खाड़ी संघर्ष से शिपिंग और तेल आपूर्ति प्रभावित, भारत ने गहरी चिंता जताई

ईरान पर अमेरिका-इज़रायल हमलों बीच भारत ने खाड़ी में रह रहे एक करोड़ नागरिकों और ऊर्जा आपूर्ति पर खतरे को लेकर गंभीर चिंता जताई है. स्ट्रेट ऑफ होर्मुज बाधित होने के बावजूद सरकार ने ईंधन भंडार को पर्याप्त बताया है, जबकि तेल की कीमतों में उछाल और आयात लागत बढ़ने की आशंका बनी हुई है.

प्रमुख व्यापारिक समुद्री मार्ग होर्मुज स्ट्रेट. (फोटो: एपी/जॉन गैम्ब्रेल)

नई दिल्ली: जैसे-जैसे ईरान, अमेरिका और इज़राइल के बीच संघर्ष मिसाइल और ड्रोन हमलों तथा खाड़ी क्षेत्र की समुद्री मार्गों पर हमलों के साथ तेज होता जा रहा है, भारत ने मंगलवार (3 मार्च) को इस संघर्ष पर अपनी आधिकारिक आकलन को और विस्तृत किया. भारत ने बढ़ती मौतों, आर्थिक व्यवधानों और भारतीय नागरिकों तथा व्यापारिक मार्गों पर सीधे खतरे के कारण ‘गंभीर चिंता’ व्यक्त की.

सिर्फ तीन दिन पहले, 28 फरवरी को विदेश मंत्रालय द्वारा जारी बयान संक्षिप्त था. उसमें चिंता व्यक्त की गई थी, संयम बरतने की अपील की गई थी और ‘सभी देशों की संप्रभुता और क्षेत्रीय अखंडता’ का सम्मान करने का आह्वान किया गया था. यह वाक्यांश, जो आमतौर पर सीमापार हमलों के संदर्भ में लागू होने वाला एक मानक कूटनीतिक अभिव्यक्ति है, मंगलवार के बयान में उल्लेखनीय रूप से गायब है.

जहां पहले बयान में तनाव ‘कम करने’ के लिए संवाद की बात कही गई थी, वहीं ताज़ा बयान में भारत ने ‘संघर्ष को जल्द खत्म’ करने की अपील की है.

क्षेत्रीय प्रभाव के विस्तार को स्वीकार करते हुए मंत्रालय ने मंगलवार को कहा कि संघर्ष शुरू होने के बाद से स्थिति ‘काफी और लगातार बिगड़ी है’ तथा यह संघर्ष ‘अन्य देशों तक फैल गया है.’ बयान में कहा गया कि ‘विनाश और मौतों की संख्या बढ़ रही है’ और ‘सामान्य जीवन तथा आर्थिक गतिविधियां ठप हो रही हैं.’

बयान में भारत को ‘इस क्षेत्र की सुरक्षा और स्थिरता में महत्वपूर्ण हितों वाला एक निकटवर्ती पड़ोसी’ बताया गया और कहा गया कि इन घटनाक्रमों ने ‘गंभीर चिंता उत्पन्न की है.’

नई दिल्ली ने अपने जोखिम का आकलन करते हुए कहा कि ‘लगभग एक करोड़ भारतीय नागरिक’ खाड़ी देशों में रह रहे और काम कर रहे हैं.

संयुक्त अरब अमीरात में सबसे अधिक 34 से 35 लाख भारतीय नागरिक रहते हैं, इसके बाद सऊदी अरब में 25 से 30 लाख और कुवैत में दस लाख से अधिक भारतीय हैं. कतर और ओमान में प्रत्येक में 7 लाख से अधिक भारतीय रहते हैं, जबकि बहरीन में लगभग 3 से 3.2 लाख भारतीय हैं. इनमें से अधिकांश निर्माण, खुदरा व्यापार, स्वास्थ्य सेवा और अन्य सेवा क्षेत्रों में कार्यरत हैं.

भारतीय मिशनों ने नागरिकों को आवश्यकतानुसार घरों के भीतर रहने, दूतावासों में पंजीकरण कराने और संघर्ष क्षेत्रों से दूर रहने की सलाह देते हुए कई बार परामर्श जारी किए हैं. उड़ानों के रद्द होने और सीमाएं बंद होने से फंसे लोगों की सहायता के लिए आपातकालीन हेल्पलाइन संचालित की जा रही हैं. पिछले 24 घंटों में खाड़ी देशों में फंसे भारतीयों की सीमित संख्या में वापसी शुरू हुई है, क्योंकि एयरलाइनों ने सीमित उड़ानें फिर से शुरू कर दी हैं.

