पिंजरा तोड़: दिल्ली से निकला आंदोलन विभिन्न राज्यों के कॉलेज और विश्वविद्यालयों तक पहुंचा

छात्राओं के हॉस्टल वापस आने की टाइमिंग, मोरल पुलिसिंग, यौन प्रताड़ना और भेदभावपूर्ण नियमों के ख़िलाफ़ शुरू हुआ पिंजरा तोड़ आंदोलन अब कई राज्यों के कॉलेज और विश्वविद्यालयों में होने लगा है.

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Kolkata: Students of Jadavpur University protest against the university's decision to scrap entrance tests for undergraduate courses, at Jadavpur University in Kolkata on Thursday, July 5, 2018. (PTI Photo) (PTI7_5_2018_000188B)
Kolkata: Students of Jadavpur University protest against the university's decision to scrap entrance tests for undergraduate courses, at Jadavpur University in Kolkata on Thursday, July 5, 2018. (PTI Photo) (PTI7_5_2018_000188B)

छात्राओं के हॉस्टल वापस आने की टाइमिंग, मोरल पुलिसिंग, यौन प्रताड़ना और भेदभावपूर्ण नियमों के ख़िलाफ़ शुरू हुआ पिंजरा तोड़ आंदोलन अब कई राज्यों के कॉलेज और विश्वविद्यालयों में होने लगा है.

Punjabi University Patiala
पंजाबी विश्वविद्यालय में लड़कियों के हॉस्टल में कर्फ्यू टाइम को लेकर भूख हड़ताल में छात्रों ने भी साथ दिया.(फोटो: सृष्टि श्रीवास्तव/द वायर)

देश की राजधानी नई दिल्ली स्थित जामिया मिलिया इस्लामिया और दिल्ली विश्वविद्यालय के विभिन्न कॉलेजों में छात्राएं पिछले तीन सालों में कई बार कैंपस के भेदकारी नियम-क़ानून और कर्फ़्यू टाइम (हॉस्टल में आने-जाने के समय को लेकर पाबंदी) के ख़िलाफ़ लगातार अभियान चलाती रहीं है.

इस अभियान को ‘पिंजरा तोड़’ अभियान दिया गया है. यह अभियान अब देश के दूसरे राज्यों के विश्वविद्यालयों और कॉलेजों में पहुंच चुका है.

ओडिशा की राजधानी भुवनेश्वर, मध्य प्रदेश की राजधानी भोपाल, पंजाब के अजमेर शहर स्थित रीजनल इंस्टिट्यूट ऑफ एजुकेशन (आरआईई), छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर स्थित हिदायतुल्ला नेशनल लॉ यूनिवर्सिटी (एचएनएलयू), पंजाब के पटियाला शहर स्थित पंजाबी विश्वविद्यालय और केरल के कोट्टायम मेडिकल कॉलेज में भी अब ऐसे अभियान ज़ोर पकड़ने लगे हैं.

महत्वपूर्ण बात यह भी है कि भले ही दिल्ली में छात्राओं को अभी उनके संघर्ष में जीत न मिली हो लेकिन भोपाल, रायपुर और केरल की छात्राओं ने अपनी बहुत सी मांगें प्रशासन से मनवा ली हैं.

इन भोपाल के रीजनल इंस्टिट्यूट ऑफ एजुकेशन, रायपुर के हिदायतुल्ला नेशनल लॉ यूनिवर्सिटी और केरल के कोट्टायम मेडिकल कॉलेज की छात्राएं कर्फ्यू टाइम को आगे बढ़वाने में सफल रहीं हैं.

छात्राओं का कहना है कि इन तीन कैंपस पर वे कर्फ्यू टाइम पूरी तरह से ख़त्म तो नहीं करा पाई हैं पर इसे बढ़वा पाना भी एक बड़ी जीत है. लड़कियों का रात को लाइब्रेरी में बैठकर पढ़ पाना भी उनके लिए बड़ी बात है क्योंकि यह इतिहास में पहले कभी नहीं हुआ था.

