‘दीनदयालु’ से ‘सेवा तीर्थ’ तक: क्या सरकारी भाषा लोकतंत्र को ईश्वरीय सत्ता की ओर ले जा रही है?

दया दिखाना क़ानूनी और तकनीकी तौर पर बाध्यकारी नहीं है. इसके केंद्र में दीनहीन व्यक्ति नहीं बल्कि दया करने वाले ‘दीनदयालु’ लोग हैं. जिनमें ‘दीनदयालुता’ को सेलिब्रेट करने का भी भाव है. जो एक विशुद्ध सामंती प्रवृत्ति है. इसीलिए आम भाषा में भी किसी अच्छे राजा को ‘दयालु’ बताया जाता है लेकिन अच्छी सरकार, अच्छे पीएम या सीएम को ‘ज़िम्मेदार’ कहा जाता है.

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‘सेवा तीर्थ’ में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी. (फोटो: एक्स/@narendramodi)

हर शासन व्यवस्था का अपना शब्दकोश होता है. मसलन, पुरानी सामंती या राजशाही व्यवस्था में लोगों को प्रजा या रियाया कहा जाता था. लेकिन लोकतंत्र आने के साथ इनकी जगह नागरिक शब्द ने ले लिया. इन शब्दों के बदलाव के पीछे राजनीतिक और सामाजिक बदलाव होते हैं. जो धीरे-धीरे स्वीकार्यता पाते हैं. जैसे 50-70 के दशक की हिंदी फ़िल्मों में ग़रीब लोग पुलिस को मायी-बाप बोलते दिखते थे. लेकिन अब कोई ग़रीब व्यक्ति पुलिस को माई-बाप नहीं कहता. यह बदलाव उसमें लोकतांत्रिक व्यवस्था में बतौर नागरिक उसके बोध के मजबूत होने के साथ ही आया है.

इसीलिए सरकारी भाषा में प्रयोग होने वाले शब्दों, प्रेरक नारों, योजनाओं के नाम और नामकरण से यह अंदाजा लगाया जा सकता है कि कोई सरकार लोकतंत्र के मूल्यों में यक़ीन रखती है या उसकी छुपी हुई मंशा सामंती व्यवस्था को वापस लाने की है. दोनों व्यवस्थाएं एक दूसरे के विपरीत मूल्यों पर आधारित हैं. लोकतंत्र जवाबदेही पर टिका है और सामंती व्यवस्था में शासन करने वाले लोग बाध्यकारी जवाबदेही से मुक्त होते हैं.

मौजूदा केंद्र सरकार में इस प्रवृति को कुछ उदाहरणों से परखा जाना चाहिए.

2016 में सुरेश प्रभु के नेतृत्व वाले रेल मंत्रालय ने सेकेंड क्लास के अनारक्षित रेल डब्बों का नामकरण किया ‘दीनदयालु कोच’. दीनदयालु का मतलब होता है जो दीनहीन निस्सहाय लोगों पर दया दिखाए.

यानी अगर आपके सामने से कोई ट्रेन गुज़र रही है और उसके डब्बों पर दीनदयालु लिखा है तो इससे यही संदेश प्रेषित होता है कि इसमें वो दीनहीन लोग बैठे हैं जिनपर सरकार ने दया और करुणा दिखाते हुए उन्हें यात्रा करने की व्यवस्था मुहैया करायी है. यानी यह भाषा उन लोगों की गरिमा से समझौता करती है, जो उन डिब्बों में बैठे हैं. सनद रहे, व्यक्ति की गरिमा हमारे संविधान की प्रस्तावना का हिस्सा है, जिसकी रक्षा करना भारतीय राज्य की घोषित ज़िम्मेदारी है.

इसको ऐसे भी परखा जाना चाहिए कि दया के पात्र यह दीन-दुखिया लोग कौन हैं? और क्या यह नामकरण हमारे आधुनिक लोकतांत्रिक व्यवस्था के लिए स्वीकार्य होना चाहिए? क्योंकि हमारे स्वतंत्रता आंदोलन, जिसके परिणाम स्वरूप लोकतंत्र विकसित हुआ, उसके किसी भी चरण में कमज़ोर लोगों की गरिमा को अस्वीकार करने वाले यह शब्द अधिकृत तौर पर इस्तेमाल नहीं हुए.

इसके बजाए इन कमज़ोर तबकों, जो सामाजिक, आर्थिक, राजनीतिक या ढांचागत कारणों से इस स्थिति में थे, को वंचित वर्ग (डिप्राइव्ड क्लास), दबाए गए लोग (डिप्रेस्ड क्लास) या उपेक्षित वर्ग (मार्जिनलाइज़्ड क्लास) जैसे नामों से संबोधित किया गया. 1919 में भारतीयों को सीमित मताधिकार देने के मुद्दे पर अध्ययन करने आई साउथबरो कमिटी और 1928 में आए साइमन कमीशन के साथ वार्ता में डॉ. अंबेडकर और अंग्रेज़ों के बीच कमज़ोर तबकों को वंचित या उपेक्षित वर्ग के बतौर ही चिह्नित किया गया. इसी तरह गोलमेज़ सम्मेलनों में इन तबकों को वंचित या उपेक्षित वर्गों के बतौर स्वीकार किया गया. किसी भी समझौते या बातचीत में ‘दीनहीन’ या ‘दुखियारे’ लोग के बतौर किसी वर्ग को चिह्नित नहीं किया गया.

