सावन का महीना डीजे वाले बाबू के साथ

धर्म का एक अभिप्राय है अपने अंदर झांककर बेहतर इंसान बनने की कोशिश करना और दूसरा स्वरूप आस्था के बाज़ारीकरण और व्यवसायीकरण में दिखता है. आस्था के इसी स्वरूप की विकृति कांवड़िया उत्पात को समझने में मदद करती है.

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धर्म का एक अभिप्राय है अपने अंदर झांककर बेहतर इंसान बनने की कोशिश करना और दूसरा स्वरूप आस्था के बाज़ारीकरण और व्यवसायीकरण में दिखता है. आस्था के इसी स्वरूप की विकृति कांवड़िया उत्पात को समझने में मदद करती है.

Kanwad Moti Nagar ANI
दिल्ली के मोती नगर में उपद्रव करते कांवड़िये (फोटो साभार: एएनआई)

सावन के महीने में कांवड़ लेकर जाने का प्रचलन पुराना है. हरिद्वार-गंगोत्री की तरफ लोग जाते हैं. छोटे स्तर पर भी ये प्रथा काफी प्रचलित है. बिहार-झारखंड में लोग ‘बाबा धाम’ जाते हैं. नंगे पांव चल कर, गंगा नदी से पानी उठाकर, समूह में बोल बम बोल बम का नारा लगाकर, देवघर के प्रसिद्ध शिवलिंग पर जल चढ़ाते हैं. पांव में छाला पड़ जाए तो पुण्य की प्राप्ति और यात्रा की गरिमा थोड़ी बढ़ जाती है.

वैसे, कांवड़ियों की जो तस्वीरें आजकल सामने आ रही हैं वो थोड़ी अनूठी हैं. भक्ति की सादगी और यात्रा के पुण्य के मायने बदल गए हैं. पांव में जूते हैं और आंखों पर चश्मा लग गया है. ये अपने आप में कोई गलत बात नहीं है वैसे. ग्लोबल वॉर्मिंग का युग है. धूप और गरमी है और खुद की हिफाज़त ज़रूरी है.

धार्मिक आस्था और अनुष्ठान का स्वरूप वक्त के साथ बदलता ही है, लेकिन हाथों में बेसबॉल के बैट भी खुद के हिफाज़त के लिए है या दूसरों की धुलाई के लिए, ये गौरतलब है.

एक तरफ पूरे महीने मीट-मुर्गा तो छोड़ दीजिए, प्याज-लहसुन तक लोग नहीं खाते हैं, और दूसरी तरफ ज्वाला से भरी आग सड़कों पर निकल कर सामने आ रही है. ये हिंसात्मक क्रोध ‘तामसिक’ खाने के कारण तो बिल्कुल भी नही है.

ज़ाहिर तौर पर ये हिंसात्मक उत्पात और उपद्रव क़ानून और उसकी रक्षा पर सवाल खड़ा कर देते हैं.

सुप्रीम कोर्ट ने इसी हवाले से कहा है कि कांवड़ियों द्वारा मचाए गए उत्पात और संपत्ति की हानि पर कड़े कदम उठाए जाने चाहिए. सार्वजनिक जगहों पर ‘क़ानून का राज’ निस्सन्देह आवश्यक है. लेकिन तीर्थयात्रा के बदलते सामाजिक मायने पर भी एक नज़र डालना चाहिए.

ज़रूरी नहीं है कि प्रतिदिन आ रहे कांवड़ उपद्रव की ख़बर को धर्म के ही गेरूआ रंग के चश्मे से ही देखा जाए. मौजूदा राजनीतिक माहौल में कुछ लोग ऐसा करें, ये बिल्कुल मुमकिन है.

कुछ लोग ये सवाल दाग ही सकते हैं कि अगर ये उपद्रव हरे रंग वाले हज्जी यात्री करते तो सरकारें, प्रशासन और काले कोट वाले प्राइम टाइम एंकर क्या कहते और क्या करते. क्या उन पर फिर भी फूल बरसाए जाते.

