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आंकड़ों के पीछे छिपे नाम: अमेरिकी हवाई हमलों ने एक ईरानी परिवार से क्या छीना

ईरान की आवाज़: तेहरान टाइम्स की पत्रकार सहर दादजू का यह लेख युद्ध की खबरों के पीछे छिपे मानवीय दर्द को सामने लाता है. वह बताता हैं कि लगातार हमलों के बीच पत्रकार होना कैसा अनुभव है और कैसे मौत के आंकड़ों के पीछे हर व्यक्ति किसी परिवार की पूरी दुनिया होता है. लेख में एक परिवार की कहानी के ज़रिये युद्ध की भयावहता को समझने की कोशिश की गई है.

सहर दादजू
21/08/2026
दुनिया/विशेष
वह पुल, जहां हसन चत्रज़ारिन ने अपने दो भाइयों - 32 वर्षीय होमायूं और 11 वर्षीय मज़्यार - को खो दिया. (फोटो: सहर दादजू)
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सुबह के लगभग तीन बज रहे हैं और मैं फिर से जाग रही हूं; जबसे हमलों का यह दौर शुरू हुआ है, ज़्यादातर रातों में मेरा यही हाल रहा है. युद्ध के समय नींद न आने की बेचैनी बिल्कुल अलग ही होती है, यह बेचैनी भी नहीं होती, बल्कि सतर्कता होती है. मेरा फ़ोन मेरे बग़ल में रखा है, उसकी स्क्रीन की रोशनी कम है लेकिन वह पूरी तरह बंद नहीं है, क्योंकि रात के दो से छह बजे के बीच ही दक्षिणी ईरान में हमले होने की आशंका रहती है.

मैंने जागते रहने की आदत बना ली है, बल्कि यह एक तरह की मजबूरी बन गई है, ताकि हमला होते ही मुझे ख़बर मिल जाए, न कि ख़बर सुनकर मेरी नींद खुले. मेरा ऐसा मानना था कि पत्रकार जिन घटनाओं को कवर करते हैं, उनसे उन्हें थोड़ी दूरी बनाए रखनी चाहिए. लेकिन अब मुझे पता नहीं कि ऐसा कैसे किया जाए, ख़ासकर इस महीने में, जब देश का दक्षिणी हिस्सा लगातार मिसाइल हमलों का सामना कर रहा है और हम बाक़ी लोग दूसरे शहरों में आराम से सोने की कोशिश कर रहे हैं.

मैं रात में खिड़की खुली रखती हूं. यह सुनने में अजीब लग सकता है, क्योंकि खिड़की से आने वाली आवाज़ें कभी भी उन असल आवाज़ों जैसी नहीं हो सकतीं जो होरमुज़गन, खुज़ेस्तान या बुशहर के लोग असल में सुन रहे हैं. फिर भी, मैं इसे खुला रखती हूं. ऐसा लगता है जैसे मैं उस घटना से आंखें नहीं चुराना चाहती जिसे दूसरे परिवार असल ज़िंदगी में झेल रहे हैं – यह उन लोगों के साथ एकजुटता दिखाने का एक फ़िज़ूल तरीक़ा हो सकता है, लेकिन मेरे पास यही एक तरीक़ा है.

पत्रकारिता के इस काम में एक ख़ास तरह का अपराध-बोध होता है जिसके बारे में कोई पहले से नहीं बताता. आप पूरा दिन लोगों के नाम और नंबर इकट्ठा करने में बिताते हैं – जैसे गांव की सड़क पर मारा गया ईंधन-टैंकर ड्राइवर, अस्पताल से लौटते समय कार में फंसा चार लोगों का परिवार, हाजियाबाद का एक एनवायरनमेंटल वॉर्डन जिसने अपने घर पर हुए हमले में तीन रिश्तेदारों को खो दिया – और फिर, रात में आप अपने शांत अपार्टमेंट में लौट आते हैं, जबकि जिन लोगों के नाम आपने लिखे थे, वे ऐसे घरों में लौटते हैं जहां उनके परिवार का कोई न कोई सदस्य अब हमेशा के लिए न लौटने के लिए जा चुका है.