पहली बार विदेश मंत्रालय के बयान में भारतीयों के मारे जाने की पुष्टि की गई, जिनका उल्लेख अब तक व्यक्तिगत राजनयिक मिशनों द्वारा किया गया था, हालांकि सीधे तौर पर इसकी निंदा नहीं की गई.

बयान में व्यापारी जहाजों पर हमलों का जिक्र करते हुए  कहा गया, ‘पिछले कुछ दिनों में ऐसे हमलों के परिणामस्वरूप कुछ भारतीय नागरिकों की मौत हुई है या वे लापता हैं.’ भारत ने कहा कि वह ऐसे हमलों का ‘पूरी तरह से विरोध’ करता है.

भारत ने चेतावनी दी कि ‘हमारे व्यापार और ऊर्जा आपूर्ति शृंखलाएं भी इसी भौगोलिक क्षेत्र से होकर गुजरती हैं’ और ‘किसी भी बड़े व्यवधान के भारतीय अर्थव्यवस्था पर गंभीर परिणाम होंगे.’

भारत अपनी कच्चे तेल की आवश्यकता का लगभग 85 से 90 प्रतिशत आयात करता है, जो लगभग 55 से 56 लाख बैरल प्रतिदिन है, जिसमें से एक-तिहाई से अधिक तेल होर्मुज स्ट्रेट से होकर आता है. भारत के तरलीकृत प्राकृतिक गैस (एलएनजी) आयात का लगभग आधा हिस्सा भी इसी मार्ग पर निर्भर है, जिसमें लगभग 40 प्रतिशत कतर से लॉन्ग-टर्म कॉन्ट्रैक्ट के तहत आता है.

ग्लोबल बेंचमार्क ब्रेंट कच्चे तेल की कीमत मंगलवार को 85 डॉलर प्रति बैरल से ऊपर पहुंच गई, आपूर्ति संबंधी चिंताओं के कारण इसमें वृद्धि हुई. यदि इस होर्मुज स्ट्रेट की नाकेबंदी होती है तो कीमतें 90 से 100 डॉलर प्रति बैरल तक जा सकती हैं, जिससे भारत के आयात बिल में अरबों डॉलर की वृद्धि होगी और महंगाई तथा रुपये पर दबाव बढ़ेगा.

मंत्रालय ने कहा कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और विदेश मंत्री एस. जयशंकर ने अपने समकक्षों से बातचीत की है. बयान में कहा गया कि भारत ‘इस क्षेत्र की सरकारों और अन्य प्रमुख साझेदारों के संपर्क में है.’ विदेश मंत्रालय के बयान का समापन इस वाक्य के साथ हुआ: ‘सरकार स्थिति पर कड़ी नजर रखेगी और राष्ट्रीय हित में आवश्यक निर्णय लेती रहेगी.’

मोदी की पहल मुख्यतः खाड़ी क्षेत्र के अरब नेताओं की ओर केंद्रित रही है, जबकि ईरानी अधिकारियों के साथ किसी सार्वजनिक रूप से पुष्टि की गई बातचीत का उल्लेख नहीं है.

मंगलवार को मोदी ने हैथम बिन तारिक (ओमान के सुल्तान), शेख सबाह अल-खालिद अल-हमद अल-सबह (कुवैत के क्राउन प्रिंस) और शेख तमीम बिन हमद अल-थानी (कतर के अमीर) से बातचीत की. हर बातचीत में मोदी ने ईरान का नाम लिए बिना उन देशों पर हुए हमलों की निंदा की और भारतीय नागरिकों की कल्याण और सुरक्षा पर चर्चा की.

ओमान ने कहा कि नेताओं ने हालिया सैन्य तनाव के क्षेत्रीय सुरक्षा पर प्रभाव पर चर्चा की और तनाव कम करने तथा कूटनीति के लिए ‘समन्वित अंतरराष्ट्रीय प्रयासों’ पर बल दिया. कतर की आधिकारिक जानकारी में कहा गया कि अमीर ने दोहा में रह रहे भारतीय समुदाय के कल्याण को लेकर मोदी को आश्वस्त किया.

पिछले दो दिनों में मोदी ने मोहम्मद बिन सलमान (सऊदी अरब के क्राउन प्रिंस), शेख मोहम्मद बिन जायद अल-नहयान (यूएई के राष्ट्रपति), हामद बिन ईसा अल-खलीफा (बहरीन के राजा), अब्दुल्ला द्वितीय (जॉर्डन के राजा) और बेंजामिन नेतन्याहू (इज़राइल के प्रधानमंत्री) से भी बातचीत की.

