मुझे इसका ज़रा भी ख़याल न था कि हमारे एक मूर्धन्य रघुपति सहाय ‘फ़िराक़’ की इस 28 अगस्त 2026 को 130वीं वर्षगांठ होगी. मुझे यह याद दिलाया मेरे सहपाठी और राजनयिक मित्र कमलेश शर्मा ने. हमने ‘शाम-ए-फ़िराक़’ 31 अगस्त को करने की योजना बनाई. यों तो फ़िराक़ जैसे कालजयी शायद को कभी भी याद किया जा सकता है और वह हमेशा हमारी आज की ज़िंदगी और हालात से जुड़ जाता है.
पर इस समय हम जिस व्यापक विस्मृति और अपनी संस्कृति की सामासिकता के क्षरण में फंसे हुए हैं उनमें लगता है कि ‘कुछ क़फ़स की तीलियों से छन रहा है नूर-सा’ जो कि फ़िराक़ की ही एक पंक्ति है.
फ़िराक़ की कविता का वितान कॉस्मिक से लेकर निपट स्थानीय तक फैला हुआ है. उसमें प्रेम, विरह, लगाव-अलगाव, सौन्दर्य और संघर्ष, हिंदी और संस्कृत की अंतर्ध्वनियां, अंधेरों की तीख़ी, शिनाख़्त, आत्मविश्वास, परंपरा की अनेक दुर्लभ स्मृतियां सब समायी हुई हैं. वे बरसों स्वतंत्रता-संग्राम और राजनीति में सक्रिय रहे. इस शिरकत और अनुभव ने उनकी कविता की अनुभव-संपदा में इज़ाफ़ा तो किया मगर उसके सौष्ठव और परिष्कार को रुखा-खुरदरा नहीं किया.
उनका कमाल यह भी था कि लगभग बातचीत के लहजे में साधारण को असाधारण बना देते थे: ‘गिरकर कहता है हर आंसू,/हम टूटे या तारा टूटा.’; ‘जो छिप के तारों की आंखों से पांव धरता है,/उसी के नक़्शे-कफ़े-पा से जल उठे हैं चिराग़.’; ‘कौन ये ले रहा है अंगड़ाई/आस्मानों को नींद आती है.’, ‘गुलों की जल्वागाहे-नाज़ में न ढूंढ अब मुझे,/मैं नक़्श था मिटा दिया, चिराग़ था बुझा दिया’, ‘ये ग़म की रात तो कटती नज़र नहीं आती,/इक और रात बनाओ, बहुत अंधेरा है’., ‘एक मुद्दत से तेरी याद भी आई न हमें, और हम भूल गए हों तुझे ऐसा भी नहीं.’
फ़िराक़ ने अपनी उर्दू कविता में अपने सांस्कृतिक-सामासिक उत्तराधिकार को कई बार अंतर्ध्वनित किया: ‘ग़ज़ल है या कोई देवी खड़ी है लट छिटकाये,/ये किसने गैसू-ए-उर्दू को यूं संवारा है.’, ‘सरज़मीने-हिन्द पर अक़वामे-आलम के फ़िराक़/क़ाफ़िले बसते गए हिन्दोस्तां बनता गया’. ‘जैसे तारों की चमक बहती हुई गंगा में/अहले-ग़म को यूं ही याद आओ कि कुछ रात कटे.’, ‘आ जा कि खड़ी है शाम पर्दा घेरे/मुद़्दत हुई जब हुए थे दर्शन तेरे/मग़रिब से सुनहरी गर्द उठी, सूए-काफ़/सूरज के अग्निरथ के घोड़े फेरे’., ‘ये तेरा शोला-ए-आवाज़ है कि दीपक राग, आ क़रीबो-दूर के चिराग़ हो गए रोशन’., ‘तहज़ीब की पहली सुबह की पाक दुआएं/गूंजी हुई हैं फ़जा में ऋषियों की सदाएं/ये गंगो-जमुन की गुनगुनाती लहरो देती हैं सुनाई तुमसे वेदों की ऋचाएं.’
