रह गई है. उन्हीं यादों में से कुछ यह है.

रज़ा के साथ बातचीत में मैंने पाया कि जब अधिक औपचारिक ढंग से बात होने लगती थी, तब मामला गड़बड़ाने लगता था. औपचारिकता उन्हें थोड़ा बाधित कर देती थी. उनका स्वाभाविक प्रवाह टूटने लगता था. इसी कारण उनसे इस तरह का प्रश्नोत्तर करने का मुझे बहुत अवसर नहीं मिला, और मैंने वैसा किया भी नहीं. मैं सामान्यतः गपशप के अंदाज़ में बात करता था; उसमें विषयान्तर से भी विषय पर लौटा जा सकता था.

जैसे पश्चिम की कला में, और ख़ासकर फ्रेंच कला में, प्रकाश को लेकर एक विशेष आग्रह दिखाई देता है. ऐसा लगता है कि प्रकाश को जितना लक्ष्य किया गया है, उतना कहीं और नहीं हुआ. प्रकाश को बरतने की कोशिश है, प्रकाश को उपजाने की कोशिश है. इत्यादि. एकाध बार मैंने उनसे पूछा कि प्रकाश के प्रति यह एक तरह का ‘ऑब्सेशन’ क्यों है? इसका मूल क्या है? इसका औचित्य क्या है? तो उन्होंने बहुत दिलचस्प बात कही.

उन्होंने कहा, ‘जब मैं पहली बार यहां आया, तो मुझे तो भारत में रहते हुए भी प्रकाश दिखाई देता था. या तो गर्मियों का बहुत कर्कश, तीखा प्रकाश होता था, या फिर ठंड में एक ठंडा-सा प्रकाश होता था और जल्दी अंधेरा हो जाता था. लेकिन यहां जब मैं कला के दूसरे पक्षों से परिचित हुआ, तो मुझे लगा कि यहां प्राकृतिक रूप से जो प्रकाश है, उसमें भी लगातार फेरबदल होता रहता है, और कलाकारों ने उसे पकड़ने की कोशिश की है. प्रकाश हर जगह है, लेकिन प्रकाश के जो रूप यहां उभरते हैं… और आम तौर पर हम जब कहते हैं कि मौसम बदल रहा है, तो हम तापमान और हवा के संदर्भ में कहते हैं. हम यह नहीं कहते कि प्रकाश अब दूसरा होने वाला है.’

उन्होंने आगे जोड़ा, ‘यहां प्रकाश बदलता है.’ ‘जैसे मैं जब गोर्बियो जाता हूं…’ वे गोर्बियो जाते थे. वहां उन्होंने एक स्टूडियो बनाया था. बाद में वे वहीं रहने भी लगे थे; उन्होंने शहर छोड़ दिया था. वह गांव से थोड़ा बाहर था. उस स्टूडियो में वे भीतर कम बैठते थे; उनका ज़्यादातर पेंटिंग का काम बाहर, खुले आकाश के नीचे होता था. अपने ही स्टूडियो और घर के परिसर में उन्होंने बगीचा लगा रखा था.

वे कहते थे, ‘उस समय गर्मियों में जो प्रकाश बढ़ता है…’ अब वहां की गर्मियों को हमारे हिसाब से गर्मियां कहना बेकार है, क्योंकि वहां हल्की ठंडक होती है. उतनी ठंडक नहीं होती जितनी जाड़ों में होती है, पर फिर भी शीतलता रहती है. सूर्य की धूप भी बहुत वत्सल-सी होती है. वह कर्कश धूप नहीं होती जैसी हमारे यहां गर्मियों में होती है. उनके हिसाब से इस सबका प्रकाश की रंगतों पर फ़र्क़ पड़ता है.

मुझे लगता है कि उन्होंने एकाध बार यह भी कहा था कि ‘फ्रेंच कला जितनी फ्रेंच अंधेरे से बनी है, उतनी ही फ्रेंच प्रकाश से भी बनी है.’ अर्थात् फ्रेंच कला की भूमिका इस तरह से भी है. इस तरह की बातें होती रहती थीं.

भाषा-देश, कविता-घर

अगले सप्ताहांत रज़ा फाउंडेशन द्वारा आयोजित अंतरराष्ट्रीय कविता समारोह ‘संसार’ इंडिया इंटरनेशनल सेंटर में होगा. उनमें ऐसे कई कवि आ रहे हैं जो अपने मूल देश में नहीं रहते; तानाशाह और क्रूर सत्ताओं, सेंसरशिप, दमन आदि के कारण या तो वहां से निष्कासित हैं या जिन्होंने अत्याचार से भागकर किसी और देश में शरण ली है.

ऐसे कवियों के लिए अब भाषा उनका देश है और कविता उनका घर. हमारे समय की जो ट्रैजेडी है, उसकी यह दुखद और मार्मिक अभिव्यक्ति है. उनकी जिजीविषा, उनकी जलावतनी, बेघरबारी, अपने स्वाभाविक पुरा-पड़ोस से दूरी, उनके आध्यात्मिक एकांत और अलगाव के बावजूद, अप्रतिहत है. उनकी कविता, कई अर्थों में, इसका साक्ष्य है कि लगभग असंभव और भयानक रूप से क्रूर परिस्थितियों में भी मनुष्य बने रहना, कवि बने रहना संभव है.

