इरैडिकेशन: जनसंहार के बीच खड़े एक रोहिंग्या कवि का प्रतिरोध

पुस्तक समीक्षा: रोहिंग्या जनसंहार की भयावह पृष्ठभूमि में मय्यू अली की किताब ‘इरैडिकेशन’ केवल एक संस्मरण नहीं, बल्कि मिटा दिए जाने के ख़िलाफ़ कविता का प्रतिरोध है. यह पुस्तक बताती है कि नफ़रत कैसे जन्म लेती है और स्मृति, भाषा व साहस किस तरह अस्तित्व को बचाने का आख़िरी सहारा बनते हैं.

(तस्वीर साभार: मय्यू अली के इंस्टाग्राम से)

’16 साल की उस बच्ची के साथ म्यांमार सेना के 5 सिपाहियों ने बलात्कार किया. छठवें सिपाही ने उस अधमरी बच्ची के कान में कहा कि वह अपने लिंग से उसका बलात्कार नहीं करेगा, बल्कि चाकू से करेगा. और यह कहते ही उसने बेहद नफरत के साथ ऐसा कर दिया.’

[इसी किताब से]

16 साल की इस रोहिंग्या बच्ची के लिए ये सभी बलात्कारी अजनबी थे. उस बच्ची ने या उसके घर वालों ने या उसके समुदाय ने कभी भी उन बलात्कारियों का रत्ती भर कुछ नहीं बिगाड़ा था. फिर यह नफरत कहां से आई?

म्यांमार में जारी जनसंहार से बचकर अपना सब कुछ लुटाकर जब वो बांग्लादेश और फिर भारत पहुचे तो यहां भी उस नफरत ने इनका पीछा नहीं छोड़ा. इन्हीं रोहिंग्या मुसलमानों के लिए भाजपा नेता टी. राजा सिंह ने कहा था कि सभी रोहिंग्या को गोली मार देनी चाहिए. भारत में रोहिंग्या एक गाली की तरह इस्तेमाल होने लगा. उन्हें ‘आतंकवादी’, ‘अवैध शरणार्थी’ और ‘जिहादी’ घोषित कर दिया गया. इन बेबस लाचार रोहिंग्या मुसलामानों के खिलाफ प्रचार किया गया कि ये रात में आपके घरों में घुसकर आपकी हत्या कर सकते है.

इन्हीं रोहिंग्या में से एक हैं 35 वर्षीय मय्यू अली.

लेकिन मय्यू अली ने इस क्रूर जनसंहार के बीच महज बेबस शरणार्थी बनकर जीने से इनकार कर दिया. उन्होंने कविता की शरण ली और अपनी कविताओं में अपना प्रति संसार रचना शुरू किया, जहां उन्होंने वो सभी चीजें सहेजकर रखनी शुरू कीं, जिन्हें म्यांमार के इस क्रूर जनसंहार ने मिटा देना चाहा था. मसलन रोहिंग्या की भाषा, संस्कृति, गीत, मुहावरे और सबसे बढ़कर उनकी जिजीविषा.

उम्मीद और जिजीविषा की अंतिम शरणस्थली कविता ही तो है. मय्यू अली के ही शब्दों में, हमारी संस्कृति को उन्होंने हमसे ही छीनी जमीनों पर दफ्न कर दिया. अब उसे कविताओं में ही सहेजा और बचाया जा सकता है. इसीलिए उन्होंने लिखा:

हर रात मेरा क़त्ल कर दिया जाता है
और हर सुबह मैं जिंदा हो जाता हूं

पिछले दिनों आई मय्यू अली की किताब ‘इरैडिकेशन: ए पोएट ऐट द हार्ट ऑफ द रोहिंग्या जेनोसाइड‘ रोहिंग्या मुसलमानों के क्रूर जनसंहार का जीवंत दस्तावेज भी है, और इसके खिलाफ जिंदा प्रतिरोध भी. कविता के साथ मुख्यतः आत्मकथा की शैली में लिखी इस किताब की एक बानगी आपको मय्यू अली की एक कविता के इस अंश से मिल सकती है:

