कश्मीर में ‘डर का माहौल’: सार्वजनिक कार्यक्रमों से पहले लोगों को थाने बुलाए जाने पर नेताओं ने जताई चिंता

कश्मीर में राष्ट्रीय अवकाश, किसी बड़े सरकारी समारोह या महत्वपूर्ण सार्वजनिक कार्यक्रम से पहले स्थानीय लोगों को बार-बार थाने बुलाए जाने और हिरासत में लिए जाने पर राजनेताओं ने चेतावनी दी है कि घाटी में इस तरह के सुरक्षा उपायों के इस्तेमाल से लोगों में डर पैदा हो रहा है और स्थानीय लोगों व प्रशासन के बीच पहले से ही कमज़ोर भरोसे की खाई और बढ़ रही है.

मंगलवार, 11 अगस्त 2026 को दक्षिण कश्मीर के अनंतनाग ज़िले में स्वतंत्रता दिवस से पहले जम्मू-श्रीनगर नेशनल हाईवे पर सुरक्षाकर्मी एक व्यक्ति की तलाशी लेते हुए. (फोटो: पीटीआई)

श्रीनगर: जम्मू-कश्मीर में विभिन्न राजनीतिक दलों के नेताओं ने राष्ट्रीय अवकाश, किसी बड़े सरकारी समारोह या महत्वपूर्ण सार्वजनिक कार्यक्रम से पहले युवाओं को बार-बार थाने बुलाए जाने और हिरासत में लिए जाने पर चिंता जताई है.

नेताओं का कहना है कि घाटी में अपनाए जा रहे ऐसे सुरक्षा उपाय लोगों में डर पैदा कर रहे हैं और पहले से ही प्रशासन व अवाम के बीच कमजोर विश्वास को और गहरा कर रहे हैं.

कश्मीर में सुरक्षा एजेंसियों के इन कदमों की आलोचना करते हुए पीपुल्स डेमोक्रेटिक पार्टी (पीडीपी) की नेता इल्तिजा मुफ़्ती ने द वायर से कहा कि बार-बार हिरासत में लिए जाने, पूछताछ और कार्रवाई से जानबूझकर ‘डर का माहौल’ बनाया जा रहा है, जिसमें आम लोगों को लगने लगा है कि किसी को भी कभी भी उठा लिया जा सकता है.

मुफ़्ती ने कहा, ‘यहां जो कुछ भी हो रहा है, वह संयोग नहीं है. इसका मकसद एक खास तरह का डर पैदा करना है.’

उन्होंने कहा कि किसी एक घटना के बाद व्यापक स्तर पर सुरक्षा कार्रवाई किए जाने से ऐसा माहौल बन गया है, जिसमें पूरी आबादी को संदेह की नजर से देखा जा रहा है.

उन्होंने द वायर से कहा, ‘इसका उद्देश्य ऐसा माहौल बनाना है, जहां हर कोई जानता हो कि दमन, उत्पीड़न और सामूहिक सजा का दौर चल रहा है.’

‘क्या हम सभी उग्रवादी हैं?’

इल्तिजा ने सवाल उठाते हुए पूछा, ‘अगर अधिकारी बार-बार दावा करते हैं कि आतंकवाद कम हुआ है और बड़े पैमाने पर मुठभेड़ नहीं हो रही हैं, तो एक घटना के बाद बड़े पैमाने पर हिरासत और पूछताछ क्यों होती है?’

उन्होंने कहा, ‘तो इसका मतलब क्या है? क्या हम सभी उग्रवादी हैं?’

इल्तिजा ने आगे कहा कि पूरी आबादी को संदेह की नज़र से देखने की यह प्रवृत्ति सुरक्षा बेहतर करने के बजाय अलगाव की भावना को और बढ़ा रही है.

उन्होंने पिछले सप्ताह अपने साथ पुरुष पुलिसकर्मियों द्वारा कथित दुर्व्यवहार का भी जिक्र किया और कहा कि ऐसी घटनाएं कश्मीरियों को यह संदेश देती हैं कि राजनीतिक या सामाजिक हैसियत भी उन्हें सुरक्षा नहीं दे सकती.

उन्होंने कहा, ‘पिछले सप्ताह मेरे साथ दुर्व्यवहार क्यों किया गया? अगर किसी पूर्व मुख्यमंत्री की बेटी और पूर्व गृह मंत्री की पोती के साथ पुरुष पुलिसकर्मी ऐसा व्यवहार कर सकते हैं, तो किसी के साथ भी कुछ हो सकता है.’

