बीते दिनों एक दोपहर जब उदास आकाश की रोशनी कमरे में उतर रही थी, तब फेसबुक पर सुविख्यात अनुवादक अरुणाव सिन्हा की एक पोस्ट दिखाई दी. पोस्ट छोटी थी, लगभग संयत. जैसे हमारे समय में विदाइयां आती हैं. मणि शंकर मुखर्जी, जिन्हें साहित्य की दुनिया केवल ‘शंकर’ के नाम से जानती है, नहीं रहे. वे 92 वर्ष के थे. शब्दों में कोई नाटकीयता नहीं थी, केवल तथ्य का भार था. लेकिन उस संक्षिप्त सूचना के भीतर बांग्ला साहित्य का एक पूरा युग जैसे चुपचाप पन्ना पलटकर बंद हो गया.
शंकर उस पीढ़ी के लेखक थे जो कहानियां लिखते नहीं थे, उन्हें जीते थे. 7 दिसंबर 1933 को बंगाल के हिंदमोटर में जन्मे शंकर ने ऐसे समय में जीवन शुरू किया जब देश औपनिवेशिक सत्ता से बाहर निकलने की प्रक्रिया में था. किशोरावस्था में ही पिता का निधन हो गया. आर्थिक जिम्मेदारियों के बीच उन्होंने कलकत्ता हाईकोर्ट में क्लर्क की नौकरी की और अंग्रेज़ बैरिस्टर नोएल फ्रेडरिक बारवेल के साथ काम किया. अदालत और साम्राज्य के ढलते बरामदों में जो अनुभव उन्हें मिले, वही उनके लेखन की पहली पूंजी बने.
इन्हीं अनुभवों पर आधारित उनकी पहली पुस्तक ‘कतो अजानारे’ प्रकाशित हुई, जिसमें एक युवा मन की जिज्ञासा और जीवन की नैतिक उलझनों की स्पष्ट छाप मिलती है.
वह होटल जो शहर बन गया
1962 में ‘चौरंगी’ के प्रकाशन ने शंकर को स्थायी रूप से शहर और भारतीय साहित्य के मानचित्र पर अंकित कर दिया. यदि कुछ उपन्यास ऐसे होते हैं जो किसी स्थान को इतना आत्मसात कर लेते हैं कि वह भूमि सांस लेने लगती है, तो ‘चौरंगी’ उनमें से एक है. कलकत्ता की ऐतिहासिक सड़क पर स्थित काल्पनिक शाहजहां होटल के भीतर यह कथा एक ऐसे रंगमंच का निर्माण करती है जहां महत्वाकांक्षा, अकेलापन, वासना, विश्वासघात और आशा एक साथ उपस्थित हैं.
होटल का लॉबी एक चौराहा है. वहां बेलबॉय हैं, प्रबंधक हैं, नर्तकियां हैं, अधिकारी हैं, स्वप्न देखने वाले हैं और पराजित लोग भी. शंकर का शहर पृष्ठभूमि नहीं है. वह धड़कन है. ‘चौरंगी’ का कलकत्ता उत्तर-औपनिवेशिक है, लेकिन साम्राज्य की स्मृतियां उसके भीतर अब भी गूंजती हैं. वह आकर्षक है और निर्दयी भी. झूमरों की रोशनी और गलियारों की खामोशी के बीच शंकर उन सूक्ष्म समझौतों को दर्ज करते हैं जिनके सहारे मनुष्य जीवित रहता है.
अनुवाद एक स्मृति की तरह
‘चौरंगी’ का जीवन उसके प्रथम प्रकाशन के बाद समाप्त नहीं हुआ. 1968 में उस पर फिल्म बनी और वह लोकप्रिय स्मृति का हिस्सा बन गई. कई दशकों बाद अरुणाव सिन्हा ने इसे अंग्रेज़ी में अनूदित किया. यह अनुवाद केवल भाषिक परिवर्तन नहीं था, बल्कि स्मृति का विस्तार था. 2007 में प्रकाशित अंग्रेज़ी संस्करण ने शाहजहां होटल के कमरों को वैश्विक पाठकों के लिए खोल दिया. आज जब अरुणाव की पोस्ट पढ़ी, तो लगा कि अनुवाद दरअसल दीयों को जलाए रखने की एक चुप क्रिया है.
‘चौरंगी’ के बाद भी शंकर ने शहर की नैतिक उलझनों को छोड़ा नहीं. ‘सीमाबद्ध’ और ‘जन अरण्य’ में उन्होंने महत्वाकांक्षा और नैतिकता के असहज संबंधों को परखा. इन रचनाओं ने सत्यजीत रे का ध्यान आकर्षित किया और वे उनकी कलकत्ता त्रयी का हिस्सा बनीं. शंकर के यहां शहर केवल अवसर का स्थल नहीं है. वह परीक्षा का स्थल भी है. दफ्तर की मेज़, बहीखाता, थका हुआ चेहरा, सब उनके वाक्यों में उपस्थित हैं.
पवित्र और सांसारिक के बीच
शंकर केवल शहरी जीवन के लेखक नहीं थे. उन्होंने स्वामी विवेकानंद और रामकृष्ण परमहंस पर भी लिखा. इन कृतियों में उन्होंने महापुरुषों को मनुष्य के रूप में देखने की कोशिश की. उनके भीतर की शंका, उनकी अध्यात्मिक यात्रा, उनका मानवीय संघर्ष. यहां शंकर धर्म को विचारधारा नहीं बनाते. वे उसे अनुभव की तरह पढ़ते हैं.
