सारे संसार को नैतिक लकवा मार गया है!

कभी-कभार | अशोक वाजपेयी: बीसवीं सदी में यूरोप में नाज़ियों के युद्ध और नरसंहार के समय जैसी चुप्पी यूरोप में छा गई थी, वर्तमान चुप्पी, उसका एक नया दुखद और शर्मनाक संस्करण है. स्वयं भारत ने इस बीच अपना जो नैतिक अवमूल्यन किया है वह समझना मुश्किल है.

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(इलस्ट्रेशन: परिप्लब चक्रवर्ती/द वायर) बैकग्राउंड में ईरान में अमेरिका-इज़रायल द्वारा किए हमले की तस्वीर.

यह महसूस करना और कहना कोई अतिरंजना नहीं है कि इस समय संसार, लगता है, अपने पूरे नैतिक अधःपतन की कगार पर पहुंच गया है. एक निरुद्देश्य बड़ा युद्ध हो रहा है जिसमें जानमाल को भारी नुकसान पहुंच रहा है. साधारण लोग, बच्चे और स्त्रियां, सैनिक मारे जा रहे हैं. इस अनावश्यक बर्बादी को रोकने का कोई प्रयत्न नहीं हो रहा है. कोई नहीं जानता कि इस युद्ध से किसे-क्या हासिल होने जा रहा है और सारा संसार लाचार सिर्फ़ हाथ पर हाथ धरे देख रहा है. किसी के पास यह नैतिक शक्ति और क़द, साहस नहीं बचे हैं कि वह इस भयानक विनाश को रोकने के लिए कोई पहल या कोशिश करे.

सारे संसार को नैतिक लकवा मार गया है और किसी को नहीं पता कि अंजाम क्या होने जा रहा है. बीसवीं सदी में यूरोप में नाज़ियों के युद्ध और नरसंहार के समय जैसी चुप्पी यूरोप में छा गई थी, वर्तमान चुप्पी, उसका एक नया दुखद और शर्मनाक संस्करण है. स्वयं भारत ने इस बीच अपना जो नैतिक अवमूल्यन किया है वह समझना मुश्किल है. हमारे तथाकथित ‘विश्वगुरुडम’ का भुरभुरापन हम पर ही धूल की तरह गिर रहा है.

प्रताप भानु मेहता ने अपने ताज़ा विश्लेषण में इस नैतिक शून्यता को हर स्तर पर नैतिक पलायन ठहराया है. वे ऐसा पहले भी लिख चुके हैं जिससे यह स्पष्ट ध्वनि निकलती है कि संसार में इस समय किसी नैतिक नेतृत्व का घोर अभाव और अनुपस्थिति है. इस पर सोचने की ज़रूरत है कि हम इस भयानक अनुपस्थिति के मुक़ाम पर कैसे और क्यों पहुंचे. सभ्यता कब और कैसे फिसलकर बर्बरता में वापस पहुंच गई है?

फिर भी, ऐसा नहीं लगता कि दुनिया में कहीं भी आम लोगों में पारस्परिकता, मदद और राहत, संवेदना और करूणा, सहायता और सहयोग, चिन्ता और सक्रियता की वृत्तियों में कोई बड़ी कटौती या विक्षति हुई है. साधारण जीवन और राजनीतिक सत्ता के बीच ऐसा परस्पर विलोम का संबंध, व्यापक आधुनिक और लोकतांत्रिक ढांचे में, आश्चर्यकारी है.

अभी कुल पच्चीस वर्ष हुए हैं बीसवीं सदी को बीते, और इस नई सदी ने, ख़ासकर उसके उत्तरार्द्ध में उभरे और सशक्त हुए उदार मूल्य, शान्ति की आकांक्षा, परस्पर आदर और सम्मान के अनुबंध, अपार अनियंत्रित हिंसा को थामने के प्रयत्न आदि सब लगभग पूरी तरह से दरकिनार ही कर दिए हैं. दूसरों की जमीन देशों और साधनों पर बेज़ा और जबरन कब्ज़ा करने की बेशर्म लिप्सा बड़ी शक्तियों को अबाध संचालित कर रही है. इस समय, लगता है, कि कोई भी, सत्ता या नेतृत्व, अधिकार या संस्थाएं ज़िम्मेदार नहीं है. दुनिया एक बेहद ग़ैर ज़िम्मेदार जगह हो गई है.