ईरान के स्वास्थ्य मंत्रालय ने बताया कि अकेले 6 जुलाई 2026 के बाद से हुए हमलों में कम से कम 50 लोग मारे गए और 500 से ज़्यादा घायल हुए हैं. इस व्यापक युद्ध में मरने वालों में आठ महीने के बच्चे से लेकर अस्सी-नब्बे साल के बुज़ुर्ग तक शामिल हैं. पिछले हफ़्ते मैंने सुबह चार बजे यह लाइन पढ़ी और उसके बाद काफ़ी देर तक अपना लैपटॉप बंद करके बैठी रही, क्योंकि मुझे समझ नहीं आ रहा था कि इसके बाद क्या लिखा जाए.

मज़्यार और होमायूं

23 जुलाई को, मेरे एक साथी ने तेहरान से सैकड़ों किलोमीटर दक्षिण में स्थित होर्मोज़गन राज्य के निमेह कार क़स्बे में हसन चत्रज़ारिन नाम के एक युवक से संपर्क किया. उसने उस रात का ज़िक्र किया जब हसन ने अपने दो भाइयों, 32 साल के होमायूं और 11 साल के मज़्यार, को एक ऐसे पुल पर खो दिया था जो अब वैसा नहीं दिखता जैसा पहले दिखता था.

बमों के हमलों ने पुल की शक्ल बदल डाली है. हसन के पास अपने भाइयों की मौत के चंद पलों पहले की रिकॉर्डिंग थी. मैंने वह रात और उसके बाद की अनेक रातें उस रिकॉर्डिंग और ट्रांसक्रिप्ट के साथ बितायीं; उसके शब्दों का एक-एक करके अनुवाद किया और कोशिश की कि भाषा बदलने के बावजूद उनके पीछे छिपी भावना या असल बात खो न जाए. मैंने कभी उसकी आवाज़ सीधे नहीं सुनी. मेरे पास सिर्फ़ उसके शब्द थे, जिन्हें दो बार दोहराया गया था – एक बार उसने कहा था, और दूसरी बार मैंने – और एक अजीब सी ज़िम्मेदारी थी कि इस दूरी के बीच कुछ भी खो न जाए.

कानों में गूंजती है होमायूं की आवाज़ – मां, तुम कहां हो?

उस घटना के बारे में एक बात मेरे ज़हन में बस गई है. पहले धमाके के कुछ ही सेकंड बाद होमायूं ने अपनी मां को जो आख़िरी फ़ोन कॉल किया था, उसमें सिर्फ़ चार शब्द थे – ‘मां, तुम कहां हो?’ – और फिर लाइन कट गई. यह असल में कोई सवाल नहीं था. यह एक सहज प्रतिक्रिया थी, वही प्रतिक्रिया जो हममें से किसी को भी उस व्यक्ति की ओर खींचती है जिसने हमेशा हर बात का जवाब दिया हो. अब वह कभी कोई जवाब नहीं मांगने वाला है.

आजकल ज़्यादातर रातों में, जब मैं जाग रही होती हूं तो ऐसा नहीं कि मैं किसी काम में लगी होती हूं. मैं बस जाग रही होती हूं, और अक्सर सोचती रहती हूं कि कोई जगह कैसे बस एक टारगेट बन जाती है – जैसे एक पुल जो घर जाने का रास्ता भर था, या खारे पानी को मीठा बनाने वाला प्लांट जिस पर बम गिरने से दस हज़ार लोग पानी के लिए तरसेंगे या तरस रहे हैं, या वाइल्डलाइफ़ की सुरक्षा के लिए बनी वार्डन की चौकी जो एक परिवार और उसके आस-पास सहित मलबे में बदल गई.

ये बातें मिलिट्री ब्रीफ़िंग की भाषा में फिट नहीं बैठतीं; वहां इंफ़्रास्ट्रक्चर और क्षमता की बात होती है, लेकिन कभी यह नहीं बताया जाता कि 11 साल का वह बच्चा – जो बड़ा होकर पुलिस अफ़सर बनना चाहता था क्योंकि ‘पुलिस लोगों की रक्षा करती है’ – अब उस सपने को पूरा करने के लिए ज़िंदा क्यों नहीं है.