आपने आग को तो देखा
लेकिन यह न देख सके कि इस आग में हम कैसे जले
आपने हत्याओं के बारे में तो पढ़ा
लेकिन यह नहीं जान सके कि हमारा गला रेता कैसे गया
मेरी पीड़ा को दस्तावेजों में क़ैद करने वालों को पुरस्कार मिले
लेकिन मेरे दर्द को अभी भी न्याय का इंतज़ार है

मय्यू अली के लिए कविता लिखना प्रतिरोध का प्रतीक बन गया. पोलिस प्रोजेक्ट को दिए अपने साक्षात्कार में उन्होंने कहा, ‘कविता मिटा दिए जाने के खिलाफ मेरा प्रतिरोध है, जो मेरे होने की घोषणा करती है.’

बांग्लादेश में करीब 7 लाख रोहिंग्या शरणार्थियों वाले एक शिविर में बेहद नारकीय जीवन जीते हुए एक दिन मय्यू अली की मुलाक़ात फ्रांस की प्रसिद्ध पत्रकार एमिली लोपेज़ (Emilie Lopes) से हुई. लोपेज़ म्यांमार सैनिकों द्वारा बलात्कार के कारण गर्भधारण करने वाली महिलाओं का ‘Le Figaro’ अखबार के लिए दस्तावेजीकरण कर रही थीं.

लोपेज ने जब मय्यू अली की कविताओं और उनकी जिजीविषा के बारे में जाना, तो वह काफी प्रभावित हुईं और काफी प्रयास करके उन्हें कनाडा का शरणार्थी वीज़ा दिलवा दिया. वह अपनी पत्नी और नन्हीं बच्ची इनाया के साथ कनाडा चले गए. हालांकि यह फैसला कतई आसान न था. अपने लोगों को इन हालात में छोड़कर आने से वह काफी समय तक अवसाद व अपराधबोध में भी रहे.

यहीं उन्होंने लोपेज़ के सहयोग से यह महत्वपूर्ण किताब लिखी और दुनिया को बताया कि सिर्फ यह जानना पर्याप्त नहीं है कि हम मारे गए क्योंकि हम महज सांख्यिकी नहीं हैं. यह जानना कहीं ज्यादा महत्वपूर्ण है कि हम कैसे मारे गए. अगर आप यह जानते हैं कि यहूदियों को मारा गया, लेकिन यह नहीं जानते कि उन्हें गैस चेंबर में मारा गया तो आप जनसंहार यानी होलोकॉस्ट को कतई नहीं समझ सकते.

मय्यू अली का जन्म म्यांमार के अराकान प्रांत में 1991 में हुआ. लगभग इसी समय से म्यांमार में रोहिंग्या मुस्लिमों को हाशिये पर धकेलना की प्रक्रिया काफी तेज़ होने लगी, जो 2017 तक आते-आते बड़े पैमाने के जनसंहार में बदल गई. इस तरह रोहिंग्या इस पृथ्वी पर सबसे बड़े शरणार्थी समूह में तब्दील हो गए. इस किताब का सबसे सशक्त पहलू यह है कि मय्यू अली ने ‘हाशिये पर धकेलना’ की इस प्रक्रिया को ‘सूक्ष्मतम स्तर तक’ जाकर दर्ज किया है.

साथ ही, यह रेखांकित किया है कि जनसंहार की प्रक्रिया हमारे जीवन में चुपचाप दबे पांव आती है और प्रायः हम सोचते हैं कि मामला शायद इससे आगे नहीं बढ़ेगा या कि यह बेहद मामूली बातें हैं.

यहीं पर हम भारतवासी अपना चेहरा भी बखूबी देख सकते हैं. बाबरी मस्जिद तोड़े जाने के बाद से मुस्लिमों के हाशिये पर धकेलना की प्रक्रिया जितनी तेज़ हुई है, वह हमें उधर ही धकेल रही है, जिसका सामना आज मय्यू अली और रोहिंग्या मुस्लिम कर रहे हैं.

