जेएनयू में निष्कासन और जवाबदेही के संकट के बीच आरक्षण नियमों का गंभीर उल्लंघन

आरटीआई में जेएनयू में 2021-22 के पीएचडी प्रवेश चक्र के दौरान आरक्षण नियमों का गंभीर उल्लंघन सामने आया है. अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति, अन्य पिछड़ा वर्ग (ओबीसी) और यहां तक कि ईडबल्यूएस के ऐसे उम्मीदवार, जिन्होंने लिखित परीक्षा में अधिक अंक प्राप्त किए थे, उन्हें वायवा के लिए बुलाया ही नहीं गया.

/
जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय के एक प्रवेश द्वार को दर्शाती दीवार. (फोटो: पीटीआई)

नई दिल्ली: बीते कुछ सप्ताह से जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय (जेएनयू) एक बार फिर प्रशासन की उदासीनता के कारण चर्चा में है. इस बार वजह यह है कि विश्वविद्यालय के इतिहास में पहली बार जेएनयू छात्रसंघ (जेएनयूएसयू) के पूरे केंद्रीय पैनल, अध्यक्ष, उपाध्यक्ष, महासचिव और संयुक्त सचिव को निष्कासित (रस्टिकेट) कर दिया गया है.

इन छात्रों ने बीआर आंबेडकर केंद्रीय पुस्तकालय में फेशियल रिकग्निशन टेक्नोलॉजी (एफआरटी) लगाने का विरोध किया था और पुस्तकालय में पढ़ने की जगह बढ़ाने की मांग उठाई थी. जिन छात्रों को निष्कासित किया गया है, उनमें पूर्व जेएनयू छात्रसंघ अध्यक्ष नीतीश कुमार के साथ-साथ वर्तमान केंद्रीय पैनल के सदस्य- अध्यक्ष अदिति मिश्रा, उपाध्यक्ष गोपिका के. बाबू, महासचिव सुनील यादव और संयुक्त सचिव दानिश अली शामिल हैं.

इस फैसले के बाद फिलहाल जेएनयू बिना छात्रसंघ के है. विश्वविद्यालय के कई छात्र इस निर्णय के खिलाफ विरोध प्रदर्शन कर रहे हैं.

छात्रों ने निष्कासन आदेश वापस लेने की मांग के साथ-साथ यूजीसी के समता (इक्विटी) नियम लागू करने, रोहित एक्ट लागू करने और जेएनयू अकादमिक काउंसिल तथा बोर्ड ऑफ स्टडीज़ में छात्र प्रतिनिधित्व बहाल करने की भी मांग की है.

पूर्व छात्रसंघ अध्यक्ष नीतीश कुमार ने द वायर से बातचीत में कहा कि 2018 से पहले विश्वविद्यालय के नियमों के अनुसार छात्रों को अकादमिक काउंसिल और बोर्ड ऑफ स्टडीज़ में प्रतिनिधित्व प्राप्त था.

हालांकि 2018 के बाद से इन महत्वपूर्ण अंगों में छात्र प्रतिनिधित्व समाप्त कर दिया गया. उनका कहना है कि प्रशासन ने यह कदम इसलिए उठाया क्योंकि छात्र प्रतिनिधि प्रशासन से जवाबदेही मांगते थे. प्रशासन छात्रों के सवालों से बचना चाहता है और उनकी सहमति के बिना अपने फैसले लागू करना चाहता है.

2021-22 सत्र के पीएचडी प्रवेश प्रक्रिया की जांच से छात्रों की आशंकाओं को और बल मिला. जांच में सामने आया कि छात्र प्रतिनिधित्व की अनुपस्थिति में जेएनयू अकादमिक काउंसिल ने प्रवेश नियमों में एक मनमाना प्रावधान जोड़ दिया, जिससे आरक्षण की भावना का गंभीर उल्लंघन हुआ.

शैक्षणिक उत्कृष्टता और सामाजिक न्याय के प्रति प्रतिबद्धता के लिए प्रसिद्ध इस संस्थान में 2021-22 के पीएचडी प्रवेश चक्र के दौरान आरक्षण नियमों का गंभीर उल्लंघन सामने आया.

सबसे पहले यह संदेह तब पैदा हुआ जब लेखकों ने सेंटर फॉर द स्टडी ऑफ रीजनल डेवलपमेंट (सीएसआरडी) में वायवा के दौरान विभिन्न सामाजिक वर्गों के कट-ऑफ अंकों में अंतर देखा. इसके बाद संबंधित जानकारी और प्रवेश रिकॉर्ड प्राप्त करने के लिए सूचना के अधिकार (आरटीआई) के तहत आवेदन दायर किया गया.

