दृश्य-प्रपंच के युग में राजनीति

विचारधारात्मक राजनीति की वकालत करते हुए उद्देश्य आधुनिक संप्रेषण को अस्वीकार करना नहीं, बल्कि उसके मूल अर्थ के उपनिवेशीकरण का प्रतिरोध करना है. राज्य और नागरिक के बीच संबंध को एक लेन-देन के रूप में नहीं, बल्कि पारस्परिक ज़िम्मेदारी पर आधारित संवाद के रूप में पुनर्परिभाषित किया जाना चाहिए. हमें स्पष्ट रूप से कहना चाहिए कि नागरिक शासन के उपभोक्ता नहीं हैं; वे उसके निर्माण में सहभागी हैं.

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(इलस्ट्रेशन: परिप्लब चक्रवर्ती/द वायर)

राजनीति, यदि उसे अपनी नैतिक गंभीरता बनाए रखनी है, तो उसे केवल दिखावे के एक दृश्य-प्रपंच में सीमित नहीं किया जा सकता. अपने मूल में, यह सत्ता और जनता के बीच, जो है और जो होना चाहिए उसके बीच एक सतत संवाद है. इसके विपरीत कोई भी आकलन न केवल उसके उद्देश्य, बल्कि उसकी संभावनाओं को भी गलत समझना होगा.

फिर भी, पिछले कुछ दशकों में हमने एक सूक्ष्म किंतु निर्णायक बदलाव देखा है- विचारधारात्मक संघर्ष के स्थल के रूप में राजनीति से हटकर ब्रांड प्रबंधन के एक अभ्यास में उसका रूपांतरण. यह परिवर्तन नवउदारवाद की दिशा के साथ तालमेल बिठाते हुए हमारे लोकतांत्रिक जीवन की संरचनात्मक पुनर्संरचना को दर्शाता है.

शास्त्रीय राजनीतिक चिंतन हमें इस परिवर्तन को समझने की शब्दावली प्रदान करता है. उदाहरण के लिए, कार्ल मार्क्स ने राजनीति को भौतिक वास्तविकताओं- वर्ग संबंधों, उत्पादन संरचनाओं और शक्ति के वितरण- के भीतर स्थापित किया. उनके ढांचे में विचारधारा वह माध्यम थी जिसके जरिए शोषण को या तो उचित ठहराया जाता था या चुनौती दी जाती थी. अतः राजनीति को विचारधारा से रहित करना उन संरचनाओं को धुंधला करना है जिन्हें वह उजागर करना चाहती है.

जो राजनीति स्वयं को विचारधारा से परे बताती है, वह अक्सर उसी यथास्थिति को मजबूत करती है जिसे वह नाम देने से बचती है.

एंतोनियो ग्राम्शी इस समझ को और गहराते हैं यह दिखाकर कि सत्ता केवल बलपूर्वक नहीं, बल्कि सहमति के निर्माण, सामान्यीकरण और आंतरिकीकरण के माध्यम से भी संचालित होती है. नवउदारवादी युग में ब्रांडिंग इस सहमति का एक प्रमुख उपकरण बन जाती है. राजनीतिक पात्रों से अपेक्षा की जाती है कि वे सुसंगठित छवियों के माध्यम से आकर्षित करें.

एक गहरा विरोधाभास तब उभरता है जब राजनीतिक अभिनेता विचारधारा से परे जाने का दावा करते हैं; वे फिर भी उन अंतर्निहित ढांचों के भीतर काम करते रहते हैं जो उनके निर्णयों को आकार देते हैं. स्पष्ट विचारधारा का अभाव उसके प्रभाव को समाप्त नहीं करता; बल्कि उसे अस्पष्ट और चुनौती देना कठिन बना देता है. इसलिए विचारधारात्मक राजनीति की पुनर्प्राप्ति का अर्थ विचारधारा को कठोर मतवाद के रूप में रोमांटिक बनाना नहीं, बल्कि उसे स्वतंत्रता, न्याय, समानता और गरिमा जैसे मूल्यों में निहित एक चिंतनशील और गतिशील ढांचे के रूप में पुनः स्थापित करना है.

फिर भी, उत्तर-विचारधारात्मक राजनीति का संकट मूलतः आधारहीनता का संकट है. जब राजनीतिक मूल्य संवैधानिक नैतिकता से उत्पन्न नहीं होते या सामाजिक न्याय की दिशा में उन्मुख नहीं होते, तो उनका विघटन अवश्यंभावी हो जाता है.

