आख़िरकार इस बात की पुष्टि हो चुकी है कि ‘सतलुज’ प्रतिबंधित हो चुकी है. हालांकि, इस रोक के बीच भी पंजाब के गांवों में यह फिल्म पहुंच चुकी है और लगातार कहीं न कहीं से इसके सार्वजनिक रूप से दिखाए जाने की ख़बरें आ रही हैं. फिल्मकार हनी त्रेहन जब इस फिल्म को बना रहे थे, उनकी उम्र 42 साल थी, लगभग वही जो फिल्म के मुख्य किरदार जसवंत सिंह खालरा की थी, जब उन्होंने सूबे में हो रहे अपहरणों और मानवाधिकार कार्यकर्ताओं की हत्याओं को दर्ज करने की शुरुआत की थी.
विभिन्न केंद्रीय मंत्रालयों के सदस्यों वाली एक अंतरविभागीय समिति द्वारा फिल्म को प्रतिबंधित किए जाने के बाद, पहली बार वरिष्ठ पत्रकार हरिंदर बावेजा से बात करते हुए त्रेहन ने फिल्म को लेकर केंद्रीय फिल्म प्रमाणन बोर्ड (सीबीएफसी) के साथ चार सालों तक चली खींचतान के बारे में बताया. इस बातचीत के संपादित अंश.
‘सतलुज’ फिल्म पर आख़िरकार देश में और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर रोक लगा दी गई. आपको निराशा तो हुई होगी. क्या इस बारे में अपने जज़्बात साझा करना चाहेंगे?
सच कहूं तो मैं उत्साहित हूं. कम-अज़-कम फिल्म आधिकारिक तौर पर रिलीज़ तो हुई और ढाई दिन के लिए उपलब्ध थी और लोग इसे देख सके. किसी भी फिल्मकार के लिए सबसे महत्वपूर्ण यही बात है कि उसके काम को देखा जाए. और फिर फिल्म के बाद आई प्रतिक्रियाएं… मैं अभिभूत हूं. मैंने इस तरह की प्रतिक्रिया की उम्मीद नहीं की थी, हालांकि मुझे यक़ीन था कि फिल्म और इसका संदेश बेहद ज़रूरी है, मगर जो प्यार और सराहना मुझे मिले, वो उम्मीद से परे थी.
मैं इसका भविष्य किसी ‘प्रतिबंधित’ फिल्म के तौर पर नहीं देखता हूं क्योंकि यह अभिव्यक्ति की आज़ादी और लोकतंत्र के विपरीत है. हां, यह बात मुझे ज़रूर निराश करती है कि इसके पायरेटेड वर्ज़न देखे जा रहे हैं. मैंने कभी सोचा नहीं था कि ‘सतलुज’ इतनी जल्दी एक आंदोलन में तब्दील हो जाएगी और लोग इसे डाउनलोड करने लगेंगे. इतना प्रेम, तारीफ़ें और प्रोत्साहन भावविभोर करने वाला है.
केंद्रीय गृह, क़ानून, रक्षा और महिला एवं बाल विकास मंत्रालयों के अधिकारियों वाली अंतरविभागीय समिति के मुताबिक यह फिल्म देशहित के ख़िलाफ़ है और भारत की संप्रभुता के लिए ख़तरा है. क्या कहेंगे इस बारे में?
मैं इस बात को नहीं मानता. मैं मानता हूं कि हम एक मज़बूत राष्ट्र हैं, और मैं यहां साफ़ कर दूं कि मेरी फिल्म को क़ानूनी मंज़ूरी मिली है. इस बात को समझना होगा कि जब कोई फिल्मकार निर्माता के पास स्क्रिप्ट लेकर पहुंचता है तब वो पहले कहानी सुनता है. रॉनी स्क्रूवाला को स्क्रिप्ट बेहद पसंद आई थी, और फिर उन्होंने इसे लॉ फर्म्स को भेजा. फिर इसे वकीलों ने स्वीकृति दी! निर्माता इसीलिए पैसा लगाने को तैयार हुए क्योंकि स्क्रिप्ट को क़ानूनन स्वीकृत किया गया था.
