बशीर बद्र आधुनिक उर्दू ग़ज़लों का संभवतः वह अनोखा नाम हैं जिनकी ग़ज़लें और नज़्में अपने लिखने वाले के नाम से अधिक मकबूल हैं. जिन लोगों ने भी बशीर बद्र का नाम औपचारिक ढंग से न भी सुना हो, उन्हें उनकी शायरियों और शेरों के माध्यम से निश्चित ही सुना होगा, पढ़ा होगा.
चाहे व्यक्ति के आंतरिक मनोभावों के विविध रंग हों या आधुनिक जीवन बोध में प्रतिदिन अनुभूत की जाने वाली संवेदनाएं, बशीर बद्र की शायरी बरबस हमारी चेतना को अभिव्यक्ति का ज़रिया दिखला जाती हैं. कई बार जब जगजीत सिंह या चंदन दास की किन्हीं गजलों को अनायास ही सुना और उसका असर बरकरार रहा तो मालूम हुआ कि ग़ज़ल के अल्फाज़ जिस शायर की कलम से निकले हैं वह अपने बशीर बद्र ही हैं. इसीलिए बशीर बद्र को जानना प्रायः अनजाने में ही होता है.
कोई नज़्म, कोई दिल तक सीधी पहुंच जाने वली शायरी, कोई गुनगुनाती-सी धुन हमें बशीर तक पहुंचा जाती है. इसीलिए मेरे लिए बशीर हमेशा खोजने से हासिल होने वाले शायर रहे, उन्हें केवल उनकी रचनाओं से पढ़कर नहीं पाया जा सकता.
एक बेहद सुंदर ग़ज़ल में जगजीत सिंह जब यह गाते हैं : ‘ख़ता-वार समझेगी दुनिया तुझे/अब इतनी ज़ियादा सफ़ाई न दे’, तो यह एक लंबे जीवन के अनुभवों से निकली हुई दार्शनिकता है. एक ऐसी दार्शनिकता जो मानवीयता के तत्वों से अछूता नहीं.
बशीर इसीलिए मानवीय संवेदनाओं के शायर थे. जीवन अपने सबसे साधारण, सबसे सहज रूप में उनकी कविताओं में आता था जिससे कि हर कोई अपना संबंध यूं ही जोड़ सकता है. उनकी रचनाशक्ति की यह सबसे बड़ी विशेषता है कि ग़ज़ल जैसी विधा को उसकी पारंपरिक कलात्मकता के दबावों से आज़ाद कर उन्होंने आम जनों की निजी थाती में तब्दील कर दिया.
1960 के बाद के साहित्यिक परिदृश्य में उनका शुमार उन शायरों में होता है जिन्होंने उर्दू कविता को विचारधारा के अतिशय दबाव से बाहर निकालकर उसे आम आदमी की ज़बान में ढालकर जीवन के रोज़मर्रा को प्रमुखता दी. इसीलिए बशीर को पढ़ते समय जोश, फ़ैज़ या मजाज़ या अली सरदार जाफ़री जैसी विद्रोही और मुखर क्रांतिकारिता के बदले एक थामा हुआ संयमित-सा असंतोष दिखलाई पड़ता है.
समाज की बदलती करवटों ने बशीर के शायर को भी उतना ही विचलित किया है, पर जीवन के उज्ज्वल पक्षों के प्रति उनका रुमान, उनकी आस्था शेष है. इसीलिए अगर सांप्रदायिकता की आंच से झुलसते हिंदुस्तानी समाज के प्रति उनकी चिंता ‘बारहा इस घर का बंटवारा हुआ है और सदा/अपने हिस्से में फ़क़त दुख के ख़ज़ाने आए हैं’ में अपना स्वर पाती है तो वहीं कहीं शायर के भीतर उम्मीद की कोई लौ है जो स्याह समयों में भी मंद नहीं पड़ती. वह ऐलान करती है:
‘मैं ये मानता हूं मिरे दिए तिरी आंधियों ने बुझा दिए
मगर एक जुगनू हवाओं में अभी रौशनी का इमाम है’.