प्रेम और विरह की अनेक तहें और जटिलताएं फ़िराक़ की शायरी में जगह पातीं और खुलती हैं. बेहद ऐन्द्रिय अनुराग और नाउम्मीदी के छोर सब वहां हैं. ‘तेरे ज़ुल्फ़ो-रुख़ का बदल ढूंढता हूं,/शबिस्तां-शबिस्तां, चराग़ां-चराग़ां.’, ‘सरक आई हैं जुल्फ़े ख़म-बसख़म रू-ए-दरख़्शां पर,/महकती छांव से आती है छनकर रोशनी तेरी.’, ‘जो तेरे गेसू-ए-पुरख़म से खेल भी न सकीं,/उन उंगलियों से सितारों को छेड़ सकता हूं.’, ‘किसी के हुस्न को आई हुई थी नींद-सी जैसे, मेरे अशआर में अंगड़ाइयां लेता उठा कोई.’, ‘वो रात ‘फिराक़’ है याद मुझे अब तक वो सुबह नहीं भूली,/जो कटते-कटते कटती थी, जो होते-होते होती थी.’, ‘वो तेरी याद है या ज़िंदगी का सानिहा कोई,/चिराग़ इक झिलमिलाता है जो माज़ी के शबिस्तां में.’ ‘हमको-तुमको फेर समय का ले आई ये हयात कहां,/हम भी वहीं है तुम भी वही हो लेकिन अब वो बात कहां.’, ‘दबे पांवों हवा बनकर वो जब दिल में सनकता है,/ये सहरा चौंक पड़ता है जो पता भी खड़कता है.’, ‘तबीयत अपनी घबराती है जब सुनसान रातों में,/हम ऐसे में तेरी यादों की चादर तान लेते हैं.’ आज भी काफ़िला-ए-इश्क़ रवां है कि जो था/वही मील और वही संगे-निशां हैं कि जो था.’
फ़िराक़ में एक तरह का उदास विवेक भी है:
ये दुनिया छूटती है, मेरे ज़िम्मे कुछ न रह जाए,
बता ऐ मंज़िले-हस्ती तेरा कितना निकलता है.
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देखिये लौ देता जाए कब तक आदम का गुनाह,
देखिये उठता है कब तक खूने-इंसां से धुआं.
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जिनको इतना याद करो हो, चलते-फिरते साये थे,
उनको मिटे तो मुद्दत गुज़री नामा-निशां क्या पूछो हो.
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ग़म का फ़साना सुननेवालो आख़िरे-शब आराम करो,
कल ये कहानी फिर छेड़ेंगे हम भी ज़रा अब सोले हैं.
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नए मंसूर हैं सदियों पुराने शेखो-काज़ी हैं,
न फ़तवे कुफ्रके बदले न उज्रे-दार ही बदला.
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सरहदे-ग़ैब तक मुझे साफ़ मिलेंगे नक़्शे-पा
पूछ न ये फिरा हूं मैं मेरे तेरे लिए कहां-कहां.
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तू एक था मेरे अशआर में हज़ार हुआ,
इस एक चिराग़ से कितने चिराग़ जल उट्ठे.
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मुझसे मशरिक़ की पेशानी हो जाती है रंगारंग,
मैं धरती का सोहाग हूं रोज़ उफ़क़ पर छलक जाता हूं.
नज़रुल-स्मृति
बांग्ला साहित्य और संस्कृति में रवींद्रनाथ ठाकुर के बाद काज़ी नज़रुल इस्लाम की बड़ी उपस्थिति रही है. बांग्लादेश न अपने स्वतंत्र देश बनने के बाद उन्हें अपना राष्ट्रीय कवि भी घोषित किया. वे एक विद्रोही कवि के रूप में बांग्ला साहित्य में सुप्रतिष्ठित हैं. उनके आसनसोल के निकट जन्मस्थान में हर वर्ष नज़रुल मेला होता था, जिसे सरकारी सहायता मिलना बंद हो गई थी. रज़ा फाउंडेशन ने अपने सीमित साधनों से मेले के आयोजन के लिए तीन वर्ष तक तीन लाख रुपये प्रतिवर्ष की सहायता दी थी. कोविड के समय यह सब बिखर गया. अब पता नहीं कि क्या स्थिति है.
