बंगाल में भाजपा क्यों जीती? हार-जीत से आगे की कहानी

बंगाल को लेकर ज़मीन से आने वाली बात यह है कि बहुत-सी जगहों पर भाजपा का कैडर तो तृणमूल के ख़िलाफ़ लड़ ही रहा था, स्थानीय स्तर पर कांग्रेस और वामपंथी कार्यकर्ताओं का एक हिस्सा भी तृणमूल-विरोध की मनःस्थिति में भाजपा को रास्ता दे रहा था.

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पूर्व बर्धमान के हरगारियाडांगा में मतदान कर लौटती आदिवासी समुदाय की महिलाएं. पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव के दूसरे और अंतिम चरण में 29 अप्रैल 2026 को यहां मतदान हुआ था. (फोटो: पीटीआई)

पश्चिम बंगाल में लंबे समय घूमकर लौटे एक युवा रिसर्चर्स ने जो वाकये सुनाए, वह इस चुनावी परिणाम से भी अधिक अर्थपूर्ण हैं. बंगाल की कहानी केवल यह नहीं है कि भाजपा 32,11,427 वोट से जीत गई और कांग्रेस पिछली बार की तुलना में इस बार 1,27,769 वोट लेकर भी कमज़ोर रह गई. असली कहानी यह है कि किसने चुनाव को मशीन की तरह लड़ा, किसने कविता की तरह समझा और किसने केवल प्रेस-कॉन्फ्रेंस की तरह निभाया.

आधिकारिक चुनावी तस्वीर यह है कि मई 2026 के चुनावी परिणामों में भाजपा 207 सीटों पर, तृणमूल कांग्रेस 80 पर, कांग्रेस 2 पर, एजेयूपी 2 पर, सीपीआईएम 1 पर और एआईएसएफ 1 पर रही; यानी उपलब्ध परिणामों का कुल योग 293 सीटों का है, जबकि विधानसभा 294 सीटों की है. इसीलिए यह परिणाम केवल सत्ता-परिवर्तन नहीं, बंगाल की राजनीतिक भूगोल में एक गहरा भू-स्खलन है. इस भू-स्खलन में संविधान की सड़क भी क्षतिग्रस्त हुई है, न्याय के स्तंभ भी ढहे और टेढ़े हुए हैं और लोकतंत्र की मर्यादा नदी के किनारे भी बहे हैं.

भाजपा ने बंगाल को केवल रैलियों से नहीं जीता. उसने उसे बूथों, जातीय-सामाजिक दरारों, स्थानीय रोष, दलित-मतुआ अस्मिता, ग्रामीण असंतोष, महिला-सुरक्षा, भ्रष्टाचार के आरोपों और तृणमूल के स्थानीय ढांचे से उपजी थकान के संयोग से भी जीता. यह अय्यारी जीत किसी एक रंग की तिलिस्मी स्याही से नहीं लिखी गई; इसमें केसरिया, धूसर, लाल और स्थानीय अपमानों की एक गहरी मिट्टी-मिली हुई स्याही है.

ग्राउंड से आने वाली बात यह है कि बहुत-सी जगहों पर भाजपा का कैडर तो तृणमूल के ख़िलाफ़ लड़ ही रहा था, स्थानीय स्तर पर कांग्रेस और वामपंथी कार्यकर्ताओं का एक हिस्सा भी तृणमूल-विरोध की मनःस्थिति में भाजपा को रास्ता दे रहा था. विचारधारा का मामला ही नहीं रह गया था. लंबे समय से बंगाल में राज्यपाल शासन की मांग करते रहे कांग्रेस नेता अधीर रंजन कह रहे थे कि केंद्र से भेजी गई फोर्सेज इस चुनाव को निष्पक्ष संपन्न करवाएंगी.

यह स्थानीय भय, प्रतिशोध और अस्तित्व की राजनीति का अस्थायी समझौता था. बंगाल में 2019 से चली ‘आगे राम, पोरे बाम’ वाली चर्चा पहले भाजपा, बाद में वाम इसी मानसिकता का नारा थी. कई विश्लेषणों ने इस बात को दर्ज़ किया है कि वाम दलों और कांग्रेस समर्थकों का एक हिस्सा तृणमूल को हटाने के लिए भाजपा को सामरिक औज़ार की तरह देखने लगा था.

इस मामले में इन दलों के केंद्रीय नेतृत्व की सोच अलग थी और स्थानीय की बिलकुल अलग. इसलिए वह पिछली बार जितना वोट लेकर भी संतुष्ट हैं और माकपा तो सिर्फ़ 1791 वोट अधिक लेकर ही प्रसन्न है. लेकिन कांग्रेस की अधिक प्रसन्नता टीएमसी वालों से दस-बारह पार्टी दफ़्तरों का कब्जा छुड़वाना भी है.

वाम के साथ जो हुआ उसकी पुनरावृत्ति?

