नई दिल्ली: विभिन्न ट्रिब्यूनलों के अध्यक्षों और सदस्यों के चयन के लिए राष्ट्रीय ट्रिब्यूनल आयोग गठित करने वाला विधेयक लोकसभा में बिना चर्चा के महज 12 मिनट में पारित होने के एक दिन बाद मंगलवार (11 अगस्त) को राज्यसभा से भी करीब एक घंटे में पारित हो गया.
केंद्रीय कानून मंत्री अर्जुन राम मेघवाल ने राज्यसभा में ट्रिब्यूनल सुधार विधेयक, 2026 पेश किया. इस दौरान विधेयक पर सीमित चर्चा हुई और विपक्षी दलों ने सदन से वॉकआउट किया.
उल्लेखनीय है कि इस विधेयक को सोमवार को लोकसभा में विपक्ष के विरोध और नारेबाजी के बीच ध्वनिमत से पारित किया गया था. विपक्षी सदस्यों ने विधेयक पेश किए जाने के विरोध में नोटिस दिए थे, लेकिन हंगामे के बीच इस पर चर्चा नहीं हो सकी.
राज्यसभा में विधेयक पर चर्चा के दौरान विपक्ष के नेता मल्लिकार्जुन खरगे को सभापति ने बोलने की अनुमति नहीं दी. इसके बाद ‘इंडिया’ ब्लॉक के सदस्यों ने सदन से वॉकआउट कर दिया.
सदन में विपक्ष के सांसद केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह के बयान की मांग को लेकर नारेबाजी कर रहे थे. वहीं, अमित शाह दोनों सदनों में मौजूद नहीं थे.
लोकसभा में भी विपक्ष की नारेबाजी के बीच विधेयक मिनटों में पारित होते रहे. जबकि विपक्ष गृह मंत्री शाह की मौजूदगी और अयोध्या में राम मंदिर के चढ़ावे की कथित चोरी पर चर्चा की मांग करते रहे.
मेघवाल ने राज्यसभा में विधेयक पर बोलते हुए कहा कि ट्रिब्यूनल त्वरित न्याय सुनिश्चित करने में न्यायपालिका की पूरक भूमिका निभाते हैं. उन्होंने कहा कि विधेयक से ट्रिब्यूनलों के अधिकारक्षेत्र में कोई बदलाव नहीं किया गया है.
उन्होंने कहा, ‘राष्ट्रीय ट्रिब्यूनल आयोग का गठन इस विधेयक का मुख्य हिस्सा है. इसमें दो न्यायिक और दो तकनीकी सदस्य होंगे. इसका नेतृत्व सुप्रीम कोर्ट के पूर्व न्यायाधीश या किसी हाईकोर्ट के पूर्व मुख्य न्यायाधीश द्वारा किया जाएगा. आयोग में नियुक्तियों की प्रक्रिया को पारदर्शी, स्वतंत्र और योग्यता आधारित बनाया जाएगा.’
उल्लेखनीय है कि मोदी सरकार के कार्यकाल में ट्रिब्यूनलों के युक्तिकरण की प्रक्रिया (rationalisation of tribunals ) 2016 में शुरू हुई थी. इसके बाद सरकार 2021 में ट्रिब्यूनल सुधार (युक्तिकरण और सेवा शर्तें) अध्यादेश लाई थी.
मालूम हो कि यह विधेयक सुप्रीम कोर्ट के उस फैसले के बाद आया है जिसमें अदालत ने ट्रिब्यूनल सुधार अधिनियम, 2021 के कुछ प्रावधानों को असंवैधानिक करार देते हुए रद्द कर दिया था. अदालत ने कहा था कि ये प्रावधान शक्तियों के पृथक्करण और न्यायिक स्वतंत्रता के सिद्धांतों के विपरीत थे, तथा ट्रिब्यूनल सदस्यों की नियुक्ति, कार्यकाल और कामकाज से जुड़े पहले के न्यायिक फैसलों के अनुरूप नहीं थे.
गौरतलब है कि यह एक ऐसा मामला था, जिसमें मुख्य न्यायाधीश ने सरकार को अपनी पीठ से ‘बचने की कोशिश’ करने के लिए दो बार फटकार लगाई थी.
सुप्रीम कोर्ट ने बीते साल 3 नवंबर को केंद्र सरकार के कड़ी फटकार लगाते हुए कहा था कि सरकार इस बेंच से बचने के लिए तरकीबें अपना रही है. पीठ ने यह भी कहा था कि इन मामलों में कार्यवाही 2021 से लंबित थी, लेकिन केंद्र सरकार ने अचानक 1 नवंबर को ही इन याचिकाओं को पांच जजों की संविधान पीठ को भेजने का आवेदन दायर कर दिया.
ऐसे में अदालत ने आश्चर्य जताते हुए कहा था, ‘केंद्र सरकार ऐसा रुख अपना रही है. हमें इस तरह की ‘रणनीति’ केंद्र सरकार द्वारा अपनाने की उम्मीद नहीं थी.’