आज़ादी के बाद जब हमें ख़ुद क़ानून बनाने का अधिकार मिला तो हमने एक कल्याणकारी राज्य होने के कारण वंचितों और उपेक्षितों को चिह्नित कर योजनाएं बनायीं ताकि इन सामाजिक, आर्थिक, ऐतिहासिक या राजनीतिक ढांचा के पीड़ितों को उस स्थिति से निकाला जा सके. इसके तहत राष्ट्रीय नमूना सर्वेक्षण कार्यालय द्वारा उपभोक्ता व्यय सर्वेक्षण की व्यवस्था बनी और बिलो पॉवर्टी लाइन यानी ग़रीबी रेखा तय की गई. दुनिया के लगभग सभी देशों में ऐसे आधुनिक मापदंडों के आधार पर सर्वेक्षण करवाए गए. ऐसा इसलिए किया गया क्योंकि आधुनिक लोकतांत्रिक विचार यह मानता है कि ग़रीबी की स्थिति को बदला जा सकता है.

लेकिन ‘दिनहीन’ और उसके प्रति दयालुता दिखाना एक ऐसी कैटेगरी है जिसमें स्थायित्व का भाव छुपा है. इसमें दया दिखाना एक एहसान करने वाली मानसिकता का परिचायक है. यह व्यक्ति या व्यवस्था की इच्छा पर निर्भर है या उससे अपेक्षा की जाती है कि वो दया दिखाएगा. यह अपेक्षा नैतिक या भावनात्मक हो सकती है.

दया दिखाना क़ानूनी और तकनीकी तौर पर बाध्यकारी नहीं है. इसके केंद्र में दीनहीन व्यक्ति नहीं बल्कि दया करने वाले ‘दीनदयालु’ लोग हैं. जिनमें ‘दीनदयालुता’ को सेलिब्रेट करने का भी भाव है. जो एक विशुद्ध सामंती प्रवृत्ति है. इसीलिए आम भाषा में भी किसी अच्छे राजा को ‘दयालु’ बताया जाता है लेकिन अच्छी सरकार, अच्छे पीएम या सीएम को ‘ज़िम्मेदार’ कहा जाता है.

यही अंतर मुख्य है. यानी ग़रीबी उन्मूलन दया पर निर्भर नहीं हो सकता. यह राज्य की बाध्यकारी ज़िम्मेदारी है. इसमें विफल होने पर उसके ख़िलाफ़ विभिन्न स्तरों पर लड़ाई लड़ी जा सकती है. जबकि दया दिखाना एक सामाजिक ज़िम्मेदारी है. अगर कोई दया नहीं दिखाता तो उसके ख़िलाफ़ आप कोई कार्रवाई नहीं कर सकते.

इसलिए सरकार जब किसी योजना का नाम ‘दीनदयालु’ रखती है तो वो दरअसल, इस शब्द की आड़ में अपनी जवाबदेही से भाग रही होती है और असहाय लोगों की ज़िम्मेदारी, समाज और लोगों की इच्छा पर छोड़ रही होती है.

यह एक सोची समझी लोकतंत्र विरोधी योजना है, जिसका मक़सद राज्य के कल्याणकारी ज़िम्मेदारी से मुक्त रहने की अवधारणा को मजबूत करना है.

शब्दों के इस खेल को आप रामराज की स्थापना, ‘वेदों की और लौटो’ जैसे नारों, बाढ़-सूखा जैसे प्राकृतिक आपदा को दैवीय आपदा कहने, जनता को उसके अधिकार बताने के बजाए कर्तव्य समझाने पर ज़ोर देने या संसद के पास के किसी जगह का नाम ‘कर्तव्यपथ’ कर देने में देख सकते हैं. सबसे महत्वपूर्ण सार्वजनिक ज़िम्मेदारी वाले प्रधानमंत्री कार्यालय का नाम बदल कर ‘सेवा तीर्थ’ कर दिया जाना लोकतंत्र द्वारा तय जवाबदेही आधारित शासन प्रणाली को जवाबदेही-विहीन दैवीय प्रणाली में बदल देने का ही तो प्रयास है.

आप किसी भगवान के दर्शन या पूजा के लिए जिस तीर्थ स्थान पर जाते हैं और उससे जो मनौती मांगते हैं उसे पूरा करने के लिए किसी जवाबदेही के तहत ईश्वर बाध्य नहीं है. जबकि सरकार बाध्य है. आप काम न करने वाले ईश्वर की शिकायत कहीं नहीं कर सकते और अगर धार्मिक हैं तो वो काम करे या ना करे, उसे भगवान मानते ही रहेंगे. इस तरह जब प्रधानमंत्री कार्यालय ‘सेवा तीर्थ’ बनता है तो यह संदेश दिया जा रहा होता है कि आपका पीएम एक जवाबदेही मुक्त ईश्वर है और आप भक्त. इस तरह जनता के वोट से ईश्वर के सत्ता की वापसी भी हो सकती है, यह शायद ही किसी लोकतंत्रवादी ने सोचा होगा.

(लेखक कांग्रेस के राष्ट्रीय सचिव हैं)