बंगनामा: तामलुक के पुष्प-प्रेमी

पश्चिम बंगाल के सांस्कृतिक कैलेंडर में शीतकाल के दौरान शहरों में पुष्प प्रदर्शनियों का आयोजन और उनका भ्रमण उतना ही अनिवार्य है जितना कि इसी मौसम में हर पाड़ा क्लब में पिकनिक. तामलुक फ्लावर लवर्स एसोसिएशन की पुष्प प्रदर्शनी इसी श्रृंखला की एक सुंदर कड़ी है. लोग ख़ुद बाग़बानी करने की स्थिति में हों या न हों, फूलों तथा पौधों का आनंद उठाने से नहीं चूकते. बंगनामा की 52 वीं क़िस्त.

/
साल 2024 में तामलुक में लगी एक पुष्प प्रदर्शनी. (फोटो साभार: फेसबुक/@supriyo.chakraborty.106)

सितम्बर 1995 में मैं तामलुक में ज़िला भूमि व भूमि संस्कार अधिकारी एवं अतिरिक्त ज़िला मजिस्ट्रेट के पद पर कार्यरत था. एक दिन मौयना कॉलेज के इतिहास के एक अध्यापक मुझसे मिलने दफ़्तर आए. औसत से ऊंचा क़द, दुबली काया, देह पर साधारण कपड़े, हाथ में एक डायरी और सांवले चेहरे पर चश्मा और हल्की मुस्कान पहने यह दिलीप राय थे. देखने से ही लगता था कि कोई भद्र पुरुष हैं.

अपना परिचय देने के पश्चात दिलीप बाबू ने कहा, ‘आमी एकटी अनुरोध निए एशेचि, आपनाके मानते होबे (मैं एक अनुरोध ले कर आया हूं. आपको स्वीकार करना होगा).’ ‘आगे शूनी तो (पहले सुनूं तो),’ मैंने भी मुस्कराते हुए उत्तर दिया.

दिलीप बाबू ने बताया कि इतिहास के अलावा उन्हें एक और विषय में रुचि थी- पर्यावरण, विशेष रूप से फूल-पौधों, में. 1960 के दशक के आरम्भ में कलकत्ता विश्वविद्यालय में पढ़ाई करते हुए उन्हें महानगरी के कुछ विशाल बाग़ानों में जाने का अवसर मिला था. उन्होंने शीतकाल की कई दोपहर तथा शामें एग्री हॉर्टिकल्चरल सोसाइटी ऑफ इंडिया तथा राष्ट्रीय ग्रंथागार के बाग़ों में गुज़ारी थीं और वहीं पनपा था उनका पुष्प प्रेम. 1964 में जब उनकी नियुक्ति तामलुक के समीप मौयना कॉलेज में व्याख्याता के रूप में हुई तो उन्होंने उस शहर से चंद किमी दूर अपने गांव नरादरी में लोगों को फूल उगाने के लिए प्रोत्साहित करना शुरू किया और फिर तामलुक में. पर इतने से उन्हें संतुष्टि नहीं मिली.

दिलीप बाबू ने देखा था कि सर्दियों में कलकत्ता के उद्यान तो नाना प्रकार के रंग-बिरंगे फूलों से भर ही उठते थे, साथ ही महानगर में दो-तीन बड़ी पुष्प प्रदर्शनियों का आयोजन भी होता था ताकि आम जनता वहां फूलों और पौधों का आनंद ले सके तथा बाग़वानी के लिए प्रेरणा पाए. वह चाहते थे कि सर्दियों में कलकत्ता की तरह उनके इलाक़े में भी एक पुष्प प्रदर्शनी होनी चाहिए जिससे वहां के लोगों को तरह-तरह के फूलों, फलों व सब्ज़ियों को उगाने में रुचि बढ़े. इस उद्देश्य से 1979 में कुछ मित्रों के साथ मिलकर उन्होंने तामलुक फ्लॉवर लवर्स एसोसिएशन की स्थापना की और उसी साल पहली बार तामलुक में एक पुष्प प्रदर्शनी का आयोजन भी किया.

अब – 1995 में – दिलीप बाबू मेरे पास दिसंबर महीने में तामलुक फ्लॉवर लवर्स एसोसिएशन की सोलहवीं वार्षिक फूलों की प्रदर्शनी का उद्घाटन करने का निमंत्रण ले कर आए थे.

यह मैं कतई नहीं कह रहा कि पश्चिम बंगाल में तामलुक एकमात्र ऐसा शहर है जहां फूल-पौधों की वार्षिक प्रदर्शनी आयोजित की जाती है. ऐसा इंगित करना सरासर ग़लत होगा क्योंकि स्थिति इससे बिल्कुल विपरीत है. इस राज्य में लगभग सभी ज़िला मुख्यालय शहरों में और कई छोटे शहरों में भी सर्दियों में पुष्प प्रदर्शनी संघटित की जाती है, इनमें से कई ऐसे भी है जिनके बीज किसी न किसी स्थानीय दिलीप राय ने बोये और परिपोषित किए हैं- किसी सरकारी दफ़्तर ने नहीं.

