मनुस्मृति मानसिकता पर हमले के बाद राहुल गांधी ने अस्पृश्यता पर बहस छेड़ दी है. इस बहस में वे तीन तरह के लोगों को संबोधित कर रहे हैं- एक तो पूरे हिंदू समाज को, विशेषकर उसके ‘उच्च जाति’ समुदाय को, दूसरे दलित समुदाय को और तीसरे राजकीय तंत्र के पदाधिकारियों, यानी प्रशासनिक और पुलिस अधिकारियों को.
क्या राहुल गांधी को और उनकी पार्टी को इससे फायदा होगा?
एक बड़ा हिस्सा है जो इसे राहुल गांधी की राजनीतिक भूल मान रहा है. उसका कहना है कि मनुस्मृति पर आक्रमण के बाद अब अस्पृश्यता का मामला उठाकर राहुल गांधी ‘उच्च जाति’ समूहों को ख़ुद से दूर कर रहे हैं. इन आलोचकों के अनुसार दलित तो कांग्रेस को वोट देंगे ही, उनके पक्ष में बोलने से कांग्रेस के आधार में कुछ नहीं जुड़ेगा. अभी कांग्रेस की ज़रूरत ‘उच्च जाति’ समुदाय को अपने क़रीब लाने की है. लेकिन राहुल गांधी के स्टैंड से इसका उल्टा होगा.
तो क्या अब हम यह मान लें कि राजनेता जिसे सच मानते हैं, वह कभी भी नहीं बोलेंगे क्योंकि ऐसा करने से उनके कुछ वोटर उनसे बिदक जाएंगे?
मुझे आज़ाद भारत के पहले और दूसरे आम चुनावों की बात याद आती है. कांग्रेस के सबसे बड़े नेता ने बार-बार पार्टी को कहा कि ‘जहां तक मेरा सवाल है, मैं हर चुनाव हारने को तैयार हूं बजाय इसके कि संप्रदायवाद और जातिवाद को ज़रा भी तरजीह दूं.’
50 के दशक में कांग्रेस पार्टी बहुत मज़बूत थी और नेहरू की लोकप्रियता के बारे में तो कहना ही क्या! फिर भी नेहरू कह रहे थे कि अगर संप्रदायवाद और जातिवाद के विरोध के कारण चुनाव हारना पड़े तो उन्हें अफ़सोस न होगा.
1954 को प्रेस को संबोधित करते हुए उन्होंने कहा,
‘हम जिसे सांप्रदायिकता कहते हैं, उसकी आलोचना और निंदा इसलिए करते हैं कि वह भारत की एकता की व्यापक सहिष्णु अवधारणा के बिल्कुल विपरीत है- उस भावनात्मक एकता के, उस समेकित एकता के ख़िलाफ़ है, जिसकी हम बात करते हैं. सांप्रदायिकता अलगाव पैदा करती है, क्योंकि वह भारत को विखंडित करती है. लेकिन सांप्रदायिकता का एक दूसरा रूप जातिवाद है. मुझे लगता है कि इस बुराई और अभिशाप को समाप्त करने के लिए जितनी गहनता से हमें विचार करना चाहिए था, हमने उतना नहीं किया. हमने इसे मानो स्वाभाविक मान लिया है. और कभी-कभी मुझे डर लगता है कि हम इस बारे में खुलकर बोलने से इसलिए बचते रहे हैं कि कहीं कोई चुनाव न हार जाएं, कहीं यह समूह या वह जाति-समूह हमारे ख़िलाफ़ वोट न कर दे. लेकिन जहां तक मेरा सवाल है, मैं भारत में हर चुनाव हारने के लिए तैयार हूं, लेकिन सांप्रदायिकता या जातिवाद के सामने रत्ती भर भी समझौता करने के लिए तैयार नहीं हूं.’
परनाना नेहरू के सामने भी राहुल गांधी जैसी ही उलझन थी. कांग्रेस में तब भी ऐसे लोगों की बहुतायत थी जिन्हें संप्रदायवाद और जातिवाद के सक्रिय विरोध से भय लगता था क्योंकि इससे वोट कट जाने का ख़तरा था. फिर भी 50 के पूरे दशक में नेहरू इन दोनों प्रवृत्तियों पर हमला करने का कोई मौक़ा नहीं छोड़ते.
हमें कुछ ताज्जुब हो सकता है कि नेहरू के गुजर जाने के 62 साल बाद भी इन दोनों पर बात करना ख़तरनाक माना जाता है. राहुल गांधी ने जब अस्पृश्यता को अपराध कहा और उसकी गंभीरता की तरफ़ ध्यान खींचा तब फिर कोई 70 साल पहले के नेहरू का एक भाषण याद आया जिसमें उन्होंने अस्पृश्यता के ख़िलाफ़ समझौताविहीन संघर्ष चलाने की बात कही थी:
”हमने अस्पृश्यता के उन्मूलन को अपने संविधान और अपने क़ानूनों में स्थान दे दिया है, लेकिन सच्चाई यह है कि जब आप हमारे किसी भी गाँव में जाते हैं, तो वह पुरानी और घृणित भावना आज भी वहां बनी हुई मिलती है. यहां तक कि कुएं से पानी पीने जैसी साधारण बातों के मामले में भी उन्हें कठिनाइयां और कष्ट झेलने पड़ते हैं.
यह एक बुरी बात है, एक घोर बुराई है; और आज इसके ख़िलाफ़ बिना किसी रहम के, बिना किसी समझौते के लड़ना होगा.’