हमारे समय पर जैसे एक नई त्रयी का सख़्त अभेद्य नियंत्रण स्थापित हो गया है: सत्ता और जन का के संबंध-विच्छेद और विलोम, अबाध गै़र ज़िम्मेदारी और नैतिक शून्यता. इतनी परिष्कृत-विकसित साधन-संपन्न, विकासशील होकर भी दुनिया इस क़दर अक्षम्य रूप से बर्बर हो गई है! संसार इस समय हिंसा-असत्य-घृणा-बर्बरता का नया गणराज्य बन रहा है!

‘त्रिवेणी’ पचहत्तर वर्ष

नई दिल्ली में संस्कृति के क्षेत्र में जो संस्थाएं- वे एक राजधानी और आबादी के मान से कम ही हैं- अविरत सक्रिय रही हैं, उनमें त्रिवेणी कला संगम का विशेष स्थान है. वह एक संस्था है, एक शैक्षणिक इकाई है और ललित कला-संगीत-नृत्य-रंगमंच-साहित्य आदि के लिए एक प्रस्तुति-परिसर भी. ‘त्रिवेणी’ की श्रीधराणी गैलरी दर्शकों के हिसाब से सबसे लोकप्रिय गैलरी है: जितने दर्शक वहां हर रोज़ कला-प्रदर्शनियां देखने आते हैं उतने किसी और गैलरी में नहीं.

ऐसा कोई महत्वपूर्ण भारतीय कलाकार मुश्किल से मिलेगा जिसने अपनी कृतियां इस गैलरी में कभी प्रदर्शित न की हों. जो मंडी हाउस चौक अपने इर्द-गिर्द दिल्ली में सबसे अधिक संस्कृति संस्थाओं को घेरता है उनमें भी ‘त्रिवेणी’ अद्वितीय है.

निजी रूप से मैं पहले पहल ‘त्रिवेणी’ आया 1963 या उसके फ़ौरन बाद जब वह अपने जोसेफ़ स्टाइन द्वारा सुकल्पित परिसर में शायद कनाट प्लेस से शिफ़्ट हुआ था. 1970 में ‘पहचान’ पत्रिका के पहले अंक का लोकार्पण ‘त्रिवेणी’ के खुले रंगमंच में, बिना मंच का इस्तेमाल किये, हुआ था जिसमें सबसे जेठे शमशेर बहादुर सिंह और सबसे तरूण ज्ञानेन्द्र पति ने अपनी कविताएं सुनायी थीं. बाद में, श्रीकान्त वर्मा के ‘मगध’ कवितासंग्रह, ‘पूर्वग्रह’ के एक विशद कवितांक, रघुवीर सहाय की रचनावली आदि के लोकार्पण त्रिवेणी में ही हुए.

मणि कौल की मुक्तिबोध पर बनायी फ़िल्म ‘सहत से उठता आदमी’ का दिल्ली में पहला प्रदर्शन वहीं हुआ. महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिन्दी विश्वविद्यालय के कई परिसंवाद और हिन्दी-उर्दू का एक साझा एम.ए. कोर्स बनाने का व्यायाम भी यहीं हुआ. 2002 में गुजरात में हुए नरसंहार के विरोध में लेखकों-कलाकारों को एकजुट करने की कई सभाएं, निश्शुल्क, ‘त्रिवेणी’ में ही हुई. रज़ा फाउंडेशन के अनेक आयोजन जिनमें कई कला-प्रदर्शनियां, भारतीय कविता उत्सव, ध्रुपद वैभव, वरिष्ठ संगीतकारों पर एकाग्र ‘महिमा’ और युवा संगीतकारों की श्रृंखला ‘आरंभ’ ‘त्रिवेणी’ में ही हुए.

