स्वतंत्रता की 79वीं वर्षगांठ के अवसर पर द वायर हिंदी ‘आज़ादी के मायने’ नाम से एक श्रृंखला शुरू कर रहा है, जहां हम समकालीन लेखकों-विचारकों के लिए आज़ादी क्या है, इस बारे में उनके विचारों से रूबरू होंगे. एक तरह से यह श्रृंखला स्वतंत्रता को आज के संदर्भो में, उसके रोज़ाना के अर्थों में समझने का, उसके मायनों से वाक़िफ़ होने का अवसर है. प्रस्तुत है छठी क़िस्त.
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आग.. जो पत्थरों में होती है और दरख्तों में भी/ आग जो हमारी निगाहों में थी और ख्वाबों में भी/ आग जो इतिहास के गलियारे में थी तीरों की नोक पर भी/ आग जो हमारे-तुम्हारे दरम्यां एक पुल भी थी/ उसी आग को जलावतन किया है…
– रणेन्द्र (गायब होता देश)
बिल्कुल पास से गुजरते हुए मैंने देखा कि धुंए का गुबार रह-रह कर फूट रहा है. कुछ एक लोग किनारे खड़े होकर देख रहे थे. सड़क के उस पार चीख-पुकार मची हुई थी. सड़क के उस पार के इलाके को आम बोलचाल में लोग मच्छी बाजार कहते थे, वहां आग से सबकुछ तबाह हो चुका था. चारों तरफ काला कार्बन बिखरा हुआ था. कुछ औरतें उस बुझती आग से कुछ खंगाल रही थी. बच्चे एक ओर घेरा बनाकर बैठे थे. युवा पसीने से तरबतर इधर-से-उधर बस भटक रहे थे. वो क्या ढूंढ रहे हैं या क्या करना चाहते हैं कुछ भी स्पष्ट नहीं हो रहा था.
घबराहट और बेचैनी भरी चाल में कभी कभी किसी का नाम पुकार रहे थे. झुग्गियों की बाईं ओर अग्निशमन गाड़ी खड़ी थी. ये गाड़ी अस्सी के दशक की फिल्म की तरह सबकुछ खत्म होने पर आई थी- हैंड्स अप कहने. कुछ सदाशयी लोग अपने पैसे से पानी के कैन मंगवा कर लोगों को पानी पिला रहे थे. कुछ एक महिलाएं आकर खिचड़ी बांट रही थी. शाम का सात-साढ़े सात बज रहा था. उन्होंने बताया कि आग चार बजे भोर में लगी थी. हमारे यहां पानी दो दिन छोड़कर आता है, इतना पानी नहीं था कि आग बुझा सकें. कोई कहने लगा कि हमने नगर निगम को बहुत बार फोन किया. किसी ने कहा कि बहुत लोगों ने फायर डिपार्टमेंट में फोन किया लेकिन कोई सुनने को तैयार नहीं था.
एक स्थानीय व्यक्ति ने कहा कि उन्होंने लगातार पार्षद को फोन किया कि पानी के टैंकर भेज दीजिए लेकिन उन्होंने फोन काट दिया. आग ने बच्चों के स्कूल की किताब-कॉपी, रिजल्ट, लोगों के राशन-कार्ड, आधार-कार्ड से लेकर मेहनत से कमाये रूपये नहीं छोड़े. सालों से दिल्ली में रहने के बाद इकठ्ठा बर्तन, बिस्तर, इलेक्ट्रानिक सामान, सब काले रंग की गाढ़ी-चिपचिपी राख में तब्दील हो चुका था. खाना बनाने का पूरा सिस्टम ध्वस्त हो चुका था. राशन काली राख में बदल चुका था. कुछ नये यूट्यूबर अपने फोन का कैमरा ऑन करके बता रहे थे कि आग कितनी भयानक थी और कितना नुकसान हुआ है. मेनस्ट्रीम मीडिया का कोई व्यक्ति नहीं था.
