छाया: करुणा की कोमल लय और प्रेम की अंतर्धारा

पुस्तक समीक्षा: मैथिली के वरिष्ठ कवि एवं सुप्रसिद्ध भाषा वैज्ञानिक उदय नारायण सिंह नचिकेता के काव्य संग्रह 'छाया' में कविताओं की कई परतें हैं. इनमें पौराणिक आख्यानों, लोकसंस्कृति की लय, समकालीन जीवन की धड़कन और वैश्विक परिघटनाओं की अनुगूंज समाहित है, जो इस कविता संग्रह को भारतीय काव्य-साहित्य की परंपरा में एक अनुपम कृति का दर्जा दिलाती है.

(फोटो साभार: अनुप्रास प्रकाशन)

कुछ किताबें ऐसी होती हैं, जो पढ़े जाने के बाद लंबे अरसे तक आपके जेहन में बसी रहती हैं, आपकी रचनात्मक सोच को मथती रहती हैं और एक अजीब तरह की रचनात्मक बेचैनी से उद्वेलित करती रहती हैं. मैथिली के वरिष्ठ कवि एवं सुप्रसिद्ध भाषा वैज्ञानिक उदय नारायण सिंह नचिकेता का ताजा काव्य संग्रह छाया ऐसी ही एक कृति है, जिसमें संकलित कविताएं काया और छाया के परस्पर द्वंद्व के बहाने पौराणिक आख्यानों, लोकसंस्कृति की लय, समकालीन जीवन की धड़कन और वैश्विक परिघटनाओं को एक सूत्र में पिरोते हुए भारतीय काव्य-साहित्य की परंपरा को समृद्ध करती है.

मैथिल साहित्य के विजन में नचिकेता एक सशक्त नाम हैं. उनके कई काव्य संग्रह प्रकाशित हो चुके हैं, जिनमें कवयो वदन्ति, अमृतस्य पुत्राः, अनुत्तरण, मध्यमपुरुष एकवचन, जहलक डायरी प्रमुख हैं.

उनके कई काव्य संग्रहों के हिंदी, बांग्ला, तमिल, अंग्रेजी में अनुवाद प्रकाशित हो चुके हैं. उन्होंने लगभग बारह नाटकों का भी सृजन किया है, जिनमें से कई नाटकों का सफल मंचन हो चुका है. जहलक डायरी कविता संग्रह पर उन्हें साहित्य अकादेमी पुरस्कार भी मिल चुका है.

वर्तमान संग्रह छाया में कुल चवालीस कविताएं संकलित हैं. इस संग्रह की कविताएं भी मनुष्य की आंतरिक शक्ति पर आस्था की कविताएं हैं. काया और छाया का रिश्ता विलक्षण इस अर्थ में होता है कि उसमें ऐसी जटिलता और विशेषताएं हैं जो व्याख्या के अतीत हैं.

काया के बिना छाया की कल्पना नहीं की जा सकती, क्योंकि छाया स्वयं कोई स्वतंत्र सत्ता नहीं रखती; वह काया की उपस्थिति से ही जन्म लेती है. प्रकाश और अंधकार के बीच खड़ी हुई देह जब किसी दिशा में अपना अस्तित्व अंकित करती है, तभी छाया आकार ग्रहण करती है. इस अर्थ में छाया, काया की अनुगामिनी है- उसकी मौन प्रतिध्वनि, उसका सूक्ष्म विस्तार.

किंतु जीवन और साहित्य के अनुभव हमें यह भी बताते हैं कि कभी-कभी यही छाया अपनी मूल काया से अधिक बड़ी, अधिक प्रभावशाली और अधिक रहस्यमय प्रतीत होने लगती है. तब वह केवल देह की परछाई नहीं रहती, बल्कि मनुष्य के भीतर छिपे भय, स्मृतियों, इच्छाओं, अपराध-बोध और स्वप्नों का रूप धारण कर लेती है.

दुनिया भर के साहित्य में छाया का चित्रण केवल दृश्यात्मक सौंदर्य तक सीमित नहीं है; वह गहन दार्शनिक और सौंदर्यात्मक अर्थों का वाहक बन जाता है. अनेक कवियों, कथाकारों और नाटककारों ने छाया को मनुष्य के द्वंद्वात्मक अस्तित्व के प्रतीक के रूप में देखा है. एक ओर वह यथार्थ से जुड़ी है, दूसरी ओर वह उस अदृश्य संसार की ओर संकेत करती है जो हमारी चेतना के भीतर निरंतर सक्रिय रहता है.

छाया कभी स्मृति बनकर हमारे पीछे चलती है, कभी भय बनकर हमारे सामने खड़ी हो जाती है, और कभी आत्मा की उस अनकही पीड़ा का संकेत देती है जिसे शब्द पूरी तरह व्यक्त नहीं कर पाते.