उनकी यह टिप्पणी दक्षिण कश्मीर में हालिया आतंकी हमलों के बाद घाटी में सुरक्षा कार्रवाई बढ़ाए जाने को लेकर बढ़ती चिंताओं के बीच आई है. इंडियन एक्सप्रेस ने अपनी रिपोर्ट में पुलिस सूत्रों के हवाले से बताया है कि कश्मीर में 2,500 से अधिक युवाओं को हिरासत में लिया गया है. इनमें श्रीनगर से 700 से अधिक, बडगाम से 200 से अधिक और बारामूला से 178 लोग शामिल हैं. इसके अलावा अन्य जिलों से भी सैकड़ों लोगों को हिरासत में लिए जाने की बात कही गई थी.

हिरासत में लिए गए लोगों की संख्या और उनके बारे में जानकारी को लेकर पारदर्शिता पर भी सवाल उठे हैं. मुफ़्ती ने कहा कि अनंतनाग की घटना के बाद घाटी के लोगों को यह स्पष्ट नहीं है कि कितने लोगों को रिहा किया गया, कितनों को औपचारिक रूप से गिरफ्तार किया गया, हिरासत में लिए गए लोगों को कहां रखा गया है और क्या उनके परिजनों को वकीलों से मिलने या मुलाकात की अनुमति है.

उन्होंने कहा, ‘फिलहाल पूरी व्यवस्था अपारदर्शी है.’

मुफ़्ती ने इस कार्रवाई को व्यवस्थित और संस्थागत बताया. उनके मुताबिक, यह कार्रवाई संदिग्ध आतंकवादियों तक सीमित नहीं है, बल्कि राजनीतिक दलों, सामाजिक कार्यकर्ताओं, वकीलों और पत्रकारों तक भी पहुंच रही है.

उन्होंने वकील मियां अब्दुल कयूम, पत्रकार इरफान मेहराज और मानवाधिकार कार्यकर्ता खुर्रम परवेज के मामलों का उदाहरण देते हुए इसे ‘कश्मीरी समाज के उन वर्गों को चुप कराने की व्यापक कोशिश’ बताया, जो घाटी में हो रही घटनाओं को दर्ज या सामने रख सकते हैं.

मुफ़्ती ने कहा कि अधिकारियों का उद्देश्य केवल लोगों को हटाना नहीं, बल्कि घाटी में हो रही घटनाओं का स्वतंत्र रिकॉर्ड बनने की संभावना को भी खत्म करना है.

उन्होंने कहा, ‘मूल रूप से ऐसा लगता है कि हमें कमजोर करो, हमें हमारे अधिकारों से वंचित करो, लेकिन कोई निशान मत छोड़ो. जिसे भी आपको लगता है कि वह इसके खिलाफ बोलेगा, उसके खिलाफ कार्रवाई करो, जबकि जो लोग आपके मुताबिक चलने वाले हैं, उन्हें जारी रहने दिया जाए.’

मुफ़्ती ने भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) पर क्षेत्र के आर्थिक और राजनीतिक शोषण का भी आरोप लगाया.

उन्होंने कहा, ‘कश्मीर भाजपा के लिए दुधारू गाय बन गया है,’ और तर्क दिया कि जब तक कश्मीर पार्टी के लिए राजनीतिक रूप से उपयोगी बना रहेगा, केंद्र सरकार उसका राजनीतिक लाभ उठाती रहेगी.

उनकी चिंताओं को अन्य राजनीतिक दलों के नेताओं का भी समर्थन मिला है.

नेशनल कॉन्फ्रेंस ने उपराज्यपाल प्रशासन से घाटी के युवाओं पर भरोसा करने को कहा

जम्मू-कश्मीर नेशनल कॉन्फ्रेंस (एनसी) के मुख्य प्रवक्ता और जदीबल के विधायक तनवीर सादिक ने पार्टी मुख्यालय में पत्रकारों से बातचीत में उपराज्यपाल प्रशासन से घाटी के युवाओं पर अधिक भरोसा करने की अपील की.

सादिक ने कहा कि जो लोग अपने परिवार के साथ शांतिपूर्वक रह रहे हैं और अपनी आजीविका कमा रहे हैं, उन्हें बेवजह पुलिस थानों में नहीं बुलाया जाना चाहिए, खासकर महत्वपूर्ण अवसरों और विशेष आयोजनों से पहले.