दिल्ली हो, रायपुर या केरल, यहां पढ़ने वाली छात्राओं की कहानी एक जैसी है. वे बताती हैं कि विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (यूजीसी) के नियमों के बावजूद कैंपस में छात्र-छात्राओं के लिए भेदकारी नियम हैं.

उनके अनुसार, प्रशासन से पूछो तो प्रशासन कहता है कि नियम तो लड़कों के लिए भी हैं पर असल में वो नियम बस दिखाने के लिए कागज पर लिखे हुए हैं. लड़कों पर किसी तरह की रोक-टोक नहीं होती वे नियमों के बावजूद कभी भी आ-जा सकते हैं.

हर जगह की छात्राएं एक जैसी ही बात बताती हैं कि उन्हें वयस्क महिलाओं की तरह नहीं समझा जाता, प्रशासन बात-बात पर अभिभावकों को संपर्क कर उनके बारे में निर्णय लेने को कहता है.

इसके अलावा लगभग हर कैंपस की लड़कियां ड्रेस कोड और मोरल पुलिसिंग से परेशान हैं और बहुत से विश्वविद्यालयों में यौन उत्पीड़न की समस्या के लिए कोई व्यवस्थित प्रणाली भी विकसित नहीं की गई है.

कैंपस में यौन उत्पीड़न की समस्या से निपटने के लिए एक व्यवस्थित प्रणाली का न होना छात्राओं के लिए एक बड़ी समस्या है.

पिछले साल दिल्ली स्थित जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय (जेएनयू) में कार्यकारी परिषद द्वारा लैंगिक मुद्दों पर संवेदनशीलता लाने के लिए बनी जेंडर सेंसटाइज़ेशन कमेटी अगेंस्ट सेक्सुअल हैरेसमेंट (जीएसकैश) को भंग कर दिया गया.

उसकी जगह आंतरिक शिकायत समिति का गठन किया गया था. छात्र-छात्राएं इसके विरोध में लंबे समय तक प्रदर्शन करते रहे क्योंकि उन्हें डर था कि यौन उत्पीड़न की समस्या से निपटने वाली किसी प्रणाली पर प्रशासन का नियंत्रण न हो.

इसी तरह दिल्ली विश्वविद्यालय की छात्राएं भी इस बात के विरोध में लंबे समय तक प्रदर्शन करती रही हैं कि हर विद्यालय में आंतरिक शिकायत समिति का गठन हो और उसके लिए बाकायदा चुनाव काराए जाएं जिससे यह समिति स्वायत्त रूप से काम कर सके.

दिल्ली में जहां यौन उत्पीड़न की समस्या से निपटने के लिए इस स्तर की डिबेट हो रही है, वहीं रायपुर स्थित हिदायतुल्ला नेशनल लॉ यूनिवर्सिटी (एचएनएलयू) और पटियाला स्थित पंजाबी विश्वविद्यालय में स्थिति एकदम उलट है.

एचएनएलयू में छात्र-छात्राओं ने लगभग एक महीने लंबा आंदोलन चलाकर अपना कर्फ्यू टाइम आगे बढ़वाया. साथ ही छात्र-छात्राओं के प्रदर्शन के सामने कुलपति सुखपाल सिंह को इस्तीफा भी देना पड़ा.

यहां लॉ की पढ़ाई करने वाली जया बताती हैं कि कुलपति सुखपाल सिंह ने कभी भी यौन उत्पीड़न की समस्या को ठीक से निपटने की कोशिश नहीं की.

वे कहती हैं, ‘जब कुलपति सुखपाल सिंह से पूछा गया कि यौन उत्पीड़न की शिकायत पर उन्होंने आज तक क्या किया तो उन्होंने जवाब में कहा- मैंने उस आरोपी प्रोफेसर को बुलाया और कहा भाई अगली बार से ऐसा मत करना.’

मालूम हो कि पटियाला के पंजाबी विश्वविद्यालय में भी कर्फ्यू टाइम को पूरी तरह ख़त्म करने की मांग को लेकर छात्र-छात्राएं पिछले 15-20 दिन से प्रदर्शन कर रहे हैं.