लेकिन वे प्राइवेट लॉ फर्म्स रही होंगी?
हां, मगर वो बड़ी फर्म्स हैं, और उनसे हरी झंडी मिलने का अर्थ है कि प्रोड्यूसर निश्चिंत होकर इसमें निवेश कर सकते हैं, क्योंकि इसमें काफी पैसा लगता है. और मैं आपको बताता हूं कि जब हम (सीबीएफसी के ‘कट्स’ लगाने की सलाह के बाद) फिल्म को लेकर बॉम्बे हाईकोर्ट गए थे, तब क्या हुआ था. आख़िरी से पहली सुनवाई में जज साहब ने कहा कि उन्हें नहीं लगता कि फिल्म में कोई कट लगाने की ज़रूरत है.
एक ही सुनवाई बची थी और जज चाहते थे कि अगले दिन ही मामला ख़त्म कर दिया जाए. पर सीबीएफसी ने दरख़्वास्त की कि इसे कुछ दिनों के लिए टाल दिया जाए. जज साहब की प्रतिक्रिया से वो जान गए थे कि वो ये केस हार रहे हैं. उसके बाद फिर सारा दबाव रॉनी स्क्रूवाला पर आ गया. उन्हें दिल्ली बुलाया गया, जहां उन्हें कोर्ट से बाहर समझौता करने और हाईकोर्ट से मुक़दमा वापस लेने के लिए कहा गया.
सत्ता से लड़ना आसान नहीं होता. इसके साथ ही रॉनी को टोरंटो फिल्म फेस्टिवल से भी फिल्म को वापस लेने को कहा गया.
रॉनी को किसने बुलाया था?
यह उन्होंने कभी नहीं बताया.

साफ़ तौर पर सरकार के अंदर से ही किसी ने ऐसा किया होगा?
हां, यकीनन. और फिर, क्योंकि उस समय सीबीएफसी ने फिल्म में 21 कट्स बताए थे, तो मैंने सोचा कि ठीक है, चलो हम वो कट्स लगा देंगे, लेकिन फिल्म को टोरंटो इंटरनेशनल फिल्म फेस्टिवल में तो रिलीज होने दें, क्योंकि इसके लिए तो किसी सर्टिफिकेट की ज़रूरत नहीं थी.
लेकिन रॉनी ने कहा, ‘नहीं, हनी, तुम नहीं समझ रहे हो, बहुत ज्यादा प्रेशर है.’ उन्होंने कहा, ‘तुमने बहुत प्यारी फिल्म बनाई है, हम कुछ एडजस्ट करते हैं.’ फिर हमने फिल्म को 21 कट्स के साथ सेंसर बोर्ड को वापस दे दिया. रॉनी को लगा था कि हमें मंजूरी मिल जाएगी लेकिन बोर्ड और ज़्यादा कट लगाने के सुझाव देता रहा. शुरुआत 21 से हुई तो और आख़िर तक आते-आते यह गिनती 127 तक पहुंच चुकी थी. मैं बस ये सोच रहा था, आख़िर हो क्या रहा है? और कैसे मैं अपनी फिल्म को बचा लूं?
इसी सबके बीच ही किसी ने रॉनी से वादा किया कि फिल्म को मंज़ूरी मिल जाएगी क्योंकि चेयरमैन साहब (सीबीएफसी के अध्यक्ष) ख़ुद इसे देखेंगे.
लेकिन दूसरी तरफ़ से झटके मिलते रहे- 65 कट, फिर 85 कट. रिवाइज़िंग कमेटी (संशोधन समिति) ने सात बार फिल्म देखी, जबकि सिनेमैटोग्राफ क़ानून के हिसाब से कमेटी एक फिल्म को केवल दो बार देख सकती है.