उन्होंने कहा कि इस तरह के समन से लोगों में डर और आशंका का माहौल पैदा होता है. दिल्ली में पैलेट गन के इस्तेमाल को लेकर महबूबा मुफ़्ती के हालिया बयान का जिक्र करते हुए सादिक ने कहा कि इस तरह की टिप्पणियों को कश्मीरी युवाओं को निशाना बनाने, उन पर संदेह करने या उंगली उठाने का आधार नहीं बनाया जाना चाहिए.

एनसी के सम्मेलन प्रवक्ता इमरान नबी डार ने कहा कि ‘संदिग्धों’ से पूछताछ की यह पुरानी प्रथा है, जो उग्रवाद के चरम दौर से चली आ रही है. उन्होंने कहा कि चिंता की बात यह है कि 2026 में भी इसी तरह के तरीके इस्तेमाल किए जा रहे हैं.

डार ने कहा कि पुलिस थानों में बुलाए जाने वाले लोगों की सूचियां हमेशा अपडेट नहीं की जातीं, जिसके कारण कई बार 60 वर्ष से अधिक उम्र के लोगों को भी पूछताछ के लिए बुला लिया जाता है.

उन्होंने सवाल किया, ‘अगर स्थिति सामान्य है, तो उग्रवाद के चरम दौर में इस्तेमाल किए जाने वाले उन्हीं तरीकों को अपनाने की जरूरत क्यों पड़ रही है?’

भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (मार्क्सवादी) यानी माकपा के नेता एमवाई तारिगामी ने भी इस चलन की आलोचना की. उन्होंने कहा कि लोगों, खासकर युवाओं को थाने बुलाने का सिलसिला वर्षों से जारी है, लेकिन 5 अगस्त, 2019 के बाद इसमें बढ़ोतरी हुई है.

तारिगामी ने द वायर से कहा, ‘आतंकी घटनाओं के लिए जिम्मेदार लोगों की पहचान करने और पेशेवर तरीके से जांच करने के बजाय, पुलिस के कुछ हिस्से लापरवाही भरे कदम उठा रहे हैं और आम लोगों का लगभग शिकार कर रहे हैं.’

उन्होंने सवाल किया कि क्या लोगों को अंधाधुंध गिरफ्तार करना या थाने बुलाना राष्ट्रीय हित में है या इससे घाटी में कानून-व्यवस्था की स्थिति बेहतर होती है.

उन्होंने कहा, ‘ऐसी गतिविधियां और प्रतिक्रियाएं लोगों और प्रशासन के बीच की खाई को और बढ़ाएंगी. लोग विश्वास की कमी की बात कर रहे हैं, लेकिन अगर यह जारी रहा तो बिल्कुल भी विश्वास नहीं बचेगा.’

पीडीपी नेता मुफ़्ती ने एनसी पर भी तीखा हमला किया. उन्होंने आरोप लगाया कि पार्टी और उमर अब्दुल्ला सरकार केंद्र सरकार तथा घाटी में लागू किए जा रहे सुरक्षा उपायों का पर्याप्त विरोध करने में नाकाम रही है.

उन्होंने कहा, ‘इतना बड़ा जनादेश मिलने के बावजूद वे (एनसी) इन सब चीजों को सामान्य बना रहे हैं.’

उन्होंने सवाल किया कि अगर सरकार कश्मीरियों की बुनियादी सुरक्षा और सम्मान सुनिश्चित नहीं कर सकती, तो बार-बार दिल्ली जाने का क्या फायदा है.

मुफ़्ती ने कहा, ‘शायद सरकार और मुख्यमंत्री को इस मुद्दे को अधिक आक्रामक तरीके से उठाना चाहिए.’

उन्होंने कहा कि प्रशासन को यह पूछना चाहिए कि क्या कश्मीर के लोग सुरक्षित हैं और क्या उनके बुनियादी अधिकारों की रक्षा की जा रही है, बजाय इसके कि उसका पूरा ध्यान मुख्य रूप से राज्य का दर्जा बहाल करने पर हो.