आरटीआई से मिली जानकारी से पता चला कि ओबीसी और ईडब्ल्यूएस श्रेणियों में आरक्षण का उल्लंघन हुआ था, जिसके बाद मामले की व्यापक पड़ताल शुरू की गई.

हालांकि जेएनयू के विभिन्न केंद्रों और विभागों से आंकड़े प्राप्त करने के लिए दाखिल किए गए आरटीआई के जवाब देने में प्रशासन ने देरी की और जानकारी देने से भी कई मौकों पर आंकड़े देने से इनकार किया. इसके कारण लेखकों को केंद्रीय सूचना आयोग (सीआईसी) में दूसरी अपील करनी पड़ी.

लगभग दो साल तक लगातार प्रयासों के बाद और अंततः सीआईसी के हस्तक्षेप के बाद प्रवेश संबंधी पूरी जानकारी प्राप्त हो सकी.

आरटीआई से क्या सामने आया

आरटीआई से मिले आंकड़े चिंताजनक तस्वीर पेश करते हैं. आंकड़ों के विश्लेषण से पता चला कि 2021-22 के पीएचडी प्रवेश चक्र में विभिन्न स्कूलों के 27 केंद्रों में आरक्षण नियमों का उल्लंघन हुआ.

अनुसूचित जाति (एससी), अनुसूचित जनजाति (एसटी), अन्य पिछड़ा वर्ग (ओबीसी) और यहां तक कि आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग (ईडबल्यूएस) के ऐसे उम्मीदवार, जिन्होंने लिखित परीक्षा में अधिक अंक प्राप्त किए थे, उन्हें वायवा के लिए बुलाया ही नहीं गया. इससे चयन प्रक्रिया की निष्पक्षता पर गंभीर सवाल उठते हैं.

उस वर्ष पीएचडी प्रवेश परीक्षा में लिखित परीक्षा को 70% और वायवा को 30% वेटेज दिया गया था. इसके बावजूद कई आरक्षित वर्गों के ऐसे उम्मीदवार, जिन्होंने बेहतर प्रदर्शन किया था, उन्हें वायवा चरण से बाहर कर दिया गया.

निम्नलिखित तालिकाएं हमारे विस्तृत विश्लेषण के निष्कर्ष प्रस्तुत करती हैं:

तालिका 01: वायवा के लिए बुलाने की प्रक्रिया में आरक्षण का उल्लंघन

Table 01 Violation of Reservation in Viva Calling Process by The Wire

लिखित परीक्षा के निर्णायक महत्व के बावजूद, आरक्षित वर्ग के कई ऐसे उम्मीदवारों को, जिन्होंने अन्य अभ्यर्थियों से बेहतर प्रदर्शन किया था, वायवा चरण में बाहर कर दिया गया और उन्हें वायवा के लिए बुलाया ही नहीं गया.

तालिका 2: लिखित परीक्षा में अधिक अंक लेकिन वायवा में कम अंक का पैटर्न

वर्ग लिखित परीक्षा में 60% से कम अंक प्राप्त करने वाले उम्मीदवारों की संख्या मौखिक परीक्षा में 4 से ज्यादा अंक प्राप्त करने वाले उम्मीदवार प्रभावित प्रतिशत
सामान्य
216 7 3.24%
ईडब्ल्यूएस 41 6 14.63%
अन्य पिछड़ा वर्ग
193 46 23.83%
अनुसूचित जाति 114 36 31.57%
अनुसूचित जनजाति
35 12 34.28%

आंकड़ों से यह भी सामने आया कि सामान्य वर्ग के छात्रों को वायवा में अपेक्षाकृत अधिक अंक दिए गए, जबकि एससी, एसटी और ओबीसी छात्रों के अंक अपेक्षाकृत कम रहे.

उदाहरण के तौर पर, लिखित परीक्षा में 60% से अधिक अंक पाने वाले सामान्य वर्ग के छात्रों में केवल 3.24% को वायवा में 4% से कम अंक मिले, जबकि यही प्रतिशत एसटी में 34.28% और एससी में 31.57% रहा.

ओबीसी छात्रों में भी यह अंतर दिखाई देता है, हालांकि यह एससी और एसटी की तुलना में कुछ कम है.