मनुष्य की सदाशयता में, उसकी मानवीयता में विश्वास करने वाले बशीर स्वातंत्रयोत्तर भारतीय परिवेश के, नए राष्ट्र के स्वप्नों और उसके संभावनाओं को एक साकार रूप लेता देखना चाहते थे. पर साथ ही इन संभावनाओं पर काल की तरह मंडराने वाले उन तत्वों से भी भली-भांति वाकिफ़ थे, जिन्हें सामाजिक साझेपन के रेशों को बिखेर देने के लिए बस एक चिंगारी भर की ज़रूरत होती है. इसीलिए शायर की यह गुहार किसी भी देश-काल से परे मानवता के प्रति, मानवता के द्वारा लगाई गई गुहार है:
‘नए दौर के नए ख़्वाब हैं, नए मौसमों के गुलाब हैं
ये मोहब्बतों के चराग़ हैं इन्हें नफ़रतों की हवा न दे’
मोहब्बत के रंग
बशीर की शायरी आधुनिकता के दबावों में निरंतर अकेले पड़ते जाने व्यक्ति की भी व्यथा को बयान करती है. मानवीय संबंधों की विविध संवेदनाओं को केंद्र में रखकर उन्होंने उन सभी मनःस्थितियों को अपनी कविता में बांधा है जो एक साधारण मनुष्य महसूस कर सकता है. यहां प्रेम, इच्छाओं, बिछड़ जाने के अविश्वास, उम्मीदों के इतने धूप-छांही रंग मौजूद हैं कि स्वयं बशीर के अनुभव संसार की विविधता और सघनता पर आश्चर्य होता है.
अगर मोहब्बत के चढ़ते हुए दौर में प्रेम से आकंठ डूबी हुई ग़ज़लें हैं तो वहीं उतरते और बदलते हुए प्रेम की भी छवियां है. ये बद्र ही हैं जो यह भी लिख सकते हैं कि ‘प्यार की नई दस्तक दिल पे फिर सुनाई दी/ चांद सी कोई सूरत ख़्वाब में दिखाई दी’ और प्रेम में डूबकर कह सकते हैं ‘महक रही है ज़मीं चांदनी के फूलों से/ ख़ुदा किसी की मोहब्बत पे मुस्कुराया है’.
तो वहीं उस मोहब्बत से मोहभंग के भी साक्षी हैं. नई रवायतों और दुनियादारी की समझ से भरी मुहब्बतों के प्रति उनका संवेदनशील मन विद्रोह कर उठता है: ‘मुझे इश्तिहार सी लगती हैं ये मोहब्बतों की कहानियां/जो कहा नहीं वो सुना करो जो सुना नहीं वो कहा करो’.

पर यह बशीर की कलम है जो कभी भी इस मोहभंग का कारण किसी एक को या यूं कहें कि प्रिय (स्त्री) को ज़िम्मेदार ठहराकर नहीं मानती. उनकी शायरी में आने वाला पुरुष अपनी व्यथा को या अपनी अच्छी नीयत के प्रदर्शन के लिए स्त्रियों को उनके स्थान से नहीं गिराता. बशीर की शायरी इसीलिए स्त्री-विरोधी नहीं है. वहां स्त्री का प्रतिनिधित्व उस पारंपरिक ग़ज़लों वाली माशूक के तौर पर नहीं किया गया है जो प्रेमी के साथ फ़रेब करती है. इसके विपरीत बशीर की पक्षधरता, प्रेम की नितांत निजी स्थितियों में भी अंततः स्त्री के साथ ही दिखलाई पड़ती है.
यह बशीर ही कह सकते थे ‘उसे किसी की मोहब्बत का ए’तिबार नहीं/ उसे ज़माने ने शायद बहुत सताया है’. और सिर्फ ज़माने तक ही न रुककर वह उस पुरुष को ही दोष देते हैं जिसने स्त्री के प्रेम का, उसके समर्पण का मान न रखा और उसे निराश कर गया. उनके यहां पुरुष अपनी जवाबदेही सबसे पहले उठाता है:
‘तमाम उम्र मिरा दिल उसी धुएं में घुटा
वो इक चराग़ था मैं ने उसे बुझाया है’.
