नई दिल्ली: अनुसूचित जाति (एससी), अन्य पिछड़ा वर्ग (ओबीसी), आर्थिक रूप से पिछड़ा वर्ग (ईबीसी) और डीनोटिफाइड ट्राइब्स (डीएनटी) के छात्रों के लिए आवंटित छात्रवृत्ति राशि का बड़ा हिस्सा खर्च नहीं हो पाया है. भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (मार्क्सवादी) के राज्यसभा सांसद जॉन ब्रिटास ने गुरुवार (12 मार्च) को सरकार के आधिकारिक आंकड़ों का हवाला देते हुए यह दावा किया.
राज्यसभा में पूछे गए एक प्रश्न के लिखित उत्तर में सामाजिक न्याय और अधिकारिता मंत्रालय में राज्य मंत्री रामदास आठवले ने बताया कि उच्च शिक्षा में एससी, ओबीसी, ईबीसी और डीएनटी समुदायों के छात्रों के लिए कई छात्रवृत्ति योजनाएं संचालित की जा रही हैं. उन्होंने इन योजनाओं के लिए आवंटित धनराशि और उसके उपयोग से जुड़े आंकड़े भी सदन के समक्ष रखे.
इन आंकड़ों के आधार पर ब्रिटास ने कहा कि इन वर्गों के छात्रों की छात्रवृत्ति के लिए निर्धारित हजारों करोड़ रुपये खर्च ही नहीं किए गए हैं. उन्होंने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर एक पोस्ट के जरिए भी यह जानकारी साझा की.
A.Thousands of crores meant for SC, OBC, EBC and DNT students’ scholarships remain unspent.
For SC & OBC scholarships:
2021-22: Rs. 4,446.24 cr spent vs Rs. 6,220.62 cr allocated
2022-23: Rs. 6,372.38 cr vs Rs. 8,165 cr
2023-24 : Rs. 7,762.82 cr vs Rs. 8,874.14 cr
2024-25… pic.twitter.com/h2uw6P61Sr— John Brittas (@JohnBrittas) March 12, 2026
सरकारी आंकड़ों के मुताबिक, डिपार्टमेंट ऑफ सोशल जस्टिस एंड एम्पावरमेंट को वर्ष 2024-25 में 14,164.42 करोड़ रुपये आवंटित किए गए थे, लेकिन विभाग ने इसमें से केवल 8,679.02 करोड़ रुपये ही खर्च किए.
इससे पहले 2023-24 में 9,163.98 करोड़ रुपये आवंटित किए गए थे, जिनमें से 8,008.79 करोड़ रुपये खर्च किए गए. वहीं एक अन्य योजना के तहत 2023-24 में 8,874.14 करोड़ रुपये आवंटित किए गए, लेकिन 7,762.82 करोड़ रुपये ही खर्च हो सके.
इसी तरह 2022-23 में 8,165 करोड़ रुपये के आवंटन के मुकाबले 6,372.38 करोड़ रुपये ही खर्च किए गए. वहीं 2021-22 में 6,220.62 करोड़ रुपये में से 4,446.24 करोड़ रुपये ही खर्च हुए. इन आंकड़ों से स्पष्ट होता है कि पिछले कुछ वर्षों से छात्रवृत्ति योजनाओं के लिए आवंटित राशि का पूरा उपयोग नहीं हो पा रहा है.
ब्रिटास ने यह भी कहा कि छात्रवृत्ति पाने वाले छात्रों की संख्या में भी विभिन्न श्रेणियों में उल्लेखनीय गिरावट आई है.
सरकारी आंकड़ों के अनुसार, अनुसूचित जाति के प्री-मैट्रिक छात्रवृत्ति लाभार्थियों की संख्या 2020-21 में 31.22 लाख थी, जो 2024-25 में घटकर 21.65 लाख रह गई. यानी लगभग 10 लाख छात्रों की कमी दर्ज की गई है.
वहीं अनुसूचित जाति के पोस्ट-मैट्रिक छात्रवृत्ति लाभार्थियों की संख्या 50.16 लाख से घटकर 48.04 लाख रह गई.
अन्य पिछड़ा वर्ग (ओबीसी), आर्थिक रूप से पिछड़ा वर्ग (ईबीसी) और डीनोटिफाइड ट्राइब्स (डीएनटी) के छात्रों में यह गिरावट और भी ज्यादा रही. इन वर्गों में प्री-मैट्रिक छात्रवृत्ति पाने वालों की संख्या 54.95 लाख से घटकर 20.61 लाख रह गई, जबकि पोस्ट-मैट्रिक लाभार्थियों की संख्या लगभग आधी (45.45 लाख से घटकर 24.53 लाख) रह गई है.
ब्रिटास ने कहा है, ‘लाखों छात्र छात्रवृत्ति की सूची से जैसे गायब ही हो गए हैं. हाशिये पर रहने वाले छात्रों के लिए यह सिर्फ एक आंकड़ा नहीं, बल्कि उनके लिए खोया हुआ अवसर है.’
इस बीच द हिंदू की एक रिपोर्ट के अनुसार, केंद्र सरकार सामाजिक रूप से वंचित वर्गों के छात्रों के लिए पोस्ट-मैट्रिक छात्रवृत्ति की पात्रता शर्तों में बदलाव की तैयारी कर रही है. रिपोर्ट के मुताबिक, इस योजना के लिए परिवार की वार्षिक आय सीमा को मौजूदा 2.5 लाख रुपये से बढ़ाकर 4.5 लाख रुपये करने का प्रस्ताव है, जिसे 2026-27 वित्तीय वर्ष से लागू किया जा सकता है.
रिपोर्ट के अनुसार, विभाग से संबंधित एक संसदीय समिति को सरकार ने जानकारी दी है कि एससी, एसटी, ओबीसी और डीएनटी समुदायों के छात्रों के लिए संचालित विभिन्न छात्रवृत्ति योजनाओं में व्यापक संशोधन करने की योजना बनाई जा रही है.