तालिका 3: स्कोर वितरण के आधार पर वायवा अंकों के चार दायरों (≤5, 6–14, 15–19, ≥20) में श्रेणीवार उम्मीदवारों की संख्या और प्रतिशत

वर्ग मौखिक परीक्षा में उपस्थित होने वाले उम्मीदवारों की कुल संख्या मौखिक परीक्षा में 5 या उससे कम अंक पाने वाले उम्मीदवार (कुल का प्रतिशत) मौखिक परीक्षा में 6-14 अंक प्राप्त करने वाले उम्मीदवारों की संख्या (कुल का प्रतिशत) मौखिक परीक्षा में 15-19 अंक प्राप्त करने वाले उम्मीदवारों की संख्या (कुल का प्रतिशत) मौखिक परीक्षा में 20 से कम अंक प्राप्त करने वाले उम्मीदवारों की संख्या (कुल का प्रतिशत)
सामान्य
612 18 (2.94%) 7 (1.14%) 293 (47.87%) 294 (48.03%)
ईडब्ल्यूएस 117 14 (11.96%) 51 (43.58%) 38 (32.47%) 14 (11.96)
अन्य पिछड़ा वर्ग
804 216 (26.86%) 392 (48.75%) 131 (16.29%) 65 (8.08%)
अनुसूचित जाति 422 127 (30.09%) 218 (51.56%) 52 (12.32%) 25 (5.92%)
अनुसूचित जनजाति
135 42 (31.11%) 74 (54.81%) 11 (8.1%) 8 (5.92)

विश्लेषण के अनुसार, सामान्य वर्ग के लगभग 48% छात्रों को वायवा में 20 या उससे अधिक अंक मिले, जबकि ओबीसी में यह 8.08% और एससी व एसटी में लगभग 5.92% रहा.

इसके विपरीत, 5 या उससे कम अंक पाने वाले सामान्य वर्ग के छात्र केवल 2.94% थे, जबकि ओबीसी में यह 26.86%, एससी में 30.09% और एसटी में 31.11% था.

तालिका के चौथे कॉलम में दिखाया गया है कि अधिकांश एससी, एसटी और ओबीसी उम्मीदवारों के अंक 6 से 14 के दायरे में केंद्रित थे.

तालिका 4: किस प्रकार वायवा को व्यक्तिपरक चयन उपकरण के रूप में इस्तेमाल कर हाशिये के समूहों को नुकसान पहुंचाया गया

मैट्रिक सामान्य
एससी + एसटी संयुक्त
अंतर (अनारक्षित– एससी/एसटी)
औसत वायवा 18.7 8.7 10
वायवा में 5 से कम अंक पाने वाले 2.94% 30.6% -27.66 प्रतिशत अंक
वायवा में 20 से कम अंक पाने वाले 48.03% 5.92%
42.11 प्रतिशत अंक
लिखित में ज्यादा और वायवा में कम 3% 32% 29 प्रतिशत अंक

विश्लेषण के अनुसार, वायवा में सामान्य वर्ग और एससी/एसटी छात्रों के प्रदर्शन के बीच अंतर काफी स्पष्ट है. वायवा अंकों में औसतन 10 अंकों का अंतर पाया गया, जिसमें सामान्य वर्ग के छात्रों के अंक काफी अधिक रहे.

वायवा में 5 या उससे कम अंक पाने वालों के प्रतिशत में -27.66 प्रतिशत अंकों का अंतर दिखता है, जो यह दर्शाता है कि बहुत कम अंक पाने वालों में एससी/एसटी छात्रों की संख्या कहीं अधिक है.

वहीं 20 या उससे अधिक अंक पाने वाले उच्च स्कोरर्स के मामले में यह अंतर 42.11 प्रतिशत अंक है, जिससे पता चलता है कि एससी/एसटी छात्रों के लिए वायवा में शीर्ष अंक हासिल करना काफी कम संभव रहा.

जेएनयू के सीएसआरडी में पीएचडी के चौथे वर्ष की छात्रा स्नेहा साहा भी आरक्षण नियम के इस उल्लंघन की शिकार रहीं.

उन्होंने कहा, ‘मैंने प्रवेश परीक्षा दी थी और लिखित परीक्षा में सामान्य वर्ग के कट-ऑफ से भी अधिक अंक प्राप्त किए थे, फिर भी मुझे वायवा के लिए नहीं बुलाया गया. मुझे उस साल दाखिला छोड़कर 2022-23 सत्र का इंतजार करना पड़ा. मेरी जिंदगी का वह एक साल कौन लौटाएगा?’

प्रवेश नीति में मनमाना प्रावधान

2021-22 के शैक्षणिक सत्र के दौरान अकादमिक काउंसिल ने पीएचडी प्रवेश नीति में एक विशेष प्रावधान जोड़ा, जिसके कारण आरक्षित वर्ग के उम्मीदवारों को अनारक्षित श्रेणी के तहत विचार किए जाने से प्रभावी रूप से रोक दिया गया, भले ही उन्होंने लिखित परीक्षा में सामान्य कट-ऑफ से अधिक अंक हासिल किए हों.

