सन् 1359 में दिल्ली के तत्कालीन सुल्तान फिरोजशाह तुगलक ने अयोध्या व वाराणसी के बीच एक ‘नया’ शहर बसाया और अपने चचेरे भाई मुहम्मद बिन तुगलक (जिसे ‘जौना खां’ नाम से जाना जाता था) के नाम पर उसका नाम ‘जौनपुर’ रखा तो शायद ही किसी ने उम्मीद की हो कि नया-नया बसा यह शहर अपनी उम्र के पचास साल पूरे करने से पहले ही ऐतिहासिक शर्की सल्तनत की राजधानी बन जाएगा.
लेकिन हुआ कुछ ऐसा ही. फिरोजशाह तुगलक की मृत्यु के बाद उत्तराधिकार के संघर्ष में उसके दरबार में खासा दबदबा रखने वाले मलिक सरवर नामक सरदार ने बड़ी भूमिका निभाकर अपनी राजनीतिक सूझबूझ व वफादारी के बदले सल्तनत का वजीर पद और ‘ख्वाजा-ए-जहां’ की उपाधि प्राप्त कर ली.
अनंतर, 1394 में सुल्तान नासिरुद्दीन महमूद शाह तुगलक ने ‘मलिक-उस-शर्क’ (पूरब के स्वामी) की एक और उपाधि देकर उसको जौनपुर का प्रशासक बनाया, साथ ही कन्नौज से बिहार तक का बड़ा क्षेत्र उसके अधीन कर दिया तो उसकी महत्वाकांक्षा ऐसी जागी कि उसने तुगलक वंश की कमज़ोरियों का फायदा उठाकर उसे अपनी स्वतंत्र सल्तनत बना लिया. यह सल्तनत उसकी ‘शर्क’ वाली उपाधि के कारण शर्की नाम से प्रसिद्ध हुई और उसके वंश के कुल मिलाकर पांच शासक हुए.
संस्कृतियों का संगम
अलबत्ता, इस सल्तनत ने अपना स्वर्णकाल इब्राहीम शाह शर्की व हुसैन शाह शर्की के शासनकालों में देखा, जब उसकी सीमाओं के विस्तार के साथ उसमें शिक्षा व कला को भरपूर बढ़ावा मिला और धर्मों व संस्कृतियों का ऐसा संगम हुआ, जिसने जौनपुर को शिराज-ए-हिंद (हिंदुस्तान का चिराग) बना दिया. इब्राहीम शाह के वक्त मैथिली के महान कवि, संगीतकार और संस्कृत के विद्वान विद्यापति वहां पहुंचे तो पाया कि वहां ‘हिन्दू तुरुक के मिलल बास’ है.
लेकिन 1479 में एक अप्रत्याशित घटनाक्रम में बहलोल लोदी ने हुसैन शाह शर्की को हराकर इस सल्तनत को दिल्ली सल्तनत में मिला लिया (जो तब तक उसके वंश की हो चुकी थी) और 1486 में अपने बड़े बेटे बर्बक शाह को उसका प्रशासक नियुक्त कर दिया तो यह नियुक्ति फर्स्ट को फली नहीं. बहलोल की मौत हुई और उसका दूसरा बेटा सिकंदर लोदी दिल्ली की गद्दी पर बैठा तो बर्बक ने विद्रोह कर दिया, जो विफल रहा. नतीजा यह हुआ कि सिकंदर लोदी ने उसके द्वारा प्रशासित क्षेत्र पर पूर्ण नियंत्रण स्थापित कर उसे दिल्ली सल्तनत का हिस्सा बना लिया.
यह स्थिति 1559 में मुगल बादशाह अकबर द्वारा उसे मुगल सल्तनत में मिलाए जाने तक बरक़रार रही. कोई डेढ़ सौ साल अपनी सल्तनत में बनाए रखने के बाद मुगलों ने 1722 में इस क्षेत्र को, जिसको अब महज जौनपुर नाम से ही पहचाना जाता था, अवध के नवाब को सौंप दिया तो कहते हैं कि दो गंगाजमुनी तहजीबों का मिलन हुआ.