भारतीय काव्य और दर्शन में भी छाया का रूप अत्यंत अर्थगर्भित रहा है. उपनिषदों से लेकर आधुनिक कविता तक, छाया को माया, आत्मा, स्मृति और अस्थिरता के प्रतीक के रूप में देखा गया है. भक्ति साहित्य में यह विरह और मिलन की अनुभूति को गहन बनाती है, जबकि आधुनिक साहित्य में यह मनुष्य की टूटन, अकेलेपन और अस्तित्वगत संकट को व्यक्त करती है.

पश्चिमी साहित्य में भी छाया का प्रयोग अक्सर मनुष्य के ‘दूसरे स्वरूप’ – उसके अवचेतन या दबी हुई इच्छाओं को अभिव्यक्त करने के लिए हुआ है. इस प्रकार छाया केवल प्रकाश का परिणाम नहीं रह जाती; वह मनुष्य के भीतर के अंधकार और उजाले के संघर्ष का कलात्मक रूप बन जाती है.

वास्तव में, काया और छाया का संबंध मनुष्य और उसके आत्मबोध के संबंध जैसा है. काया हमारे बाह्य अस्तित्व का संकेत है, जबकि छाया हमारे भीतर छिपे उस संसार की ओर इशारा करती है जिसे हम स्वयं भी पूरी तरह नहीं जान पाते. कभी-कभी मनुष्य अपनी काया से अधिक अपनी छाया से परिचित होता है – अर्थात् अपने बाह्य रूप से अधिक अपने भय, स्मृतियों और स्वप्नों से.

यही कारण है कि साहित्य में छाया का चित्रण हमें केवल दृश्य नहीं देता, बल्कि आत्मचिंतन की ओर भी ले जाता है. छाया हमें यह स्मरण कराती है कि हर प्रकाश अपने साथ एक अंधकार भी लेकर चलता है, और हर मनुष्य के भीतर एक ऐसा अनदेखा पक्ष होता है जो उसके व्यक्तित्व को गहराई और रहस्य प्रदान करता है.

छाया मनुष्य के व्यक्तित्व का वह हिस्सा है, जो सत्य और ज्ञान के प्रकाश में प्रकट तो होता है, लेकिन अक्सर अनदेखा कर दिया जाता है. छाया मानवीय व्यक्तित्व का वह हिस्सा है, जो कृत्रिमता से दूर यथार्थ के धरातल पर आंतरिक गहराई पर आधारित पू्र्णता का बोध कराता है. छाया पर केंद्रित इन कविताओं में उदय नारायण सिंह समृद्ध भारतीय काव्य-परंपरा और समकालीन जीवन-समाज के बीच भावनात्मक तनाव और सौंदर्यपूर्ण आनंद की सृष्टि करते हैं.

छाया के माध्यम से कवि ने उन पहलुओं को भी उजागर किया है, जिन्हें अक्सर छिपाने की कोशिश की जाती है, जिससे करुणा और ज्ञानात्मक संवेदना की समझ का संचार होता है.

आज की इस छायावादी-रहस्यमयी दुनिया में जब चारों तरफ युद्ध, उन्माद, नफरत और हिंसा की होड़ मची है, दिखावे की दुनिया में जीवन की लघुता स्पष्ट रूप से हथेली पर ‘इत्तु-सा’ रह गया है, कवि इसे तलवार की धार पर नहीं, बल्कि कलम की नोक पर रख देते हैं, जहां से यह महाकाव्यात्मक विस्तार लिए कोर कागज के इस उजड़े अरण्य में कभी उन्मादी प्रेम का किस्सा बन जाता है, तो कभी अरेबियन नाइट्स की सहस्रों कथाओं की शृंखला के स्वरूप में प्रेम की प्रतिच्छाया बनकर भग्न हृदय का आख्यान बन जाता है.

कहा जाता है कि सदैव काया की अनुगामिनी बनी रहने वाली छाया भी बुरे वक्त में काया का साथ छोड़ जाती है. यही नहीं, कभी-कभी तो काया के खिलाफ छाया षड्यंत्रों का खेल भी रचती है. हमारे लौकिक जीवन की हर घटना के पीछे कोई न कोई राजनीति होती है.

जासूसी कथाओं के जानकार बखूबी जानते होंगे कि उठाने और गिराने की राजनीति के पीछे अक्सर किसी न किसी शैडो-फीगर (छद्म छवि) की महत्वपूर्ण भूमिका होती है. इसी छद्म छवि को मशहूर शायर निदा फाजली ने अपने एक शेर में बखूबी कहा है- हर आदमी में होते हैं दस बीस आदमी/जिस को भी देखना हो कई बार देखना. दरअसल, हर व्यक्ति के कई चेहरे होते हैं, जीवन मे कई भूमिकाएं होती हैं. मसलन, एक ही व्यक्ति अपने घर में पिता, पुत्र, पति, प्रेमी आदि कई भूमिकाओं में होता है, तो दूसरी तरफ कार्यस्थल पर उसका दूसरा रूप, एक दूसरी भूमिका होती है.