85 कट लगाए जाने के बाद मुझे समझ आ गया था कि मेरी फिल्म बुरी तरह से कट जाने वाली है और मुझे यह नहीं समझ में आ रहा था कि इसके नैरेटिव को कैसे बचा लूं. यही सब चल रहा था. चेयरमैन साहब को फिल्म देखनी थी मगर महीनेभर तक ऐसा कुछ नहीं हुआ. और महीना बीतने के बाद सीबीएफसी के वकील ने चिट्ठी भेजी… इसमें 127 कट बताए गए थे.
मेरी प्रतिक्रिया यही थी कि ऐसा तो नहीं हो पाएगा. रॉनी ने कहा, ‘हनी, मुझे फिल्म रिलीज़ करनी है.’ मैंने कहा, ‘रॉनी, अगर तुम्हारी अंतरात्मा इजाज़त दे, तो तुम इसे किसी और से एडिट करवा सकते हो; तुम फिल्म रिलीज़ कर सकते हो… मुझे पता है कि फिल्म पर तुम्हारा पैसा लगा है.’
सीबीएफसी के अध्यक्ष कौन थे तब?
प्रसून जोशी
वे ख़ुद फिल्म इंडस्ट्री का हिस्सा हैं. यही माना जाता है कि उन्हें तो फिल्म बनाने वालों के पक्ष में होना चाहिए था…
सब ऐसा चाहते हैं, लेकिन वह [प्रसून जोशी] [महीनेभर के लिए] गायब हो गए और रॉनी पूरी तरह हिल गए थे. हमने इसी उम्मीद के साथ 85 कट लगा दिए थे कि अब तो हमें सर्टिफिकेट मिल जाएगा.
अच्छा मैं एक बात को लेकर पूरी तरह स्पष्ट था… कि अगर अदालत यह कह रही होती तो मैं डेढ़ सौ कट लगा देता. लेकिन अगर ऐसा करने के लिए कोई ऐसा इंसान कह रहा है, जिसके दिमाग में अपनी पॉलिटिक्स और एजेंडा चल रहा है, तो मैं बदलाव नहीं करने वाला. मैं इस सबके लिए बना ही नहीं हूं.
इन सबके बावजूद रॉनी, जिन्हें ख़ुद फिल्म बहुत पसंद है, एक साल तक लोगों तक पहुंचने की कोशिश करते रहे, लेकिन कोई जवाब नहीं मिला.
जब आप लोगों की सीबीएफसी के साथ ये खींचतान चल रही थी, तब दिलजीत दोसांझ भी प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से मिले थे…
मैंने उनसे इस बारे में कभी नहीं पूछा. आप प्रधानमंत्री से मिलकर यह नहीं कह सकते न कि सर, प्लीज़ मेरी फिल्म रिलीज़ करने में मदद कर दें. मैं तो ऐसा नहीं करूंगा.
वे कौन-से हिस्से कटवाना चाहते थे? सीबीएफसी को किन बातों से परहेज़ था? उनके ऐतराज़ क्या थे? और कट की संख्या बढ़ाने के पीछे क्या एजेंडा लग रहा था?
मैं यह समझ नहीं पाया, क्योंकि मुझे उन बदलावों को करने की कोई सही वजह नहीं दिखी. वे ‘पंजाब’ हटाना चाहते थे. सीबीएफसी ने कहा, पंजाब कहने के बजाय आप यहां और वहां क्यों नहीं कहते. वे नहीं चाहते थे कि हम ‘पंजाब पुलिस’ कहें.
लेकिन पुलिसवाले सिख हैं और मुख्य बात यह है कि फिल्म जसवंत सिंह खालरा पर केंद्रित है…
ठीक यही बात मैंने कही थी. किस दूसरे राज्य में सरदार [सिख] पुलिसवाले हैं? मैंने उनसे कहा, मुझे उस राज्य का नाम बताएं, मैं वही लिख दूंगा.
