नई दिल्ली: पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव में भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) की ऐतिहासिक जीत के एक दिन बाद बांग्लादेश के विदेश मंत्री खलीलुर रहमान ने मंगलवार (5 मई) को कहा कि अगर राज्य में सरकार बदलने के बाद ‘पुश-इन’ की घटनाएं होती हैं तो ढाका कार्रवाई करेगा.
बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी (बीएनपी) के आधिकारिक फेसबुक पेज पर मंगलवार को रहमान का बयान साझा किया गया. इसमें उनकी तस्वीर के साथ बांग्ला में संदेश लिखा गया था. पोस्ट में रहमान के हवाले से कहा गया, ‘पश्चिम बंगाल में सत्ता परिवर्तन के बीच अगर पुश-इन की घटनाएं होती हैं तो बांग्लादेश कार्रवाई करेगा.’
‘पुश-इन’, जिसे भारत में ‘पुशबैक’ कहा जाता है, उस प्रक्रिया को कहा जाता है जिसमें भारतीय सीमा सुरक्षा बल लोगों को शारीरिक रूप से भारत-बांग्लादेश सीमा पार धकेल देते हैं. भारतीय अदालतों में भी ऐसे कई दावे किए गए हैं कि सुरक्षा बल बंगाली मूल के मुसलमानों को बांग्लादेशी नागरिक बताकर सीमा पार भेज देते हैं.
बांग्लादेश लंबे समय से ऐसी कार्रवाइयों को अपनी संप्रभुता का उल्लंघन बताकर विरोध करता रहा है. प्रोथोम आलो की एक रिपोर्ट के मुताबिक, मई 2025 से जनवरी 2026 के बीच भारतीय अधिकारियों ने 2,479 लोगों को सीमा पार कर बांग्लादेश भेजा. इनमें से 120 लोगों की पहचान बॉर्डर गार्ड बांग्लादेश ने भारतीय नागरिकों के रूप में की.
इसलिए यह चौंकाने वाली बात नहीं है कि पश्चिम बंगाल चुनाव परिणाम पर बांग्लादेश की पहली प्रतिक्रिया भारत द्वारा ‘पुश-इन’ की घटनाएं बढ़ाए जाने की आशंका को लेकर आई है.
पश्चिम बंगाल के अगले मुख्यमंत्री बनने के प्रबल दावेदार, भाजपा नेता शुभेंदु अधिकारी ने अपना चुनाव अभियान कथित ‘मुस्लिम विदेशियों’ और ‘बांग्लादेशी घुसपैठियों’ के मुद्दे पर केंद्रित रखा था.
दिसंबर 2025 में अधिकारी ने कोलकाता स्थित बांग्लादेश के उप उच्चायोग तक एक विरोध मार्च का नेतृत्व किया था. वहां उन्होंने पत्रकारों से कहा था कि बांग्लादेश को ‘वैसा सबक सिखाया जाना चाहिए जैसा इज़रायल ने गाज़ा को सिखाया.’ उन्होंने यह धमकी भी दी थी कि भारतीय जमीन पर इस मिशन को काम नहीं करने दिया जाएगा.
अधिकारी ने बिना कोई सबूत दिए दावा किया था कि राज्य में 1.5 करोड़ ‘घुसपैठिए’ हैं. भाजपा द्वारा बंगाल के चुनाव अभियान में ‘बांग्लादेशी घुसपैठियों’ का मुद्दा विशेष गहन मतदाता सूची पुनरीक्षण अभियान (एसआईआर) के साथ प्रमुखता से उठाया गया. एसआईआर के तहत लगभग 90 लाख मतदाताओं के नाम हटाए गए थे. इनमें एक-तिहाई मुसलमान बताए गए.
बांग्लादेश से सटे एक अन्य राज्य असम के मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा शर्मा ने भी इसी तरह के दावे किए थे और सार्वजनिक रूप से लोगों को सीमा पार धकेलने की बात कही थी. शर्मा ने अधिकारी के साथ चुनाव प्रचार किया था.
मंगलवार दोपहर ढाका में अधिकारी और शर्मा के बयानों पर पूछे गए सवाल के जवाब में रहमान ने कहा, ‘जब असम के मुख्यमंत्री ने वह बयान दिया और स्वीकार किया कि उन्होंने कुछ काम किए हैं, तब आपने देखा कि हमने विरोध दर्ज कराया. इस मामले में जो भी कदम जरूरी होंगे, हम उठाएंगे.’
शर्मा के बयानों को लेकर बांग्लादेश ने 30 अप्रैल को भारत के कार्यवाहक उच्चायुक्त पवन बाढ़े को तलब किया था. ढाका ने ऐसे सार्वजनिक बयानों को ‘उल्टा असर डालने वाला’ बताया और भारतीय राजनीतिक नेताओं से संवेदनशील द्विपक्षीय मुद्दों पर संयम बरतने की अपील की.