यह वही बंगाल है, जहां वामदलों को उखाड़ने के लिए कभी ममता बनर्जी के पीछे लगभग पूरा विपक्षी मानस खड़ा हो गया था. इतिहास की विडंबना देखिए, जो ऊर्जा 2011 में वाम सत्ता के ख़िलाफ़ जमा हुई थी, उसका एक बदला हुआ संस्करण 2026 में तृणमूल के ख़िलाफ़ था. सत्ता के कमरे में जब पार्टी सरकार से बड़ी हो जाती है तो दरवाज़े बाहर से नहीं, भीतर से गलते हैं. तृणमूल के साथ भी यही हुआ. भ्रष्टाचार, सिंडिकेट, कट-मनी, भर्ती घोटाले, महिला-सुरक्षा और प्रशासनिक अहंकार उसके ख़िलाफ़ लगातार चुनावी सामग्री बनते गए.

ममता बनर्जी का व्यक्तित्व अब भी भारतीय राजनीति की सबसे असाधारण घटनाओं में है. वे निर्भीक हैं, लड़ाका हैं, सड़क की भाषा जानती हैं और जनता के मन में सीधे प्रवेश करने की क्षमता रखती हैं. उनके स्त्री-केंद्रित कल्याणकारी कार्यक्रमों ने बंगाल की राजनीति को गहराई से प्रभावित किया. लक्ष्मी भंडार जैसे कार्यक्रमों ने महिला मतदाताओं के बीच उनकी राजनीतिक पहुंच को बहुत मज़बूत किया था. लेकिन केवल कल्याणकारी नक़दी राजनीति को अंतहीन सुरक्षा-कवच नहीं दे सकती. जब रोज़गार, सुरक्षा, स्थानीय गुंडागर्दी और प्रशासनिक नियंत्रण की शिकायतें साथ-साथ जमा होने लगती हैं तो जनता लाभार्थी होते हुए भी विद्रोही हो जाती है.

तृणमूल की त्रासदी यही रही कि ममता बनर्जी का निजी साहस उनके संगठन की स्थानीय हिंसक शैली पर नियंत्रण नहीं रख पाया. वे स्वयं जितनी निडर थीं, उनका स्थानीय ढांचा उतना ही आत्मसंतुष्ट और कई जगहों पर आक्रामक समझा जाने लगा. यह आरोप नया नहीं है कि बंगाल में पार्टी-संगठन अक्सर शासन से बड़ा हो जाता है. वामकाल में यही हुआ था; तृणमूल ने उस ढांचे को तोड़ा नहीं, कई जगहों पर बस उसका रंग बदल दिया.

वामदलों की स्थिति भी अजीब है. उनका चुनावी ढांचा टूटा है, पर उनका सामाजिक अवशेष पूरी तरह नष्ट नहीं हुआ. ब्रिगेड पर भीड़ जुटाने की क्षमता, युवाओं को विचार की भाषा देने की कुव्वत और भाजपा-तृणमूल द्वंद्व से बाहर तीसरी आवाज़ बनने की संभावना अभी भी उनमें कहीं बची हुई है. पूरा लेफ़्ट फ्रंट इस बार भी 6.74 प्रतिशत के साथ 42.9 लाख वोटों पर सिमट गया है.

2026 में सीपीआईएम ने मीनाक्षी मुखर्जी, मयूख विश्वास, कलातन दासगुप्ता, दिप्सिता धर और अफरीन बेगम जैसे अपेक्षाकृत युवा चेहरों को आगे किया; यह अपने बूढ़े ढांचे को युवा धमनियों से भरने की कोशिश थी. सत्ता में रहते हुए जिस वाम ने युवाओं को अक्सर पोस्टर चिपकाने और नारे लगाने तक सीमित रखा, वही वाम पराजय के बाद युवाओं को चेहरा बनाने पर मजबूर हुआ. इतिहास ऐसे ही व्यंग्य लिखता है.

भाजपा की रणनीति

भाजपा ने बंगाल में वह रास्ता नहीं अपनाया, जो वह प्रायः हिंदी पट्टी में अपनाती है. वहां वह केवल शहरी-सवर्ण प्रवेश-द्वार से नहीं उतरी; उसने गांव, दलित, अनुसूचित जाति, जनजाति और मतुआ समाज की नसों को पकड़ा. वह बंगाली दलितों को मंदिर प्रवेश तक करवाने के अभियानों से भी जुड़ी.

विश्लेषण बताते हैं कि भाजपा की जीत में एससी-एसटी सीटों और मतुआ मतदाताओं की बड़ी भूमिका रही. ‘द वायर’ के आंकड़ों के अनुसार, 30% से अधिक एससी आबादी वाली सीटों में भाजपा ने लगभग 82.7% सीटें जीतीं; मतुआ समुदाय की भाजपा के साथ टिकाऊ नज़दीकी को भी इस जीत का अहम घटक माना गया.