हमें बताया गया कि हम दिल्ली, देश, सिस्टम, स्टेट नहीं कह सकते… उन्होंने कहा कि एक्स्ट्रा ज्यूडिशियल (न्यायेतर), जुडिशरी (न्यायपालिका), कानून जैसे शब्दों का इस्तेमाल न करें… हमें यहां तक कहा गया कि इंदिरा गांधी का नाम न लें.
फिल्म में एक लाइन है, कि इंदिरा गांधी को मरे 11 साल हो चुके हैं और पंजाब सरकार को बने तीन…
यह फैक्ट है, है न? इंदिरा गांधी की हत्या 1984 में हुई और ‘सतलुज’, जिसका नाम तब पंजाब 95 था, साल 1995 को लेकर है, वही साल जब खालरा का अपहरण किया गया और हत्या कर दी गई.
फिर मुझे यह भी ध्यान आया कि यहां इंदिरा गांधी के बारे में एक पूरी फिल्म बन चुकी है जिसका नाम ‘इमरजेंसी’ है और यहां मैं एक लाइन में उनका ज़िक्र भी नहीं कर सकता… यह तकलीफ़देह था. और तो और उन्होंने हमसे पूरी फिल्म से गुरबानी हटाने के लिए भी कहा.
पर गुरबानी तो शांति, सुकून का आह्वान है…
जब भी मैं वजह पूछता, तो वे कहते सवाल मत पूछो, जो हम कह रहे हैं वो करो. उन्हें गायब हुए लोगों के पच्चीस हज़ार के आंकड़े से भी परेशानी थी. उन्होंने तो यहां तक कहा कि आप श्मशान घाट का नाम नहीं ले सकते, किसी भी श्मशान घाट के बारे में बात नहीं कर सकते, चाहे वह दुर्गियाना हो, पट्टी या तरनतारन.
लेकिन सतलुज एक असली इंसान की कहानी पर आधारित है, जिनका अपहरण कर क़त्ल कर दिया गया था. यह सीबीआई केस था और पुलिसकर्मियों को दोषी ठहराया गया था, बात सुप्रीम कोर्ट तक गई थी…
मैंने उन्हें यही बात बताई, जिस पर उन्होंने कहा, ‘आप 30 साल पहले हुई किसी बात को वापस क्यों लाना चाहते हैं?’ इसके जवाब में कोई क्या कह सकता है? वे नहीं चाहते थे कि हम भारतीय तिरंगा या कनाडा का झंडा दिखाएं!
लेकिन तिरंगा पंजाब का भी उतना ही है जितना किसी अन्य राज्य का?
मैंने भी यही कहा: कि आप पंजाब को भारत का हिस्सा नहीं मानते हैं! उन्होंने कहा, ये सब बातें मुझसे मत पूछो या मुझे न बताओ. मैंने तब तत्कालीन सीईओ से पूछा, ‘सर, क्या आपने फिल्म देखी है?’ उन्होंने कहा, ‘नहीं, लेकिन मैं देखने की सोच रहा हूं.’ मैंने उनसे कहा, ‘सर, प्लीज़ ओरिजिनल वाली देखें.’ इस पर उन्होंने कहा, ‘नहीं, अगर मुझे फिल्म पसंद आ गई तो…’
ऐसे समय में फिल्मकार होना कितना मुश्किल है, जब प्रोपगैंडा फिल्मों को राजनीतिक दिग्गजों का समर्थन मिल रहा है और सतलुज जैसी सत्य घटनाओं पर आधारित फिल्म, जो न्यायेतर हत्याओं और मानवाधिकार हनन की बात करती है, प्रतिबंधित हो जाती है.