जब प्रशासन ने इनकी बात नहीं मानी तो छात्र-छात्राएं पिछले हफ्ते से भूख हड़ताल पर भी बैठ गए हैं. यहां पर पंजाबी की पढ़ाई करने वाली किरण बताती हैं, ‘हाल ही में प्रदर्शन के दौरान दो छात्र समूहों में झड़प हो गई. हम लड़कियों को स्टूडेंट एसोसिएशन ऑफ पटियाला के लड़कों द्वारा छेड़ा गया, धक्का दिया गया. इस बात की शिकायत के लिए जब हम प्रशासन के पास गए तो हमें पता चला जिस जीएसकैश की बात यह लोग करते हैं उसका न तो कोई ऑफिस है न ही किसी को पता है कि किसके पास शिकायत करनी है. इस समिति को प्रशासन अपने हिसाब से चलाता है.’

हिदायतुल्ला नेशनल लॉ यूनिवर्सिटी में भूख हड़ताल पर बैठे छात्र( फोटो साभार: फ़ेसबुक)
रायपुर स्थित हिदायतुल्ला नेशनल लॉ यूनिवर्सिटी में भूख-हड़ताल पर बैठे छात्र छात्राएं. (फोटो साभार: फेसबुक)

भोपाल स्थित रीजनल इंस्टीट्यूट ऑफ एजुकेशन (आरआईई) और आरआईई अजमेर में छात्राओं के विरोध प्रदर्शन के बाद अब आरआईई भुवनेश्वर की क़रीब 400 छात्राएं 28 सितंबर से कैंपस के भेदकारी नियमों और प्रशासन के रवैये के ख़िलाफ़ प्रदर्शन शुरू कर चुकी हैं.

28 सितंबर को तेज़ बारिश में भी छाता लिए क़रीब 400 छात्राएं सड़कों पर आकर ‘आरआईई का पिंजरा तोड़’ और महिलाओं की आज़ादी के नारे लगा रहीं थी.

बीएड तीसरे साल में पढ़ने वाली एक छात्रा ने नाम न बताने की शर्त पर कहा, ‘हमें प्रशासन द्वारा हम पर थोपे गए नियम का कोई तर्क नहीं समझ आता. हमारा कॉलेज 5:30 बजे तक चलता है और कर्फ्यू टाइम 6:30 बजे का है अगर हम कोई कोचिंग करना चाहें या अपनी पॉकेट मनी के लिए ट्यूशन पढ़ाना चाहें तो वो भी नहीं कर सकते.’

आरआईई की एक अन्य छात्रा ने नाम न बताने की शर्त पर कहा, ‘हम जब भी इनसे बात करके कोई समाधान निकालना चाहते हैं, लेकिन हमें जवाब में ऐसी बातें सुनने को मिलती हैं जिनका कोई तर्क न हो. हम कहते हैं, हम वयस्क महिलाएं हैं आप हमें क़ैद नहीं कर सकते तो हमें जवाब मिलता है कि तुम्हारा ख़्याल कौन रखेगा. जब हमने कहा हम अपना ख़्याल ख़ुद रखने के सक्षम हैं तो ये कहते हैं अच्छा जाओ अपने मां-बाप से लिखवा कर ले आओ.’

आरईई भोपाल में भी लगभग इन्हीं मांगों को लेकर लड़कियां प्रदर्शन कर रही हैं. हाल ही में उनकी कुछ मांगे प्रशासन ने मांग ली हैं. देश में तमाम विश्वविद्यालयों में लड़के और लड़कियों के लिए नियम-क़ानून भेदकारी हैं.

आरआईई भोपाल के प्रदर्शन में कम से कम 300 छात्राओं ने सड़कों पर उतर कर प्रशासन से इन नियमों को ख़त्म करने की मांग की. छात्राओं का कहना है कि उनके ऊपर ड्रेस कोड लागू किया जाता है, मोरल पुलिसिंग की जाती है और टाइमिंग की पाबंदी लगाई जाती है.

छात्राओं ने बताया कि प्रशासन द्वारा उन्हें बार-बार टारगेट किया जाता है इसी कारण से उन्हें दुपट्टे से मुंह ढककर प्रदर्शन करना पड़ा था.

