नई दिल्ली: ग्रेटर नोएडा स्थित बुद्ध इंटरनेशनल सर्किट में फॉर्मूला 1 रेस की संभावित वापसी को लेकर हलचल तेज़ हुई है. खबरों के मुताबिक, अडानी समूह इस सर्किट को अपने अधिग्रहण प्रस्ताव के साथ जोड़कर देख रहा है.
समूह के वरिष्ठ पदाधिकारी करण अडानी ने हाल ही में कहा कि वे फॉर्मूला 1 को भारत में दोबारा लाने के लिए ‘व्यक्तिगत रूप से सक्रिय’ हैं.
हालांकि, इस उत्साह के बीच कई बुनियादी सवाल भी खड़े होते हैं. बुद्ध इंटरनेशनल सर्किट का निर्माण और स्वामित्व पहले जेपी ग्रुप के पास था, विशेष रूप से उसकी प्रमुख कंपनी जयप्रकाश एसोसिएट्स लिमिटेड और जेपी स्पोर्ट्स इंटरनेशनल लिमिटेड के जरिए. वित्तीय संकट और बकाया देनदारियों के चलते 2019 के आसपास इस परियोजना की ज़मीन का नियंत्रण यमुना एक्सप्रेसवे इंडस्ट्रियल डेवलपमेंट अथॉरिटी के पास चला गया.
कर्ज़ में डूबी जयप्रकाश एसोसिएट्स के अधिग्रहण के लिए अडानी समूह ने नवंबर 2025 में 14,535 करोड़ रुपये का प्रस्ताव देकर अधिकतर ऋणदाताओं का समर्थन हासिल किया. प्रस्ताव में प्रतिद्वंद्वी बोलीदाताओं की तुलना में अधिक अग्रिम भुगतान की पेशकश की गई थी. लेकिन अधिग्रहण प्रक्रिया अभी न्यायिक और नियामकीय मंजूरियों के दायरे में है, ऐसे में फॉर्मूला 1 की वापसी का दावा फिलहाल एक संभावित व्यावसायिक योजना भर है, न कि सुनिश्चित कार्यक्रम.
इस बीच, केंद्रीय खेल मंत्री मनसुख मंडाविया ने हाल में सर्किट का दौरा कर यमुना एक्सप्रेसवे औद्योगिक विकास प्राधिकरण के अधिकारियों से बातचीत की. यह संकेत देता है कि केंद्र और राज्य स्तर पर इस परियोजना को लेकर चर्चा जारी है.
हालांकि, सरकार की ओर से अब तक कोई औपचारिक घोषणा नहीं हुई है कि फॉर्मूला 1 को फिर से ‘खेल’ का दर्जा देकर कर विवाद जैसी पिछली अड़चनों को स्थायी रूप से सुलझा लिया गया है.
गौरतलब है कि बुद्ध सर्किट पर फॉर्मूला 1 रेस 2011, 2012 और 2013 में आयोजित हुई थी. इसके बाद उत्तर प्रदेश सरकार के साथ कर विवाद के चलते यह बंद हो गई. राज्य सरकार का तर्क था कि यह आयोजन खेल नहीं, बल्कि मनोरंजन की श्रेणी में आता है, जिससे टैक्स देनदारी बढ़ी और आयोजन आर्थिक रूप से अव्यवहारिक हो गया.
हाल में दिल्ली में आयोजित ऑल इंडिया मैनेजमेंट एसोसिएशन के 70वें स्थापना दिवस कार्यक्रम में अडानी पोर्ट्स एंड सेज़ के प्रबंध निदेशक करण अडानी ने कहा था, ‘मैं बहुत उत्साहित हूं… जाहिर है कि बुद्ध सर्किट इस सौदे का हिस्सा है. फॉर्मूला वन को भारत में दोबारा लाने के मामले में मैं व्यक्तिगत रूप से काफी सक्रिय हूं. मुझे लगता है कि भारत में बहुत संभावनाएं हैं. भारत में फॉर्मूला वन को लेकर अच्छा खासा समर्थन और प्रशंसक वर्ग मौजूद है.’
लेकिन सवाल यह भी है कि क्या सार्वजनिक नीतियां, कर ढांचा और दीर्घकालिक वित्तीय मॉडल पहले की तुलना में अधिक स्थिर और पारदर्शी हो पाए हैं?
फॉर्मूला 1 की वापसी केवल कॉरपोरेट अधिग्रहण का विस्तार नहीं, बल्कि खेल नीति, कर ढांचे और सार्वजनिक संसाधनों के उपयोग से जुड़ा मुद्दा भी है. ऐसे में यह देखना अहम होगा कि यह पहल खेल विकास के व्यापक हित में आगे बढ़ती है या मुख्यतः एक हाई-प्रोफाइल व्यावसायिक परियोजना के रूप में आकार लेती है.
