नई दिल्ली: पिछले सप्ताह प्रदर्शनकारियों के खिलाफ किए गए बल प्रयोग को लेकर केंद्र सरकार की ओर से पहली आधिकारिक प्रतिक्रिया देते हुए केंद्रीय राज्य मंत्री जितेंद्र सिंह ने बुधवार (29 जुलाई) को लोकसभा में कहा कि 20 जुलाई के प्रदर्शनों के दौरान पुलिस ने ‘अधिकतम संयम’ बरता था, प्रदर्शनकारियों पर कोई गोली नहीं चलाई गई थी, इसलिए इस तरह के किसी आदेश का सवाल ही नहीं उठता.
प्रधानमंत्री कार्यालय में राज्य मंत्री का यह बयान उस समय आया, जब उससे कुछ ही देर पहले लोकसभा में पेपर लीक विरोधी विधेयक पर चर्चा के दौरान विपक्ष के नेता राहुल गांधी ने केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह पर छात्रों पर गोली चलाने का आदेश देने का आरोप लगाया था.
जितेंद्र सिंह ने कहा, ‘सबसे पहले, जब वह (राहुल गांधी) कहते हैं कि गृह मंत्री ने गोली चलाने का आदेश दिया और फिर उसका कोई प्रमाण नहीं दे पाते, तो बुनियादी तथ्य यह है कि गोली चलाने का आदेश कोई मंत्री नहीं देता. यह आदेश मजिस्ट्रेट, एसडीएम (उप मंडल दंडाधिकारी) या डीएम (जिलाधिकारी) देते हैं. हम सभी विधायक और सांसद रहे हैं और हमारे अनुभव के आधार पर यह दिखाता है कि उन्हें सार्वजनिक जीवन का अनुभव नहीं है.’
उन्होंने आगे कहा, ‘दूसरी बात, यह बार-बार स्पष्ट किया जा चुका है कि कोई गोलीबारी नहीं हुई थी, केवल आंसू गैस का इस्तेमाल किया गया था. जब गोली चली ही नहीं, तो आदेश देने का सवाल ही नहीं उठता. और ऐसा आदेश देने का अधिकार मंत्री के पास नहीं, बल्कि मजिस्ट्रेट के पास होता है.’
जितेंद्र सिंह ने आगे कहा, ‘सदन में बिना तथ्यों के बोलना विपक्ष के नेता को शोभा नहीं देता. 21 जुलाई को वह प्रधानमंत्री आवास के बाहर जाकर धरने पर बैठ गए, क्योंकि इतने वर्षों बाद भी प्रधानमंत्री नहीं बन पाने से वे निराश हैं.’ वह पिछले सप्ताह प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के आधिकारिक आवास के बाहर राहुल गांधी द्वारा छात्रों पर पुलिस कार्रवाई के विरोध में माफी की मांग को लेकर किए गए प्रदर्शन का जिक्र कर रहे थे.
इसके बाद सिंह ने कहा कि कांग्रेस के लोकसभा में उपनेता गौरव गोगोई ने मंगलवार (28 जुलाई) को अपने बयान में कहा था कि निर्दोष युवाओं पर हमला किया गया, जबकि वास्तविकता यह है कि ‘अधिकतम संयम बरता गया.’
उन्होंने कहा, ‘शायद उन्हें नहीं पता कि अधिकतम संयम बरता गया था. यह सुनिश्चित किया गया कि कोई जनहानि न हो. 1979 से 1984 के बीच असम में ऑल असम स्टूडेंट्स यूनियन (आसू) ने आंदोलन किया था और रिकॉर्ड बताते हैं कि उस दौरान कांग्रेस सरकारों के समय 860 निर्दोष लोग मारे गए, जिनमें अधिकांश छात्र थे. शायद उन्होंने सोचा होगा कि जैसे उन्होंने निर्दोष छात्रों पर हमला किया था, वैसे ही हमने भी किया होगा.’
लोकसभा में सार्वजनिक परीक्षा (अनुचित साधनों की रोकथाम) संशोधन विधेयक, 2026 पर हुई चर्चा के दौरान जितेंद्र सिंह ने ये बातें कहीं. सिंह का यह बयान ऐसे समय आया है, जब प्रदर्शनकारियों को गनशॉट लगने की कम से कम पांच घटनाएं सामने आ चुकी हैं.
बुधवार शाम आयोजित एक प्रेस कॉन्फ्रेंस में राहुल गांधी ने जितेंद्र सिंह के बयान पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि वह प्रेस के सामने एक ऐसे व्यक्ति को लेकर आए थे, जो पैलेट गन का शिकार हुआ था.