2021 में उन्हें ‘एका एका एकाशी’ के लिए साहित्य अकादेमी पुरस्कार मिला. यह सम्मान उनके लंबे साहित्यिक जीवन की औपचारिक स्वीकृति था. लेकिन सच यह है कि उनका वास्तविक सम्मान पाठकों की निरंतर उपस्थिति में निहित है.
भाषाओं के पार
शंकर की कृतियां बांग्ला से बाहर भी गईं. ‘चौरंगी’ का हिंदी में अनुवाद हुआ. साहित्यिक जगत में अक्सर यह उल्लेख आता है कि हिंदी और मैथिली के चर्चित लेखक राजकमल चौधरी ने इसे ‘चौरंगी’ शीर्षक से हिंदी में प्रस्तुत किया था. चाहे बांग्ला में पढ़ा जाए या हिंदी में, इस कथा की पीड़ा और उसकी करुणा समान रहती है.
राजकमल चौधरी स्वयं शहरी बेचैनी के लेखक थे, इसलिए यह संवाद स्वाभाविक प्रतीत होता है.

अनुवाद यहां केवल भाषाई सेतु नहीं था, बल्कि अनुभव का पुनर्जन्म था. एक शहर, जो मूलतः कोलकाता था, हिंदी के पाठकों के मन में अपने-अपने शहरों में बदल जाता है. शाहजहां होटल का गलियारा पटना, इलाहाबाद, दिल्ली या लखनऊ की किसी इमारत में रूपांतरित हो उठता है. यही शंकर की ताकत थी कि वे स्थानीय होकर भी सीमित नहीं थे. उनकी कथा में जो आकांक्षा है, जो नैतिक उलझन है, जो पराजय और जिद का मिश्रण है, वह भारतीय मध्यवर्ग की साझा नियति है.
इसीलिए ‘चौरंगी’ केवल एक अनूदित उपन्यास नहीं रह जाता, वह भाषाओं के बीच चलती उस सांस्कृतिक बातचीत का हिस्सा बन जाता है जिसमें शहर, मनुष्य और समय एक-दूसरे का अनुवाद करते रहते हैं.
शहर एक वादा और एक जाल
शंकर की भाषा में कोई आडंबर नहीं है. वह शांत है, लेकिन भीतर एक नैतिक अस्थिरता लिए हुए. वे देखते हैं कि व्यवस्था मनुष्य को कैसे आकार देती है. आर्थिक महत्वाकांक्षा किस तरह नैतिक धरातल को क्षीण करती है. भीड़ में भी अकेलापन कैसे बना रहता है. उनके लिए शहर एक वादा भी है और एक जाल भी.
आज जब उनके जाने की खबर सुनकर शाहजहां होटल की छवि मन में लौटती है. गलियारे शायद थोड़े धुंधले हैं. मेज़ पर घंटी रखी है. लिफ्ट अब भी चल रही है. पात्र अब भी बहस कर रहे हैं. यही साहित्य का विरोधाभास है. सृजक चला जाता है, सृजन रह जाता है.
देखने की नैतिकता
शंकर उपदेशक नहीं थे. वे पर्यवेक्षक थे. वे देखते थे और पाठक को देखने देते थे. उनका लेखन सरल नहीं करता, वह जटिलता को स्वीकार करता है. उसमें एक प्रकार की नैतिक विनम्रता है.
उनकी संवेदना विशिष्ट रूप से बांग्ला है, लेकिन उनके प्रश्न भारतीय हैं. वे उस समाज की थरथराहट को पकड़ते हैं जो आधुनिकता से जूझ रहा है, औपनिवेशिक अवशेषों से संवाद कर रहा है और अपनी नई पहचान गढ़ रहा है.
खुले रह गए दरवाज़े
साहित्य नागरिक स्मृति भी है. वह घटनाओं से अधिक वातावरण को दर्ज करता है. शंकर ने एक शहर का वातावरण सुरक्षित किया. उनके बिना वह शायद स्मृति में धुंधला पड़ जाता.
शोक को बड़े शब्दों में व्यक्त करना आसान है. लेकिन शायद सही प्रतिक्रिया यह है कि ‘चौरंगी’ को फिर से खोला जाए. ‘सीमाबद्ध’ को फिर से पढ़ा जाए. उन क्षणों को याद किया जाए जब कोई पात्र खिड़की पर खड़ा होकर अपने जीवन के आकार पर विचार करता है. उन्हीं क्षणों में शंकर जीवित हैं.
मणि शंकर मुखर्जी केवल अपनी पुस्तकों को नहीं, एक दृष्टि को छोड़ गए हैं. उन्होंने सिखाया कि साधारण जीवन के भीतर भी महाकाव्य छिपे होते हैं. होटल की लॉबी और दफ्तर की मेज़ के भीतर भी मनुष्य की पूरी कथा दर्ज हो सकती है.
अंत में, चौरंगी का रखवाला अपनी कथा से बाहर चला गया है. लेकिन उसके खोले हुए दरवाज़े अब भी खुले हैं. आने वाली पीढ़ियां उन दरवाज़ों से गुजरेंगी, बेचैन और जिज्ञासु, और शायद अपने ही जीवन का प्रतिबिंब उन पन्नों में पाएंगी.
(आशुतोष कुमार ठाकुर समाज, साहित्य और कला पर लिखते हैं.)
