बातचीत से सुलझाएं राम मंदिर और बाबरी मस्जिद विवाद: सुप्रीम कोर्ट

भाजपा नेता सुब्रमण्यम स्वामी द्वारा इस मामले पर जल्दी फैसला देने की मांग के जवाब में सुप्रीम कोर्ट ने इसे अदालत से बाहर सुलझाने की सलाह दी है.

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(फोटो: पीटीआई)

भाजपा नेता सुब्रमण्यम स्वामी द्वारा इस मामले पर जल्दी फैसला देने की मांग के जवाब में सुप्रीम कोर्ट ने इसे अदालत से बाहर सुलझाने की सलाह दी है.

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(फोटो : पीटीआई)

दशकों से चले आ रहे राम मंदिर और बाबरी मस्जिद विवाद मंगलवार को सुप्रीम कोर्ट ने सुझाव देते हुए कहा कि दोनों पक्षों को कोर्ट के बाहर बात करके सर्वसम्मति से यह मुद्दा सुलझाना चाहिए. शीर्ष कोर्ट द्वारा यह टिप्पणी तब की गई जब भाजपा नेता सुब्रमण्यम स्वामी ने इस मामले पर तत्काल सुनवाई की मांग की.

कोर्ट ने इस मुद्दे को संवेदनशील और भावनात्मक मुद्दा बताते हुए संबंधित पक्षों से इस पर नए सिरे से बातचीत शुरू करने को कहा है. उन्होंने यह भी कहा कि वे इसके लिए मध्यस्थ भी नियुक्त कर सकते हैं. अगर बातचीत से इस मामले का हल नहीं निकलता है तब ही वे इस पर कुछ कहेगा.

मुख्य न्यायाधीश जस्टिस जेएस खेहर की अध्यक्षता वाली तीन जजों की इस पीठ में न्यायमूर्ति डीवाई चंद्रचूड़ और न्यायमूर्ति एसके कौल भी शामिल थे. उन्होंने यह भी कहा कि अगर दोनों पक्ष चाहें तो वे मध्यस्थता करने के लिए भी तैयार हैं. साथ ही अगर ज़रूरत पड़ी तो कोर्ट प्रधान वार्ताकार भी नियुक्त कर सकता है.

पीठ ने स्वामी से कहा कि वे दोनों पक्षों से सलाह और बातचीत करें और 31 मार्च तक कोर्ट को अपने फैसले के बारे में सूचित करें.

गत वर्ष 26 फरवरी को सुप्रीम कोर्ट ने ध्वस्त किए गए विवादित ढांचे के स्थल पर राम मंदिर के निर्माण की मांग करने वाली स्वामी की याचिका के साथ उन्हें अयोध्या विवाद से संबंधित लंबित मामलों में बीच बचाव करने की अनुमति दी थी.

कोर्ट के इस सुझाव के बाद स्वामी ने मीडिया से बात करते हुए कहा, ‘हम तो शुरू से तैयार हैं कि मंदिर भी बनना चाहिए, मस्जिद भी बननी चाहिए, पर मस्जिद सरयू नदी के उस तरफ बननी चाहिए और विवादित राम जन्मभूमि पूर्ण रूप से राम मंदिर के लिए दे दी जानी चाहिए. 1994 में तत्कालीन नरसिम्हा राव सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में एफिडेविट दिया था कि अगर कभी सिद्ध हो जाए कि इस ज़मीन पर पहले मंदिर था, फिर मस्जिद बनी,  तो यह ज़मीन हिंदुओं को दे देंगे. एफिडेविट के आधार पर इलाहाबाद हाईकोर्ट ने भारतीय पुरातात्विक सर्वेक्षण को इसकी जांच सौंपी थी, जिन्होंने दो साल की जांच के बाद उन्होंने कहा कि एक विशाल मंदिर मस्जिद के नीचे है. मस्जिद नमाज़ पढ़ने की जगह है और नमाज़ कहीं भी पढ़ी जा सकती है. मेरा सुझाव है कि सरयू नदी के उस पार मस्जिद बने और यह ज़मीन मंदिर के लिए सौंप दिया जाए. हम बातचीत के लिए तैयार हैं, हम चाहते हैं कि ऐसा न्यायिक देखरेख में हो.’

