इज़रायल को हथियार आपूर्ति में भारत की ‘महत्वपूर्ण भूमिका’, नौ में तीन सरकारी कंपनियां: एमनेस्टी

एमनेस्टी इंटरनेशनल ने अपनी एक रिपोर्ट में बताया है कि भारत गाज़ा युद्ध के दौरान इज़रायल की सैन्य आपूर्ति श्रृंखला का एक महत्वपूर्ण हिस्सा बन गया है. रिपोर्ट में नौ भारतीय कंपनियों के हथियार और सैन्य पुर्ज़ों के निर्यात का उल्लेख है, जिनमें तीन भारत सरकार के स्वामित्व वाले रक्षा उपक्रम बताए गए हैं.

गाज़ा शहर में इज़रायली सेना के हवाई हमले के बाद उठता धुआं. (तस्वीर: एपी, 28 जुलाई 2026)

नई दिल्ली: 29 जुलाई को एमनेस्टी इंटरनेशनल ने आरोप लगाया कि भारत गाज़ा में कथित युद्ध अपराधों, मानवता के खिलाफ अपराधों और नरसंहार को लेकर दी गई ‘स्पष्ट और सार्वजनिक चेतावनियों’ के बावजूद इज़रायल को हथियार, गोला-बारूद और सैन्य उपकरणों के पुर्ज़ों की आपूर्ति करता रहा है.

संगठन ने कहा कि भारत अब ‘इज़रायल के सैन्य अभियानों को संभव बनाने वाली आपूर्ति श्रृंखला का एक महत्वपूर्ण हिस्सा’ बन गया है.

‘मेड इन इंडिया: द सप्लाई ऑफ वेपन्स एंड एम्युनिशन टू इज़रायल’ शीर्षक से जारी 42 पन्नों की अपनी रिपोर्ट में एमनेस्टी इंटरनेशनल ने कहा कि उसने 7 अक्टूबर 2023 को हमास के हमलों के बाद गाज़ा में इज़रायल के सैन्य अभियान शुरू होने से लेकर 30 नवंबर 2025 तक भारत से इज़रायल भेजी गई 2,596 खेपों (शिपमेंट) की पहचान की है. इन खेपों में छोटे हथियार, गोला-बारूद और सैन्य वाहनों में इस्तेमाल होने वाले पुर्ज़े शामिल थे.

सार्वजनिक रूप से उपलब्ध शिपमेंट-स्तर के व्यापारिक आंकड़ों के आधार पर एमनेस्टी इंटरनेशनल ने कहा कि उसकी जांच में ‘इज़रायली रक्षा क्षेत्र और गाज़ा में फ़िलिस्तीनियों के खिलाफ किए जा रहे कथित नरसंहार के लिए भारत की ओर से दिए जा रहे भौतिक समर्थन की सीमा और व्यापकता’ दर्ज की गई है.

संगठन के जांचकर्ताओं का कहना है कि उन्होंने सावधानीपूर्वक जांच के बाद कम से कम 3,90,516 सैन्य-ग्रेड हथियारों के छोटे पुर्ज़ों, 5,64,970 विस्फोटक आयुध (एक्सप्लोसिव ऑर्डनेंस) के पुर्ज़ों, जिनमें ड्रोन के वारहेड और तोप के गोले (आर्टिलरी शेल) के खोल शामिल हैं, तथा 298 सैन्य वाहनों के पुर्ज़ों के निर्यात की पहचान की है.

एमनेस्टी ने कहा कि इज़रायल को हथियार और सैन्य सामग्री उपलब्ध कराने वाले कुछ देशों को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर लगातार जांच और आलोचना का सामना करना पड़ा है, लेकिन कुछ अन्य देश अब तक बड़े पैमाने पर इस निगरानी से बचे रहे हैं. संगठन का आरोप है कि ‘भारत अब उन आपूर्ति श्रृंखलाओं का एक महत्वपूर्ण हिस्सा बन गया है, जो इज़रायल के सैन्य अभियानों को संभव बना रही हैं. एमनेस्टी इंटरनेशनल, संयुक्त राष्ट्र और स्थानीय गैर-सरकारी संगठनों (एनजीओ) ने इन अभियानों को फ़िलिस्तीनियों के खिलाफ नरसंहार की श्रेणी में माना है.’

संयुक्त राष्ट्र के मानवीय मामलों के समन्वय कार्यालय (ओसीएचए) द्वारा फ़िलिस्तीनी स्वास्थ्य मंत्रालय के आंकड़ों के हवाले से जारी जानकारी के अनुसार, 1 जुलाई तक गाज़ा में 73,000 से अधिक फ़िलिस्तीनी मारे जा चुके थे और 1,73,500 से अधिक लोग घायल हुए थे. इनमें से 1,000 से अधिक मौतें 10 अक्टूबर 2025 को लागू हुए युद्धविराम के बाद हुईं.

निर्यात करने वाली कंपनियां कौन हैं?

एमनेस्टी इंटरनेशनल ने नौ भारतीय कंपनियों की पहचान की है, जिनके बारे में उसका कहना है कि उन्होंने गाज़ा पट्टी में इज़रायली सेना और उसके निर्णय लेने वालों द्वारा कथित युद्ध अपराध, मानवता के खिलाफ अपराध और नरसंहार किए जाने की आशंका को लेकर दी गई स्पष्ट और सार्वजनिक चेतावनियों के बाद भी इज़रायल को हथियार, गोला-बारूद, उनके पुर्ज़े और दोहरे उपयोग (ड्यूल-यूज़) वाली वस्तुओं का निर्यात जारी रखा.