ईरानी अधिकारियों के साथ संपर्क का कोई उल्लेख न होना उल्लेखनीय है, विशेषकर तेहरान के साथ भारत के ऐतिहासिक संबंधों को देखते हुए, जिनमें चाबहार बंदरगाह परियोजना भी शामिल है, जिसे अफगानिस्तान और मध्य एशिया तक संपर्क द्वार के रूप में संयुक्त रूप से विकसित किया गया है.

भारत ने ईरान पर अमेरिका और इज़राइल के हमलों, जिनमें सर्वोच्च नेता अली खामेनेई की हत्या भी शामिल है, की कोई निंदा जारी नहीं की है, हालांकि भारतीय विपक्ष ने इसकी तीखी आलोचना की है.

भारत का ईंधन भंडार पर्याप्त: हरदीप सिंह पुरी

पश्चिम एशिया में जारी संघर्ष के कारण प्रमुख समुद्री मार्ग होर्मुज स्ट्रेट से व्यापार बाधित होने के बीच, जो भारत के पेट्रोलियम उत्पाद आयात का अहम मार्ग है, केंद्र सरकार का आकलन है कि उसके ईंधन भंडार ‘पर्याप्त रूप से संतोषजनक’ स्तर पर हैं और वे संघर्ष से उत्पन्न ‘अल्पकालिक व्यवधानों’ का सामना करने के लिए पर्याप्त हैं.

केंद्रीय पेट्रोलियम और प्राकृतिक गैस मंत्री हरदीप सिंह पुरी ने मंगलवार (3 मार्च) को मीडिया से बातचीत में कहा कि भारतीय ऊर्जा कंपनियों के पास अब ‘ऐसी ऊर्जा आपूर्तियों तक पहुंच है जो हॉर्मुज़ स्ट्रेट से होकर नहीं गुजरतीं’ और ये आपूर्तियां संघर्ष से अस्थायी रूप से प्रभावित होने वाली आपूर्ति की भरपाई करने में मदद करेंगी. हालांकि उन्होंने इन कार्गो के स्रोत के बारे में विस्तार से नहीं बताया.

केंद्रीय पेट्रोलियम एवं प्राकृतिक गैस मंत्री हरदीप सिंह पुरी. (फोटो: पीटीआई)

ईरान और दूसरी ओर अमेरिका व इज़राइल के बीच संघर्ष के कारण इस हॉर्मुज़ स्ट्रेट में रुकावट ऐसे समय आई है जब ट्रंप प्रशासन के दबाव के बीच भारतीय रिफाइनरियों द्वारा रूसी तेल की खरीद घटाए जाने के बाद पश्चिम एशियाई कच्चे तेल पर भारत की निर्भरता बढ़ी है.

समाचार एजेंसी रॉयटर्स के अनुसार, यदि यह संघर्ष दस दिन या पखवाड़े से अधिक समय तक चलता है तो भारत कच्चे तेल, एलएनजी और एलपीजी के वैकल्पिक स्रोतों की तलाश कर रहा है. वहीं ब्लूमबर्ग ने बताया कि पुरी के मंत्रालय के अधिकारी विदेश मंत्रालय के अपने समकक्षों से ‘वॉशिंगटन से कुछ गुंजाइश निकालने’ की पैरवी कर रहे हैं. अमेरिका ने भारत द्वारा रूसी तेल की खरीद के ‘दंड’ के रूप में लगाया गया 25% टैरिफ पिछले महीने यह दावा करते हुए समाप्त किया था कि नई दिल्ली ने ऐसी खरीद रोकने पर सहमति जताई है.

पश्चिम एशिया में संघर्ष के चौथे दिन पत्रकारों से बातचीत करते हुए पुरी ने कहा कि भारत ‘मध्य पूर्व से उत्पन्न अल्पकालिक व्यवधानों से निपटने के लिए कच्चे तेल और पेट्रोल, डीजल तथा एटीएफ (जेट ईंधन) सहित प्रमुख पेट्रोलियम उत्पादों के पर्याप्त भंडार है.’

भारत की स्थिति का उल्लेख करते हुए उन्होंने कहा कि भारत विश्व का तीसरा सबसे बड़ा आयातक, चौथा सबसे बड़ा रिफाइनर और पेट्रोलियम उत्पादों का पांचवां सबसे बड़ा निर्यातक है. मंत्री ने जोड़ा कि भारतीय ऊर्जा कंपनियों के पास अब ‘ऐसी ऊर्जा आपूर्तियों तक पहुंच है जो हॉर्मुज़ स्ट्रेट से होकर नहीं गुजरतीं’ और जो पश्चिम एशिया में आपूर्ति बाधित होने की स्थिति में इसकी भरपाई कर सकती हैं.