ऐसे आधारहीन राजनीति प्रदर्शनात्मक और क्षणभंगुर बन जाती है. इस प्रवृत्ति का एक विशेष रूप सर्वव्यापी आक्रोश की राजनीति में दिखाई देता है, जो आत्मधार्मिक, भावनात्मक और एक अलग-थलग मध्यवर्ग की ऊब पर आधारित होती है.

यह राजनीति आक्रोश को प्रतिबद्धता समझ बैठती है और सोशल मीडिया की लोकप्रियता को राजनीतिक स्थायित्व का पर्याय मान लेती है. यह हर भावनात्मक झोंके के साथ डोलती है, मनोदशा के प्रति प्रतिक्रियाशीलता को लोकतांत्रिक जवाबदेही समझने की भूल करती है.

ऐसी संरचनाएं टिकाऊ नहीं हो सकतीं क्योंकि उनमें शक्ति के पुनर्वितरण या अधिकारों के विस्तार के प्रति कोई स्थायी प्रतिबद्धता नहीं होती. यहां पार्थ चटर्जी द्वारा प्रस्तावित- यद्यपि अपूर्ण पर व्यापक रूप से प्रयुक्त- राजनीतिक समाज और नागरिक समाज के बीच का भेद उपयोगी सिद्ध होता है. नागरिक समाज के कई घटक स्वयं को राजनीति के संरक्षक के रूप में प्रस्तुत करते रहे हैं, एक ऐसे व्यापक जनसमूह की ओर से बोलने का दावा करते हुए जिसका वे न तो प्रतिनिधित्व करते हैं और न ही पूर्णतः समझते हैं.

यह संरक्षकता का भाव, चाहे जितना सदाशयपूर्ण क्यों न हो, संरचनात्मक राजनीति की जगह नैतिक संकेतों को स्थापित कर देता है. इस परिवर्तन को प्रतिस्पर्धा, विकल्प और व्यक्तिगत पसंद के महिमामंडन द्वारा और बल मिलता है. परिणामस्वरूप एक ऐसी राजनीति सामने आती है जो नैतिक रूप से संतोषजनक प्रतीत होती है, परंतु जड़ों से कटी हुई रहती है, जो न तो एकजुटता उत्पन्न कर पाती है और न ही परिवर्तन.

यह संवैधानिक कल्पना ही है- जिसमें समानता, बंधुत्व और प्रत्येक नागरिक की गरिमा के प्रति प्रतिबद्धता निहित है- जो दीर्घकालिक राजनीतिक सहभागिता की मानक भाषा प्रदान कर सकती है. यह कार्य औपचारिक राजनीति से परे भी विस्तारित होता है क्योंकि शैक्षणिक संस्थान, मीडिया और नागरिक समाज विभिन्न स्तरों पर राजनीतिक ब्रांडिंग के तर्क में सहभागी बन चुके हैं. इस चक्र को तोड़ने के लिए ऐसे स्थानों का निर्माण आवश्यक है जहां विचारों पर आलोचनात्मक विमर्श हो सके.

यहां युर्गन हाबर्मास का सार्वजनिक क्षेत्र का विचार एक महत्वपूर्ण सुधार प्रस्तुत करता है. हाबर्मास के अनुसार, लोकतंत्र संवादात्मक तर्कशीलता पर आधारित है- नागरिकों के बीच विचारपूर्ण बहस की क्षमता पर. जब राजनीति को ब्रांडिंग में सीमित कर दिया जाता है, तो यह संवादात्मक क्षेत्र एक प्रकार के रंगमंच में सिमट जाता है.

‘प्रभावों का रंगमंच’ वाक्यांश गी देबोर्ड की ‘स्पेक्टेकल’ की अवधारणा के साथ गूंजता है, जहां प्रतिनिधित्व सार पर हावी हो जाता है और रूप अपने आप में एक प्रभावी वास्तविकता प्राप्त कर लेता है. ऐसी स्थिति में राजनीति शासन का कार्य नहीं रह जाती; वह शासन के प्रदर्शन का अभ्यास बन जाती है. जो प्रस्तुत किया जाता है, वह किए गए कार्य से अधिक महत्वपूर्ण हो जाता है.

इसके नैतिक निहितार्थ गहरे हैं. जब प्रतिबद्धता को दायित्व के बजाय बोझ के रूप में देखा जाने लगता है, तो राजनीति अपना मानक आधार खो देती है.