बीएनपी सरकार के सत्ता में आने के बाद यह भारत के खिलाफ उसका पहला औपचारिक विरोध था.
रहमान ने लंबे समय से लंबित तीस्ता जल बंटवारा विवाद पर भी बात की. तीस्ता समझौता पिछले 15 वर्षों से अटका हुआ है. 2011 में तीस्ता नदी के पानी के बंटवारे पर प्रस्तावित समझौते को तत्कालीन मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने यह कहते हुए रोक दिया था कि इससे पश्चिम बंगाल के कृषि हितों को नुकसान होगा. इसके बाद भारतीय प्रधानमंत्रियों की ढाका यात्राओं के दौरान भी यह समझौता हस्ताक्षरित नहीं हो सका.
जब उनसे पूछा गया कि पश्चिम बंगाल में सरकार बदलने से तीस्ता समझौते पर नई संभावनाएं खुल सकती हैं या नहीं, इस पर रहमान ने सावधानी बरतते हुए कहा, ‘पश्चिम बंगाल में अभी सरकार का गठन नहीं हुआ है. जब तक वे यह स्पष्ट नहीं करते कि उनकी सोच क्या है या वे क्या करना चाहते हैं, तब तक यह उम्मीद करना उचित नहीं होगा कि हम उनके मन की बात समझ लें. उसके बाद ही हम देख पाएंगे कि पहले हुआ समझौता मौजूदा परिस्थितियों में फिर से विचार के लिए खोला जा सकता है या नहीं. लेकिन इसके लिए बातचीत करनी होगी. हमें भी अपनी भूमिका निभानी होगी.’
उन्होंने कहा कि सबसे अहम बात यह है कि तीस्ता के किनारे रहने वाले लोग गंभीर पारिस्थितिक संकट का सामना कर रहे हैं. ‘यह आर्थिक सुरक्षा का सवाल है. हम हर संभव विकल्प पर विचार करेंगे. जो सबसे बेहतर होगा, वही चुनेंगे. यहां सबसे बड़ा सवाल हमारे लोगों के हित का है. बांग्लादेश फर्स्ट.’
बांग्लादेश तीस्ता रिवर कॉम्प्रिहेंसिव मैनेजमेंट एंड रिस्टोरेशन प्रोजेक्ट के प्रति अपनी प्रतिबद्धता बनाए हुए है. यह चीन समर्थित परियोजना नदी की ड्रेजिंग और तटबंध निर्माण पर केंद्रित है. भारत ने मई 2024 में तत्कालीन विदेश सचिव विनय क्वात्रा की ढाका यात्रा के दौरान तीस्ता परियोजना को खुद वित्तीय सहायता देने की पेशकश की थी. इसे व्यापक रूप से उस कोशिश के रूप में देखा गया था, जिसके जरिए भारत रणनीतिक रूप से संवेदनशील सिलीगुड़ी कॉरिडोर के पास स्थित इस परियोजना से चीन को दूर रखना चाहता था.
पश्चिम बंगाल में भाजपा की जीत ऐसे समय में हुई है जब भारत और बांग्लादेश लंबे तनावपूर्ण दौर के बाद रिश्तों को सामान्य बनाने की कोशिश कर रहे हैं.
अगस्त 2024 में जनविद्रोह के बाद शेख हसीना को सत्ता से हटाए जाने के बाद नोबेल पुरस्कार विजेता मुहम्मद यूनुस के नेतृत्व वाली अंतरिम सरकार के कार्यकाल के दौरान ढाका के नई दिल्ली के साथ संबंध काफी बिगड़ गए थे.
फरवरी 2026 के आम चुनाव में बीएनपी ने भारी जीत हासिल की. तारिक रहमान निर्वासन से लौटकर चुनाव अभियान का नेतृत्व करने आए थे. भारत ने नई सरकार के साथ जल्दी संपर्क साधने की कोशिश की. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने रहमान को भारत आने का निमंत्रण देते हुए एक पत्र भेजा, जिसे लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला ने 17 फरवरी को आयोजित शपथ ग्रहण समारोह में शामिल होने के दौरान सौंपा. इस समारोह में विदेश सचिव विक्रम मिस्री भी मौजूद थे. इससे पहले विदेश मंत्री एस. जयशंकर बीएनपी प्रमुख रह चुकीं और तारिक रहमान की मां खालिदा जिया के अंतिम संस्कार में शामिल होने ढाका गए थे.
पिछले महीने विदेश मंत्री रहमान ‘सद्भावना यात्रा’ पर नई दिल्ली आए थे. बीएनपी सरकार के सत्ता संभालने के बाद यह भारत की उनकी पहली मंत्रीस्तरीय यात्रा थी. इस दौरान रहमान ने जयशंकर, राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजीत डोभाल और पेट्रोलियम मंत्री हरदीप सिंह पुरी से मुलाकात की थी.