यह प्रावधान सुप्रीम कोर्ट और विभिन्न उच्च न्यायालयों के कई फैसलों के विपरीत था. अदालतों ने लगातार कहा है कि यदि आरक्षित वर्ग का कोई उम्मीदवार सामान्य वर्ग के कट-ऑफ से अधिक अंक प्राप्त करता है, तो उसे मेरिट के आधार पर सामान्य वर्ग में शामिल किया जाना चाहिए.

स्नेहा साहा ने बताया कि अगले वर्ष जब उन्हें दाखिला मिला, तब उन्हें पता चला कि पिछले प्रवेश चक्र में यह भेदभाव हुआ था. उन्होंने प्रशासन से स्पष्टीकरण मांगा, जहां उन्हें बताया गया कि यह प्रावधान उस समय के कुलपति के कार्यकाल में जोड़ा गया था.

उस समय जेएनयू के कुलपति मामीडाला जगदीश कुमार थे, जिन्होंने 2016 से 2022 तक यह पद संभाला. 2022 में उन्हें विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (यूजीसी) का अध्यक्ष नियुक्त किया गया.

बाद में जब इस लेख के लेखक आरक्षण नीति से छेड़छाड़ के प्रयासों को उजागर करने लगे, तब अगले शैक्षणिक सत्र में इस प्रावधान को चुपचाप हटा दिया गया.

कुलपति के रूप में उनके कार्यकाल के दौरान विश्वविद्यालय कई विवादों का केंद्र रहा. 2016 में नजीब अहमद का लापता होना और 2020 में नकाबपोश हमलावरों द्वारा हमला जैसे मामले राष्ट्रीय स्तर पर चर्चा में रहे.

इतना ही नहीं, यूजीसी के अध्यक्ष के रूप में उनके कार्यकाल में देश के विभिन्न विश्वविद्यालयों में जाति आधारित भेदभाव के मामलों में 118% वृद्धि दर्ज की गई. इसके बावजूद इस वर्ष गणतंत्र दिवस पर उन्हें साहित्य और शिक्षा के क्षेत्र में पद्मश्री से सम्मानित किया गया.

आरक्षण-विरोधी प्रावधान जैसे मनमाने नीतिगत फैसलों के साथ ये घटनाएं इस बात को दर्शाती हैं कि प्रशासन ने जेएनयू में आलोचनात्मक सोच और सामाजिक न्याय की भावना को कमजोर करने की कोशिश की है.

पारदर्शी अकादमिक काउंसिल की आवश्यकता

जेएनयू में छात्र आंदोलन हमेशा सामाजिक न्याय के पक्ष में रहा है. हालांकि संस्थागत स्तर पर वायवा में भेदभाव का मुद्दा नया नहीं है. इसे दूर करने के लिए पहले भी राजीव भट्ट समिति (2012), एसके थोराट समिति (2013) और अब्दुल नफे समिति (2016) कई समितियां बनाई गई थीं.

इन सभी रिपोर्टों में आरक्षित वर्ग के उम्मीदवारों के वायवा अंकों में असमानता दर्ज की गई और इसे दूर करने के लिए ठोस सिफारिशें दी गईं.

लेकिन इन सिफारिशों को लागू करने के बजाय प्रशासन ने अकादमिक काउंसिल से छात्र प्रतिनिधित्व ही समाप्त कर दिया. हालांकि, समाधान केवल छात्र प्रतिनिधित्व बहाल करने तक सीमित नहीं है. इसके साथ ही ऐसे शिक्षकों को भी शामिल करना जरूरी है जो आलोचनात्मक सोच और शैक्षणिक ईमानदारी का प्रतिनिधित्व करते हों.

तभी प्रवेश और मूल्यांकन से जुड़े फैसले पारदर्शी, जवाबदेह और निष्पक्ष हो सकते हैं.

हाल के वर्षों में पीएचडी प्रवेश में वायवा का महत्व और बढ़ गया है, खासकर एनटीए स्कोर लागू होने के बाद. पहले लिखित परीक्षा का वेटेज अधिक होता था, फिर भी कमजोर सामाजिक पृष्ठभूमि के छात्रों को वायवा में कम अंक दिए जाने के आरोप लगते रहे हैं.

उस समय भी ऐसी असमानताएं सामने आईं जब वायवा का वेटेज कम था, अब सवाल उठता है कि अब क्या स्थिति होगी, जब जेआरएफ श्रेणी के तहत पिछले दो प्रवेश चक्रों में वायवा का वेटेज लगभग 100% तक बढ़ गया है.

(मोहम्मद अर्शिद और राखोहरी बेग जेएनयू में शोधार्थी हैं.)

(इस रिपोर्ट को अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें.)