इस प्रवृत्ति के विरुद्ध जॉन रॉल्स एक प्रभावशाली प्रतिपक्ष प्रस्तुत करते हैं. ‘न्याय के रूप में निष्पक्षता’ का उनका विचार यह आग्रह करता है कि राजनीतिक व्यवस्थाएं सभी के लिए, विशेषकर सबसे वंचितों के लिए, न्यायसंगत ठहराई जा सकें. यह एक ऐसा ढांचा है जो चिंतन और तर्क की मांग करता है. ऐसा दृष्टिकोण केवल ब्रांडिंग-प्रेरित राजनीति से उत्पन्न नहीं हो सकता. ब्रांडिंग प्राथमिकताओं को समेट सकती है, पर उनका परीक्षण नहीं करती; वह इच्छाओं का प्रतिबिंब तो बनाती है, पर उन्हें अनुशासित नहीं करती.

वास्तव में परिवर्तनकारी राजनीति के साथ इसका अंतर स्पष्ट है. सामाजिक आंदोलनों- आंबेडकरवादी संवैधानिकता से प्रेरित दलित उभार से लेकर ऐतिहासिक कानूनी सुधारों को जन्म देने वाले महिला आंदोलनों तक- ने लोकतंत्र को गहरा करने का कार्य इसलिए किया क्योंकि वे विचारधारात्मक रूप से सुदृढ़ थे. उन्होंने दावे किए, और वे दावे न्याय की उस दृष्टि में निहित थे जो संविधान के अनुरूप थी.

जाति-विरोधी आंदोलनों से यह स्पष्ट होता है कि सबसे स्थायी लोकतांत्रिक राजनीति नीचे से, उन समुदायों से उभरती है जिन्होंने बहिष्कार की हिंसा को झेला है और उसी अनुभव से सामाजिक व्यवस्था की एक संगठित आलोचना विकसित की है. डॉ. भीमराव आंबेडकर का ‘जाति उन्मूलन’ का आग्रह एक क्रांतिकारी परियोजना था, जो भारतीय समाज की सांस्कृतिक और ज्ञानमीमांसीय आधारशिलाओं को रूपांतरित करने की मांग करता था.

निवेदिता मेनन जैसे विद्वानों ने यह तर्क दिया है कि स्त्रीवादी राजनीति, अपने सबसे कठोर रूप में, एकमात्र मुद्दे की राजनीति के आकर्षण को अस्वीकार करती है और लिंग को जाति, वर्ग और पूंजी की व्यापक संरचनाओं के भीतर स्थापित करने पर जोर देती है. यही वह अंतर है जो एक आंदोलन को एक मनोदशा से अलग करता है. आंदोलन संस्थाएं, शब्दावली और एकजुटताएं निर्मित करते हैं जो आक्रोश के क्षण से परे टिकती हैं; जबकि मनोदशाएं समाचार चक्र के बदलते ही विलीन हो जाती हैं.

इससे यह निष्कर्ष नहीं निकलता कि भावनाओं का राजनीति में कोई स्थान नहीं है- वह है, और अत्यंत प्रभावशाली भी- पर संरचनात्मक विश्लेषण और संवैधानिक प्रतिबद्धता से विहीन भावनाएं परिवर्तन के बिना केवल शोर उत्पन्न करती हैं.

विचारधारात्मक राजनीति की वकालत करते हुए उद्देश्य आधुनिक संप्रेषण को अस्वीकार करना नहीं, बल्कि उसके मूल अर्थ के उपनिवेशीकरण का प्रतिरोध करना है. राज्य और नागरिक के बीच संबंध को एक लेन-देन के रूप में नहीं, बल्कि पारस्परिक जिम्मेदारी पर आधारित संवाद के रूप में पुनर्परिभाषित किया जाना चाहिए. हमें स्पष्ट रूप से कहना चाहिए कि नागरिक शासन के उपभोक्ता नहीं हैं; वे उसके निर्माण में सहभागी हैं.

यद्यपि यह कार्य सरल नहीं है, क्योंकि राजनीति के बाजारीकरण को बनाए रखने वाली शक्तियां अत्यंत सशक्त और गहराई से जमी हुई हैं. फिर भी राजनीतिक रूप अपरिवर्तनीय नहीं होते; वे निरंतर सामूहिक क्रिया के माध्यम से चुनौती दिए जाते हैं और पुनः निर्मित होते हैं.

अंततः दांव पर स्वयं लोकतंत्र का अर्थ है. क्या वह एक ऐसा क्षेत्र बना रहेगा जहां विचारों का संघर्ष हो और सत्ता जवाबदेह ठहराई जाए? या वह एक ऐसे क्षेत्र में परिवर्तित हो जाएगा जहां धारणा सिद्धांत पर हावी हो जाए और नागरिकता उपभोग में सिमट जाए?

(लेखक राष्ट्रीय जनता दल के राज्यसभा सदस्य हैं.)