मेरी फिल्म सरकार के पक्ष में कुछ भी नहीं करती है. मुझे एक बैठक में स्पष्ट रूप कहा गया था- ‘बहुत अच्छी फिल्म है, लेकिन इसमें हमारे लिए क्या है?’ पहले, वे [सीबीएफसी] यह मानने को तैयार नहीं थे कि यह फिल्म एक सच्ची कहानी पर आधारित है. मैंने कहा, मुझे हफ्तेभर का समय दें और मैं अमृतसर लौट आया और 1,800 पन्नों की रिसर्च करके उन्हें दी. उन्होंने तब फिल्म देखी, फिर मैंने कहा, ‘तो अब आप जानते हैं कि यह एक सच्ची कहानी है?’
संशोधन समिति के प्रमुख ने कहा, ‘हां, यह एक सच्ची कहानी है, त्रेहन जी. मैं मानता हूं, लेकिन क्या आप बता सकते हैं कि आज के वक़्त में इतनी ज़ोर से कौन सच बोलता है?’
एक और बात बताता हूं, मेरे साथ कट्स के लिए बातचीत कर रहे अधिकारियों में से एक चाहते थे कि त्रिलोकपुरी [दिल्ली का वो इलाका जहां इंदिरा गांधी की हत्या के बाद 1984 के दंगों में सिखों को जिंदा जला दिया गया था] का नाम बदलकर ‘खानपुरी’ कर दिया जाए. मैंने उनसे कहा कि यही फिल्म का केंद्र है, तब उन्होंने कहा, ‘क्या फर्क पड़ता है, खानपुरी कर दे न.’ [मुस्लिम] विरोधी एजेंडा आगे बढ़ाया जा रहा था. उनके लिए यह बहुत आम-सी बात थी.
मीडिया सहित फिल्म के आलोचक पूछ रहे हैं कि आप 25,000 हत्याओं के आंकड़ों पर कैसे पहुंचे?
यह सवाल सही है और यह बात कई सार्वजनिक दस्तावेजों में है! यह संख्या सार्वजनिक है. खालरा का भाषण, जो कोई भी देख सकता है, यूट्यूब पर उपलब्ध है, उसमें उनका आंकड़ा लगभग 25,000 का है. मैंने इसे ही ध्यान में रखा क्योंकि यह खालरा पर बनी फिल्म है और उनकी कही यह बात बरसों से सार्वजनिक डोमेन में है.
मगर सीबीआई ने अपनी जांच में यह आंकड़ा 2,000 से अधिक नहीं बताया था?
नहीं, नहीं, नहीं, मेरे पास उसकी जानकारी तो नहीं है. बस एक बात और जोड़ूंगा, खालरा ने हमेशा कहा कि यह आंकड़ा लगभग 25,000 था. ठीक है? यहां तक कि वकील राजविंदर सिंह बैंस ने भी यह आंकड़ा 17,000 से 18,000 से ज़्यादा बताया था.

दूसरी आलोचना यह हो रही है कि खालरा कट्टरपंथी जरनैल सिंह भिंडरावाले, जो उग्रवाद के स्याह दौर के केंद्र में रहा, के समर्थक थे, और खालरा ने इंदिरा गांधी के हत्यारों का महिमामंडन किया. आपकी फिल्म में दोनों बातों का ही ज़िक्र नहीं है…
यह बहुत सब्जेक्टिव बात है. मेरी फिल्म कोई पॉलिटिकल फिल्म नहीं है; यह किसी के चरित्र की पड़ताल नहीं कर रही है. मेरी फिल्म सिर्फ मानवाधिकारों के बारे में है. एक आम आदमी किसके लिए खड़ा था, और उसकी लड़ाई क्या थी, और उस इंसान के साथ क्या हुआ.