इस मायने में पश्चिम बंगाल अन्य राज्यों से सचमुच बिल्कुल भिन्न है. बंगाल के सांस्कृतिक कैलेंडर में शीतकाल के दौरान शहरों में पुष्प प्रदर्शनियों का आयोजन और उनका भ्रमण उतना ही अनिवार्य है जितना कि इसी मौसम में हर पाड़ा, यानी मोहल्ले, तथा पाड़ा क्लब में पिकनिक की प्रस्तुति. लोग ख़ुद बाग़बानी करने की स्थिति में हों या न हों, फूलों तथा पौधों का आनंद उठाने से नहीं चूकते.

चेन्नई, बंगलुरु तथा मुंबई कुछ चुनिंदा शहर हैं जहां भी यह प्रदर्शनी पुरानी परंपरा के वेश में नज़र आती है, लेकिन इसका प्रसार इन राज्यों के कुछ शहरों तक ही सीमित है. कुछ दशकों से पंजाब और हरियाणा में वार्षिक बाग़बानी प्रदर्शनी का चलन हो गया है पर इन दोनों राज्यों में इन नुमाइशों के ज़रिये मूलतः सब्ज़ियों तथा फलों की खेती को प्रोत्साहित करने पर ज़ोर दिया जाता है न कि फूलों को बढ़ावा देने पर. मेरी जानकारी में पश्चिम बंगाल के अलावा शायद ही कोई अन्य राज्य है जहां हर ज़िले में वार्षिक पुष्प प्रदर्शनी का आयोजन किया जाता है.

दरअसल दो-ढाई सौ वर्ष पूर्व अंग्रेजों ने पाया कि बंगाल के तीन महीनों की संक्षिप्त और ख़ुशनुमा ठंड यूरोप की मधुर ग्रीष्म के फूलों के लिए उपयुक्त है. फलस्वरूप उन्होंने कई अंग्रेज़ी फूल तथा सब्ज़ियों को यहां की उर्वर भूमि में उगाना आरंभ किया. 1820 में ब्रिटिश मिशनरी तथा वनस्पति प्रेमी विल्यम केरी ने कृषि तथा बाग़बानी को बढ़ावा देने के उद्देश्य से कलकत्ता में एग्री हॉर्टिकल्चरल सोसाइटी ऑफ इंडिया को स्थापित किया. यह भारत में अपनी तरह की पहली संस्था थी.

इसके पश्चात 1835 में चेन्नई में तथा 1848 में ऊटी में भी एग्री हॉर्टिकल्चरल सोसाइटी की स्थापना की गई. एग्री हॉर्टिकल्चरल सोसाइटी ऑफ इंडिया ने 1828 में कलकत्ता में प्रथम पुष्प एवं बाग़बानी प्रदर्शनी का आयोजन किया. इससे पूर्व मैंने उल्लेख किया है कि कलकत्ता के अलावा चेन्नई, ऊटी, बंगलुरु तथा मुंबई प्रमुख शहर हैं जहां दीर्घ काल से वार्षिक पुष्प प्रदर्शनियां आयोजित होती आई हैं. लेकिन यह अचंभे की कोई बात नहीं क्योंकि इन्हीं शहरों में सबसे पहले एग्री हॉर्टिकल्चरल संस्थाओं ने भी अपने पांव जमाए थे.

अगर हम गौर करें तो पाते हैं कि ज्यों पुष्प प्रदर्शनियों के पीछे एग्री हॉर्टिकल्चर सोसाइटी खड़ी दिखती हैं उसी तरह शुरुआत के प्रत्येक एग्री हॉर्टिकल्चर सोसाइटी के पीछे अंग्रेजों द्वारा पूर्व स्थापित बोटैनिक या वनस्पति उद्यान दिखाई देता है. कलकत्ता का बोटैनिक उद्यान, जो सबसे पुराना है, 1786 में ईस्ट इंडिया कंपनी द्वारा हुगली नदी के किनारे स्थापित किया गया था. यह किसी भी मायने में जन कल्याण प्रकल्प नहीं था, बल्कि यह भी कंपनी बहादुर के व्यापारिक महत्वाकांक्षाओं की एक और अभिव्यक्ति थी.

