राष्ट्रीय विधि विश्वविद्यालयों में मनुस्मृति, अर्थशास्त्र व भारतीय मूल्य पढ़ाए जाने चाहिए: जस्टिस धर्माधिकारी

मद्रास हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश जस्टिस धर्माधिकारी ने एक कार्यक्रम में कहा कि राष्ट्रीय विधि विश्वविद्यालय के छात्र अक्सर अपनी सांस्कृतिक और वैचारिक जड़ों से कटे हुए नज़र आते हैं. इसलिए उन्हें जैन, बौद्ध धर्म, मनुस्मृति और अर्थशास्त्र जैसे ग्रंथों के सिद्धांत और उनके आपसी संबंधों की शिक्षा दी जानी चाहिए.

जस्टिस धर्माधिकारी. (फोटो साभार: सोशल मीडिया/स्क्रीनग्रैब)

नई दिल्ली: मद्रास हाईकोर्ट के चीफ जस्टिस सुश्रुत अरविंद धर्माधिकारी ने हाल ही में एक कार्यक्रम में बोलते हुए कहा कि राष्ट्रीय विधि विश्वविद्यालय (एनएलयू) के छात्र अक्सर अपनी सांस्कृतिक और वैचारिक जड़ों से कटे हुए नजर आते हैं. इसलिए उन्हें जैन, बौद्ध धर्म, मनुस्मृति और अर्थशास्त्र जैसे ग्रंथों के सिद्धांत और उनके आपसी संबंधों की शिक्षा दी जानी चाहिए.

लाइव लॉ के मुताबिक, भोपाल के नेशनल लॉ इंस्टिट्यूट यूनिवर्सिटी में आयोजित एक कॉन्क्लेव में बोलते हुए जस्टिस धर्माधिकारी ने कहा, ‘हम लगातार यह देख रहे हैं कि भले ही एनएलयू ऐसे विलक्षण प्रतिभा वाले छात्र तैयार कर रहे हैं, जो अपने समकालीनों से कहीं आगे हैं, लेकिन इसका एक नुकसान यह है कि वे सबसे तेज़ गति से करोड़पति बनने के एकमात्र लक्ष्य के साथ ग्रेजुएट हो रहे हैं. उनमें से ज़्यादातर लोगों का अपनी सांस्कृतिक और वैचारिक जड़ों से पूरी तरह से जुड़ाव टूट चुका है. चाहे वे जैन धर्म, बौद्ध धर्म, मनुस्मृति या अर्थशास्त्र के सिद्धांत हों.’

उन्होंने आगे कहा, ‘इन सभी ग्रंथों और समृद्ध साहित्य के आपसी जुड़ाव के बारे में सभी कानून के छात्रों को जानना बेहद ज़रूरी है. इससे न केवल उनकी सोच में स्थिरता और परिपक्वता आएगी, बल्कि वे उस महान भारतीय संस्कृति के प्रति भी जागरूक होंगे, जो हमें अपने कर्तव्यों और कर्मों के प्रति अत्यधिक सचेत रहने की सीख देती है- और जिसके लिए हमने इस महान देश में एक इंसान के रूप में जन्म लिया है.’

जस्टिस धर्माधिकारी ने यह भी सुझाव दिया कि भारतीय इतिहास और ग्रंथों को, जिनकी झलक संविधान के कई हिस्सों में मिलती है, पाठ्यक्रम में शामिल किया जाए और कानून के युवा छात्रों को पढ़ाया जाए- विशेष रूप से उन छात्रों को जो देश के प्रमुख राष्ट्रीय विधि विश्वविद्यालयों में पढ़ाई कर रहे हैं.

उन्होंने कहा, ‘यह ज़रूरी है कि भारतीय विज्ञान, संस्कृति और हज़ारों वर्षों से चली आ रही उन शाश्वत मूल्यों और परंपराओं पर एक अलग और समर्पित पाठ्यक्रम अनिवार्य रूप से सभी लॉ स्कूलों के पाठ्यक्रम में शामिल किया जाए; ये वे मूल्य और परंपराएं हैं जिन्होंने हर तरह के हमलों के बावजूद भारतीय सभ्यता की रीढ़ को मज़बूती से थामे रखा है और उसे स्थायित्व प्रदान किया है.’

जस्टिस धर्माधिकारी के अनुसार, ‘पंचतंत्र की कहानियां, जातक कथाएं, चाणक्य के उपदेश, और अशोक द्वारा बौद्ध धर्म अपनाने के बाद प्राप्त चर्चाएं और शिक्षाएं- जिनकी झलक हमारे भारतीय संविधान के विभिन्न हिस्सों में मिलती है- उन सभी को कानून के युवा छात्रों को, विशेष रूप से देश के प्रमुख राष्ट्रीय विधि विश्वविद्यालयों में अनिवार्य रूप से पढ़ाया जाना चाहिए.’

इस तरह जज ने आगे कहा कि कानून के छात्रों के लिए समाज के मूल मूल्यों से जुड़ाव रखना और उस असली मकसद को समझना बहुत ज़रूरी है, जिसके लिए उन्होंने यह पढ़ाई चुनी है.

