नई दिल्ली: जनवादी लेखक संघ के केंद्रीय कार्यालय ने केंद्रीय गृह मंत्रालय से ‘वंदे मातरम’ संबंधी हालिया आदेश को तत्काल वापस लेने की मांग की है.
संगठन का कहना है कि यह निर्णय संविधान सभा के सर्वसम्मत फैसले का उल्लंघन है और संविधान की प्रस्तावना की भावना के भी प्रतिकूल है, जिसमें किसी प्रकार का बदलाव करने का अधिकार किसी को नहीं है.
संघ द्वारा जारी बयान में कहा गया है कि बंकिम चंद्र चट्टोपाध्याय ने ‘वंदे मातरम’ की रचना वर्ष 1875 में की थी और बाद में इसे अपने उपन्यास ‘आनंदमठ’ (1882) में शामिल किया. मूल गीत केवल दो अंतरों का था, जिसमें मातृभूमि की वंदना की गई थी. उपन्यास में शामिल करते समय इसमें चार अतिरिक्त अंतरे जोड़े गए, जिनमें देवी दुर्गा की स्तुति का स्वर प्रमुख है. इस प्रकार गीत में दो अलग-अलग विषयवस्तुएं एक साथ जुड़ गईं.
बयान में कहा गया है कि रवीन्द्रनाथ टैगोर ने 1896 में कांग्रेस के अधिवेशन में पहली बार मूल दो अंतरों वाला ‘वंदे मातरम’ गाया था. स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान यह गीत व्यापक रूप से स्वतंत्रता सेनानियों द्वारा गाया जाता रहा. प्रारंभिक दो अंतरों को लेकर कोई विवाद नहीं था, किंतु विस्तारित संस्करण के सार्वजनिक कार्यक्रमों में गायन पर आपत्तियां उठने लगीं.
इसमें कहा गया है कि इस विवाद के समाधान के लिए कांग्रेस ने 1937 में एक समिति गठित की थी, जिसमें जवाहरलाल नेहरू, सुभाषचंद्र बोस, आचार्य नरेंद्रदेव और मौलाना आजाद शामिल थे. समिति की सहमति बनी कि यदि किसी व्यक्ति को गीत के कुछ अंश आपत्तिजनक लगते हैं, तो उसे राष्ट्रीय सभाओं में कोई अन्य ‘आपत्तिरहित गीत’ गाने की स्वतंत्रता होगी. रवीन्द्रनाथ टैगोर और महात्मा गांधी के समर्थन से कांग्रेस ने यह निर्णय लिया कि सार्वजनिक सभाओं में मूल दो अंतरों वाला गीत ही गाया जाएगा.
संविधान सभा ने रवीन्द्रनाथ टैगोर रचित ‘जन गण मन’ को राष्ट्रीय गान के रूप में स्वीकार किया. यह भी कई अंतरों वाला लंबा गीत है, किंतु इसके आरंभिक भाग को ही राष्ट्रगान के रूप में अपनाया गया. ‘वंदे मातरम’ को राष्ट्रगीत का दर्जा दिया गया, परंतु इसे किसी भी अवसर पर गाना अनिवार्य नहीं किया गया. राष्ट्रगान का गायन पर्याप्त माना गया, हालांकि दोनों को समान सम्मान प्रदान किया गया. संविधान सभा ने 24 जनवरी 1950 को ‘वंदे मातरम’ के पहले दो अंतरों को राष्ट्रगीत के रूप में मान्यता दी थी और इस पर पूर्ण सहमति थी.
बयान में कहा गया है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा अपने तीसरे कार्यकाल (2025) में यह आरोप लगाया गया कि प्रथम प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने मुसलमानों के दबाव में आकर ‘वंदे मातरम’ के सभी अंतरों को राष्ट्रगीत के रूप में स्वीकार नहीं किया, तथ्यात्मक रूप से गलत है. संगठन का दावा है कि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने स्वतंत्रता आंदोलन में भाग नहीं लिया और उस दौर में ‘वंदे मातरम’ का गायन भी नहीं किया.
लेखक संघ के अनुसार फरवरी 2026 में गृह मंत्रालय द्वारा जारी आदेश के तहत सभी सरकारी कार्यक्रमों, शैक्षणिक संस्थानों और बड़े सार्वजनिक आयोजनों में राष्ट्रगान ‘जन गण मन’ से पहले ‘वंदे मातरम’ के सभी छह अंतरों का गायन अनिवार्य किया गया है.
जनवादी लेखक संघ ने कहा है कि गृह मंत्रालय का यह आदेश स्वतंत्रता आंदोलन की विरासत और संविधान दोनों की भावना के विपरीत है.
संगठन के अनुसार, यह संविधान सभा के सर्वसम्मत निर्णय का उल्लंघन है और इसके पीछे सांप्रदायिक दृष्टिकोण काम करता दिखाई दे रहा है. यह कदम देश की एकता को कमजोर करने तथा धार्मिक अल्पसंख्यकों को अपमानित करने की कोशिश भी है.
संघ ने इस आदेश को अस्वीकार्य बताते हुए सरकार से इसे तत्काल वापस लेने की मांग की है.
इससे पहले पूर्वोत्तर के प्रभावशाली छात्र संगठन नगा स्टूडेंट्स फेडरेशन (एनएसएफ) ने कड़ा विरोध किया है.
एनएसएफ ने 20 फरवरी को जारी बयान में कहा, ‘यह निर्देश एक सख्त प्राथमिकता क्रम निर्धारित करता है और सबसे जरूरी बात इसे स्कूलों पर लागू करता है. ऐसा निर्देश थोपना नगा समाज की ऐतिहासिक, राजनीतिक और सांस्कृतिक वास्तविकताओं की अनदेखी करता है. हम भारतीय संविधान के ढांचे, जिसमें अनुच्छेद 51A(क) भी शामिल है, से अवगत हैं, लेकिन हम स्पष्ट रूप से कहते हैं कि कोई भी प्राधिकरण नगा मातृभूमि पर इस तरह से सांस्कृतिक या विचारधारा के हिसाब से चलने के लिए मजबूर नहीं कर सकती जो हमारे खास इतिहास और पहचान की अनदेखी करे.’
