विविधता समृद्धि का स्वरूप है और असमानता असफलता का

असमानता न सिर्फ एक नैतिक समस्या है, बल्कि आर्थिक विकास में भी बाधा है. हालांकि भारत  में असमानता के कई आयाम हैं, लेकिन इनमें ख़ास चार- जाति, धर्म, लिंग और आर्थिक असमानता हैं जिनकी समालोचना की ज़रूरत है.

लैंगिक, ग्रामीण-शहरी, भूमि स्वामित्व और भाषा के आधार पर असमानता का आकलन भी उतना ही महत्वपूर्ण है, क्योंकि ये सामाजिक असमानताएं आर्थिक असमानता से भी जुड़ी होती हैं. (इलस्ट्रेशन: परिप्लब चक्रबर्ती/द वायर)

1955 में प्रकाशित ‘संस्कृति के चार अध्याय’ राष्ट्रकवि  रामधारी सिंह ‘दिनकर’ की एक मशहूर किताब है. दिनकर ने इस किताब के ज़रिए सभ्यता और संस्कृति के बीच के फ़र्क़ को साझा करते हुए भारतीय इतिहास में सांस्कृतिक विविधता और सहिष्णुता को हिंदुस्तान की ख़ास ताक़त और पहचान बताई.

दिनकर के मुताबिक, भारत किसी एक सोच की जागीर नहीं बल्कि विभिन्न परंपराओं और सोच का ज़ायकेदार मिश्रण है.

जहां सांस्कृतिक विविधता हमारी अस्मिता की नींव है, वहीं एक और किस्म का अंतर आज के भारत के सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक हालत का संदिग्ध मानचित्र पेश करता है. वह है असमानता. एक तरह से देखा जाए तो ये भी विविधता का एक रूप है लेकिन ऐसा रूप जो भारत के प्रगति में अड़चन की मुख्य वजह साबित हो रहा है.

असमानता न सिर्फ एक नैतिक समस्या है, बल्कि आर्थिक विकास में भी बाधा है. हालांकि भारत  में असमानता के कई आयाम हैं, लेकिन इनमें ख़ास चार- जाति, धर्म, लिंग और आर्थिक असमानता हैं जिनकी समालोचना की ज़रूरत है. ये चार अलग नहीं बल्कि अंतर्विभाजक हैं, एक दूसरे के साथ जुड़े हुए हैं. आंकड़ों के ज़रिये इस लेख में ऐसे दो आयामों का विवरण प्रस्तुत करता हूं.

पहला अध्यायजाति

1901 में अंग्रेज़ों के शासन के दौरान, भारत  कई प्रशासनिक हिस्सों में बंटा हुआ था. ज्यां द्रेज़ और अमर्त्य सेन की किताब ‘इंडिया: एन अनसर्टेन ग्लोरी (An Uncertain Glory)’ में 6 प्रशासनिक हिस्सों में ब्राह्मण और दलितों के साक्षरता स्तर का उल्लेख है. हर प्रशासनिक विभाग में, औसतन, 60% ब्राह्मण पुरुष साक्षर थे, वहीं दलित पुरुषों के साक्षरता का स्तर 1% से भी कम था. ब्राह्मण महिलाओं में जहां औसतन 5% साक्षर थे, वहीं दलित महिलाओं में 0% साक्षर थे.

2011 की जनगणना के मुताबिक, हर 3 दलित पुरुषों में 2 साक्षर हैं और सिर्फ 56% दलित महिलाएं साक्षर हैं. हालांकि 1901 से तुलना करें तो यह अच्छी बात है लेकिन जिस रफ़्तार से साक्षरता बढ़नी चाहिए थी, उस रफ़्तार से नहीं बढ़ी है.

देश की आर्थिक स्थिरता का एक माप यह है कि कितने लोगों का गुज़ारा दिहाड़ी मज़दूरी पर निर्भर है. ये जितना कम हो, उतना बेहतर माना जाता है. 2023 में रिलीज़ की गई अज़ीम प्रेमजी यूनिवर्सिटी के स्टेट ऑफ वर्किंग इंडिया रिपोर्ट के मुताबिक, 2021 में सामान्य श्रेणी के 8% से भी कम श्रमिक दिहाड़ी मज़दूरी करते हैं और 35% से ज़्यादा दलित श्रमिक दिहाड़ी मज़दूरी पर निर्भर हैं.

यानी कनेक्शन बहुत सीधा है. जो शिक्षित हैं, उन्हें ज़्यादा आय वाला रोज़गार मिलेगा. जिनकी आय ज़्यादा होगी, उनका सत्ता और प्रशासन पर ज़्यादा प्रभाव होगा, उनका सोशल नेटवर्क और ताकतवर होगा. सरकारी आंकड़ों के मुताबिक, हर 100 लोगों में सिर्फ 5 लोग ब्राह्मण समुदाय से हैं और 20 लोग दलित समुदाय से हैं, लेकिन 125 साले पहले से ही ब्राह्मणों के शिक्षा की परिस्थिति दलितों के मुकाबले काफी आगे है.

आप खुद ही सोच सकते हैं कि इतने सालों में उनका सोशल नेटवर्क कितना और मज़बूत हो गया होगा, उनकी आर्थिक स्थिति में कितनी वृद्धि हुई होगी और समाज में ब्राह्मण और अन्य अगड़ी जाति के लोगों का वर्चस्व कितना मजबूत हुआ होगा.