पूरी फिल्म में मैं किसी राजनीतिक दल का नाम नहीं ले रहा हूं. मुझे अच्छी तरह पता था कि वे [खालरा] अकाली दल की मानवाधिकार इकाई के महासचिव (जनरल सेक्रेटरी) थे पर मैंने कभी इसका ज़िक्र नहीं किया. उनके विज़िटिंग कार्ड में यह लिखा था, लेकिन मैंने उसे हटा दिया क्योंकि मैं फिल्म को कोई राजनीतिक रंग नहीं देना चाहता था.
अगर खालरा अपराधी थे, या अगर वह खालिस्तानी थे तो चलिए देखते हैं कि पंजाब पुलिस ने अपनी गवाही में क्या कहा. उन्होंने कहा कि उनके पास खालरा के ख़िलाफ़ एक भी शिकायत नहीं थी: कोई एफआईआर नहीं, उनके ख़िलाफ़ कोई आपराधिक मामला दर्ज नहीं किया गया था.
मेरे लिए खालरा एक ऐसे शख़्स हैं जो सरकारी रिकॉर्ड में बेदाग थे, एक ऐसा आदमी, जो सिस्टम के ख़िलाफ़ खड़ा हुआ. सीबीआई ने पाया था कि उनका अपहरण किया गया और क़त्ल कर दिया गया. एजेंसी ने पाया कि उनके अपने लोग [पुलिसकर्मी] दोषी थे. मुझे लगता है कि मेरी फिल्म भारतीय संविधान को भी अच्छी रोशनी में दिखाती है.
पर क्या आप व्यक्तिगत रूप से इस बात को लेकर असहज नहीं हैं कि उन्होंने इंदिरा गांधी के हत्यारों का महिमामंडन किया?
नहीं, मुझे नहीं लगता कि उन्होंने उनका महिमामंडन किया. मैंने बहुत रिसर्च की है. और अगर वह भिंडरावाले को संत कह रहे थे, तो क्या यह अपराध है? पंजाब के अस्सी प्रतिशत लोग भिंडरावाले को संत कहते हैं.
मेरा काम उनके द्वारा लड़ी गई लड़ाई, और उन्होंने न्यायेतर हत्याओं के (पीड़ितों) के लिए कितनी मेहनत की, यह बताना था. मैंने उस कहानी को पूरी गरिमा और इज़्ज़त के साथ बताने की कोशिश की है.
इस बात की भी आलोचना है कि मैंने दूसरे पक्ष के बारे में बात नहीं की है. जो कोई भी दूसरी तरफ़ फ़िल्म बनाना चाहता है, वह पूरी तरह से आज़ाद है. यह एक आज़ाद देश है, बोलने की आज़ादी है. आप मुझे क्यों बता रहे हैं? और साफ़ कहूं तो, मेरे मुख्य किरदार ही दूसरी तरफ़ के बारे में बात करते हैं.
अगर आपको याद हो, जब अर्जुन रामपाल का किरदार पूछताछ के लिए सुग्गा के पास आता है तो सुग्गा उससे कहता है, ‘हमारी एक गोली कितनी गोलियों के जवाब में चलती है, वो तुझे बाहर से पता नहीं चलेगा. ये वो लोग हैं जो पकड़े नहीं जाते, जिनके लिए हमें आर्मी बुलानी पड़ती है, तोपें भी कम पड़ जाते हैं…’

जो नेता कहते हैं कि पंजाब के हिंदू कब जागेंगे, वे खुद बहरे और गूंगे हैं. उन्हें बार-बार सतलुज देखने की ज़रूरत है. फिल्म में जब नए मुख्यमंत्री आते हैं, तो बिट्टा (केपीएस गिल) उनसे कहते हैं कि पंजाब में उग्रवाद ख़त्म हो गया है और यह सब उन्होंने ही किया है.
इस पर सीएम जवाब देते हैं, ‘आपने सही किया, लेकिन अब नौकरशाही को संभालने दो क्योंकि मैं नहीं चाहता कि यह राज्य अब पुलिस स्टेट बना रहे.’