कवि नचिकेता छाया के बहाने व्यक्ति के इसी बहुरूपिया चेहरे को रेखांकित करते हुए कहते हैं कि-

असल में तुम हो हनुमति
लेकिन हुनर कहां है तुम्हें
कि देख और पहचान सको
अपने ही पुरुष को-
मात्र व्यस्त रहती हो राजनीति में
किसे उठाना और किसे गिराना है
किसके सिर पर कहोगी इंद्रदेव को
कि गिरा दें वज्रवाण?

या और छाया के इस अनूठे खेल और राजनीति से इतर भारतीय गाहर्स्थ परंपरा की उस मान्यता का भी ध्यान आता है, जिसमें एक स्त्री स्वयं को अपने पुरुष की छाया मानती है. लेकिन कवि का कौशल देखिए कि उसने उसी छाया की ‘अपने घर’ की चाहत और मांग को कविता का वर्ण्य विषय बनाकर उसे स्त्री अधिकार और स्त्री विमर्श का विषय बना दिया है.

यह पुरानी मान्यताओं की नींव पर खड़े सामंती भारतीय परिवार की दीवारों के दरकने का संकेत भी है-

मुझे अपना घर चाहिए
जहां केवल मैं ही रहूं
घुमूं-फिरूं
जहां चाहे ताक-झांक करूं
और कोई न हो

हे नाथ,
तब मुझे फायदा ही क्या
अपना एक घर होने से
अगर मुझे न मिली स्वतंत्रता?

आधुनिक स्त्री विमर्श का यह बुनियादी सवाल वर्जिनिया वुल्फ के उस ए रूम ऑफ वन’स ओन जैसी क्रांतिकारी व कालजयी निबंध की याद दिलाता है, जो स्त्रियों की बौद्धिक स्वतंत्रता के लिए आर्थिक आत्मनिर्भरता और व्यक्तिगत स्थान (इंडिविजुअल स्पेस) की ज़रुरत पर ज़ोर देता है.

मौजूदा दौर में जब अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर खतरे बढ़ चले हैं, कवि भाषा की विविधता को रेखांकित करते हुए कहते हैं-

बोलना इतना सहज नहीं होता है, श्रीमान!
लाज-शर्म दर्शन-भ्रम सब घोलकर
प्रस्तुत होती है भाषा मेरी
उसकी कितनी-कितनी बोलियां
निकलती है हरेक सांस के संग
यह तो आप पर है-
उसे समझ सकें या नहीं!

संग्रह में कवि ने जीवन, दर्शन, विज्ञान, इतिहास, पुराकथाओं, लोककथाओं, आधुनिक जीवन की विसंगतियों, राजनीतिक प्रपंच, युद्ध, हिंसा आदि से संबंधित विषयों को बड़ी कुशलता से विषयगत रूप से एकसाथ पिरोया है और इस क्रम में यह मानव जीवन की वास्तविकता और नियति का महाकाव्यात्मक आख्यान बन गया है. इसमें भारतीय दर्शन और पुराणों के अद्भुत और प्रेरक प्रसंगों आदि का वर्णन है.

इसमें एक ओर जहां वैदिक युग की महान नारी लोपामुद्रा, जिन्होंने पति के साथ गृहस्थी और अध्यात्म का अद्भुत संतुलन बनाया का वर्णन है, वहीं, मध्यकाल के महान नैयायिक दार्शनिक उदयनाचार्य, जिन्होंने बौद्धिक और तार्किक आधार पर हिंदू धर्म एवं ईश्वर के अस्तित्व की रक्षा की, का भी जिक्र है. यही नहीं, यहां रानी रूपमती और बाजबहादुर के अमर प्रेमकथा की लोक की लय और संगीत की स्वरलहरी का आख्यान भी है.

इन कविताओं की कई परतें हैं, जिनमें पौराणिक आख्यानों, लोकसंस्कृति की लय, समकालीन जीवन की धड़कन और वैश्विक परिघटनाओं की अनुगूंज समाहित है, जो इस कविता संग्रह को भारतीय काव्य-साहित्य की परंपरा में एक अनुपम कृति का दर्जा दिलाती है.

नचिकेता के इस संग्रह की सभी कविताओं में करुणा की कोमल लय और प्रेम व संवेदना अंतर्धारा फल्गु नदी-सी अंतःसलिला प्रवाहित हो रही है. वेदों, पुराणों, प्राचीन साहित्य, लोकजीवन की लय और भारतीय काव्य-परंपरा की समृद्ध विरासत से संवाद करती ये कविताएं मैथिली नवकविता की उस प्रगतिशील परंपरा की समृद्धि से साक्षात्कार कराती है, जिसे विद्यापति के बाद यात्री, राजकमल, रामकृष्ण झा किसुन, जीवकांत, वीरेंद्र मल्लिक, अग्निपुष्प, महाप्रकाश आदि ने सींचा है.

(रमण कुमार सिंह पेशे से पत्रकार हैं और हिंदी एवं मैथिली में सृजन करते हैं. वे साहित्य अकादेमी में मैथिली परामर्श मंडल के सदस्य भी हैं.)