दूसरा अध्यायधर्म

जस्टिस राजेंद्र सच्चर के नेतृत्व में स्थापित सच्चर कमेटी  ने 2006 में मुसलमान समुदाय की सामाजिक, आर्थिक और रोज़गार के परिस्थिति में विस्तृत रिपोर्ट रिलीज़ की थी. भारत की आबादी में करीब 14% मुसलमान समुदाय से हैं लेकिन सरकारी आंकड़ों के मुताबिक (2004-05 के एनएसएसओ सर्वे), 31 % मुसलमान गरीबी रेखा से नीचे पाए गए. जबकि पूरे देश में 23% आबादी गरीबी रेखा से नीचे थे.

जहां सामान्य श्रेणी  के हिंदुओं के लिए औसत प्रति व्यक्ति मासिक उपभोग व्यय 1,469 रुपये था, वहीं मुसलमानों के लिए यह सिर्फ 800 रुपये था. यानी, भागीदारी के हिसाब से, सामान्य श्रेणी के हिंदुओं की तुलना में ज़्यादा मुसलमान गरीब थे. नियमित रोज़गार में भी मुसलमानों की भागीदारी बहुत कम थी. चिंता का विषय ये है कि इस रिपोर्ट के 20 साल बाद भी मुसलमानों की आर्थिक हालत में सुधार नज़र नहीं आ रहा है.

सरकारी (पीएलएफएस) आंकड़ों का विश्लेषण कर साजिदा अंजुम द्वारा किया गया सराहनीय रिसर्च इंडियन जर्नल ऑफ लेबर इकोनॉमिक्स में प्रकाशित हुआ, जो यह दर्शाता है कि भेदभाव और पूर्वाग्रह की वजह से मुसलमान पुरुष न सिर्फ कम संख्या परिमाण में नियमित रोज़गार में शामिल हैं बल्कि उनका मासिक वेतन भी सामान्य श्रेणी के हिंदू पुरुषों से कम है.

सामाजिक और आर्थिंक आयाम में मुसलमानों के पिछड़ेपन के बावजूद ‘हिंदू खतरे में है’ का नारा कई जगह प्रचलित है. कहा जाता है कि मुसलमानों की जनसंख्या हिंदुओं से आगे निकल जाएगी. यहां भी आंकड़े कुछ और ही कहते हैं. वर्तमान में जनसंख्या और कुल प्रजनन दर (टीएफआर) के आधार पर वैज्ञानिक तरीक़े से अनुमान किया जाता है कि भविष्य में जनसंख्या कितनी होगी. कुल प्रजनन दर वह औसत संख्या है जिसके ज़रिए हम जान सकते हैं कि कितने बच्चे एक महिला अपने जीवनकाल में जन्म दे सकती है और माना जाता है कि अगर यह दर 2.1 हो तो भविष्य की जनसंख्या वर्तमान जनसंख्या के बराबर रहेगी.

1992 में हिंदुओं का टीएफआर 3.3 था और मुसलमानों का 4.4. 2021 में हिंदुओं का टीएफआर 1.94 हुआ और मुसलमानों का घटकर 2.3 हुआ है. मुसलमान समुदाय की कुल प्रजनन दर, हिंदू समुदाय के मुकाबले, और तेज़ी से घट रही है. ख़ासकर राज्यों के बीच कुल प्रजनन दर में काफी भिन्नता है. तमिलनाडु में हिंदू टीएफआर 1.52 है और मुसलमानों का 1.86. वहीं, बिहार में हिंदू कुल प्रजनन दर 2.9 है और मुसलमानों की 3.3 प्रतिशत. बिहार के हिंदुओं का कुल प्रजनन दर तमिलनाडु के मुसलमानों के स्तर से बहुत ज़्यादा है.

विकास का कोई भी माप देखेंगे तो तमिलनाडु बिहार से काफी आगे है. आंकड़ों का बारीकी से विश्लेषण करने पर जान सकते हैं कि कुल प्रजनन दर का संबंध शिक्षा और राज्य के विकास पर निर्भर करता है और धर्म पर नहीं. गणित साफ़ है कि भारत में कभी भी मुसलमानों की आबादी हिंदुओं से ज़्यादा नहीं हो सकती. उनका राजनीतिक नेतृत्व भी नहीं के बराबर है. इस परिपेक्ष्य में यह कहना कि ‘हिंदू खतरे में है’ विविधता पर हमला और लोगों को भ्रमित करने का तरीका है.

यह तो सिर्फ झलक थी. लैंगिक, ग्रामीण-शहरी, भूमि स्वामित्व और भाषा के आधार पर असमानता का आकलन भी उतना ही महत्वपूर्ण है, क्योंकि ये सामाजिक असमानताएं आर्थिक असमानता से भी जुड़ी होती हैं. समग्र रूप से देखें, तो ये सिर्फ नैतिक संकट या संवैधानिक चूक नहीं हैं, बल्कि आर्थिक विकास के लिए भी हानिकारक हैं.

पर्याप्त प्रमाण बताते हैं कि अधिक असमानता वाले समाज में सामाजिक अशांति की संभावना अधिक होती है, जिसका आर्थिक विकास पर सीधा नकारात्मक प्रभाव पड़ता है. विविधता समृद्धि का स्वरूप है और असमानता असफलता का. असमानता घाव है तो विविधता मलहम.  यदि हम सचमुच भारत को ‘विश्वगुरु’ बनाना चाहते हैं, तो दिनकर की कल्पनानुसार समाज में सहिष्णुता और समन्वय का बढ़ावा देकर  असमानता को विविधता में परिणत करने की ज़रूरत है.

(राजेंद्रन नारायणन समाजशास्त्री हैं.)