लड़कियों का कहना है कि जब भी वे प्रशासन से ये सवाल करती हैं कि आख़िर यूजीसी के नियम आने के बाद भी छात्र-छात्राओं के लिए अलग-अलग नियम क्यों हैं तो उन्हें सुरक्षा का हवाला देकर चुप करा दिया जाता है. कई जगह लड़कियों को कहा गया कि जिस तरह वो घर पर उनके मां-बाप की ज़िम्मेदारी हैं, वैसे ही यहां प्रशासन की ज़िम्मेदारी हैं.

आरआईई भोपाल की एक अन्य छात्रा ने बताया, ‘इस कैंपस में लड़कों के लिए नियम बस दिखाने के लिए हैं अगर वो कर्फ्यू टाइम के बाद भी आएं तो भी उन्हें कुछ नहीं कहा जाता. हमने इस संबंध में जब प्रशासन से पूछा तो हमें जवाब मिला कि तुम्हारे घर में भी तो तुम में और तुम्हारे भाई में अंतर किया जाता होगा. जब शादी होगी तो समझ जाओगी.’

आरआईई भुवनेश्वर में प्रदर्शन करती छात्राएं (फोटो साभार: फ़ेसबुक)
आरआईई भुवनेश्वर में प्रदर्शन करती छात्राएं. (फोटो साभार: फ़ेसबुक)

आरआईई भोपाल में बीएड के पांचवें साल में पढ़ने वाली एक छात्रा ने बताया कि इस प्रदर्शन से पहले उन लोगों को छत पर नहीं जाने दिया जाता था क्योंकि प्रशासन को डर है कि लड़कियां कूदकर अपनी जान दे देंगी. इसलिए इतने सालों तक एक कैंपस में रहने के बावजूद लड़कियों ने हॉस्टल की छत नहीं देखी थी.

वहीं आरआईई भुवनेश्वर की छात्राओं की शिकायत है कि शनिवार और रविवार को उन्हें बाकी दिनों के मुकाबले बाहर जाने के लिए कुछ घंटे अधिक मिलते हैं लेकिन उसमें भी एक बेतुका नियम डाला गया है. छात्राओं को शनिवार और ररिवार को 9 से एक बजे और 3 से 6 बजे तक बाहर रहने की छुट्टी मिलती है.

एक छात्रा ने इस पर कहा, ‘हम अगर कोई काम कर रहे हों तो हमें एक बजे से पहले वो काम छोड़कर आना पड़ता है और दो घंटा हॉस्टल में ज़बरदस्ती ख़ाली बैठना पड़ता है. यह एक बेतुका नियम हैं. हमारे साथ अजीबोगरीब व्यवहार किया जाता है और हमारे कपड़ों पर आपत्तिजनक टिप्पणी की जाती है.’

इसी साल अगस्त में दिल्ली स्थित जामिया मिलिया इस्लामिया विश्वविद्यालय ने छात्राओं के लिए रात में हॉस्टल बंद होने का समय घटाकर वापस नौ बजे कर दिया था. इस आदेश के तीन महीने पहले छात्राओं के जबरदस्त प्रदर्शन के चलते हॉस्टल का समय रात आठ बजे से बढ़ाकर 10:30 बजे किया गया था.

इतना ही नहीं विश्वविद्यालय प्रशासन ने हॉस्टल बंद होने के समय को लेकर किसी भी तरह के विरोध प्रदर्शन पर भी प्रतिबंध लगा दिया था. विश्वविद्यालय प्रशासन ने इस नियम के पीछे ‘अभिभावकों की शिकायत और चिंता’ को ज़िम्मेदार ठहराया था.

लगभग हर विश्वविद्यालय में छात्राओं की मांगों को उनके अभिभावक तक पहुंचाया जाता है और अनापत्ति प्रमाण पत्र पर हस्ताक्षर करने को कहा जाता है.