उसी में कोई परिवार यूट्यूबर को बता रहा था कि यहां ज्यादातर यूपी और बिहार के लोग थे. हिंदू-मुसलमान सभी रहते थे. अस्सी प्रतिशत घर हिंदुओं के थे. साउथ इंडिया के भी लोग थे. कुछ परिवार ऐसे थे जिनका काम खुद पर चाबुक बरसा कर रोटी कमाना था. ज़्यादातर महिलाएं घरों में चौका-बर्तन करती थीं. कुछ महिलाएं कपड़ा लेकर बर्तन बदलने का भी काम करती हैं. आदमी मज़दूरी करते हैं. कुछ एक कबाड़ का काम करते थे. उनके बच्चे स्थानीय सरकारी स्कूल में पढ़ते थे. उसी में किसी ने बताया कि साहब हमने तो पहले ही कहा था कि हम जगह खाली कर देंगे लेकिन आग लगाने से तो हमारा सबकुछ चला गया.
जितनी देर वहां खड़ी रही कोई नेता राहत की फौरी बातें भी लेकर नहीं आया. जबकि सभी बड़े नेता बामुश्किल दो से छह किलोमीटर की दूरी पर निवास करते हैं. आग में जिनका सबकुछ जल गया वे चिल्ला नहीं रहे थे. वे चुप थे. जैसे कार्बन उनके चेहरे पर जम गया हो. जैसे उन्हें पता हो कि उनके अधिकार तो पहले ही जले कागज़ की कॉपी हैं. अगर वो उनको हाथ लगायेंगे तो हाथ में सिर्फ राख आएगी. जो दिख रहा है वो गायब हो जाएगा.
अगले दिन कॉलोनी के वॉट्सऐप ग्रुप पर उसी आग के साथ कमेंट्री करता हुआ एक वीडियो मिला. ‘निजात मिली गंद से’, ‘निजात मिली मच्छी मार्केट से’.
झुग्गियों का ये पूरा समूह गांव के एक पुराने तालाब के पास बना हुआ था. लोगों ने बताया कि पहले तो यहां कोई आता नहीं था. जब हमलोगों ने रहना शुरू किया, तब ये बहुत ही ऊंची-नीची ज़मीन थी. चोरी और लूट-पाट आम घटना थी. अपराध करने के बाद लोग लाश यहां डाल देते थे. हमने धीरे-धीरे इस जगह को रिहाइश के लायक बनाया. अब इस जगह के मालिक निकल आए हैं और वे चाहते थे कि ये जगह हम खाली कर दें.
फिर एक दिन सुबह चार बजे कुछ लड़के आए उन्होंने पेट्रोल डालकर कबाड़ वाले हिस्से पर आग लगा दी. कुछ ने उन्हें देखा, इसी से शोर मचा और हम लोग जाग गये लेकिन एक तो आग इतनी तेज़ थी और दूसरा यह कि हमारे घर पन्नी के हैं तो कुछ भी नहीं बचा. कोई कितना बचा सकता था. प्रायः टीन-प्लास्टिक और कुछ-एक लकड़ी के फट्टे से बने घर को घर कहना ही नहीं चाहिए क्योंकि हाउस का मतलब शायद घर होता है. ये हाउस तो थे नहीं. जिन लोगों के घर जले थे, वे बहुत कम बोल रहे थे. वे किसी से भी पानी की शिकायत नहीं कर रहे थे. वे भी नहीं कह रहे थे कि आखिर उनका घर जलाने का हक़ किसी को कैसे मिला. इसकी जांच हो, वे यह भी नहीं कह रहे थे.
ये लोग ऐसे बर्ताव कर रहे थे जैसे कि इस राख से उन्हें फिर से कहीं और झुग्गी बनानी है. वहां कुछ सिसकियां थी. एक गहरा गाढा काला रंग पसरा था उसमें कौन से और रंग है उसका पता नहीं लग रहा था. अगले दिन के अखबार में ऐसी कोई खबर नहीं थी. एक छोटी-सी सूचना किसी इलाके में एसी फटने से लगी आग के बारे में थी. एक करोड़ सत्तहत्तर लाख जिनके सिर पर छत नहीं उन्हीं में से किसी एक झुग्गी के जलने की इस घटना में सचमुच ऐसा कुछ नहीं था जिस पर कुछ सनसनीखेज कहा जा सकता था.
मैक्सिकन लेखक वुआन रूल्फो अपनी कहानी लुवीना में एक ऐसे इलाके का दृश्य खींचते हैं, जहां चारों ओर उदासी पसरी है. धूल, बेबसी और नाउम्मीदी और एक तरह से जम चुकी संवेदनाएं ही वहां की पहचान बन गयी हैं. आदमी जो अपने बच्चों के साथ वहां आया है, उसे कुछ भी हासिल नहीं है. सूरज भी बुझा है. ज़मीन एक लुटी हुई ठठरी में बदल चुकी है. यहां लोग ज़िंदा हैं लेकिन जिंदगी को हार चुके हैं.
मेरी समझ से ऐसा तब होता है जब देश के भीतर दो देश का निर्माण हो चुका हो. इस प्रक्रिया में कुछ ऐसा घट रहा हो जिसमें एक बड़ी आबादी को महसूस ही न हो कि वह किसी इकाई से नाभिनालबद्ध है. उसके राष्ट्र को जो पोषण मिल रहा है, उसका कुछ अंश उसके शरीर में भी जाएगा. 1936 में प्रकाशित मुल्कराज आनंद के उपन्यास कुली के चौदह वर्ष के नायक मुन्नु को आज़ादी के दिन शिमले में रिक्शा खींचते हुए देखने पर अजीब-सी कसक होती है. यह कसक बढ़ती ही जाती है. एक घाव के ठीक होने के बजाय उसके बढ़ते जाने की टीस की तरह.
बहस-मुबाहसा,गुस्सा-क्षोभ,मांग-अधिकार, दबाव और बदलाव सबकुछ कहने का अधिकार ही आज़ादी है. लेकिन अपने-अपने दुखों के बोझ से दबे लोगों के भीतर एक भय ऐसा धंस जाता है और वे एक ऐसी धारणा के शिकार हो जाते हैं कि नाली-पानी,रोजी-रोटी,शिक्षा-स्वास्थ्य पर बात करने को वे देश-द्रोह समझ बैठते हैं. वे भी जिनके होम और हाउस एक हैं.
इन्हीं सवालों की उमड़-घुमड़ के बीच पंद्रह अगस्त नजदीक आता जाता है. एक ऐसा दिन जो हिंदुस्तान की जनता को बहुत मुश्किल से हासिल हुआ है. वह दिन जिसके साथ आज़ाद नागरिक होने की गरिमा जुड़ी है. कहते हैं किसी चीज़ को जोगना यानी बनाने से ज्यादा बनाये रखने में अधिक सजग रहना पड़ता है. आज़ादी को पाने के लिए जिस त्याग और संघर्ष की जरूरत पड़ी, उससे कहीं ज़्यादा उसे बनाये रखने में श्रम की ज़रूरत है.
पंद्रह अगस्त उन्नीस सौ सैंतालीस, सिर्फ एक तारीख़ नहीं है. तमाम मज़लूमों, दलितों-दमितों, गरीबों और इस देश के निवासियों की उम्मीदों का दिन है. आजादी का दिन कोई जादू का दिन नहीं था कि सदियों से जमा ग़ैर-बराबरी का ढांचा टूट जाता. उसके हर अंधेरे को अंधेरा कहने से ही वह मुकम्मल हो सकती थी.
नाइजीरिया के प्रख्यात नाटककार वॉल सोइन्का, 1960 में आजादी के उत्सव के दिन अपना नाटक ‘अ डांस इन द फारेस्ट’ प्रस्तुत करते हैं. ये नाटक इसलिए खास है कि आजादी के दिन मंचित हो रहे नाटक में अतीत के गौरवगान के बजाय अतीत में लोगों पर हुए अन्याय, उपनिवेशवाद से लड़ाई और आज़ादी के बाद लोगों की वास्तविक स्थिति को प्रस्तुत किया गया. यह कटाक्ष गीत-संगीत और नृत्य से गुथा हुआ नाटक, आज़ादी का वास्तविक मूल्यांकन कर रहा था. अपने देश की आज़ादी का सांगोपांग मूल्यांकन करके उसे बेहतर बनाना ही स्वतंत्रता है. आग को जलावतन करने से देश नहीं बनता है.
कहते हैं कि जब कोई धारणा आम लोगों में स्वीकृति पा जाती है तब किसी भी ताकत के लिए सत्ता संचालन करना बहुत आसान हो जाता है. अगर ऐसा नहीं होता तो गुलामों को चेन में बांधकर उनके दांत-जबड़े गिनकर बाज़ार में खरीदना-बेचना आसान नहीं होता, दलितों को छुतहर बनाकर उन्हें छाता-जूता, स्वच्छ पानी और भोजन से वंचित नहीं किया जा सका होता और न ही स्त्रीद्वेष एक आम बात होती.
यह धारणा ही है कि हमारे या आपके बोलने से क्या हो जाएगा. यह कहते समय तमाम लोगों के खड़े होने से हुए बदलावों की फेहरिस्त स्मृतिलोप का शिकार हो जाती है. अवार भाषा के जनकवि रसूल हमजातोव अपनी किताब ‘मेरा दागिस्तान’ में लिखते हैं-
मैं अक्सर अम्मा से पूछा करता था-
दागिस्तान कहां है?
तुम्हारे पालने में मेरी समझदार अम्मा जवाब देती
तुम्हारा दागिस्तान कहां है? आंदी गांव के एक व्यक्ति से किसी ने पूछा.
उसने चकराते हुए अपने इर्द-गिर्द देखा.
यह टीला दागिस्तान है. यह घास दागिस्तान है. यह नदी दागिस्तान है. पर्वत पर पड़ी बर्फ ही दागिस्तान है. सिर के उपर बादल,क्या यह दागिस्तान नहीं है तब सिर के ऊपर सूरज भी क्या दागिस्तान नहीं है
मेरा दागिस्तान हर जगह है. आंदी गांव के वासी ने उत्तर दिया.
यदि हम दागिस्तान को किसी देश की परिभाषा के रूप में पढ़ें तो बिल्कुल वही उत्तर होगा जो कवि का है. अपने देश की परवाह करने के बजाय उपेक्षा करना ही बुराई को ताकतवर बनाना है. आज़ादी के दिन हम फिर से याद करते हैं. फिर से याद करना इस देश के पहाड़ों, जंगलों, नदियों, खेतों-खलिहानों, कारखानों और मनुष्यों की स्थिति याद करना है.
इस याद करने की प्रक्रिया में एक बड़ा हिस्सा उनका अपने-आप ही निकल आता है जिनके पास अधिकारों का जला पन्ना पड़ा है. अगर वो ऊंगली भी लगायें तो हाथ में राख लिपट जाती है. इन्ही अर्थों में अवधी के प्रसिद्ध शायर जुमई खां ‘आजाद’ की नज़्म, पंद्रह अगस्त को प्रश्नांकित नहीं करती बल्कि वास्तव में आज़ाद हिंदुस्तान में और उजियारा भरना चाहती है.
आजादी शरमाया घर मां जहां मील करखनवा.
बरबादी दुखिया के घर मां जहां मिलै न दनवा॥
रोवै कारीगर मजूरवा, अंसारी, जोरिया.
भला आई कब अजदिया गाँव की ओरिया..
(सविता पाठक जानी-मानी साहित्यकार हैं.)
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