रिपोर्ट के अनुसार, इनमें से तीन कंपनियां रक्षा मंत्रालय के अधीन सार्वजनिक क्षेत्र के रक्षा उपक्रम (डीपीएसयू) हैं, जो भारत सरकार के पूर्ण स्वामित्व और नियंत्रण में संचालित होती हैं.

एमनेस्टी के मुताबिक, म्यूनिशंस इंडिया लिमिटेड (एमआईएल) ने एलबिट सिस्टम्स को 155 मिमी के 1,000 हाई-एक्सप्लोसिव आर्टिलरी गोले निर्यात किए. वहीं एडवांस्ड वेपन्स एंड इक्विपमेंट इंडिया लिमिटेड ने फरवरी 2024 में इसी इज़रायली कंपनी को 81 मिमी के 120 मोर्टार लॉन्चर भेजे.

रिपोर्ट के अनुसार, तीसरी सरकारी कंपनी इंडिया ऑप्टेल लिमिटेड (आईओएल) ने 178 सेमीकंडक्टर उपकरण, जिनमें वैनाडियम ऑक्साइड सेंसर भी शामिल थे, सेमीकंडक्टर डिवाइसेज़ लिमिटेड को निर्यात किए. रिपोर्ट में इस कंपनी को एलबिट सिस्टम्स और राफेल एडवांस्ड डिफेंस सिस्टम्स का संयुक्त उद्यम बताया गया है.

एमनेस्टी का तर्क है कि इन तीनों कंपनियों पर भारत सरकार का स्वामित्व और नियंत्रण होने के कारण इनके द्वारा किया गया निर्यात राज्य (सरकार) की कार्रवाई माना जाना चाहिए. संगठन ने कहा कि सुप्रीम कोर्ट की सात-न्यायाधीशों वाली संविधान पीठ द्वारा तय किए गए मानदंडों के अनुसार, ये तीनों कंपनियां वित्तीय, प्रशासनिक और कार्यात्मक रूप से सरकार के नियंत्रण में हैं.

रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि ये कंपनियां अंतरराष्ट्रीय न्यायालय (आईसीजे) द्वारा निर्धारित ‘पूर्ण निर्भरता’ की कसौटी पर भी खरी उतरती हैं. इस कसौटी के तहत किसी संस्था को अंततः राज्य का एक साधन (इंस्ट्रूमेंट) माना जाता है.

रिपोर्ट में कहा गया है, ‘जब एमआईएल, आईओएल और एडवांस्ड वेपन्स एंड इक्विपमेंट इंडिया लिमिटेड इज़रायल को हथियार भेजती हैं, तो वे सरकारी संस्थाओं के रूप में ऐसा करती हैं. इसका मतलब है कि भारत सरकार ही इज़रायल को हथियार हस्तांतरित कर रही है और एक निर्माता देश के रूप में भारत की अंतरराष्ट्रीय कानूनी जिम्मेदारियां भी इससे जुड़ती हैं.’

द वायर ने इससे पहले मई 2024 में अपनी रिपोर्ट में बताया था कि म्यूनिशंस इंडिया लिमिटेड को उसी वर्ष जनवरी में इज़रायल को हथियार भेजने की मंजूरी मिल गई थी.

एमनेस्टी के अनुसार, निजी भारतीय कंपनियों का सैन्य निर्यात सरकारी कंपनियों की तुलना में कहीं अधिक बड़े पैमाने पर हुआ.

रिपोर्ट के मुताबिक, पीएलआर सिस्टम्स प्राइवेट लिमिटेड, जो अडानी समूह और इज़रायल वेपन इंडस्ट्रीज़ (आईडब्लूआई) का संयुक्त उद्यम है, ने आईडब्लूआई नेगेव मशीन गनों के 10,571 पुर्ज़े और 33,033 बोल्ट कैरियर निर्यात किए.

इसी तरह इंडो-एमआईएम प्राइवेट लिमिटेड ने 59,637 से अधिक ऑटोमैटिक सियर निर्यात किए. ये हथियारों के ऐसे आंतरिक पुर्ज़े होते हैं, जो उन्हें पूरी तरह स्वचालित (फुली ऑटोमैटिक) मोड में फायर करने में सक्षम बनाते हैं.

वहीं भारत फोर्ज की सहयोगी कंपनी कल्याणी स्ट्रैटेजिक सिस्टम्स लिमिटेड ने एलबिट सिस्टम्स की सहायक कंपनी इज़रायल मिलिट्री इंडस्ट्रीज़ को 155 मिमी के 9,600 आर्टिलरी गोलों के बाहरी खोल (बॉडी) निर्यात किए.

रिपोर्ट में अल्फा एलसेक डिफेंस एंड एयरोस्पेस सिस्टम्स प्राइवेट लिमिटेड के निर्यात का भी उल्लेख किया गया है. यह भी एलबिट सिस्टम्स के साथ एक संयुक्त उद्यम है. इस कंपनी ने दिसंबर 2025 में ‘WH 5 KG Armed Assy’ नाम से चिह्नित 122 विस्फोटक वारहेड निर्यात किए.

एमनेस्टी का कहना है कि एलबिट सिस्टम्स के जिन हथियारों में 5 किलोग्राम का वारहेड इस्तेमाल होता है, उनमें केवल स्काईस्ट्राइकर लोइटरिंग म्यूनिशन शामिल है. रिपोर्ट के अनुसार, इस हथियार के अवशेष गाज़ा में कई स्थानों पर मिले हैं, जिनमें अप्रैल 2025 में खान यूनिस भी शामिल है.