नई दिल्ली: चीन ने भारत से भेजी गई कम-से-कम 70 गैर-बासमती चावल की खेपों को यह आरोप लगाते हुए ठुकरा दिया है कि इन निर्यातों में जीएम (जेनेटिकली मॉडिफाइड) फसलें शामिल हैं.
बिजनेसलाइन की रिपोर्ट के अनुसार, चीनी बंदरगाहों पर यह अस्वीकृति ऐसे समय में आई है जब चीन सर्टिफिकेशन एंड इंस्पेक्शन ग्रुप (सीसीआईसी) का भारत स्थित कार्यालय विशाखापत्तनम में अपनी टेस्टिंग सुविधा पर खेप की जांच और उन्हें मंज़ूरी दे रहा है.
इसके नतीजे
रिपोर्ट के अनुसार, केवल पिछले एक सप्ताह में ही चीन ने चावल की कम-से-कम चार नई खेपों को वापस लौटा दिया. मार्च में भी चीन ने भारत से भेजी गई तीन चावल खेपों को अस्वीकार कर दिया था.
तीन भारतीय कंपनियों – नागपुर की श्रीराम फूड इंडस्ट्री, रायपुर की स्पोन एंटरप्राइजेज और हरियाणा की एनएम फूडइम्पेक्स – के चीनी आयात लाइसेंस निलंबित कर दिए गए हैं. पूरे उद्योग में निर्यातकों ने लगभग 200 कंटेनर चावल रोक लिया है, क्योंकि यह अनिश्चितता बनी हुई है कि बीजिंग किन खेपों को मंजूरी देगा और किन्हें नहीं.
बिज़नेस अपटर्न के अनुसार, यह उल्लेखनीय है कि ये अस्वीकृतियां ठीक उसके बाद शुरू हुईं, जब भारत के कृषि मंत्री ने जनवरी 2026 में घोषणा की थी कि भारत ने चीन को पीछे छोड़ते हुए दुनिया का सबसे बड़ा चावल उत्पादक देश बन गया है.
भारत का अपना रुख बिल्कुल साफ़ है: भारत में कमर्शियल खेती के लिए मंज़ूर एकमात्र जेनेटिकली मॉडिफाइड फसल बीटी कपास है.
इसी बात का उल्लेख करते हुए केंद्रीय पर्यावरण मंत्रालय ने 30 अप्रैल को जारी एक ज्ञापन में औपचारिक रूप से पुष्टि की कि जेनेटिक इंजीनियरिंग अप्रेज़ल कमेटी (जीईएसी) ने भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (आईसीएआर) के साथ मिलकर किसी भी जीएम चावल की किस्म को कभी मंजूरी नहीं दी है.
व्यापार युद्ध
बिज़नेसलाइन द्वारा उद्धृत अनाम सूत्रों ने कहा कि चीन द्वारा भारत की गैर-जीएमओ चावल खेपों को अस्वीकार किया जाना ‘इस बात का संकेत है कि वह भारत के साथ व्यापार युद्ध में शामिल है.’
एक अधिकारी ने नाम न प्रकाशित करने की शर्त पर अखबार से कहा, ‘चीन हमारी छवि खराब करने की कोशिश कर रहा है. वह ऐसी चीजें करने के लिए जाना जाता है और पहले भी ऐसा कर चुका है.’
व्यापारी चुनिंदा जांच को लेकर भी चिंतित हैं. नेशनल हेराल्ड की रिपोर्ट के अनुसार, चीन भारत से आने वाली खेपों पर तो जीएमओ जांच लागू कर रहा है, लेकिन थाईलैंड, वियतनाम, पाकिस्तान या म्यांमार से आने वाले चावल पर ऐसी जांच नहीं की जा रही.
विदेश व्यापार विशेषज्ञ एस. चंद्रशेखरन ने नेशनल हेराल्ड से कहा कि यह कदम चीन की ‘रणनीतिक व्यापार योजना’ प्रतीत होता है.
सिंगापुर स्थित एक कृषि अर्थशास्त्री ने बिज़नेस अपटर्न से कहा, ‘यह व्यापार युद्ध का नया मोर्चा है. अगर आप अपने घरेलू पर्यावरण कानूनों के तहत किसी उत्पाद को ‘असुरक्षित’ बता सकते हैं, तो फिर आपको कर बढ़ाने की जरूरत नहीं पड़ती. यह एक ऐसा कदम है जिसे कम समय में चुनौती देना बहुत मुश्किल है.’
जैसे-जैसे भारतीय चावल कीमत और मात्रा दोनों में अधिक प्रतिस्पर्धी होता जा रहा है, वह चीन की उन घरेलू मूल्य-समर्थन व्यवस्थाओं के लिए चुनौती बन रहा है जिनके जरिए वह अपने किसानों की रक्षा करता है. जीएमओ संबंधी चिंताओं का हवाला देकर बीजिंग प्रभावी रूप से भारत के आयात को सीमित कर सकता है, बिना विश्व व्यापार संगठन (डब्ल्यूटीओ) के कोटा और टैरिफ नियमों का उल्लंघन किए, जिन्हें कानूनी रूप से उचित ठहराना कहीं अधिक कठिन होता है.
व्यापारियों और विश्लेषकों ने व्यापक रूप से इस कदम को ‘व्यापार युद्ध’ करार दिया है. यह पहली बार नहीं है जब चीन ने भारत के खिलाफ गैर-टैरिफ बाधाओं का इस्तेमाल किया हो. ऐसी बाधाओं के कारण 2019-20 तक चीन को भारत का चावल निर्यात न के बराबर रहा था; बाद में प्रतिबंधों में ढील दिए जाने के बाद ही इसमें तेज़ बढ़ोतरी हुई.
फिलहाल उद्योग की सबसे बड़ी आवश्यकता आईसीएआर से एक औपचारिक ‘गैर-जीएमओ घोषणा-पत्र’ की है – ऐसा दस्तावेज़ जो हर खेप के साथ भेजा जा सके और जिसे बीजिंग के लिए खारिज करना अधिक कठिन हो.