इस मिलन में अवध के लिए यह देखना बहुत सुखद था कि जिस गंगा-जमुनी तहजीब का वह अलंबरदार है, जौनपुर सर्वथा निर्दंभ भाव से उसकी उससे ज्यादा सेवा व विकास कर रहा है. दूसरे शब्दों में कहें, तो उसने हिंदू-मुस्लिम सद्भाव के साथ ज्ञान व कलाओं के संरक्षण तक में जी-जान लगाकर उनमें ऐसी सुगंध भर दी है, जो सदियों तक जाने वाली नहीं है.
हिंदी में जनपदीय इतिहास लिखने, उसको राष्ट्रीय इतिहास से जोड़ने व सांस्कृतिक व साहित्यिक आयामों से उसका मेल कराने की परंपरा समृद्ध हो पाई होती तो आप हमारे यह सब बताए बगैर ही इस सुगंध से परिचित होते. लेकिन विडंबना यह कि इस परंपरा की बदहाली के मद्देनजर अपने इस संसार में रहते ही जौनपुर शहर के पर्याय बन गए बहुआयामी व्यक्तित्व के धनी कवि, गद्यकार, चित्रकार और मूर्तिकार स्मृतिशेष अजय कुमार ने ‘राग जौनपुरी‘ नाम से जौनपुर के इतिहास, संस्कृति और साहित्य पर केन्द्रित एक पुस्तक लिखी तो वह उनके जीवनकाल में प्रकाशित ही नहीं हो सकी.
अब नवारुण पब्लिकेशन ने उसे प्रकाशित कर एक बड़ी रिक्ति भर दी है तो उससे गुजरना जौनपुर के राग से ही नहीं, विराग और वास्तु (क्योंकि शर्की सल्तनत को उसके वक्त की इमारतों के वास्तु शिल्प के लिए भी जाना जाता है) तक से गुजरने और इतिहास व संस्कृति की सुगंध से सराबोर होने का पर्याय लगता है.
इस कारण और कि इसमें बोलचाल की भाषा व बतकही वाली शैली का ऐसा दिलचस्प इस्तेमाल हुआ है, जो कहीं से भी उसको बोझिल नहीं बनाता. न ही यह अहसास होने देता है कि लेखक अपनी धारणाओं को पाठकों पर बरबस प्रक्षेपित करने के फेर में है.
बनारस का मोहल्ला!
मिसाल के तौर पर इसमें छपे 1975-76 के उनके एक लेख का यह छोटा-सा अंश देखिए:
ठाकुर प्रसाद सिंह ने कभी लिखा था कि ‘नगर के रूप में कलकत्ता ही जन्मा है, बाकी तमाम कस्बे से विकसित होकर नगर बने हैं.’ जौनपुर के बारे में यही बात दोहरानी हो तो मैं इसे इस तरह कहने की इजाजत चाहूंगा कि ‘कुछ कस्बे से नगर के रूप में विकसित होकर भी कस्बे ही रह गए, जैसे हमारा जौनपुर.’ पर दिक्कत तो यह है कि खुद ठाकुर प्रसाद सिंह इसे एक कस्बा भी नहीं मानते, एक मोहल्ला ही तस्लीम करते हैं – ‘उनके’ बनारस का एक मोहल्ला भर.
इसी लेख में अजय कुमार ने आगे लिखा है कि एक समय ठाकुर प्रसाद सिंह के इस कथन से उनके जौनपुरीपन को हल्की-सी ठेस लगी थी, लेकिन फिर सोचा कि बहस बढ़ाकर हासिल क्या होना है? लाख बनारस सा पुराना इतिहास क्यों न हो, उससे विशाल साम्राज्य की राजधानी क्यों न रहा हो, जौनपुर है तो कमबख्त बनारस का एक मोहल्ला ही. पटवारी के कागजात में कुछ भी लिखा हो, मौके पर कब्जा तो बनारस का ही है. (बाद में उनकी यह धारणा बदली तो ‘थोड़ी हाशिया आराई’ में उन्होंने लिखा कि अब पटवारी के कागज के साथ मौके पर भी जौनपुर का कब्जा हो चुका है.)