तेहरान में बैठे-बैठे मैं किसी मिसाइल को रोक नहीं सकती. खमीर काउंटी में मैं कुछ भी दोबारा नहीं बना सकती. लेकिन सुबह के तीन बजे, जब मेरी स्क्रीन पर बातचीत का ट्रांसक्रिप्ट खुला हो, तो मैं बस इतना कर सकती हूं कि किसी नाम को न्यूज़ की सुर्खियों से गायब होने से पहले सिर्फ़ एक नंबर बनने से रोकूं. यहां से दक्षिण में कहीं, एक मां ऐसे घर में जाग रही है जहां से उसके दो बेटे ग़ायब हैं. मुझे नहीं पता कि इस बात का क्या करूं, सिवाय इसके कि मैं जागती रहूं, इसे लिखूं और इसे पढ़ने वाले हर व्यक्ति से – चाहे वे कहीं भी हों – यह याद रखने को कहूं कि ये कभी सिर्फ़ नंबर नहीं थे. वे किसी की पूरी दुनिया थे.

(यहां से नीचे सहर दादजू के सहकर्मी पत्रकार और हसन चत्रज़ारिन की उस बातचीत का संपादित और हिंदी में अनूदित अंश है. इस बातचीत का लिप्यंतरित और अरबी से अंग्रेज़ी में अनुवाद सहर दादजू ने किया था.)

जो हुआ, वह होना नहीं था. जो हुआ, वह किसी के साथ न हो – हसन चत्रज़ारिन

हसन ने बताया कि उनका परिवार बड़ा परिवार है. मां-बाप, छः भाई और दो बहनें. अब उनमें से दो कम हो गए. पिता ने जीवन भर कड़ी मेहनत की. वे एक सीमेंट कारखाने में ड्राइवर थे. अब वे रिटायर हो गए हैं. मज़्यार परिवार में सबसे छोटा था. अभी चौथी में पढ़ता था और पांचवीं में जाने वाला था. होमायूं सबसे बड़ा था. उसने शादी नहीं की थी. उसने घर की ज़िम्मेदारियों को ही ज़िंदगी बना लिया था.

17 जुलाई 2026 की उस रात हम लोग भाई के घर में जमा थे. भाई का घर हमारे घर के बिल्कुल बाजू में ही है. आधी रात के बाद का वक़्त था. तभी अचानक भयानक विस्फोट हुआ. धमाका इतना बड़ा था कि घर के दरवाज़े खिड़कियाँ और दीवारें कांप गए. कुछ पलों के भीतर ही पूरे क़स्बे की लाइट चली गई. हम सब गहरे अंधेरे में डूबे थे. तभी मेरी मां के फोन पर होमायूँ का फोन बजा. मां ने जल्दी से फोन उठाया. वो दूसरी तरफ़ से बमुश्किल इतना भर कह पाया कि – ‘मां, तुम कहां हो?’ और फोन कट गया. उसके बाद हम लोग लगातार उसे कॉल करते रहे, लेकिन दूसरी तरफ़ से कोई जवाब नहीं आया.

परिवार के हम सभी लोग बहुत बेचैन और फ़िक्रमंद थे. हमने आपस में पूछा कि होमायूं गया कहां था. मां ने बताया कि छोटे भाई मज़्यार की ज़िद पर होमायूं उसे पास के झरने पर लेकर गया था, जिसका पानी कुछ क़ुदरती तौर पर कुछ रोगों के उपचार के लिए भी उपयुक्त माना जाता था. हम लोग अनिष्ट की आशंका से भरे हुए थे लेकिन उनके साथ कुछ बुरा घट गया हो, यह सोचना भी नहीं चाहते थे. आख़िर कुछ देर के बाद मैं और मेरा चचेरा भाई घर से निकले और जिस तरफ़ धमाका हुआ था, उस तरफ़ गए.

उस तरफ़ दूर से ही धुआं और आसमान तक उठती लपटें दिख रही थीं. हम फिर भी सोच रहे थे कि हमारे भाई ठीक होंगे. धमाके से फोन लाइन खराब हो गई होंगी, इसलिए उनका फोन नहीं लग रहा होगा. हम पुल के नज़दीक पहुंचे जहां से लपटें उठ रही थीं. पुल धराशायी हो गया था. कुछ लोग वहां इकट्ठे होने लगे थे. वे शायद आसपास के थे या वहां से गुज़र रहे लोगों में से जो बच गए थे, वे थे.

