मुसाफ़िर हैं हम भी, मुसाफ़िर हो तुम भी… नहीं रहे मशहूर शायर बशीर बद्र

मशहूर उर्दू शायर बशीर बद्र का गुरुवार (28 मई) दोपहर करीब साढ़े बारह बजे भोपाल में निधन हो गया. प्रेम, विस्थापन और इंसानी रिश्तों को सरल लेकिन असरदार भाषा में कहने वाले बद्र के शेर संसद से लेकर आंदोलनों तक गूंजते रहे.

बशीर बद्र उन चुनिंदा शायरों में रहे जिनकी पंक्तियां राजनीतिक भाषणों से लेकर प्रेम पत्रों तक, हर जगह सहजता से जगह बना लेती थीं. (फोटो साभार: bashirbadr.com)

नई दिल्ली: ‘लोग टूट जाते हैं एक घर बनाने में, तुम तरस नहीं खाते बस्तियां जलाने में…’ यह उर्दू शायरी की दुनिया में यह महज़ एक शेर नहीं, बल्कि हमारे समय की सामूहिक स्मृति का हिस्सा बन चुका है.

इस शेर को लिखने वाले मशहूर शायर बशीर बद्र अब हमारे बीच नहीं रहे. गुरुवार (28 मई) दोपहर करीब साढ़े बारह बजे भोपाल में उनका निधन हो गया. वे लंबे समय से डिमेंशिया से जूझ रहे थे. उनके बेटे तैयब बद्र ने निधन की पुष्टि करते हुए बताया कि पिछले कुछ दिनों से उनकी तबीयत लगातार गिर रही थी. गुरुवार को मग़रिब की नमाज़ के बाद भोपाल के बड़ा बाग कब्रिस्तान में उन्हें सुपुर्द-ए-ख़ाक किया जाएगा.

बशीर बद्र के जाने की खबर के साथ ही उर्दू अदब की दुनिया में एक गहरा सन्नाटा उतर आया. गीतकार और शायर जावेद अख्तर ने लिखा, ‘आज हमारी ज़बान उर्दू थोड़ी और ग़रीब हो गई. बशीर बद्र एक बेहद ख़ुशगू शायर थे, जो हमेशा के लिए महफ़िल से उठ गए. ये शायर और इसकी शायरी हमारी यादों में हमेशा ज़िंदा रहेंगे.’

15 फरवरी 1935 को अयोध्या में जन्मे सय्यद मोहम्मद बशीर बद्र ने अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय से बीए, एमए और पीएचडी की पढ़ाई की. उन्होंने अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय और बाद में मेरठ कॉलेज में अध्यापन किया. फ़ारसी, हिंदी और अंग्रेज़ी पर समान पकड़ रखने वाले बशीर बद्र ने उर्दू ग़ज़ल को आम बोलचाल की ज़बान में एक नई नरमी और आत्मीयता दी.

उनकी ग़ज़लें कठिन अलंकारों या भारी-भरकम शब्दों की बजाय सीधे दिल से संवाद करती थीं. शायद यही वजह रही कि उनके शेर महफ़िलों से निकलकर आम लोगों की बातचीत, संसद की बहसों और सड़कों पर लगे पोस्टरों तक पहुंचे.

‘उजाले अपनी यादों के’, ‘आहट’, ‘आमद’, ‘इकाई’, ‘आस’ और ‘कुल्लियाते बशीर बद्र’ जैसी कृतियों ने उन्हें उर्दू शायरी का लोकप्रिय चेहरा बनाया. उनकी किताब ‘आस’ के लिए उन्हें 1999 में साहित्य अकादमी पुरस्कार मिला, उसी वर्ष उन्हें पद्मश्री से भी सम्मानित किया गया.

बशीर बद्र की शायरी की सबसे बड़ी ताकत उसका समय के साथ चलना था. वे प्रेम, बिछड़न और अकेलेपन की बात करते हुए भी अपने दौर की त्रासदियों को दर्ज करते रहे. दिल्ली के शाहीन बाग आंदोलन के दौरान जब सांप्रदायिक हिंसा में उजड़े लोगों के समर्थन में पोस्टर लगे, तब उन्हीं का शेर सबसे अधिक दिखाई दिया- ‘लोग टूट जाते हैं एक घर बनाने में…’ यह शेर बाद के वर्षों में बुलडोज़र कार्रवाई और बेघर किए गए लोगों पर होने वाली बहसों में भी बार-बार उद्धृत हुआ.