झूठों और घृणा से आच्छादित की जा रही दुनिया में वह एक तरह का सत्याग्रह है. सत्याग्रह की आंच, उसकी लपक, उसकी ऊष्मा. इस कविता ने, बिना किसी नियोजन के, लगभग अनायास, अंतःकरण-यातना-साहस-संवेदना की एक विश्व-बिरादरी बना दी है. जीवन और प्रकृति की, पर्यावरण और मानवीय संबंधों की सुंदरता और ऐन्द्रियता इस कविता के भूगोल का अनिवार्य हिस्सा है. उसमें अदम्य स्थानीयता, अपने समय के अंधेरों-उजालों की तीख़ी शिनाख़्त, वैचारिक प्रश्नवाचकता, रोज़मर्रापन और उसकी विडंबनाएं, एकांत की सामुदायिकता सब एक-दूसरे से गुंथे हुए हैं.

कवि लिथुआनिया, स्लोवीनिया, अलज़ीरिया, सीरिया, सूडान, मिस्र, इटली, ईराक और अर्जेंटीना से आ रहे हैं. लिथुआनियन, स्लोविन, फ्रेंच, अरबी, स्पेनिश, अंग्रेज़ी और यूक्रेनियन भाषाओं में लिखने वाले कवि हैं. हिंदी के जाने-माने कवियों ने उनकी कविताओं के, अंग्रेज़ी अनुवादों से, हिंदी में अनुवाद किए हैं. उनका एक संचयन भी इस अवसर पर प्रकाशित किया जा रहा है.

एक और अनोखी बात है यह है कि तेरह भारतीय चित्रकारों ने इन कवियों की कविताओं से प्रेरित होकर रेखांकन बनाए हैं जिनकी एक प्रदर्शनी भी समारोह के दौरान होगी. कविता और कला के बीच जो संवाद स्थगित सा है वह फिर से सजीव होगा.

‘संसार’ का यह आयोजन एक तरह से हमें उस दूसरे संसार की ओर ले जाएगा जिससे हम भारत में प्रायः अपरिचित रहे हैं. यह हमारे जाने-माने ‘संसार’ में दरअसल ‘दूसरा संसार’ है: ऐसा संसार जो हमारे अपने संसार से मिलता-जुलता है.

(साभार: राजा फाउंडेशन)

समारोह के लिए दिए गए एक वक्तव्य में ईराक की विख्यात कवयित्री दुन्या मिखाइल ने कहा है कि ‘कविता वह हाशिया है जहां दुनिया सांस ले सकती है. वह न तो राज करती है, न हुकुम चलाती है; वह सुनती है. शोरगुल के दौर में कविता एक तरह का विराम होती है जहां अर्थ जमा होता है. वह देशनिकालों को भाषा और समय के पार ले जाती है, निगरानी चौकियां जिन्हें जब़्त नहीं कर सकती उनकी तस्करी- दुख, कोमलता, नाम.’

स्लोवीनिया की ग्लोरयाना वेबर के अनुसार ‘कविता दूसरी दहलीज़ पर ले जाती है. वह मुझे याद दिलाती है कि संसार उत्तरों में नहीं बोलता है बल्कि अंतर्ध्‍वनियों में…. संपूर्ण को बांटा नहीं जा सकता. न ही उस पर हम कब्ज़ा कर सकते हैं. हम सिर्फ़ सुन सकते हैं– जैसे एक संकरी दरार में रोशनी.’

यूक्रेन की कैटरीना कैलिट्को कहती हैं कि कविता मुझे सजग रहने देती है- संसार के घावों, उसकी सुंदरता और उसके नाजुक सचों के प्रति और अपनी ईमानदार आवाज़ उनको संबोधित करने के लिए.’

सिनान अंतून के लिए ‘कविता हमारी भूखी आत्माओं के लिए इफ़रात में मुफ़्त रोटी, हमारे निजी और सामूहिक घावों के लिए मरहम है; एक पूंजीवादी संसार में जिसे मानवीय लिप्सा और नरसंहारक हिंसा के सुलगा रखा है.

मिस्र के कवि याहिया लाबाबीदी को लगता है कि हमारी तकलीफ़ों से भरी दुनिया में ‘कविता अंतःकरण का एक रूप है’ और ‘वह हमें अपनी आध्यात्मिक ज़िम्मेदारियों पर वापस ले जाती है.’

लिथुआनिया की आंद्रे वेलांतिनेत को लगता है कि लोगों को अक्सर महसूस होता है कि कोई विकल्‍प, कोई बाहर जाने का दरवाज़ा नहीं है- कविता में यह सामर्थ्‍य होता है कि वह लोगों को ऊपर उठा सके और उन्हें आवाज़ दे सके जो अपनी सचाइयों को व्यक्त नहीं कर पाते.

(लेखक वरिष्ठ साहित्यकार हैं.)