मैं साथ में बड़ी टॉर्च लेकर गया था. मैंने टॉर्च की रोशनी डाली. तब मुझे पुल के किनारे पर मेरे भाई की गाड़ी दिखी. बिल्कुल पुल के किनारे से एक-या दो मीटर अंदर. शायद एक पल और गुज़र गया होता तो वे पुल पार कर गए होते. गाड़ी देखने के बाद भी मैं इस उम्मीद को छोड़ना नहीं चाहता था कि मेरे दोनों भाई ज़िंदा होंगे, हालांकि गाड़ी की हालत बता रही थी कि मेरी उम्मीद चमत्कार हो जाने की थी. मैंने जैसे ही गाड़ी को देखा, मैं चीखा, ‘वहां उस गाड़ी में मेरे भाई हैं. मदद करो, उन्हें बचा लो’.

आसपास के लोग, जो भी वहां इकट्ठा हुए थे, सब पास आ गए. लेकिन गाड़ी तक पहुंचना संभव नहीं था. तब तक कोई रेस्क्यू टीम भी नहीं आयी थी. पीछे एक और कार धू-धू करके जल रही थी. उसमें मौजूद सभी लोग जल गए थे. बाद में गांव में उनके रिश्तेदारों ने बताया कि वे चार लोग (पति, पत्नी, उनकी बेटी और पत्नी की मां) एक ही परिवार के थे और वे पास के शहर बंदर अब्बास गए हुए थे जहां अस्पताल में उनके परिवार का एक अन्य सदस्य भर्ती था. लौटते हुए वे सभी मारे गए.

पुल

थोड़ी देर बाद बड़ी मुश्किल से हम अपने भाइयों के नज़दीक पहुँच पाये, और उनके जिस्म बाहर निकल पाये. मुझे याद है, मैं रोता जा रहा था और छोटे मज़्यार के चेहरे को इस उम्मीद में धीरे-धीरे थपथपा रहा था कि वह आंखें खोल दे और कुछ कहे. बड़ा भाई होमायूं हमारे घर का सुतून (स्तम्भ) था, हमेशा परिवार की बेहतरी, खुशी और सुरक्षा के लिए हमारे सिरों पर तना हुआ एक छत जैसा. और मज़्यार हमारे घर-परिवार की रोशनी था. वह हमेशा मुस्कराता रहता था और खुश रहता था. उससे किसी ने कभी पूछा था कि तुम बड़े होकर क्या बनना चाहोगे, तो उसने जवाब में कहा था कि वह पुलिस वाला बनना चाहता था. पूछने वाले ने पूछा कि क्यों? तो उसने जवाब दिया कि पुलिस वाले लोगों को बचाते हैं, इसलिए वह पुलिस बनेगा. ऐसा था मज़्यार. वह इसलिए पुलिस वाला नहीं बनना चाहता था कि उससे पैसे या इज़्ज़त या ताक़त मिलेगी, बल्कि इसलिए कि वह लोगों की हिफ़ाज़त कर सके.

होमायूं और मज़्यार

उस दिन सिर्फ़ हमारे घर में ही नहीं, बल्कि हमारे गांव के अनेक घरों के चिराग़ बुझे. हमारा गांव कोई फ़ौजी अड्डा नहीं था. उस पर हमले की कोई वजह नहीं थी. फिर भी हम यही चाहते हैं कि दुनिया में किसी को भी ऐसी तक़लीफ़ का सामना न करना पड़े.

(सहर दादजू ईरान के प्रमुख अंग्रेज़ी दैनिक अख़बार तेहरान टाइम्स में राजनीति और अंतरराष्ट्रीय मामलों की संवाददाता हैं.)

(पत्रकार सहर दादजू के इस लेख का हिंदी अनुवाद सुधीर सजल ने किया है. लेख विनीत कुमार के माध्यम से उपलब्ध हुआ, जो कवि और सामाजिक-राजनीतिक कार्यकर्ता हैं.)

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