बदग़ुमानी नहीं
बशीर मानते थे कि कविता का जीवन उसके लिखे जाने के साथ समाप्त नहीं हो जाता, बल्कि वह तो शुरू ही तब होता है जब वह पाठकों तक पहुंचती है. एक बार रचना, अस्तित्व में आ जाए तो उसके अर्थ, उसकी ग्राह्यता केवल लेखक के अधिकार में नहीं रहते. हर पाठक उसे अपने अनुभवों, स्मृतियों, संवेदनाओं और जीवन-दृष्टि के आलोक में पढ़ता है.
कविता का सौंदर्य इसी में निहित है कि वह किसी एक निश्चित अर्थ में कैद नहीं रहती. लेखक उसे भले जन्म देता है पर उसके अर्थों का विस्तार उसका पाठक वर्ग करता है. इस प्रकार एक ही कविता अनेक पाठकों के मन में अनेक अर्थ ग्रहण करती है. मसलन, प्रेम जैसी संवेदना के न जाने कितने बारीक रूप बशीर के यहां मौजूद हैं. प्रेम में अंतर्निहित व्यथा या उदास कर जाने वाली स्मृतियां भी प्रेम का एक ज़रूरी हिस्सा बनकर उनकी शायरी में जड़ी हुई हैं.
एक ऐसे दौर में जहां तरक़्कीपसंद कवियों में प्रेम और रूमानियत से भरी शायरी के लिए विशेष आकर्षण नहीं दिखलाई पड़ता, ऐसे में बशीर का अंदाज़ और उनकी रचनाधर्मिता दोनों ही अलग थे, और इस अर्थ में यह उनका युग के चलन के प्रति निजी विद्रोह था. प्रेम में क्षतिबोध को बशीर से बेहतर, शायद ही समकालीन उर्दू शायरी में किसी ने इतने सूक्ष्म रूप से अभिव्यक्त किया उन्होंने लिखा है
‘भला हम मिले भी तो क्या मिले वही दूरियां वही फ़ासले,
ना कभी हमारे कदम बढ़े ना कभी तुम्हारी झिझक गई’.
बशीर की प्रेम और रुमानियत से भरी कविताओं की एक बड़ी विशेषता ही यही है कि वहां स्मृतियों की आवाजाही बनी रहती है. ऐसा लगता है मानो शायर कुछ भी भूलना नहीं चाहता. वहां प्रेम से उभर पाने की कोशिशें भी नाकामयाब ठहरती हैं, क्योंकि स्मृतियों में वह विगत प्रेम यूं ही ज़िंदा रहता है:
‘तुझे भूल जाने की कोशिशें कभी कामयाब ना हो सकीं
तेरी याद शाख-ए-गुलाब है जो हवा चली तो लचक गई’
उम्रें बीत जाती हैं दिल को दिल बनाने में…
बशीर के रचनात्मक लेखन की शुरुआत कच्ची उम्र से ही हुई, इसीलिए भी उन्होंने बहुत अधिक लिखा. उनकी असाधारण प्रतिभा का अंदाज़ा इसी बात से लगाया जा सकता है कि छात्र जीवन में ही उनकी रचनाएं व्यापक रूप से चर्चित होने लगी थीं. वर्ष 1946 में उन्होंने पहली बार अपनी एक ग़ज़ल सार्वजनिक रूप से प्रस्तुत की. अवसर था इटावा में आयोजित एक अखिल भारतीय मुशायरे का जो उर्स के अवसर पर आयोजित किया गया था. कम उम्र होने के बावजूद उनकी ग़ज़लों ने श्रोताओं का मन खूब रिझाया.
इसी मुशायरे के अवसर पर नगर के प्रतिष्ठित साहित्यप्रेमियों मोनिस साहब और ज़मीन अली साहब ने किशोर बशीर की मौलिक प्रतिभा से प्रभावित होकर उन्हें ‘बद्र’ यानि पूर्णिमा का चांद की उपाधि प्रदान की. लखनऊ से प्रकाशित होने वाली प्रतिष्ठित साहित्यिक पत्रिका ‘निगार’ में पहले-पहल उनकी रचनाएं छपीं जिसने उन्हें व्यापक पाठक-वर्ग तक पहुंचाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई.