नेहरू के वक्त से आज के वक्त में एक तब्दीली आई है. चूंकि अस्पृश्यता क़ानूनन जुर्म है, अब खुलेआम छुआछूत करने से लोग परहेज़ करते हैं. फिर भी कई बार तो ऐसा सार्वजनिक तौर पर किया जाता है. जैसे गांव के ‘सवर्ण’ बच्चे स्कूल के दोपहर के खाने का बहिष्कार करते हैं अगर खाना बनाने वाली दलित हो. इसके ख़िलाफ़ कोई संगठन या पार्टी कभी सामाजिक जागरण अभियान नहीं चलाती. क्या इस डर से कि इससे ‘सवर्ण’ जातियां चिढ़ जाएंगी?
अस्पृश्यता आज अधिकतर अप्रत्यक्ष रूप से बरती जाती है. अब आप किसी दलित को कहीं जाने, बैठने, किसी चीज़ को छूने से रोक नहीं सकते. ऐसा करना जुर्म है. तो फिर किया यह जा सकता है कि जिस स्थान पर कोई दलित खड़ा हुआ हो या जिसका किसी तरह उपयोग किया हो, उसे वापस अपने उपयोग के लायक बनाने के लिए उस जगह को शुद्ध किया जाए.
राहुल गांधी के वक्तव्य के बाद हर तरफ़ से कहा जाने लगा कि अस्पृश्यता बीती हुई बात है. लेकिन उसी के साथ इसके प्रमाण भी लिखित और वीडियो की शक्ल में सामने आने लगे कि अस्पृश्यता आज भी चलन में है. सार्वजनिक स्थलों पर दूरी बनाए रखने से लेकर, कुछ जगहों को दलितों के लिए निषिद्ध बनाकर छुआछूत ही किया जाता है.
लेकिन सबसे निरापद तरीक़ा है शुद्धीकरण का. शुद्धीकरण तो अशुद्धि के बाद ही किया जाता है. वह जगह या वस्तु इसलिए अशुद्ध हो जाती है कि एक ‘दूषित’ देह उसे स्पर्श करती है. देह का दूषण उस वस्तु में संक्रमित होता है. उस दूषण से मुक्ति का उपाय शुद्धि है. अगर क़ानून न होता तो उस ‘दूषित’ देह को यह दुस्साहस ही न करने दिया जाता. वैसा नहीं किया जा सकता, इसलिए शुद्धि करके अपने धर्म को बचाया जा सकता है. इसका मतलब ही यह है कि शुद्धि की आवश्यकता नहीं है अगर अस्पृश्यता का ख़याल न हो.
यह तर्क ग़लत है कि शुद्धि से किसी का अपमान नहीं होता. जब किसी के स्पर्श के बाद किसी स्थान या वस्तु को शुद्ध किया जाता है तो वास्तव में उस स्पर्श को मिटाया जाता है. उस ‘दूषित’ देह के ‘दूषण’ से मुक्त करके ही किसी जगह या वस्तु का इस्तेमाल किया जा सकता है.
शुद्धि-व्यापार से यह भी बतलाया जाता है कि शरीरों में एक दर्जाबंदी है. एक ही प्रकार की देह से दूषण उत्पन्न होता है. वह देह दलित की है. दलित कभी शुद्धि नहीं करते. वह अधिकार ‘उच्च जाति’ के लोगों को है. इस तरह शुद्धि स्पष्ट रूप से भेदभाव है. और भेदभाव अपराध है.
राहुल गांधी शुद्धीकरण के आपराधिक चरित्र पर ज़ोर दे रहे हैं. इससे सवर्ण तबके में बेचैनी हो सकती है. वे कह सकते हैं कि उनके एक सामाजिक आचार का पालन जुर्म नहीं हो सकता क्योंकि इससे वे अपने लिए जगह बना रहे हैं, सीधे किसी पर इसका असर क्यों पड़ना चाहिए! लेकिन बिना उन्हें यह बताए कि यह अपराध है, इस समाज में अस्पृश्यता के विचार की शुद्धि के रूप में छलपूर्ण उपस्थिति को समझा नहीं जा सकता.
राहुल गांधी यह तो कह ही रहे हैं कि अस्पृश्यता सामाजिक कुरीति है लेकिन वे पुलिस और प्रशासन को याद दिला रहे हैं कि उनका कर्तव्य इस अपराध की पहचान करके उसके ख़िलाफ़ कार्रवाई का है. यह उनका संवैधानिक कर्तव्य है. पुलिस इसमें कोताही करके इस अपराध को बढ़ावा दे रही है.
जो लोग देशप्रेम, देशद्रोह की भाषा में ही बात करते हैं उन्हें यह समझना चाहिए कि अस्पृश्यता भारत के राष्ट्र बनने के रास्ते में बड़ी बाधा है. बिना बराबरी और साझेदारी के अहसास के लोग एक ही राष्ट्र के सदस्य कैसे हो सकते हैं. इस तरह अस्पृश्यता उनके लिए राष्ट्रद्रोह होना चाहिए.
मल्लिकार्जुन खरगे ने संसद में कहा कि आज तक उन्होंने अपने दलित होने के कारण कोई सुरक्षा नहीं मांगी है, लेकिन उनके स्पर्श से किसी स्थल को अशुद्ध माने जाने से वे अपमानित महसूस कर रहे हैं. उन्हें कमतरी का अहसास कराया गया है. इससे उन्हें पीड़ा हुई है.
खरगे साहब की पीड़ा को समझना क्यों हमारे लिए इतना कठिन है? क्यों शुद्धि के भेस में छिपी अस्पृश्यता को हम पहचान नहीं पाते?
(लेखक दिल्ली विश्वविद्यालय में पढ़ाते हैं.)