मालदा और मुर्शिदाबाद जैसे मुस्लिम-बहुल क्षेत्रों की कहानी भी सीधी-सरल और सहज नहीं है. यह कहना पर्याप्त नहीं कि भाजपा ने वहां परचम लहरा दिया; सच यह है कि तृणमूल की पुरानी अल्पसंख्यक पकड़ में दरारें पड़ीं, विपक्षी मुस्लिम वोट में विभाजन हुआ और कई सीटों पर भाजपा को लाभ मिला. मुर्शिदाबाद में भाजपा 22 में से 9 सीटें जीतने तक पहुंची और मालदा में 12 में से 6 सीटें भाजपा तथा 6 तृणमूल के हिस्से आईं. यह परिणाम बताता है कि बंगाल का मुस्लिम मत भी अब एक ही बंद संदूक में बंद नहीं रहा.

एसआईआर का असर पर 

इसी जगह चुनाव आयोग, एसआईआर और मतदाता-सूची को लेकर उठे सवालों को भी एकदम खारिज नहीं किया जा सकता, लेकिन पूरे परिणाम को केवल उसी से समझना भी राजनीतिक अकर्मण्यता और दोषारोपण होगा. कई विश्लेषणों ने यह माना है कि वोटर-रोल संशोधन और डिलीशन कुछ सीटों पर निर्णायक हो सकते हैं.

परिपक्व राजनीतिक निष्कर्ष यह होगा कि बंगाल में सत्ता-विरोध, स्थानीय संगठन, हिंदू-संगठन, दलित-मतुआ लामबंदी, अल्पसंख्यक वोट का विभाजन, चुनावी संस्थाओं पर अविश्वास और बंगाली समाज के जिस्म की ऊर्जा और रीढ़ को नए ज्यामितीय ‘संतुलन’ में लाने के प्रयास मिलकर परिणाम के भीतर काम कर रहे थे. अलबत्ता, राजनीति में सद्भावना पर्याप्त नहीं होती; भूगोल, जाति, भाषा, व्यापार, स्मृति और भय की अलग फाइल बनानी पड़ती है.

बंगाल का सबसे बड़ा संदेश यही है कि ममता बनर्जी को केवल भाजपा ने नहीं हराया. उन्हें उनके अपने स्थानीय ढांचे ने हराया, उनके विरोधियों की सामरिक एकजुटता ने हराया, मतुआ और दलित राजनीति की नई दिशा ने हराया, अल्पसंख्यक वोट की दरारों ने हराया और उस आत्मविश्वास ने हराया, जो लंबे शासन के बाद धीरे-धीरे अहंकार में बदल जाता है और वह छोटी-छोटी बातों पर असहमति जताने वाले सहयोगियों को बाहर का दरवाज़ा दिखा देता है. भाजपा ने इस सबको पढ़ा; कांग्रेस ने शायद सुना भी नहीं; वाम ने देर से समझा और तृणमूल ने अंतिम क्षण तक माना कि ‘दीदी’ नाम की एकाकी बिजली पूरे अंधेरे को हर बार चीर देगी. लेकिन राजनीति में बिजली भी तभी तक चमत्कार है जब तक तार जल न जाएं.

ममता अब भी बंगाल की राजनीति से बाहर नहीं हुई हैं. वे हारकर भी संघर्ष का नाटकीय केंद्र बनी रह सकती हैं. परिणामों के बाद उनके इस्तीफ़ा न देने और चुनाव आयोग पर आरोपों ने एक संवैधानिक संकट जैसी स्थिति बना दी है. मगर लोकतंत्र में अंततः व्यक्तित्व से बड़ा जनादेश होता है. बंगाल ने इस बार केवल सरकार नहीं बदली; उसने सत्ता को यह याद दिलाया कि जिस जनता को आप लाभार्थी समझते हैं, वही अचानक नागरिक बनकर आपके सामने खड़ी हो सकती है.

यही बंगाल का पुराना स्वभाव है. वह देर से बोलता है, मगर जब बोलता है तो दीवारों पर नारा नहीं, इतिहास पर खरोंच छोड़ता है. लेकिन जीत-हार के अंतर, इस बार के ही नहीं, पिछली बार के भी और बढ़े-घटे वोटों के गणित में एसआईआर को भी एक एफआईआर (फस्ट इन्फर्मेशन रिपोर्ट) की तरह पढ़ना चाहिए. वह चार्जशीट का मामला है या क्लोज़र रिपोर्ट का, चार्जशीट का है तो कोर्ट ट्रायल कैसे चलेगा और जजमेंट क्या आएगा, इस पर निर्भर करेगा. लेकिन फिलहाल तो राजनीति का पूरा गणित और राजनीतिक रसायन शास्त्र सामने है, जिन्होंने बंगाल की भूमिगत भौतिकी को पूरी तरह बदल दिया.

(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं.)