बशीर ने 18,000 से भी अधिक क़लाम लिखे. जीवन के अंतिम दशकों में भले ही वह याददाश्त कम होते जाने से जूझते रहे पर उससे पहले-पहले तक भी उनकी रचनात्मकता बदस्तूर थी. इक्यानवे साल के लंबे जीवन में उनके नाम बेशुमार शोहरतें रही भी तो भी उनके अंतर मन की पीड़ा और अपने जड़ों से बिछड़ जाने का विचार एक सतत अंतर्धारा की तरह उनके साथ साथ चलता रहा.
मेरठ में 1987 के फ़सादात में जिस तरह न केवल उनका घर बल्कि कई अप्रकाशित पांडुलिपियों और नज्मों की संभाल से खड़ी की गई लाइब्रेरी जलकर खाक हो गई तो जीवन भर की जमा-पूंजी गंवाकर उन्हें भोपाल आकर बस जाना पड़ा. हालांकि बाद में उन्होंने इस हादसे को भी स्वीकार करते हुए आगे के जीवन में मिलने वाली कामयबियों को ही याद रखना चाहा, पर घर के कहीं पीछे छूट जाने की पीड़ा उनके नज़्मों में बार-बार आती रही.
सांप्रदायिकता की आड़ में लोगों को उनके जड़ों से काट देने वाली खूनी राजनीति पर ही बशीर ने लिखा था: ‘लोग टूट जाते हैं एक घर बनाने में/ तुम तरस नहीं खाते बस्तियां जलाने में’. या फिर सात संदूकों में भरकर दफ़्न कर दो नफ़रतें, आज इन्सां को मोहब्बत की ज़रूरत है बहुत.
हम रात चमकते हैं तारीक ख़लाओं में…
बशीर उर्दू कविता के आधुनिक दौर का प्रतिनिधित्व करने वाले कवियों में एक अहम स्थान रखते हैं. उनकी काव्य-यात्रा उत्तर-औपनिवेशिक स्वातंत्रयोत्तर राष्ट्र के समानांतर ही अपना स्वरूप ग्रहण कर रही थी. यह वह दौर था जब उर्दू ग़ज़ल अपनी पारंपरिक सीमाओं और रूढ़ बंधनों से मुक्त होने के लिए संघर्ष कर रही थी. आधुनिकता के दबावों से समाज में नए मूल्य और नई चेतनाएं जन्म ले रही थीं और पुराने मानदंड और विचार अपनी प्रासंगिकता खो चले थे. उर्दू साहित्य में उभर रहे नए आंदोलनों और प्रवृत्तियों का समाज पर गहरा प्रभाव पड़ रहा था.
यह वही दौर था जब एक समय अत्यंत प्रभावशाली रहा प्रगतिशील लेखक आंदोलन की पकड़ साहित्यिक-सांस्कृतिक परिवेश पर कम होती चली जा रही थी. साथ ही, स्वतंत्रता के साथ मिले विभाजन और पाकिस्तान के एक नए राष्ट्र के रूप में अस्तित्व में आने से उपमहाद्वीप की राजनीतिक और सांस्कृतिक परिस्थितियों में व्यापक परिवर्तन आ चुके थे. ऐसे उथल-पुथल भरे समय में भारतीय उर्दू शायर ग़ज़ल की नई पहचान, नई भूमिका निर्धारित करने का प्रयास कर रहे थे. अहमद फराज़, निदा फ़ाज़ली, वसीम बरेलवी, राहत इन्दौरी, मंज़र भोपाली के समकालीन बशीर बद्र का लेखन इन्हीं समयों की उपज था और अपने सरोकारों की विविधता से अधिक सघनता के लिए जाना गया.