बचपन की बात बताते हुए मय्यू अली कहते हैं कि हम बौद्ध बच्चों के साथ सहज ही खेलते थे. कोई अंतर नज़र नहीं आता था. लेकिन थोड़ा बड़े होने पर उन्होंने पाया कि सार्वजनिक जगहों पर उनके पहचान पत्र तो चेक किए जाते हैं, लेकिन बौद्ध लोगों को कुछ नहीं कहा जाता. कुछ समय बाद उनके लिए अपमानजनक शब्द ‘कालर’ का इस्तेमाल बढ़ने लगा, उन्हें जन्म-प्रमाणपत्र से वंचित किया जाने लगा. सार्वजनिक संस्थाओं पर उनसे भेदभाव होने लगा.

अंततः एक सर्द रात मय्यू अली के गांव को सेना ने घेर लिया. मय्यू अली के घर की सघन और बेहद डरावनी तलाशी ली गई. अगले दिन स्कूल जाने पर मय्यू अली ने पाया कि गांव के सभी मुस्लिम घरों की तलाशी ली गई है, लेकिन किसी भी बौद्ध बच्चे के घर की तलाशी नहीं ली गई है. इसी दिन मय्यू अली के भीतर कुछ दरक गया और इसी के बाद उन्होंने कविता की शरण ली.

सबसे आश्चर्य तो तब होता है, जब मय्यू अली यह बताते हैं कि कैसे बौद्ध विहारों में मुस्लिमों के खिलाफ नफरत के संदेश दिए जाते थे और आम बौद्ध लोगों को मुस्लिमों के खिलाफ हिंसा करने के लिए उकसाया जाता है. जो धर्म हमेशा से शांति और करुणा का पर्यायवाची रहा है, उसका यह ‘मेटामोर्फोसिस’ हैरान कर देने वाला है. भारत में भी आए दिन होने वाली ‘धर्म संसद’ में इसकी खौफनाक गूंज सुनी जा सकती है.

किताब का अंतिम अध्याय बहुत ही खूबसूरत है. यह अध्याय दरअसल बेटी इनाया के नाम मय्यू अली का खत है. इसमें उन्होंने अपनी बेटी को उसके जन्म की कहानी बताते हुए लिखा कि जब वह अपने परिवार के साथ शरणार्थी बन कर बांग्लादेश आए तो अपने साथ एक जार में वहां की मिट्टी भी लाए थे. रोहिंग्या मुसलमानों में यह प्रथा है कि बच्चे के जन्म के बाद उसकी गर्भनाल को घर के पीछे अपनी जमीन की मिट्टी में ही गाड़ दिया जाता है. मान्यता है कि इससे व्यक्ति का अपनी जमीन से रिश्ता बना रहता है. लेकिन जब बांग्लादेश के एक सरकारी अस्पताल में इनाया का जन्म हुआ, तो डाक्टरों ने गर्भनाल नहीं दी. इससे मय्यू अली बहुत दुखी हुए.

फिर इनाया अपनी मिट्टी से कैसे जुड़ेगी?

मय्यू अली की यह किताब इसी अर्थ में इनाया को अपनी ‘मिट्टी’ से जोड़ने के लिए है. जब इनाया बड़ी होगी तो यह किताब पढ़ेगी और समझ सकेगी कि वह किस ‘मिट्टी’ का हिस्सा है और इस ‘मिट्टी’ की सुगंध कैसी है. और सबसे बढ़कर इस ‘मिट्टी’ का इतिहास कैसा है.

मय्यू अली के ही शब्दों में, ‘मैं यह किताब तुम्हें समर्पित कर रहा हूं ताकि तुम अपना इतिहास कभी न भूलो, वह इतिहास जिसे म्यांमार के कुछ लोग मिटा देना चाहते हैं.’

किताब की शुरुआत मय्यू अली ने एक रोहिंग्या कहावत से की है, उसी से मैं इसे समाप्त करना चाहता हूं, ‘अगर जरूरत पड़े तो भात-मांड खाकर भी जीवित रह लेना लेकिन कभी भी अपना साहस मत खोना.’

मय्यू अली की यह किताब इसी साहस की दास्तान है.

(मनीष आज़ाद सामाजिक-राजनीतिक कार्यकर्ता व लेखक हैं.)