सब कुछ साफ-साफ कहा जा रहा है, लेकिन मैं ऐसा फिल्मकार नहीं हूं जो ढिंढोरा पीटता हो. अपनी कहानियां कहने की मेरी एक तरह की गरिमा है, मैं कहानी वैसे ही बताऊंगा जैसा मुझे अच्छा लगेगा. एक फिल्ममेकर के तौर पर यही मेरा तरीका है.
चलिए ज़ी5 पर आते हैं, यह मंच फिल्म दिखाने के लिए कैसे राज़ी हुआ? उनका राजनीतिक झुकाव तो किसी से छिपा नहीं है.
ईमानदारी से कहूं तो मुझे इस बारे में सूचना दी गई थी. पहली बार जब फिल्म का नाम ‘घल्लूघारा’ (नरसंहार के लिए पंजाबी शब्द) रखा गया तब दो और नाम- पंजाब 95 और सतलुज मेरे मन में थे. ओटीटी को सीबीएफसी के सर्टिफिकेट की ज़रूरत नहीं है. मुझे शुरू से ‘सतलुज’ टाइटल बहुत सुंदर लग रहा था. मैंने बस यही कहा था कि मैं फिल्म में किसी भी तरह के कट्स लगाने के ख़िलाफ़ हूं, तब मुझे बताया गया कि ज़ी5 को इस बार से कोई परेशानी नहीं है.
एक ऐसी फिल्म जो ऐसे राजनीतिक वक़्त की कहानी कहती है जिसमें भाजपा शामिल नहीं है, उसे रोका क्यों जा रहा है, इस पर आप क्या सोचते हैं? फिल्म देखने वाले तो यही कह रहे हैं कि वो काला दौर वापस नहीं आना चाहिए.
इस बात से मेरी समझ भी बनी है और सीख भी मिली है. मुझे लगता है कि फिल्म ने पंजाब को एक साथ ला दिया है. सीबीएफसी कानून-व्यवस्था की जिन मुश्किलों की बात कर रहा था, वो कहां हैं? जब हज़ारों लोग स्क्रीनिंग में बैठकर फिल्म देख रहे होते हैं, तो कोई जातिवाद नहीं होता, कोई जात-पात नहीं होता, कोई अमीर-ग़रीब नहीं. हिंदू और सिख एक साथ फिल्म देख रहे हैं.
पूरा पंजाब इस फिल्म को देखने के लिए साथ आ रहा है क्योंकि उन्हें लगता है कि कोई उनके दर्द के बारे में बोल रहा है. सतलुज उनके घावों पर मलहम की तरह है, लेकिन इसे बैन कर दिया गया है क्योंकि उनकी राजनीति फूट डालो और राज करो पर केंद्रित है. वे शायद एकता से डरते हैं क्योंकि तब यह ऐसा हो जाता न कि हम अपनी राजनीति कैसे बनाए रखें…

इन सार्वजनिक स्क्रीनिंग के पीछे भी राजनीतिक एंगल हैं क्योंकि इनमें से अधिकतर अकाली दल करवा रहा है.
कांग्रेस ने भी वो जगहें बताई हैं, जहां वे स्क्रीनिंग कर रहे हैं. इतने सारे लोग हैं, भाजपा स्क्रीनिंग कर रही है.
सच में? भाजपा स्क्रीनिंग आयोजित कर रही है?
कई भाजपा नेताओं ने कहा है कि उन्हें फिल्म से कोई समस्या नहीं है. भाजपा कार्यकर्ता तो स्क्रीनिंग देख रहे होंगे.
‘सतलुज’ आपके लिए बहुत ही भावुक फिल्म थी. खालरा का परिवार अपनी कहानी, अपनी फाइलें, दस्तावेज़ आदि साझा करने के लिए सहमत हुआ. क्या आपको लगता है कि फिल्म पर बैन लगने के बाद आपको उनसे माफ़ी मांगनी चाहिए?