बहरहाल, जौनपुर के बारे में बताने का उनका अंदाज इतना खिलंदड़ है कि कुछ न पूछिए:
जौनपुर सिर्फ एक सड़क पर चलता है जो स्टेशन से शुरू होकर शहर से गुजरती हुई सीधे बनारस निकल जाती है, कहीं रुकती नहीं. जैसे बनारस में कहीं से किधर को क्यों न जाइये, एक गली सामने पड़ जायेगी, वैसे ही जौनपुर में भी कहीं से कहीं को जाइये, यह सड़क आपको ठेंगा जरूर दिखायेगी. … लगता है अकबर बादशाह को कुछ इल्म नजूम भी था जो उसने सारा शहर छोड़कर अपना मशहूर पुल और पक्की सराय इसी सड़क पर बनवाई. जब इस पुल को बनाने वालों को जमीन में दबी शेर हाथी की एक विशालकाय मूर्ति मिली, तो उसे भी उन्होंने इसी सड़क पर बैठा दिया.
अब शर्की बादशाहों और अंग्रेज बहादुर को क्या कहा जाये जिन्होंने अपनी मस्जिदें, जेल-कचेहरी इधर-उधर छिटका दीं, वरना जौनपुर देखने आने वालों को यहां रुकने की जहमत नहीं करनी पड़ती. एक तरफ से घुसते और दूसरी तरफ से निकल जाते. वैसे यहां आता ही कौन है? गुजरे जमाने में आते थे, मुसीबतजदा भी और मुसीबतशुदा भी. एक जिन पर कहीं से हमला होता था या जो कहीं से आकर यहां हमला करते थे.
‘गलतियों’ से बना ‘सही इतिहास’!
जौनपुर की तारीफ करते हुए भी उनका अंदाज-ए-बयां थोड़े ब्याज और ब्याज स्तुति के साथ वैसा ही है: बापू जब बापू नहीं बने थे, तब भी दक्षिण अफ्रीका में एक जौनपुरी उनके साथ था. (स्व. रामसुंदर पाठक उर्फ जटाशंकर पाठक. इटवा गांव के प्रसिद्ध संग्रामी स्व. शिव वर्ण शर्मा के बड़े भाई. वे कुली के रूप में दक्षिण अफ्रीका गए थे और महात्मा ने वहां नस्लभेदी सरकारों के खिलाफ आंदोलन छेड़ा, तो उनके अनन्य सहयोगियों में से एक और पहले सत्याग्रही बने.) और जब वे भारत आए ये तो सारा जौनपुर उनके साथ हो लिया.
जौनपुर को दो बार राष्ट्रपिता के स्वागत का सौभाग्य प्राप्त हुआ. एक विशिष्ट संयोग इसमें जुड़ा है- वे अपनी एक सालगिरह (02 अक्टूबर, 1929) पर यहां थे. इससे पहले फरवरी, 1921 में जौनपुर में कांग्रेस के संस्थापक स्वर्गीय रामेश्वर प्रसाद सिंह के अनुरोध पर काशी से लखनऊ जाते समय भी. उन्होंने पुस्तक में जवाहरलाल नेहरू की जौनपुर की यात्राओं पर रामेश्वर प्रसाद सिंह की लिखी एक टिप्पणी भी दी है.
‘राग जौनपुरी’ की उनके द्वारा बताई गई तफसील भी कुछ कम दिलचस्प नहीं है, जो उनके अनुसार आज भी तलवार के धनी पर किस्मत के गरीब विद्याप्रेमी, चित्रकार व महान संगीतज्ञ हुसैन शाह की कीर्ति का गान कर रहा है, जिन्होंने दर्जन भर राग-रागिनियां बनाईं और गंधर्व की उपाधि पाई. बड़े बड़े उस्तादों की प्रातः वंदना की शोभा है यह राग.
उनके ही शब्दों में:
पोर्ट ब्लेयर के संगीत शिक्षक भट्टाचार्य मोशाय ने एक कथा सुनाई थी – एक जौनपुरी गांधार में गलत सुर लगा गए. जानकारों ने टोका यह कौन सा राग है? उस्ताद समझ तो गए अपनी ग़लती, पर जवाब फ़र्रूख़ाबादी दिया, मैं जौनपुरी हूं और यह राग जौनपुरी है. बात सही है या ग़लत, मुझे तो बस सुनकर मजा आ गया. क्या जादू है इस शहर का – गलती भी न सिर्फ सही हो जाती, बल्कि जम जाती है और सही की ऐसी-तैसी कर देती है…. ऐसी ही असंख्य गलतियों से बना है जौनपुर शहर. इसका इतिहास गलतियों का इतिहास है. किसने सही कहा होगा, जब नूर मोहम्मद ने कहा था – एक बिरिछ लागी दुइ डारा. एकहि ते नाना परकारा.. मातु के रक्त पिता के बिंदू. उपजे दोऊ तुर्क और हिंदू.. पर इसे गलत कहने वाले नहीं जानते थे कि एक दिन इस अकेले कंठ की पुकार समूचे राष्ट्र की आवाज बन जायेगी. गलतियों की एक लम्बी परंपरा एक सही इतिहास को जन्म देगी.