जस्टिस धर्माधिकारी ने कहा, ‘वह समय दूर नहीं है जब जाने-माने लॉ स्कूल शायद होशियार ग्रेजुएट तो तैयार कर लें, लेकिन वे इंसानों की तरह सोचने के बजाय रोबोट की तरह सोचें- उनमें वह संवेदनशीलता न हो, जिसे उन्हें समाज के आम लोगों की सेवा के लिए विकसित करना और बढ़ाना चाहिए. हम सभी ने जानबूझकर इस नेक और बौद्धिक पेशे को इसलिए नहीं चुना है कि हम अमीर बन जाएं, बल्कि इसलिए चुना है कि हम इस वादे का सम्मान कर सकें कि ‘कानून का राज’ हमेशा देश के हर आम नागरिक का रक्षक बनकर खड़ा रहेगा.’

कार्यक्रम में ‘औपनिवेशिक प्रभावों से परे: भारत की कानूनी व्यवस्था पर पश्चिमी प्रभाव पर पुनर्विचार और सुधार’ विषय पर बोलते हुए जज ने यह भी कहा कि न्यायिक व्यवस्था का भारतीयकरण सिर्फ़ एक कानूनी सुधार नहीं है, बल्कि यह भारत की कानूनी पहचान को वापस दिलाने की दिशा में उठाया गया एक कदम है.

उन्होंने आगे कहा कि न्यायिक व्यवस्था का भारतीयकरण न्याय को ज़्यादा सुलभ बनाता है, सांस्कृतिक रूप से ज़्यादा प्रासंगिक बनाता है, और भारतीय समाज की ज़रूरतों को सही मायने में दर्शाता है.

उन्होंने आगे कहा कि औपनिवेशिक प्रभाव एक कोहरे जैसा था, जो हमें अपने परिवेश को स्पष्ट रूप से देखने से रोक रहा था. उन्होंने छात्रों से इस कोहरे को हटाने का आग्रह किया.

उन्होंने कहा कि कानून का अध्ययन केवल उसके वर्तमान स्वरूप में ही नहीं किया जाना चाहिए, बल्कि इस बात की भी पड़ताल की जानी चाहिए कि उसका मूल उद्देश्य क्या था. फिर उसे भारत की वर्तमान आवश्यकताओं के अनुरूप फिर से लिखा जाना चाहिए.

जज ने यह भी जोड़ा कि भारत में पश्चिमी कानूनों के प्रभाव पर पुनर्विचार और उनमें सुधार का अर्थ अतीत को मिटाना नहीं है- जो कि भारतीय लोकतंत्र की रीढ़ रहा है- बल्कि इसका उद्देश्य कानूनी संस्थाओं की मानसिकता को औपनिवेशिक प्रभाव से मुक्त करना है.

जस्टिस धर्माधिकारी ने इस बात की ओर संकेत किया कि आज़ादी के बाद भी हमारी कानूनी व्यवस्था की कई प्रक्रियाएं और मानसिकता भारतीय वास्तविकताओं के बजाय ब्रिटिश प्रभाव को ही दर्शाती रहीं. उन्होंने बताया कि वर्तमान कानूनी प्रणाली की प्रमुख समस्याओं में से एक इसकी जटिलता और आम लोगों की पहुंच से बाहर होना है.

उन्होंने कहा कि अधिकांश कानून अत्यंत क्लिष्ट अंग्रेजी भाषा में लिखे गए हैं, जिन्हें किसी भी मुकदमा लड़ने वाले व्यक्ति के लिए समझना कठिन होता है. यदि कोई वादी न्यायालय के तर्कों और निर्णयों को ही न समझ पाए तो यह माना जाएगा कि न्याय अभी भी औपनिवेशिक काल के दरवाज़ों के पीछे ही कैद है.

जस्टिस धर्माधिकारी ने एक अन्य मुद्दे जजों को ‘लॉर्डशिप’ या ‘लेडीशिप’ कहकर संबोधित करने के चलन की ओर भी ध्यान आकर्षित करते हुए कहा कि यह प्रथा उस औपनिवेशिक व्यवस्था की देन थी, जिसमें आम नागरिकों को न्याय की मांग एक अधिकार की बजाय याचना के रूप में करनी पड़ती थी.

उन्होंने हाल ही में भारतीय दंड संहिता (आईपीसी), दंड प्रक्रिया संहिता (सीआरपीसी) और इंडियन एविडेंस एक्ट की जगह क्रमशः भारतीय न्याय संहिता, भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता और भारतीय साक्ष्य अधिनियम को लागू किए जाने को एक अत्यंत महत्वपूर्ण कदम बताते हुए कहा कि इन तीनों नए कानूनों के माध्यम से औपनिवेशिक काल के आपराधिक कानूनों को समाप्त कर दिया गया है, जिसका मुख्य उद्देश्य ‘दंडात्मक मानसिकता’ से हटकर ‘न्याय-उन्मुख मानसिकता’ की ओर अग्रसर होना है.