हाल ही में दिल्ली में एक शाम नज़रुल को याद करते और नज़रुल गीति सुनते बीती. सभागार भर गया जिससे ज़ाहिर था कि नज़रुल में रुचि बनी हुई है.
नज़रुल ने स्वतंत्रता-संग्राम में भाग लिया था और काफ़ी अलग क़िस्म की पत्रकारिता भी की थी. उनके गद्य में बहुत अग्रगामी दृष्टि और लालित्य दोनों हैं. एक जगह उन्होंने लिखा:
‘पैगंबरों और अवतारों ने यह कभी नहीं कहा कि वे हिंदू या मुसलमान या ईसाई के लिए ही प्रगट होते हैं. उनका उद्घोष तो यह रहा है कि वे सकल मानवता के लिए अवतरित हुए हैं- जैसे कि प्रकाश सबके लिए होता है. फिर भी, कृष्ण भक्तों ने दावा किया कि कृष्ण हिंदुओं के हैं, मोहम्मद के अनुयायियों ने माना कि वे मुसलमानों के हैं और यीशु के पूजकों ने कि वे ईसाइयत के है. कृष्ण-मोहम्मद-ईसा देश की संपत्ति हो गए. इस मिल्कियत के कई नुक़सान हुए. लोग प्रकाश की किरणों के लिए कभी नहीं लड़ते पर वे गाय और बकरे के लिए लड़ते हैं. मुझे अच्छी तरह से याद है कि हम बचपन में सूरज के लिए झगड़ते थे. हमारा एक दल कहता था कि उसके यहां देखा गया सूरज पड़ोस में देखे गए सूरज से बड़ा होता था. उससे ज़्यादा गहरा यह विश्वास था कि हर पड़ोस में एक बिलकुल अलग सूरज उगता था.’
नज़रूल ने यह भी कहा: ‘आज सभी मनुष्यों का ईश्वर मंदिरों-मसज़िदों-गिरजाघरों की दीवारों में क़ैद है. मुल्ला और पुरोहित, पादरी और संत उस पर जेल वॉर्डनों की तरह निगरानी कर रहे हैं. शैतान अब खुदा के सिंहासन पर बैठ गया है.’
अन्यत्र उन्होंने लिखा: ‘सत्य आत्मोन्मीलित है. उसे किसी क्रुद्ध लाल आंखोंवाले राजदंड से रोका नहीं जा सकता. मैं वीणा हूं जो सनातन सत्य को झंकृत करती है. मैं ईश्वर के हाथ में वीणा हूं अगर टूटना है तो वह टूट सकती है लेकिन ईश्वर को कोई नहीं तोड़ सकता. यह एक शाश्वत सत्य है कि सत्य का अस्तित्व है और ईश्वर का भी. समय के आरम्भ से और सदा के लिए.’
विश्व साहित्य पर अपने एक विशद निबंध में नज़रुल ने अपेक्षा की: ‘हमें भी साहित्य में सार्वभौमिकता रचना चाहिए. हमें यह अपनी स्थानीय और राष्ट्रीय विशिष्टता गंवाये बिना कर सकना चाहिये. इससे फ़र्क नहीं पड़ता कि कौन कहां का है- हर व्यक्ति के हृदय में कुछ सच होते हैं, कुछ बहुत परिष्कृत भाव जो सभी देशों के लोगों में समान होते हैं. साहित्यिक कृतियां रचते समय हमें इन सूक्ष्म तत्वों को ध्यान में रखना चाहिए. … पाठक की आत्मा छू सकने की शक्ति तभी आ सकती है जब आपके पास अपनी आत्मा हो.’
(लेखक वरिष्ठ साहित्यकार हैं.)