जिस रफ़्तार से मीडिया के मॉनिटरिंग की ख़बरें आ रहीं हैं, जो सिर्फ एक इंसान और एक विचारधारा के मार्केटिंग का ज़रिया बनकर सिमट रही है, कुछ गरमा-गरमी की बातें तो ज़रूर उठतीं. कुछ हो न हो, कुछ एक-आध दफ़ा प्रतिबंध लफ़्ज़ ज़रूर सुनायी देता.

कांवड़ का प्रचलन कितना पुराना है, ये तय कर पाने के लिए तो इस विषय पर शोध करना होगा. बहुत मुमकिन है पहले इसका प्रचलन स्थानीय रहा हो.

कुछ रिपोर्ट्स बतलाते हैं कि 1980 के दशक से ये व्यापक पैमाने पर होने लगा. बात शायद ठीक ही हो. यही वो दशक है जब वैष्णो देवी का भी दर्शन विस्तृत पैमाने पर होने लगा था. इसे अन्यथा न लिया जाए लेकिन ऐसा लगता है कि धार्मिक तीर्थस्थलों का भी एक फैशन-चक्र होता है. कभी कोई देवी या देवता फैशन में आ जाते हैं तो कभी कोई और.

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मेरठ में निकलते कांवड़िये (फोटो: पीटीआई)

याद आता है, नब्बे का दशक जब गणेशजी सर्वव्यापी हो गए थे. आर्चीज़ के छोटे-छोटे सुंदर क्रिस्टल के गणेशजी लगभग हर मध्यमवर्गीय घर में पाए जाते थे. कहीं दीवार से टंगे तो कहीं मेज़ पर रखे. कहने का मात्र ये अर्थ है कि वो पूजाघर से बाहर आकर ड्रॉइंग रूम में सजावट की अन्य वस्तुओं के साथ घुल-मिल गए थे.

नब्बे का दशक उन्नति का दशक था. कम से कम ऐसा माना जाता था. एक तरफ राज और राहुल के किरदार स्विट्ज़रलैंड के वादियों और लंदन की सड़कों पर बाहें फैलाये देशी-इश्क़ कर रहे थे, दूसरे तरफ प्रतिष्ठा और परंपरा के नाम पर के-सीरीज के सीरियल घर और समाज में संस्कार को सुसज्जित कर रहे थे.

आधुनिकता और आर्थिक उदारवादिता के संदर्भ में बहुत लाज़िमी हो कि शुभ लाभप्रद कार्य के लिए गणेशजी की लोकप्रियता बढ़ गयी हो.

यह एक सामाजिक विश्लेषण की कोशिश है न कि धार्मिक आस्था पर कोई कटाक्ष. आजकल के परिवेश में यह बात दोहरा देना ज़रूरी है. लेकिन आस्था भी सामाजिक परिवर्तनों से जुड़ी होती है.

धर्म समाज का अंग होता है, इसीलिए वह सामाजिक विश्लेषण के दायरे से बाहर नही है. आर्थिक संभावनाओं के दायरे से भी अछूता नही है. ये बात तो सब मानेगें कि आर्थिक समृद्धि आने से तीर्थस्थलों और मंदिरों में भेंट और चढ़ावे की राशि बढ़ जाती है. कुछ मिन्नतें और मिनौती दर्द और दुख में मांगी जाती है, कुछ समृद्धि और संपन्नता के लिए. दूसरे धर्मों में भी ऐसा ही होता होगा.

गली-गली में ज्योतिष केंद्र खुले हुए हैं. कुछ लोगों को शायद अलग-अलग रंगों के अंगूठियां पहनने के लिए उंगलियां कम पड़ रहीं है. टीवी पर बाबाओं और विशेषज्ञों का तांता लगा हुआ है. धर्म का एक अभिप्राय है अपने अंदर झांककर बेहतर इंसान बनने की कोशिश करना. इसका दूसरा स्वरूप आस्था के ‘बाज़ारीकरण’ और ‘व्यवसायीकरण’ में दिखता है.