इस संबंध में जामिया की छात्राओं का कहना था, ‘इस मुल्क के एक नागरिक के तौर पर वोट देने और सरकार चुनने का हमें हक़ है. शादी करने और बच्चे पैदा करने के लिए भी हमें वयस्क समझा जाता हैं पर रात को थोड़ी देर तक ही सही कैंपस के बाहर रहने के लिए सक्षम नहीं समझा जाता. क्यों हमारे जीवन का ये निर्णय अभिभावक और विश्वविद्यालय प्रशासन अपने हाथ में ले लेता है. क्या सुरक्षा का हवाला देकर हमारे मौलिक अधिकार छीनना गलत नहीं है.’

रायपुर की हिदायतुल्ला नेशनल लॉ यूनिवर्सिटी में हाल ही में छात्र-छात्राओं ने कर्फ्यू टाइम को आगे बढ़ाने समेत कई मांगों को लेकर एक लंबा आंदोलन चलाया जो कि कुलपति के इस्तीफे के बाद ख़त्म हुआ.

छात्र-छात्राओं ने कुलपति पर कुप्रबंधन, भ्रष्टाचार और यौन उत्पीड़न के आरोपों के ख़िलाफ़ किसी भी तरह की कार्रवाई में असफल रहने के आरोप लगाए थे.

कुलपति के पद से नहीं हटने पर छात्र-छात्राओं ने एक अक्टूबर से भूख हड़ताल शुरू कर दी थी. 27 अगस्त से लगातार प्रदर्शन कर रहे छात्र-छात्राओं को एक अक्टूबर को कुलपति के इस्तीफे के साथ जीत मिली. हालांकि जामिया की छात्राओं के साथ जो हुआ उसे देखकर हिदायतुल्ला नेशनल लॉ यूनिवर्सिटी में भी छात्राएं डरी हुई हैं कि कहीं यहां भी कर्फ्यू टाइम वापस न बढ़ जाए.

इससे पहले यहां 27 अगस्त से दस दिन तक लगातार चला प्रदर्शन बीते 4 सितंबर को ख़त्म हुआ था लेकिन कुलपति सुखपाल सिंह के दोबारा कार्यभार संभालने से एक बार फिर छात्र- छात्राओं और विश्वविद्यालय प्रशासन के बीच टकराव की स्थिति पैदा हो गई थी.

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पटियाला स्थित पंजाबी विश्वविद्यालय में पिजड़ा तोड़ अभियान से जुड़ी एक तस्वीर. (फोटो: सृष्टि श्रीवास्तव/द वायर)

10 दिन तक चले इस प्रदर्शन में कुलपति को हटाने की मांग के साथ हॉस्टल में आने-जाने की समय-सीमा को पूरी तरह से ख़त्म करना, लाइब्रेरी के लिए कर्फ़्यू टाइम को बढ़ाना, मोरल पुलिसिंग ख़त्म करना, यौन उत्पीड़न मामलों में कार्रवाई के लिए कमेटी का गठन, स्वतंत्र वॉर्डन की नियुक्ति और छात्र-छात्राओं की प्रतिक्रिया लेने के लिए व्यवस्था बनाने की मांगें शामिल थीं.

इसी तरह आरआईई अजमेर की छात्राओं को भी ऐसे ही भेदकारी नियम-क़ानून का सामना करना पड़ता था जिसे हाल ही में हुए विरोध प्रदर्शन के बाद कुछ हद तक ख़त्म किया गया है.

छात्राओं को शाम 6:30 बजे तक हॉस्टल आना होता था लेकिन छात्र कभी भी कैंपस में आ-जा सकते थे. यहां भी छात्राओं की यही समस्या है कि छात्रों के लिए नियम सिर्फ कागज पर हैं.

हाल ही में 25 और 26 सितंबर को हुए प्रदर्शन के बाद छात्राओं को भी 8 बजे तक हॉस्टल के बाहर रहने की अनुमति दे दी गई है. एक छात्रा ने इस जीत पर कहा, ‘हमें इतनी छोटी सी चीज़ हासिल करने के लिए इतना संघर्ष करना पड़ता है.’