यह बोटैनिक उद्यान वास्तव में वनस्पति का अन्यतम प्रयोगशाला थी. इसकी स्थापना का मुख्य उद्देश्य था देश-विदेश के वाणिज्यिक महत्व वाले नए पौधों तथा वृक्षों का परीक्षण कर प्रथमतः बंगाल तथा तदोपरांत पूरे भारत में उनका प्रसार- जैसा कि अमाज़ोन के तट से रबर और कोको, बर्मा से सागौन, असम तथा चीन से चाय, इत्यादि के साथ किया गया. आरंभ में एग्री हॉर्टिकल्चर सोसाइटी को शायद इस पहल के विस्तार के साधन के रूप में नहीं देखा गया था पर अंग्रेजों के व्यापारिक उद्देश्य की प्राप्ति में इसने सहायक की भूमिका अवश्य निभाई. इसीलिए 1820 में इसकी स्थापना हुगली के उस पार बोटैनिक उद्यान के विशाल परिसर में ही हुई थी जहां से 35 वर्ष बाद इसे कलकत्ता के अलीपुर इलाक़े में निजी अहाते में ले आया गया और जहां वह अब भी स्थित है.

यह स्वीकार करना भी आवश्यक है कि इन सभी बड़ी-छोटी संस्थाओं के कार्यकलापों के कारण फूलों तथा घरेलू बाग़बानी में लोगों कि रुचि बढ़ती गई है. अब कलकत्ता में शीतकाल में और भी कई पुष्प प्रदर्शनी होती हैं. कलकत्ता निवासियों को हरेक वर्ष इनमें सबसे अधिक इंतज़ार रहता है विधानसभा, कलकत्ता महानिगम, कलकत्ता महानगर विकास प्राधिकरण तथा बंगाल गुलाब संस्था की पुष्प प्रदर्शनियों का.

तामलुक फ्लावर लवर्स एसोसिएशन की पुष्प प्रदर्शनी इसी शृंखला की एक सुंदर कड़ी है. इस संस्था का महत्व सबसे पहले उसकी निरंतरता है. धीरे-धीरे इसके द्वारा आयोजित पुष्प तथा बाग़वानी प्रदर्शनी तामलुक की सर्दियों में सार्वजनिक जीवन का एक खूबसूरत हिस्सा बन चुकी है. दिलीप बाबू ने इस संस्था के मार्फ़त कई अलग-अलग गतिविधियों को एक साथ जोड़ा है- सजावटी बाग़वानी, फूलों की खेती, सार्वजनिक प्रदर्शनियां, पर्यावरण शिक्षा और सामुदायिक भागीदारी.

फूल प्रदर्शनी के तीन-चार दिनों के दौरान यहां प्रतिदिन बच्चों से लेकर बूढ़ों तक की भीड़ बरकरार रहती है. कई स्कूलों से छात्र-छात्रियों के दलों को भी कक्षा अनुसार यहां भेजा जाता है.

दिसंबर 1995 के अंतिम सप्ताह में मैं तामलुक हाईस्कूल पहुंचा. पुष्प प्रदर्शनी की तैयारी विद्यालय के प्रांगण में की गई थी. दिलीप बाबू ने मुझे दिखाया कि किस तरह पूरा क्षेत्र कई श्रेणियों के फूलों और पौधों से सजाया गया था. समूचे प्रांगण में सर्दियों के फूलों के अतिरिक्त घरेलू पौधे, कैक्टस, बॉनसाई तथा विभिन्न सब्ज़ियों की भी बहार आई हुई थी. हर श्रेणी में प्रतियोगिता रखी गई थी जिनका उस प्रातः ही निर्णायक मंडली ने परिदर्शन कर अपना निर्णय आयोजकों को बता दिया था. इस वजह से हमें पौधों के कई अनुभागों में विजेताओं से भी भेंट हुई जो फूले नहीं समा रहे थे.

मेरे परिवार में भी बाग़बानी का शौक़ था जिससे मैं अछूता न था, पर मुझे इतनी ख़ुशी प्रदर्शनी में सजे अभिनव फूलों या पौधों को देख कर नहीं मिली, जितनी बच्चों तथा वयस्कों को उनका आनंद उठाते देख कर हुई. किसी विशाल लाल डहेलिया को देखकर किसी बच्चे का विस्मय या किसी झुर्री-अंकित चेहरे पर सफ़ेद गुलदाउदी की मृदुता का प्रतिबिंब या घने कांटेदार कैक्टस के व्यंग्यात्मक नाम -‘सास की कुर्सी’ – सुनकर किसी नवयुवती की पुलकित हंसी और ऐसे ही न जाने कितने ही सहज स्वतः स्फ़ूर्त प्रतिक्रियाओं को देख कर मुझे लगा कि फूल-पौधों से सरल, निर्मल आनंद का स्रोत और कुछ नहीं हो सकता.

(चन्दन सिन्हा पूर्व भारतीय प्रशासनिक सेवा अधिकारी, लेखक और अनुवादक हैं.)

(इस श्रृंखला के सभी लेख पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें.