नई दिल्ली: इलाहाबाद हाईकोर्ट के जस्टिस अतुल श्रीधरन ने सोमवार (20 जुलाई) को उत्तर प्रदेश सरकार द्वारा बुलडोज़र से की जा रही तोड़-फोड़ की कार्रवाई की कड़ी आलोचना की है.
लाइव लॉ की रिपोर्ट के मुताबिक, उन्होंने कहा कि राज्य उन लोगों के घर ढहा रहा है जिन पर किसी अपराध का आरोप है, ताकि ‘बुलडोज़र जस्टिस’ के आदी हो चुके समाज की खून की प्यास बुझाई जा सके.
जस्टिस श्रीधरन ने 51 पन्नों की अपनी राय में कहा, ‘राज्य को यकीन है कि समाज सामूहिक ‘शैडेनफ्रूड’ (दूसरों की बदकिस्मती से खुशी पाने की भावना) से ग्रस्त है और कानून की तय प्रक्रिया का पालन किए बिना खुद ही सज़ा देने (विजिलांट स्टाइल) के राज्य के कदम की तारीफ़ करेगा, और दूसरे व्यक्ति के नुकसान या बदकिस्मती से खुशी महसूस करेगा.’
उल्लेखनीय है कि यह राय एक डिवीज़न बेंच के बंटे हुए फ़ैसले का हिस्सा थी, जिसमें जस्टिस सिद्धार्थ नंदन भी शामिल थे.
ये टिप्पणियां जस्टिस श्रीधरन ने एक रिट याचिका से जुड़े मामले में अपनी राय में कहीं. इस मामले में हमीरपुर के एक परिवार की संपत्तियों को अधिकारियों ने तब निशाना बनाया था, जब परिवार के एक सदस्य पर बीएनएस, आईटी एक्ट, पॉक्सो एक्ट और यूपी गैर-कानूनी धर्म परिवर्तन निषेध कानून के तहत मामला दर्ज किया गया था.
जस्टिस श्रीधरन ने आरोपी के घर को तुरंत ढहाने की कार्रवाई को ‘कार्यपालिका के विवेक का प्रतिशोधात्मक इस्तेमाल’ बताया और इसे ‘कार्यपालिका के विवेक के छद्म इस्तेमाल’ की श्रेणी में सबसे ‘घिनौना’ रूप करार दिया.
जस्टिस श्रीधरन ने आश्रय की मानवीय आवश्यकता पर प्रकाश डालते हुए अपने आदेश की शुरुआत उर्दू शायर बशीर बद्र के एक शेर से करते हुए कहा, ‘लोग टूट जाते हैं एक घर बनाने में, तुम तरस नहीं खाते बस्तियां मिटाने में.’
जस्टिस श्रीधरन ने इस बात पर ज़ोर दिया कि सुप्रीम कोर्ट के फ़ैसलों के बावजूद बिना किसी डर के तोड़-फोड़ की कार्रवाई जारी है, ‘मानो ये फ़ैसले मौजूद ही न हों’, या फिर राज्य को पूरा भरोसा है कि देश की सबसे बड़ी अदालत द्वारा बनाए गए कानून की अनदेखी करने पर ‘उन्हें किसी बुरे नतीजे का सामना नहीं करना पड़ेगा’.
लाइव लॉ के अनुसार, उन्होंने आगे कहा कि घर सिर्फ़ एक संपत्ति नहीं होता, बल्कि परिवार की उम्मीदों, सम्मान और सुरक्षा का प्रतीक होता है, और इसे अचानक छीन लेने से वे ‘निराशा की गहरी खाई’ में धकेल दिए जाते हैं.
जस्टिस श्रीधरन ने यह भी कहा कि अदालतों को इसे होने से रोकना चाहिए और प्रभावित लोगों को मुआवज़ा देने का आदेश दिया जा सकता है.
‘राम मंदिर में चोरी बर्दाश्त की हद पार करने वाली घटना है’
उन्होंने अयोध्या के राम मंदिर से फंड के कथित गबन को लेकर चल रहे विवाद का भी ज़िक्र किया और कहा कि भ्रष्टाचार अब आम बात हो गई है.
जस्टिस श्रीधरन ने कहा, ‘राम मंदिर में चढ़ावा चोरी से जुड़ा हालिया विवाद ‘बर्दाश्त की हद पार करने वाली’ घटना है. जो लोग राम मंदिर में हुई चोरी से ज़रा भी विचलित नहीं होते, उन्हें किसी भी चीज़ से शर्मिंदा नहीं किया जा सकता; यह चोरी भारतीयों की ईमानदारी के सबसे निचले स्तर को दिखाती है.’
वर्तमान मामले में जस्टिस श्रीधरन और जस्टिस नंदन दोनों ने सर्वसम्मति से यह माना कि किसी आरोपी को दंडित करने के लिए उसके घर को ध्वस्त करना सत्ता का अवैध और प्रतिशोधात्मक दुरुपयोग है.
दोनों न्यायाधीशों ने इस बात पर विभाजित फैसला सुनाया कि क्या राज्य को एफआईआर दर्ज होने की तारीख से दो साल की अवधि तक किसी आरोपी के घर को ध्वस्त करने की कार्रवाई करने से रोका जा सकता है.