कैसे कैसे जौनपुरी
क्या आश्चर्य कि पुस्तक की एक टिप्पणी का शीर्षक ‘ऐसे-ऐसे जौनपुरी’ है तो एक अन्य का ‘कैसे-कैसे जौनपुरी’. एक अध्याय ‘ऐसे जौनपुरी थे वामिक साहब’ भी है, जिसकी बाबत जानना जरूरी है कि अजय कुमार की कोशिशें न होतीं तो ‘भूखा बंगाल’ जैसे कालजयी गीत की सर्जना के बावजूद हिंदी की दुनिया वामिक से अपरिचित ही रह जाती.
बहरहाल, अजय कुमार लिखते हैं: कम शहर होंगे, जहां हिंदू मुसलमानों की जौनपुर जैसी मिली जुली बस्ती हो, कोई मुहल्ला ऐसा नहीं, जहां दोनों न बसे हों और वह भी अलग-अलग नहीं. कम शहर होंगे, जहां साम्प्रदायिक दंगा न हुआ हो. लेकिन यहां नहीं हुआ. न आजादी के पहले, न बाद. किसने-किसने और कितनी ही कोशिश की, पर साम्प्रदायिकता नहीं भड़की यहां. न भड़केगी. कारण वही, ‘मिलल बास.’ एक दूसरे से सटकर खड़े हिन्दुओं और मुसलमानों के मकान. ऐसे सटकर बसे लोग कितना भी भड़क जायें, एक दूसरे का घर नहीं फूंक सकते.
हालांकि अजय कुमार एक जगह यह पूछकर इस स्थिति का अंदेशों से भरा ‘नया’ पहलू भी चाहे-अनचाहे दिखा ही देते हैं कि क्या बड़े पैमाने पर कत्लोगारत देखे बगैर हम ‘जौनपुर में दंगा नहीं हुआ’ यह प्रलाप बंद नहीं करेंगे? हां, जौनपुर के अभी तक दंगों से बचे रहने का कारण यह है कि दंगा अफवाहों से शुरू होता है, उन्हीं पर पनपता है. लेकिन यहां अफवाहें जड़ जमाएं तो कैसे? किसी न किसी मोड़ पर सिपाह और पुरानी बाजार (मुहल्ले) टकरा (मिल) जाते हैं.
अंत में यह कहें बिना बात अधूरी रह जाएगी कि ‘राग जौनपुरी’ में जौनपुर के राग का ही जिक्र नहीं है, रंगमंच का भी है, खत्म हो चुके तेल व इत्र उद्योग का भी (इस शिकायत के साथ कि इन्हें छोड़ दें तो जौनपुर जीरो इंडस्ट्रियल एरिया बना हुआ है.), मदरसों का भी और मैकाले का भी, आजादी की लड़ाई में किसानों के संग्राम का भी, ‘चितरसारी’ के सरगम का भी, स्वातंत्र्य समय के बड़े-बड़े लड़वैयों का भी, ‘नन्हें-नन्हें वियतनामों’ का भी, विद्वानों, अदीबों व संगीतज्ञों का भी और उन कई का भी इब्ने मरियम हुआ करे थे जो.
राहुल सांकृत्यायन के हवाले से उन्होंने यह दर्ज करने से भी गुरेज नहीं किया है कि समाजवाद और साम्यवाद का संदेश देने में भी जौनपुर पहला रहा है. चार्वाक भले पहले भौतिकवादी रहे हो, पहला साम्यवादी तो महदी जौनपुरी ही था, जिसने लोदी और सूत्रकाल यानी पंद्रहवीं और सोलहवीं सदी में उस समय की शहंशाहियत और सामंतवादी के खिलाफ एक तरह के साम्यवाद का प्रचार किया और इस कुसूर में अनुयायियों के साथ निर्दयता से कत्ल कर दिया गया.
(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं.)