राहुल गांधी ने कहा, ‘पैलेट गन एक घातक हथियार है. नज़दीक से चलाई जाए तो यह किसी व्यक्ति की जान ले सकती है या उसे अंधा कर सकती है. मैंने प्रेस के सामने आपको पैलेट गन से घायल एक व्यक्ति को दिखाया. उसके शरीर और आंख में चोट के निशान थे. एम्स की रिपोर्ट में लिखा है कि मरीज को पैलेट गन से गोली लगी है. यह किसने किया? यह किसी एक व्यक्ति का काम नहीं है, ऐसे कई मामले हैं. मैंने सबूत दिए हैं, फिर भी वे कह रहे हैं कि हम झूठ बोल रहे हैं. मैंने पीड़ित से बात की है, डॉक्टर से बात की है. और सरकार कह रही है कि हमने पैलेट गन का इस्तेमाल ही नहीं किया. अब आप ही बताइए, आप सबूतों पर भरोसा करेंगे या खोखले दावों पर?’
हालांकि, दिल्ली पुलिस ने पैलेट गन के इस्तेमाल से इनकार किया है, लेकिन द वायर ने अपनी एक विस्तृत रिपोर्ट में शेख इरशाद मंसूर के मामले का खुलासा किया है, जिनके शरीर से लेडी हार्डिंग मेडिकल कॉलेज (एलएचएमसी) में सर्जरी के जरिए पैलेट जैसी धातु की कई वस्तुएं निकाली गई थीं.
द वायर ने यह भी पुष्टि की है कि इरशाद जिस जगह घायल हुए थे, वह कनॉट प्लेस स्थित भूमिगत पालिका बाज़ार के ऊपर का इलाका था. इसके अलावा, द वायर को एक वीडियो भी मिला है, जिसमें उसी स्थान और लगभग उसी समय एक रैपिड एक्शन फोर्स (आरएएफ) का जवान इरशाद के पेट की ओर उस हथियार से फायर करता दिखाई देता है, जो पैलेट गन जैसा प्रतीत होता है.
सोशल मीडिया पर साझा किए जा रहे एक अन्य वीडियो में भी एक दूसरे व्यक्ति को दिखाया गया है, जिसे 20 जुलाई को उसी स्थान पर हुई फायरिंग में पैलेट जैसी चोटें आई थीं.
द हिंदू ने मंगलवार को अपनी रिपोर्ट में बताया कि गुरुग्राम में काम करने वाली 32 वर्षीय एक महिला ने दावा किया है कि 20 जुलाई को सेंट्रल दिल्ली में हुए आंदोलन के दौरान उन्हें गोली लगी थी. अख़बार के अनुसार, राम मनोहर लोहिया (आरएमएल) अस्पताल द्वारा जारी उनकी डिस्चार्ज समरी में लिखा है कि उनके दाहिने कान में गोली लगने से चोट आई थी.
हालांकि, दिल्ली पुलिस ने बुधवार शाम सोशल मीडिया पर चल रहे इन दावों को खारिज करते हुए कहा कि उसके रिकॉर्ड के अनुसार प्रदर्शनकारी को साधारण चोट आई थी और गोली लगने का कोई सबूत नहीं है.
इससे पहले राहुल गांधी ने पिछले सप्ताह एक प्रेस कॉन्फ्रेंस की थी, जिसमें 19 वर्षीय साहिल लोछाब भी मौजूद थे. साहिल की एक आंख में पैलेट गन से चोट लगी थी और उन्होंने पत्रकारों को अपनी चोटें दिखाईं. 21 जुलाई को एम्स जयप्रकाश नारायण एपेक्स ट्रॉमा सेंटर में उनका ऑपरेशन किया गया था. फायरिंग में लगी चोट के कारण उनकी एक आंख की रोशनी जाने की आशंका जताई गई है.
22 जुलाई को आउटलुक पत्रिका ने अपनी एक रिपोर्ट में कहा था कि उसके एक संवाददाता पर ऐसे हथियार से गोली चलाई गई थी, जिसका विवरण पैलेट गन से मेल खाता है. रिपोर्ट के अनुसार, पत्रकार को जो चोटें आईं, वे भी पैलेट लगने से होने वाली चोटों जैसी थीं.
वहीं, द हिंदू ने अपनी रिपोर्ट में दावा किया है कि 20 जुलाई को प्रदर्शनकारियों के खिलाफ पैलेट गन के इस्तेमाल की अनुमति दिल्ली पुलिस ने दी थी. अख़बार के मुताबिक, 22 जुलाई की तड़के संसद मार्ग थाने में रैपिड एक्शन फोर्स (आरएफए) की जनरल डायरी में दर्ज जानकारी के अनुसार, यह अनुमति दिल्ली पुलिस के एक पुलिस उपायुक्त (डीसीपी) स्तर के अधिकारी के निर्देश पर दी गई थी.