केरल स्थित कोट्टायम मेडिकल कॉलेज की छात्राएं 14 सितंबर के दिन पांच घंटे तक लगातार धरने पर बैठने के बाद अपने कर्फ्यू टाइम को 7:30 बजे से बढ़वाकर 9:30 बजे करवाने में सफल रहीं.

छात्राओं को वार्डेन से पत्र मिल गया है पर उन्हें डर है कि प्रिंसिपल अभिभावकों से बात करने की बात कहकर इसे वापस न ले लें. छात्राओं को डर है कि कहीं अभिभावकों से पूछने पर इस मांग को यह कहकर न ख़ारिज कर दिया जाए कि अभिभावक नहीं चाहते हैं.

पटियाला स्थित पंजाबी विश्वविद्यालय में भी छात्र-छात्राएं कर्फ्यू को पूरी तरह से हटाने समेत 14 मांगों को लेकर लगभग 20 दिन से धरने पर बैठे हैं. प्रशासन के साथ छात्र-छात्राओं की 13 मांगों पर सहमति बन गई है लेकिन कर्फ्यू को पूरी तरह ख़त्म करने की मांग प्रशासन ने नहीं मानी है. इस मांग को लेकर छात्र-छात्राओं ने पिछले चार दिनों से अनिश्चितकालीन भूख हड़ताल शुरू कर दी है.

यहां डेंगू से प्रभावित क़ानून की दूसरे वर्ष की छात्रा गगनदीप भी भूख हड़ताल पर बैठीं हुई हैं. गगनदीप कहती हैं, ‘यह पितृसत्ता के ख़िलाफ़ हमारी आर-पार की लड़ाई है अगर प्रशासन ने हमारी बात नहीं मानी तो चाहे हमारी जान भी चली जाए मैं भूख हड़ताल ख़त्म नहीं करूंगी.’

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पटियाला के पंजाबी विश्वविद्यालय में लड़कियों के हॉस्टल से सामने लगा बैरीकेड. (फोटो: सृष्टि श्रीवास्तव/द वायर)

भटिंडा के एक छोटे से गांव माडी से आने वाली अमनदीप पंजाबी विश्वविद्यालय में बीए आॅनर्स कोर्स की दूसरे वर्ष की छात्रा हैं. भूख हड़ताल पर बैठीं अमनदीप कहती हैं, ‘सड़कें तभी सुरक्षित होंगी जब महिलाएं सड़कों पर होंगी. लड़कियों को आधे समय बंद रखने से उनको कम अवसर मिलते हैं यह उनके साथ भेदभाव है.’

दिल्ली विश्वविद्यालय हो या पंजाबी विश्वविद्यालय इन सब जगहों पर लड़कियों के लिए कर्फ्यू टाइम ख़त्म करने की मांग को लड़कों का भी समर्थन मिला है. पंजाबी विश्वविद्यालय में भूख हड़ताल पर बैठे हरदीप पंजाबी में एमए कर रहे हैं. हरदीप संगरूर ज़िले के एक छोटे से गांव से आते हैं.

हरदीप कहते हैं, ‘मेरे गांव में महिलाओं को बहुत दबाया जाता है. मैंने यह सब ख़ुद अपने घर में देखा है और मैं ये कहूंगा कि पहले मैं भी अपने घर में औरतों को, ख़ासकर अपनी बहनों को रोकता-टोकता था पर पढ़ाई और राजनीति ने मुझे सिखाया कि यह गलत है. अब मैं लड़कियों की आज़ादी के समर्थन में हूं. इस देश की आधी आबादी को अवसरों से दूर क़ैद करके नहीं रखना चाहिए.’

द वायर की टीम कुछ दिन पहले यहां गई थी. यहां विश्वविद्यालय में लड़कियों के हॉस्टल से लेकर कुलपति कार्यालय और कुलपति कार्यालय से लेकर बाहर गेट तक जाने पर पता चलता है कि मात्र एक स्ट्रीट लाइट काम कर रही थी.

लड़कियों ने बताया कि कैंपस में छेड़छाड़ की समस्या बहुत बड़ी है. प्रशासन इस पर सुनवाई नहीं करता. लड़कियों के हॉस्टल तक आने वाली दोनों तरफ की सड़कों पर बैरीकेड है, गॉर्ड हैं पर लाइट नहीं.

