नई दिल्ली: पिछले सप्ताह प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के न्यूज़ीलैंड दौरे के दौरान वहां हुई भारतीय विदेश मंत्रालय की प्रेस ब्रीफिंग में एक स्थानीय पत्रकार ने पूछा था कि प्रधानमंत्री मोदी ने इस दौरे पर प्रेस कॉन्फ्रेंस क्यों नहीं की.
इसके जवाब में मंत्रालय के अधिकारी रुद्रेंद्र टंडन ने कहा कि इस बात का जवाब देना उनका काम नहीं है, फिर भी वे इस विषय पर आए और मोदी का बचाव किया. टंडन ने उन्हें ‘एक बेहतरीन नेता’ बताते हुए जोड़ा कि मोदी ‘बिचौलियों’ के ज़रिये बात करने के बजाय जनता से सीधे बातचीत करना पसंद करते हैं.
उनका कहना था, ‘आपको याद रखना चाहिए कि भारतीय वोटर ज़्यादातर गांव के लोग हैं जो सीधा संपर्क चाहते हैं. उन्हें किसी के ज़रिये बात करना पसंद नहीं है.’
इससे पहले मोदी के दौरे पर रिपोर्टिंग कर रहे एक ऑस्ट्रेलियाई पत्रकार ने लाइव टीवी पर कहा था कि अल्बानीज़ [ऑस्ट्रेलियाई प्रधानमंत्री] के साथ नरेंद्र मोदी की यात्रा के बारे में हम बस इतना ही जान पाएंगे. ऐसा मशहूर है कि वह [मोदी] बिना स्क्रिप्ट वाली न्यूज़ कॉन्फ्रेंस से बचते हैं, इसके बजाय वे स्टेज-मैनेज्ड अपीयरेंस पसंद करते हैं.’
उल्लेखनीय है कि विश्व प्रेस स्वतंत्रता सूचकांक में भारत 180 देशों में 157वें स्थान पर है और नरेंद्र मोदी पिछले 12 साल से अधिक समय में पहले ऐसे प्रधानमंत्री है, जिन्होंने पदभार संभालने के बाद से भारत में एक भी प्रेस कॉन्फ्रेंस नहीं की है.
इस साल की शुरुआत में मोदी के यूरोप दौरे के दौरान भी इसी तरह के सवाल सुनाई दिए थे. नॉर्वे और नीदरलैंड के पत्रकारों ने सार्वजनिक रूप से सवाल उठाया था कि भारतीय प्रधानमंत्री अपने समकक्षों के साथ, बिना स्क्रिप्ट वाले सवाल क्यों नहीं लेते.
नॉर्वे विश्व प्रेस स्वतंत्रता सूचकांक में शीर्ष पर है और वहां की पत्रकार हेले ल्यूंग, जिन्होंने उस समय प्रधानमंत्री मोदी से सवाल किया, और इसे लेकर उन्हें मोदी सरकार के समर्थकों ने ट्रोल किया था, ने भी हाल में उठे सवालों पर टिप्पणी करते हुए कहा कि अब दुनिया का ध्यान इस बात पर जा रहा है कि कैसे भारतीय पीएम प्रेस वार्ता नहीं करते हैं.
It is nice to see that other countries are continuing the discussion about declining press freedom in India.
That was a part of my goal when I decided to do over 30 interviews with press from all around the world after the «Norway incident».
Reporters working from countries… https://t.co/tfBeW4Lpe7
— Helle Lyng (@HelleLyngSvends) July 11, 2026
उन्होंने एक्स पर लिखा, ‘यह देखकर अच्छा लगा कि दूसरे देश भी भारत में प्रेस की घटती आज़ादी पर चर्चा जारी रख रहे हैं. जब मैंने नॉर्वे घटना के बाद दुनिया भर की प्रेस के साथ 30 से ज़्यादा इंटरव्यू करने का फ़ैसला किया, तो मेरे मकसद का एक हिस्सा यह भी था. न्यूज़ीलैंड और नॉर्वे जैसे देशों में काम करने वाले पत्रकारों पर तब ज़्यादा ज़िम्मेदारी आ जाती है जब अन्य देशों के नेता वहां आते हैं. छोटे देश भी योगदान कर सकते हैं और बदलाव ला सकते हैं. मुझे खुशी है कि कुछ भारतीयों को यह काम की बात लगी. यही वजह है कि यह ज़रूरी है.’