आस्था के इसी दूसरे वाले स्वरूप की विकृति कांवड़िया उत्पात को समझने में मदद करती है. पिछले बीस से तीस साल के आधुनिकता का असर हमारे शहरों पर भी आसानी से दिख रहा है. शहरों की सीमा निरंतर बढ़ती जा रही है.

गाड़ियों की संख्या भी उसी रफ़्तार से बढ़ रही है. सड़कें तंग होती जा रही हैं और कारों की लंबाई दुगनी. पहले ब्रेड एंड बटर कार चलता था, अब एक्स्ट्रा लार्ज साइज़ के डिब्बे पहियों पर दौड़ते हैं. साइज़ भी बढ़ गयी है और रफ़्तार की चाहत भी.

आख़िरकार, जितनी भी कांवड़िया उत्पात की घटनाएं सामने आयीं हैं उन सब में कार का होना मौजूद है. लेकिन, ये लड़ाई सिर्फ सड़कों पर आज़ादी की नही हैं. सवाल अधिकार का सिर्फ नहीं है कि सावन के महीने में कारें चलेंगी या कांवड़ियां चलेंगे.

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फोटो: पीटीआई

पिछले कुछ वर्षों से सरकारें स्कूल और कॉलेज बंद करवा रहे हैं ताकि सड़कों पर बसों की संख्या कम हो जाए. लेकिन स्थिति बदल गयी हो, ऐसा लग तो नहीं रहा है. इस मुठभेड़ को इसीलिए क़ानून की विफलता के बाहर से भी देखने की ज़रूरत है.

ये नए आस्था के नए स्वरूप को दिखलाता है. सावन पर बहुत से गीत हैं. लोकगीतों में सावन के गीत अक्सर गाए जाते हैं. उन्नीसवीं शताब्दी के अंत और बीसवीं के शुरू में छोटी छोटी पुस्तिकाएं छपती थीं इन गीतों की. ‘सावन सोहाग’ और ‘सावन दर्पण’ – इन तरहों के नामों से.

यह प्रेमी-प्रेमिका के अलग अलग होने के तड़पने का महीना है. सावन प्रतीकात्मक है मिलन के होने का. कारे बादल, मोर पपीहा, अंगना का झूला, सखियों का गाना – ये सारे सावन को अनुपम बना देते हैं. कारे बादल और कारे नैन जादू चलाते हैं.

आजकल एक और जादू चल रहा है. वो है डीजे वाले बाबू का. ये गीत कांवड़ियों के बीच प्रचलित हो गया है. वैसे तो तीर्थ का राजनीतिकरण नही होना चाहिए, लेकिन लुत्फ़ उठाइए सावन के इस नए गीत का. ये गीत सावन पर है या योगी जी पर, ये बात आप खुद तय करें:

डीजे बजवा दिए योगी ने,

रंग जमा दिए योगी ने,

भोले नचवा दिए योगी ने…

 

अखिलेश ने हुक्म सुनाया था

डीजे में बैन लगाया था,

2017 के इलेक्शन में

भोलों ने इसे हराया था,

छक्के छुटवा दिए योगी ने

रंग जमा दिए योगी ने…

 

ये गोरखनाथ का चेला है

अंगारों से खेला है,

बहू-बेटियों को जिसने छेड़ा

उसे पकड़-पकड़ कर पेला है,

गुंडे मरवा दिए योगी ने

रंग जमा दिए योगी ने…

 

ये भक्तों की सम्मान करें

ये हवन-कीर्तन दान करें,

पीएम बनेगा यूपी भारत का

ऐसा लोग अनुमान करें,

ऐसे करम कमा दिए योगी ने…

(लेखक जे़डएमओ के सेंटर फॉर मॉडर्न ओरिएंटल स्टडीज़, बर्लिन में सीनियर रिसर्च फेलो हैं.)