‘त्रिवेणी’ में बरसों भारत के कुछ श्रेष्ठ कलाकारों ने युवाओं को नियमित प्रशिक्षण दिया है. इनमें मणिपुरी के सिंहजीत सिंह, अब तक वहां सक्रिय चित्रकार रामेश्वर बूटा आदि शामिल रहे हैं. वहां लगभग स्थायी रूप से मूर्धन्य रंगकर्मी और कलाविद् इब्राहिम अलकाज़ी की गैलरी ‘आर्ट हैरिटेज़’ ने लगातार सुविचार-सुकल्पित प्रदर्शनियां की हैं जिनमें अनेक मूर्धन्य जैसे सूज़ा, तैयब मेहता, केजी सुब्रमण्यन, अकबर पदमसी आदि शामिल रहे हैं. ‘त्रिवेणी’ में एक शिल्प आंगन और सेरेमिक कर्मशाला भी है. पहले उसमें पुस्तकों-कैसेट्स की एक दुकान भी थी.

‘त्रिवेणी’ दिल्ली में लेखकों-कलाकारों आदि का अड्डा भी रही है. एक ज़माने में वहां किसी भी दिन जाने पर आपको हुसेन, स्वामीनाथन, गायतोण्डे, अलकाज़ी, हबीब तनवीर, कृष्ण खन्ना, बाहर से आए कलाकार-लेखक आदि बैठकर बतियाते मिल जाते थे. कइयों से मेरी पहली भेंट वहां चलाये जा रहे रेस्तरां में ही अचानक और अप्रत्याशित रूप से हुई.

यह याद करना चाहिए कि ‘त्रिवेणी’ की स्थापना लेखक डा. कृष्ण लाल श्रीधराणी और उनकी नृत्यकार पत्नी सुन्दरी श्रीधराणी ने की थी. सुन्दरी जी उदय शंकर के अलमोड़ा केन्द्र में दीक्षित थीं और इस संस्था को शुरू से ही उच्च स्तरीय रखने और चलाने का श्रेय उन्हें ही जाता है. उनमें उदार कलादृष्टि और प्रबंध कौशल का बिरला संयोग था. दिल्ली के दो कला संस्थान ‘दिल्ली शिल्पी चक्र’ और ‘त्रिवेणी’ की स्थापना लाहौर से बंटवारे के बाद आए कलाकारों ने की.

नए भजन

इन दिनों शोक या स्मृति सभाओं में आरंभ में आध-पौन घंटे भजन-गायन होता है. पहले ये भजन कबीर-तुलसी-सूर-मीरा के पद होते थे. अब धीरे-धीरे इसमें भी मिलावट शुरू हो गई है. धुनें अकसर फिल्मी गानों की होती हैं और नए भजनकवि पैदा हो गए हैं जिनकी ख़ासी निराभ और सतही रचनाएं गायक बहुत विभोर होकर गाते हैं. इन भजनों को थोड़ी मान्यता या वैधता इससे मिल जाती हैं कि वे भक्त कवियों की रचनाओं को आगे-पीछे गाकर गाए जाते हैं. विकसित भारत के अभियान में शायद ऐसे भजनकवियों और भजनगायकों को काम मिल रहा है तो उजर नहीं किया जा सकता.

मृत्यु, नश्वरता, अनश्वरता, अध्यात्म, मुक्ति आदि हमारे भक्ति काव्य के विषय रहे हैं. उसके पदों में गहराई और सघनता है. उनमें भावुकता नहीं, गहरा भावात्मक लगाव है. उन्हें छोड़कर सतही-भावुक नए भजनों का सहारा लेना समझ में नहीं आता. कई बार तो लोग इन भजनों को सुनकर ऐसे झूमते हैं कि लगता है कि सभा स्मृति और शोक के लिए नहीं, मज़े के लिए आयोजित है. इसमें दिवंगत की जो अवमानना होती है उसे न तो आयोजक पहचानते हैं, न श्रोता.

(लेखक वरिष्ठ साहित्यकार हैं.)