उन्होंने सवाल किया, ‘हम देखते हैं कि वे बार-बार दिल्ली जाते हैं. पूरी कैबिनेट जाती है—आप हमें राज्य का दर्जा दीजिए, लेकिन अपने लोगों का क्या? अगर वे सुरक्षित नहीं हैं, तो आपको राज्य का दर्जा किस लिए चाहिए?’

उल्लेखनीय है कि ये चिंताएं दक्षिण कश्मीर में हालिया आतंकी हमलों और आतंकवाद-रोधी अभियानों की पृष्ठभूमि में सामने आई हैं. पिछले महीने अनंतनाग में पुलिस हेड कांस्टेबल आशिक हुसैन कुरैशी की आतंकी हमले में हत्या के एक दिन बाद अधिकारियों के अनुसार सक्रिय आतंकवादी माने जाने वाले दो लोगों के घर हसनपोरा और बिजबेहरा के ठोकरपोरा में ध्वस्त कर दिए गए. पुलिस ने कथित तौर पर हमले के बाद 2,500 से अधिक लोगों को हिरासत में लिया था.

इन घरों को गिराया जाना अप्रैल 2025 में पहलगाम आतंकी हमले के बाद देखे गए घटनाक्रम की याद दिलाता है. उस समय घाटी के अलग-अलग हिस्सों में कम से कम नौ संदिग्ध आतंकवादियों के घर ध्वस्त किए गए थे.

तिहाड़ जेल में बंद उत्तर कश्मीर के सांसद इंजीनियर राशिद के प्रवक्ता फिरदौस बाबा ने स्वतंत्रता दिवस, गणतंत्र दिवस और सरकारी समारोहों के आसपास कश्मीरियों, खासकर युवाओं को बार-बार थाने बुलाए जाने को ‘बेहद निंदनीय और अनुचित’ बताया.

उन्होंने दावा किया कि अदालतों से बरी हो चुके लोगों को भी पुलिस थानों में बुलाया गया है.

बाबा ने यह भी आरोप लगाया कि जिन लोगों के रिश्तेदार 1990 के दशक में सीमा पार चले गए थे, उन्हें पुलिस सत्यापन प्रमाणपत्र नहीं दिए जा रहे हैं. उन्होंने कहा कि इस तरह के कदम सामूहिक सजा के समान हैं.

‘हमें युवाओं के साथ सुलह का मौका नहीं गंवाना चाहिए’

बाबा ने कहा, ‘कश्मीरी अब हिंसा पसंद नहीं करते.’ उन्होंने प्रशासन से युवाओं के साथ विश्वास बहाली के अवसर को पहचानने की अपील की.

उन्होंने कहा, ‘हम बेहद नाजुक माेहौल में रह रहे हैं. हमें युवाओं के साथ सुलह का मौका नहीं गंवाना चाहिए. उपराज्यपाल प्रशासन को इसकी अगुवाई करनी होगी.’

मुफ़्ती ने कहा कि प्रशासन को अच्छी तरह पता है कि उसे क्या करना चाहिए और क्या नहीं, लेकिन वह गलत रास्ता चुन रहा है.

उन्होंने कहा, ‘मुझे लगता है कि उन्हें ठीक-ठीक पता है कि क्या करना है और क्या नहीं करना है. दुर्भाग्य से वे वही कर रहे हैं जो उन्हें नहीं करना चाहिए और जो करना चाहिए, वह नहीं कर रहे हैं.’

उनके मुताबिक, समस्या समझ की कमी नहीं बल्कि प्रशासन के कदमों के पीछे की मंशा है. उन्होंने आरोप लगाया कि यह रवैया डर पैदा करने और यह सुनिश्चित करने के लिए है कि कश्मीरी ‘बंदूक की नली के साए’ और ‘गर्दन पर पड़ते भारी जूतों के डर’ के बीच जीते रहें.

इस बीच तारिगामी ने उपराज्यपाल प्रशासन और संबंधित अधिकारियों से पुलिस प्रशासन के कुछ अनुभागों द्वारा की जा रही ‘लापरवाह कार्रवाई’ को रोकने की अपील की.

उन्होंने कहा, ‘अगर आप सुरक्षा स्थिति सुधारने को लेकर चिंतित हैं, तो लोगों के साथ दुश्मनों जैसा व्यवहार न करें. लोगों की सुरक्षा करना कानून-व्यवस्था लागू करने वाली एजेंसियों का महत्वपूर्ण कर्तव्य है, उन्हें परेशान करना नहीं.’

(इस ख़बर को अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें.)