माफ़ी? इसके उलट खालरा के परिवार ने मुझे फोन किया और कहा, हनी, निराश मत होना. फिल्म शुरू करने से पहले ही उन्होंने मुझसे कहा था कि यह आसान नहीं होने वाला और देश की राजनीति को ध्यान में रखते हुए इस बात की संभावना है कि फिल्म कभी बाहर ही न आ पाए.
कुछ आलोचकों ने मेरी फिल्म को प्रोपगैंडा फिल्म कहा है. अगर आप कह रहे हैं कि यह एक प्रोपगैंडा फिल्म है- तो इसे रिलीज़ होने दें. क्या हम दूसरी प्रोपगैंडा फिल्में रिलीज़ नहीं करते? अगर वो फिल्में रिलीज़ हो सकती हैं, तो यह क्यों नहीं? ये बात दर्शकों को तय करने दें न?
फिल्म का प्रतिबंधित हो जाना एक बड़ा संदेश है. फिल्म इंडस्ट्री के आपके दोस्तों, साथियों का इस बारे में क्या कहना है?
मुझे पूरी बिरादरी से समर्थन मिल रहा है. फिल्म ने सच में उन्हें छुआ है, उन्हें भावुक किया है. जिन फिल्मकारों को मैं सराहा करता था, पर कभी उनसे मिला नहीं था, वे मुझे कॉल कर रहे हैं. उनके जज़्बात ही मेरा ईनाम हैं.
मैंने इम्तियाज़ अली, राम गोपाल वर्मा, अनुराग बसु, सईद मिर्ज़ा और कुछ और लोगों से सुना है… आपके ज़रिये मैं सच में सरकार से विनती करना चाहता हूं और कहना चाहता हूं कि 31 साल पहले केंद्र सरकार ने जसवंत सिंह खालरा को इंसाफ दिलाने बड़ी भूमिका निभाई थी, 31 साल बाद फिर हम उसी जगह आ पहुंचे हैं. मेरी गुज़ारिश है कि फिल्म और खालरा के साथ इंसाफ करें.

क्या कभी ऐसा लगता है कि खालरा को दूसरी बार मार दिया गया है?
बिल्कुल, लेकिन सतलुज को बहने से रोका नहीं जा सकता. खालरा को सतलुज से ज़िंदा बाहर आने में 31 साल लग गए. खालरा को फिर से किडनैप किया गया है, लेकिन उन्हें कभी मारा नहीं जा सकता. यह सिर्फ़ इंसानी शरीर की बात नहीं है, यह सोच की बात है.
भविष्य की क्या योजना है? क्या इस निराशा से उबर पाए हैं?
मैं शिव कुमार बटालवी की बायोपिक पर काम कर रहा हूं.
मैं निराशा को ठहरने नहीं देता, क्योंकि मेरे पास सबसे अच्छे उस्ताद रहे हैं, चाहे वह विशाल भारद्वाज हों, रॉनी हों या मेरे गुरु बैरी जॉन, जिन्होंने मुझे डायरेक्शन की राह दिखाई. चरैवेति- चलते रहना ही रास्ता है. बशीर बद्र ने कहा भी था न, ‘हम भी दरिया हैं, हमें अपना हुनर मालूम है, जिस तरफ भी चल पड़ेंगे, रास्ता हो जाएगा…’
आखिरी सवाल: क्या राजनीति में आने की कोई योजना है?
क्या मुझे पहले ही यहां खींच नहीं लिया गया है… मैं अपनी फिल्मों पर फोकस करना चाहता हूं और, उन कहानियों को लेकर बहुत उत्साहित हूं, जो मैं बताना चाहता हूं.
(हरिंदर बावेजा वरिष्ठ पत्रकार हैं. हाल ही में उनकी किताब ‘दे विल शूट यू मैडम: माय लाइफ थ्रू कॉन्फ्लिक्ट’ प्रकाशित हुई है.)
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