पुरी ने कहा, ‘वर्तमान में भंडार के संदर्भ में सरकार पर्याप्त रूप से संतुष्ट है… निरंतर निगरानी के आधार पर सरकार सतर्क आशावादी है कि आवश्यकता पड़ने पर चरणबद्ध उपाय करके स्थिति को और नियंत्रित किया जा सकता है.’

सप्ताहांत में अमेरिका और इज़राइल द्वारा हमले किए जाने के बाद ईरान ने प्रतिक्रिया स्वरूप अन्य कदमों के साथ हॉर्मुज़ स्ट्रेट को बंद घोषित कर दिया. एक अनुमान के अनुसार यह जलमार्ग समुद्री तेल निर्यात का 34% वहन करता है और रॉयटर्स ने एक भारतीय अधिकारी के हवाले से बताया कि भारत के कच्चे तेल आयात का लगभग 40% इसी मार्ग से आता है.

उसी अधिकारी ने रॉयटर्स की निधि वर्मा को बताया कि भारत के कच्चे तेल भंडार लगभग 25 दिनों की मांग को पूरा कर सकते हैं. डीजल (गैस ऑयल), पेट्रोल और एलपीजी के भंडार की स्थिति भी लगभग ऐसी ही है. हालांकि शीर्ष निर्यातक कतर द्वारा उत्पादन रोकने के निर्णय के चलते भारत की एलएनजी आपूर्ति केवल कुछ दिनों के लिए ही पर्याप्त है. इसके मद्देनज़र भारत एलएनजी की खपत को सीमित कर रहा है.

रॉयटर्स के अनुसार, पिछले महीने तक भारत के कच्चे तेल आयात में पश्चिम एशिया की हिस्सेदारी लगभग 55% थी, जो 2022 के अंत के बाद से सबसे अधिक है. 2022 में, यूक्रेन पर आक्रमण के कारण मॉस्को पर लगाए गए पश्चिमी प्रतिबंधों के चलते सस्ता हुआ रूसी तेल भारत ने अभूतपूर्व मात्रा में खरीदना शुरू किया था और वह समुद्री मार्ग से भेजे जाने वाले रूसी तेल का सबसे बड़ा खरीदार बन गया था.

यह स्थिति तब बदली जब अमेरिका ने भारत पर रूसी तेल खरीद बंद करने का दबाव बनाया. पिछले महीने 25% ‘दंडात्मक’ टैरिफ समाप्त करने की घोषणा करते हुए अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने कहा था कि यदि नई दिल्ली ‘प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से’ रूसी तेल आयात फिर शुरू करती है तो यह शुल्क दोबारा लगाया जा सकता है. हालांकि मोदी सरकार ने सार्वजनिक रूप से ट्रंप के इस दावे की पुष्टि नहीं की है कि भारत ने रूसी कच्चे तेल का आयात रोकने पर सहमति दी थी.

जहाज-ट्रैकिंग फर्म क्लेपर के विश्लेषक सुमित रितोलिया ने पीटीआई से कहा कि ‘अरब सागर और व्यापक एशियाई क्षेत्र में बिना निश्चित खरीदार के तैर रहे रूसी तेल के कार्गो को ज़रूरत पड़ने पर एब्जॉर्ब किया जा सकता है.’

हालांकि, अल्पावधि में जोखिम ‘तत्काल भौतिक कमी’ की बजाय ‘कीमतों में अस्थिरता और उच्च आयात लागत’ का है, पीटीआई ने रितोलिया के हवाले से कहा. अमेरिका-इज़राइल के हमलों के बाद से तेल की कीमतों में उछाल आया है.

इस बीच, केंद्र सरकार ने आपूर्ति शृंखला को सुदृढ़ रखने के लिए एक ‘अंतर-मंत्रालयी समूह’ भी गठित किया है. केंद्रीय वाणिज्य मंत्री पीयूष गोयल ने मंगलवार को बताया कि इस समूह में वित्तीय सेवा विभाग, पेट्रोलियम, विदेश और नौवहन मंत्रालयों के साथ-साथ केंद्रीय अप्रत्यक्ष कर एवं सीमा शुल्क बोर्ड के अधिकारी शामिल होंगे, ताकि संघर्ष के प्रभावों से निपटा जा सके.