जस्टिस खेहर ने यह भी कहा कि इसका कारगर हल निकालने के लिए ‘थोड़ा लें-थोड़ा दें’ का रुख अपनाना होगा.

क्या योगी आदित्यनाथ के उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री बनने का कोर्ट के इस सुझाव से कोई संबंध है? संघ विचारक राकेश सिन्हा कहते हैं, ‘ये केवल संयोग है कि कोर्ट ने प्रदेश में योगी सरकार आने के बाद कोई राजनीतिक फैसला न देने का निर्णय लिया. मुझे लगता है सुप्रीम कोर्ट का यह फैसला सही है.’

जहां उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ सहित वरिष्ठ नेता लालकृष्ण आडवाणी, विनय कटियार, महेश शर्मा और उमा भारती जैसे कई भाजपा नेताओं ने इस फैसले का स्वागत किया है, पर कुछ मुस्लिम नेता ख़ुश नज़र नहीं आए.

बाबरी मस्जिद कमेटी के जॉइंट कन्वेनर डॉ. एसक्यूआर इलयास ने सीएनएन-न्यूज़-18 से बात करते हुए कहा, ‘इस मसले पर कई बार बातचीत हो चुकी है, जिसका कोई हल नहीं निकला. विहिप और बाबरी मस्जिद कमेटी भी साथ मिलकर कोई समाधान नहीं निकाल सके. हर तरह की मध्यस्थता हो चुकी है. इस मुद्दा क़ानूनी रूप से ही हल हो सकता है न कि भावनात्मक रूप से. हम इस बात से सहमत नहीं हैं कि चीफ जस्टिस इस मामले में मध्यस्थ की भूमिका निभाएं.’

बाबरी मस्जिद एक्शन कमेटी के कन्वेनर ज़फ़रयाब जिलानी का कहना था कि 27 सालों से इस मसले पर बात ही हो रही है पर आज तक कोई हल नहीं निकला. अगर सुप्रीम कोर्ट मध्यस्थता करने की बात कह रहा है तो हम उस पर भरोसा करते हैं. उन्होंने यह भी साफ़ किया कि उन्हें नहीं लगता कि शीर्ष कोर्ट राजनीतिक दबाव में आकर ऐसा कह रहा है.

वहीं बाबरी मसले के सबसे पुराने पक्षकार रहे हाशिम अंसारी के बेटे इकबाल अंसारी का कहना है कि अगर बातचीत से इस मसले का हल निकलता है तो हमें कोई परेशानी नहीं है. यही मानना इस्लामिक धर्मगुरु राशिद फिरंगी महली का भी है. उन्होंने इस मुद्दे पर सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी को सही बताते हुए कहा कि हम सुप्रीम कोर्ट के कहे का सम्मान करते हैं.

इसके इतर हिंदू महासभा, जो राम जन्मभूमि मामले का एक याचिकाकर्ता है, के वकील हरिशंकर जैन का कहना है, ‘हमें किसी तरह का गैर-अदालती समाधान स्वीकार्य नहीं है. सुब्रमण्यन स्वामी को पहले यह बात सुनिश्चित करनी चाहिए कि दूसरा पक्ष अपना दावा ख़ारिज करने को तैयार हो. हम हिंदुओं की भावनाओं से नहीं खेल सकते. इस मसले पर कोई समझौता मुमकिन नहीं है. जिस तरह बाबरी मस्जिद एक्शन कमेटी एक इंच ज़मीन छोड़ने को नहीं तैयार है, उसी तरह हम भी पीछे नहीं हटेंगे.’

(समाचार एजेंसी भाषा से इनपुट के साथ)