गुजरात में तीन दिन बाद (26 अप्रैल) स्थानीय निकाय चुनाव होने वाले हैं. चुनाव प्रचार पहले से ही जोरों पर था, तभी आनंद से भाजपा सांसद मितेश पटेल ने अपने भड़काऊ बयानों से इसे और गरमा दिया.
भाजपा सांसद पटेल ने मतदाताओं से कहा कि अगर इस क्षेत्र से कांग्रेस का एक भी उम्मीदवार जीत गया, तो उनके विकास फंड से एक भी रुपया यहां नहीं पहुंचेगा. उन्होंने कहा कि वह खुद इस बात का ध्यान रखेंगे ताकि लोगों को सबक सिखाया जा सके.
यह बयान वीडियो में रिकॉर्ड हो गया और तेज़ी से फैल गया.
इस बात को नजरअंदाज करना इसलिए भी मुश्किल था क्योंकि पहले भी ऐसा हो चुका है. 2022 के चुनाव के दौरान पटेल का एक ऐसा ही वीडियो वायरल हुआ था और उस समय भी इसकी आलोचना हुई थी. विपक्ष ने तुरंत इस बात को पकड़ लिया. उन्होंने कहा कि यह कोई जुबान फिसलने की बात नहीं है.
ये चुनाव स्थानीय स्व-शासन निकायों – नगरपालिकाओं, तालुका पंचायतों और जिला पंचायतों – के लिए हो रहे हैं. ये संस्थाएं मुख्य रूप से सरकारी अनुदानों पर चलती हैं. सड़क, जल आपूर्ति, स्वच्छता, सार्वजनिक स्वास्थ्य और ग्रामीण विकास जैसी सेवाएं इन्हीं के माध्यम से संचालित होती हैं. इसलिए मतदाताओं से यह कहना कि उनके वोट के आधार पर फंड बंद हो सकते हैं, कोई साधारण धमकी नहीं है.
कांग्रेस नेताओं ने इस पर कड़ी प्रतिक्रिया दी. उन्होंने इसे ‘बाहुबल की राजनीति’ बताया. एक विपक्षी नेता ने इसे ‘खुल्लम खुला दबाव’ यानी मतदाताओं पर सीधा दबाव डालने की कोशिश कहा.
उन्होंने तीन खास आरोप लगाए. पहला, यह बयान मतदाताओं को डराने-धमकाने जैसा है. दूसरा, यह सरकारी फंड का खुलेआम राजनीतिकरण है. तीसरा, यह उन संवैधानिक सिद्धांतों पर चोट करता है, जिनके तहत सभी नागरिकों के साथ समान व्यवहार किया जाना चाहिए.
एक वरिष्ठ विश्लेषक ने कहा कि सार्वजनिक धन को निजी संपत्ति की तरह देखना समान नागरिकता की अवधारणा को सीधे कमजोर करता है.
यह घटना केवल एक बयान तक सीमित नहीं है, बल्कि इससे व्यापक चिंताएं सामने आती हैं. पर्यवेक्षकों ने चुनावों में समान अवसर की बात उठाई, साथ ही प्रचार में सरकारी तंत्र के उपयोग और पार्टी व सरकार के बीच की सीमाओं के मिटते जाने पर भी सवाल उठाए.
यदि मतदाता यह मानने लगें कि विपक्षी उम्मीदवार को चुनने का मतलब बुनियादी सेवाओं से वंचित होना है, तो यह सवाल उठता है कि क्या यह वाकई एक ‘स्वतंत्र चुनाव’ है?
भाजपा ने पटेल के बयान पर अब तक कोई विस्तृत स्पष्टीकरण जारी नहीं किया है. इस चुप्पी ने विवाद को और बढ़ा दिया है. यह मुद्दा अब चुनाव प्रचार का एक प्रमुख विषय बन गया है.
गुजरात में भाजपा का चुनाव अभियान ‘सुशासन’ और ‘विकास’ के मुद्दों पर टिका हुआ है. जबकि विपक्ष अब संस्थाओं के दुरुपयोग के आरोपों के साथ जवाब दे रहा है. विपक्ष अब संस्थागत दुरुपयोग के आरोपों के साथ पलटवार कर रहा है. पटेल की टिप्पणियों ने इस विरोधाभास को और भी तीखा कर दिया है – जो उनकी अपनी ही पार्टी के लिए असहज करने वाला है.
(यह रिपोर्ट मूल रूप से ‘वाइब्स ऑफ़ इंडिया‘ पर प्रकाशित हुआ था.)