संसद में भी उनकी शायरी कई बार गूंजी. फरवरी 2018 में संसद में राष्ट्रपति के अभिभाषण पर चर्चा के दौरान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कांग्रेस पर तंज कसते हुए बशीर बद्र का शेर पढ़ा था, ‘जी बहुत चाहता है सच बोलें, क्या करें हौसला नहीं होता.’ उससे एक दिन पहले कांग्रेस नेता मल्लिकार्जुन खरगे ने भी सदन में उनका ही शेर पढ़ा था, ‘दुश्मनी जमकर करो लेकिन ये गुंजाइश रहे, जब कभी हम दोस्त हो जाएं तो शर्मिंदा न हों.

यह शायद बशीर बद्र की सबसे बड़ी ताकत थी कि उनके शेर किसी एक विचारधारा, एक मंच या एक वर्ग के नहीं रहे. वे सार्वजनिक जीवन की साझा भाषा बन गए.

2019 में केन-बेतवा लिंक परियोजना पर चर्चा के दौरान भाजपा सांसद निशिकांत दुबे ने उनका शेर पढ़ा था- ‘अगर फ़ुर्सत मिले पानी की तहरीरों को पढ़ लेना, हर एक दरिया हमारे सालों का अफ़साना लिखता है.’

बशीर बद्र उन चुनिंदा शायरों में रहे जिनकी पंक्तियां राजनीतिक भाषणों से लेकर प्रेम पत्रों तक, हर जगह सहजता से जगह बना लेती थीं. लेकिन उनकी निजी जिंदगी उतनी आसान नहीं थी, जितनी उनकी शायरी की मुलायम भाषा लगती है. मेरठ दंगों के दौरान उनका घर जला दिया गया था. उस आग में उनकी कई नई ग़ज़लें और निजी डायरी भी राख हो गई थीं.

फिल्मकार विशाल भारद्वाज ने एक इंटरव्यू में बताया था कि दंगों के बाद बशीर बद्र गहरे अवसाद में चले गए थे. वे अपनी जली हुई ग़ज़लों को याद करने की कोशिश करते थे. भारद्वाज के मुताबिक, ‘उस समय मैं 19 साल का था और भंडारी नाम के एक व्यक्ति थे, जिनकी उम्र करीब 70 साल थी. उन्हें कुछ शेर याद थे, जबकि मुझे ज़्यादातर याद थे. वह (बशीर बद्र) मुझसे पूछते थे, ‘बेटा, उस ग़ज़ल के कुछ शेर याद हैं?’ और जाहिर है, मुझे सब याद था. उन्होंने फिर से लिखना शुरू किया और करीब 15 दिनों में अवसाद से बाहर आ गए. मैं और भंडारी मिलकर उन जली हुई कविताओं का लगभग 90 प्रतिशत हिस्सा याद कर पाए थे.’

यह सिर्फ एक शायर की निजी त्रासदी नहीं थी, बल्कि उस दौर की हिंसा और टूटन का दस्तावेज़ भी थी. शायद इसी वजह से बशीर बद्र की शायरी में घर, बस्ती, याद और विस्थापन बार-बार लौटते हैं. उनके यहां मोहब्बत सिर्फ रूमानी एहसास नहीं, बल्कि इंसानी गरिमा और साथ रहने की इच्छा का रूप ले लेती है.

बशीर बद्र की ग़ज़लों की सबसे बड़ी खूबी यह थी कि वे कठिन समय में भी उम्मीद का एक छोटा-सा दिया जलाए रखती थीं. उन्होंने उर्दू शायरी को महज़ अदबी दायरों में सीमित नहीं रहने दिया, बल्कि उसे रोज़मर्रा की जिंदगी का हिस्सा बना दिया. यही कारण है कि उनके जाने के बाद भी उनकी पंक्तियां लोगों की ज़बान पर रहेंगी- कभी किसी टूटते हुए घर के दुख में, कभी किसी बिछड़ते रिश्ते में और कभी इस उम्मीद में कि इंसानियत अब भी बची हुई है.