ल्यूंग ने पूछा, ‘क्या इसका मतलब यह है कि प्रधानमंत्री आम तौर पर टाउन हॉल में लोगों से मिलते हैं और उनकी रोज़मर्रा की ज़िंदगी की दिक्कतों के बारे में सवाल-जवाब करते हैं? मैंने उन्हें कॉकरोच जनता पार्टी, जो एक ज़मीनी आंदोलन है, से सीधे तौर पर बात करते नहीं देखा. अगर मैं इस बारे में गलत हूं तो मुझे सही करें.’
इस हालिया टिप्पणी को लेकर भारत का विदेश मंत्रालय एक बार फिर से आलोचनाओं के घेरे में आ गया है, लेकिन उतना नहीं जितना तब हुआ था, जब मंत्रालय के अधिकारी सिबी जॉर्ज ने एक प्रेस कॉन्फ्रेंस में भारतीय संस्कृति, ज़ीरो और योग के बारे में बातें की थीं. लेकिन अब नाराज़गी इस बात को लेकर है कि क्या भारत के ‘ग्रामीण लोग’ जवाबदेही नहीं चाहते हैं और क्या विदेश सेवा के अधिकारियों को इस तरह की बातें करनी चाहिए.
ख़बरों के अनुसार, विपक्षी दल कांग्रेस के नेता पवन खेड़ा ने कहा कि ‘नौकरशाह अमूमन की सरकार की सेवा में ही होते हैं,’ हालांकि उन्होंने जोड़ा कि टंडन का स्पष्टीकरण ‘लोकतांत्रिक रूप से बचाव करने लायक नहीं’ था.
जनसभाओं के ज़रिये राजनीति, ऑस्ट्रेलियाई मीडिया ने क्या देखा?
स्काई न्यूज, ऑस्ट्रेलिया ने ऑस्ट्रेलियाई प्रधानमंत्री एंथनी अल्बानीज़ और विक्टोरिया की प्रीमियर जैकिंटा एलन की उपस्थिति में मेलबर्न के मार्बल स्टेडियम में नरेंद्र मोदी द्वारा आयोजित बड़े प्रवासी सम्मेलन की आलोचना की और कहा कि ‘यह कूटनीति नहीं है, यह राजनीति है और ऑस्ट्रेलियाई करदाता की कीमत पर है.’
एंकर डेनिका डी जॉर्जियो ने अल्बानीज़ पर तंज़ करते हुए कहा कि वे ‘मोदी को ज़रूरत से ज़्यादा तवज्जो दे रहे हैं.’
नेटवर्क ने इस आयोजन को लेकर हमलावर होते हुए कहा कि यह समारोह सत्तारूढ़ पार्टी को भारतीय प्रवासियों के करीब लाने के लिए हुआ था, एंकर के अनुसार,’जिनमें से 85% सत्तारूढ़ पार्टी को वोट देते हैं’. उन्होंने मोदी के ऑस्ट्रेलिया में ऑस्ट्रेलियाई लोगों का ही स्वागत करने के लिए और अल्बानीज़ को ऐसा होने देने के लिए नाराज़गी जताई.
उल्लेखनीय है इससे पहले साल 2019 में संयुक्त राष्ट्र अमेरिका के ह्यूस्टन में हुए ‘हाउडी मोदी’ इवेंट में जब मोदी ने वहां के दर्शकों के सामने ‘अब की बार, ट्रंप सरकार’ का नारा दिया था, तब अमेरिकी राजनीति में दखल देने के लिए उनकी कड़ी आलोचना हुई थी. हालांकि, मोदी के वह नारा दिए जाने के कुछ हफ़्तों बाद ट्रंप वह चुनाव हार गए थे और जो बाइडेन राष्ट्रपति चुने गए थे. अपने दूसरे कार्यकाल में ट्रंप द्वारा कई बार भारत का अपमान किए जाने के बाद मोदी की चुप्पी पर सवाल उठाए गए हैं, साथ ऐसा भी कहा गया है कि उस समय ट्रंप के लिए प्रचार करने से भारत को कोई लाभ नहीं हुआ.
ऑस्ट्रेलिया की हालिया घटना को कांग्रेस प्रवक्ता सुप्रिया श्रीनेत ने ‘भारतीय मीडिया पर मज़ाक’ क़रार देते हुए कहा कि कुछ ही समय में प्रधानमंत्री मोदी के समर्थक ऑस्ट्रेलियाई पत्रकार को बदनाम करने लगेंगे. उन्होंने यह भी आरोप लगाया कि मोदी से जवाब मांगने के बजाय, भारतीय मीडिया का एक हिस्सा उनके ‘एकालापों को बढ़ा-चढ़ाकर पेश करने में लगा है.