1960 के बाद उर्दू ग़ज़ल के क्षेत्र में नए अनुभवों, नई संवेदनाओं और नई अभिव्यक्तियों का प्रवेश हो चुका था. ग़ज़ल ने भी पारंपरिक विषयों की सीमाओं से बाहर निकलकर समकालीन जीवन की जटिलताओं, विडंबनाओं और मानवीय सरोकारों को अपने भीतर समाहित करना शुरू किया. बशीर की रचनात्मकता इन्हीं सारे परिवर्तनों को पुरज़ोर अपने पूरे गठन में आत्मसात किए हुई थी. उन्होंने सही मायनों में आधुनिक संवेदना को ग़ज़ल की पारंपरिक सौंदर्य-चेतना के साथ संयोजित किया. इसीलिए अगर एक तरह उनकी शायरी में गहरी मानवीय आत्मीयता दिखाई देती है, तो दूसरी ओर बदलते समय की बेचैनियां, टूटते-दरकते रिश्तों के विक्षोभ और नए सामाजिक यथार्थ भी सशक्त रूप से अभिव्यक्त होते हैं.

यही विशेषता उन्हें आधुनिक उर्दू ग़ज़ल के सबसे प्रभावशाली रचनाकारों में स्थान दिलाती है. सात से अधिक कविता संग्रहें अगर उनके भीतर के स्वाभाविक सर्जक होने की मिसाल थे तो उर्दू साहित्य पर आलोचना की दो पुस्तकें उनके एक अकादमिक अध्येता होने को दिखलाती थीं. वह केवल एक लोकप्रिय शायर ही नहीं बल्कि उर्दू साहित्य के एक गंभीर चिंतक और आलोचक के रूप में भी प्रतिष्ठित थे. उनके उर्दू गज़लों का एक संग्रह कुल्लियाते बशीर बद्र पाकिस्तान में भी प्रकाशित हुआ, जो न केवल उप-महाद्वीप में एक लोकप्रिय शायर के रूप में उनकी उपस्थिति का सबूत है बल्कि भाषा के साझे विरासत को भी रेखांकित करता है.
पर यह लोकप्रियता उनके अपने जीवन के संघर्षों से ही हासिल हुई थी, जो एक सामान्य व्यक्ति की तरह ही जीवन के ऊबड़-खाबड़ राहों से चलते-गुजरते थक भी सकती थी, और ऐसे समय में ही वह यह कह उठते थे कि ‘अजब चराग़ हूं दिन रात जलता रहता हूं/ मैं थक गया हूं हवा से कहो बुझाए मुझे’. इसीलिए भी बशीर की ग़ज़लों की एक महत्वपूर्ण विशेषता उनकी मनोवैज्ञानिक गहराई है. वे मानवीय मन के भीतर पैठ कर उसके सूक्ष्म भावों, अंतर्द्वंद्वों और संवेदनात्मक अनुभवों को बड़ी बारीकी से पकड़ते हैं.
उनके अशआर में जीवन की भावनात्मक विडंबनाएं अत्यंत मार्मिक और प्रभावशाली ढंग से व्यक्त होती हैं. यही कारण है कि उनकी शायरी पाठक के हृदय को सीधे स्पर्श करती है और उसे अपने ही व्यक्तिगत अनुभवों का एक प्रतिबिंब लगती हैं.
दुआ करो कि ख़ुदा हमको आदमी कर दे…
भले ही प्रेम और रूमानियत बशीर की शायरी में केंद्रीय स्थान रखती हों, पर उनके कवि मानस की चिंताएं जीवन के अन्य पक्षों पर भी उतनी ही मारक नज़र रखती थी. इसीलिए उनकी रचनाओं में अगर आधुनिकता के ख़तरों की बात कभी आती है तो, मनुष्य के मनुष्य से दूर होते जाने की भी व्यथा दर्ज़ हुई है ‘अच्छा तुम्हारे शहर का दस्तूर हो गया/ जिस को गले लगा लिया वो दूर हो गया’ और वहीं सिर्फ मनुष्य ही नहीं बल्कि मनुष्य के प्रकृति से टूटते संबंधों पर भी मर्सिया कहा गया है ‘महलों में हमने कितने सितारे सजा दिए, लेकिन ज़मीं से चांद बहुत दूर हो गया‘.
अपने समय और उसके रुख से बशीर कभी तटस्थ नहीं रहे. उनकी नज़्मों में एक गहरे राजनीतिक मोहभंग और सियासतदारों की राजनीतिक चालों के प्रति आगाह बने रहने की भी ताक़ीद मिलती है. कभी-कभी तो वस्तुस्थितियों से विक्षुब्ध कवि मन का संयत विद्रोह भी प्रतिकार कर उठता है और वह सबको एक स्वर से कटघरे में खड़े करते हैं. इंकलाब और तेवर किसी क्रांतिकारी की मानिंद न भी ही इनमें पर पीड़ित जनता के विक्षोभ को बखूबी दर्ज़ करते हैं:
‘वही ताज है वही तख़्त है वही ज़हर है वही जाम है
ये वही ख़ुदा की ज़मीन है ये वही बुतों का निज़ाम है’.
बशीर के लिए धर्म किसी मानवीयता से बढ़ कर नहीं था. जो धर्म लोगों के दिल बांट दें, ऐसे धर्म से बेहतर है कि उस धर्म का निज़ाम ही ख़त्म हो जाए. उनकी रचनाएं मानवता के बचाव की गुहार लगाती हैं. उस मानवता के वृत्त में अगर जीवन की कोमल संवेदनाएं हैं तो वहीं मनुष्यता का प्रतिनिधित्व करने वाले बच्चे भी. इसीलिए बार-बार बच्चे उनकी रचनाओं में झांक जाते हैं.
समाज-सत्ता-धर्म के विभाजनकारी शक्तियों के हाथों कुचले जाने वाले मासूम बच्चों की लाशें बशीर की शायरी में जब आती हैं तो उसका पाठ आज के समकालीन संदर्भों में और भी अधिक मानीखेज हो उठता है. वह दिखलाता है कि शक्ति का केंद्रीकरण किसी एक व्यक्ति या एक संस्था के हाथों में हुआ तो उसके ख़तरे कितने दूरगामी साबित हो सकते हैं.
यह हम आज के समय में जब विश्व नए सिरे से युद्धों में जल रहा है, भली-भांति समझ सकते हैं. उनकी एक करुण नज़्म की यह पंक्तियां क्या आज गाज़ा के मलबों में दबे बच्चों की तस्वीरें हमारे सामने नहीं लातीं?
‘यहां एक बच्चे के ख़ून से जो लिखा हुआ है उसे पढ़ें
तिरा कीर्तन अभी पाप है अभी मेरा सज्दा हराम है’.
पर वस्तुतः बशीर मनुष्य और मानवता के शायर हैं. इसीलिए मानवीय संवेदना, सौंदर्य-बोध और पारिवारिक जीवन के प्रति भी गहरी आस्था रखते हुए वे जीवन की सार्थकता को केवल भौतिक उपलब्धियों में नहीं, बल्कि जीवन के भीतर उपस्थित कोमलता और मानवीय सदाशयता में देखते हैं. और एक बार फिर उनकी इस कोमलतम संवेदनाओं के केंद्र में मासूम बच्चे आ जाते हैं:
‘वो शाख़ है न फूल, अगर तितलियां न हों,
वो घर भी कोई घर है जहां बच्चियां न हों’.
देखा जाए तो समकालीन सामाजिक संदर्भ में यह पंक्तियां कितनी अर्थपूर्ण हो उठती हैं क्योंकि यह अप्रत्यक्ष रूप से उस सामाजिक मानसिकता का प्रतिकार करती है जो बेटियों को बेटों के बर-अक्स कम महत्व देती है. यह थी बशीर की कविता की असली पक्षधरता जो समाज के प्रचलित विमर्श से परे जाने का साहस रखती थी पर बिना किसी अतिरिक्त नाटकीयता और शोर-शराबे के. बिना किसी बड़े इंक़लाबी दावों के भी बशीर अपनी रचनाओं में उन उजालों को चुपचाप भरते रहे जिन्होंने अंधेरों के प्रति अपना विद्रोह बनाए रखा.
(अदिति भारद्वाज गद्यकार हैं, जो साहित्य और सिनेमा में रुचि रखती हैं.)