इतिहास में पीएचडी कर रहीं रूपिंदर कहती हैं, ‘यहां अगर लड़कियों को रात में निकलने नहीं देना है तो इतने गॉर्ड और सीसीटीवी का क्या मतलब हुआ. अगर हमारा कर्फ्यू टाइम ख़त्म भी हो जाता है तो भी हम पागल नहीं हैं कि 24 घंटे बाहर ही रहेंगे. यह इसलिए है कि जिसे ज़रूरत हो वो जाकर अपने लिए दवा या खाना तो ला सके.’

इतिहास में पीएचडी कर रहीं अमनदीप कहती हैं, ‘इस कैंपस में लगभग 70% लड़कियां हैं तो इतनी बड़ी संख्या को 30% लड़कों के लिए अंदर रखा है. अगर लड़कों से ही हमारी सुरक्षा ख़तरे में है तो उन्हें हॉस्टल में बंद रहना चाहिए, हमें नहीं.’

इस हड़ताल के दौरान प्रदर्शन में नेतृत्व कर रहे डेमोक्रेटिक स्टूडेंट आॅर्गनाइज़ेशन की एक अन्य छात्र संगठन स्टूडेंट एसोसिएशन से झड़प हो गई जिसके बाद 13 छात्र-छात्राओं पर एफआईआर दर्ज हुई है.

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पटियाला के पंजाबी विश्वविद्यालय में भूख हड़ताल पर बैठे छात्र-छात्राएं. (फोटो: सृष्टि श्रीवास्तव/द वायर)

डेमोक्रेटिक स्टूडेंट आॅर्गनाइज़ेशन के सदस्य अमरजीत बताते हैं, ‘यहां पर बहुत बेतुके नियम हैं अगर किसी को बर्थडे मनाना हो तो जुर्माना देना पड़ता है. अगर आप नीले की जगह काले पेन से अटेंडेस दे दें तो उस पर भी जुर्माना लगता है. यहां पर नियमों की किताब नहीं जेल मैन्युअल चलती है. महत्वपूर्ण बात यह है कि यह सभी जुर्माना कर्फ्यू से जुड़ा है.’

वे आगे कहते हैं, ‘लड़कियों को 10 घंटे बंद रखने का मतलब आधी आबादी को अनेक अवसरों और उनके व्यक्तित्व के विकास से दूर रखना है. यह संविधान के तहत और यूजीसी के तहत मिला हुआ अधिकार है प्रशासन इसे कैसे छीन सकता है. हम इसके ख़िलाफ़ अपनी हड़ताल जारी रखेंगे.’

विश्वविद्यालय के रजिस्ट्रार मनजीत सिंह निज्जर ने इन आरोपों पर कहा, ‘ये मांग बिल्कुल गलत है. हम लड़कियों को पूरी रात बाहर रहने की आज़ादी नहीं दे सकते. रात को ढाई बजे किसी को बाहर क्या करना है.’

उन्होंने ‘हमारा विश्वविद्यालय पटियाला में है यहां का माहौल दिल्ली, बेंगलेरु और मुंबई जैसा नहीं है. हमें लड़कियों की सुरक्षा की चिंता है इसीलिए ये मांग नहीं मान सकते. कल को कुछ हो जाएगा तो ज़िम्मेदार कौन होगा. ये लड़कियां किस बैकग्राउंड से आती हैं, उस माहौल को समझना होगा.’

डेमोक्रेटिक स्टूडेंट आॅर्गनाइज़ेशन के सदस्य अमरजीत ने बताया, ‘छात्राओं ने चार अक्टूबर, गुरुवार को प्रदर्शन के दौरान पांच हॉस्टलों के गेट तोड़ दिए. छात्राओं ने कर्फ़्यू टाइम शुरू होने के बाद रात को पांच हॉस्टल के गेट तोड़ कर प्रशासन को बता दिया है कि वे अब उनके ऊपर थोपे गए नियमों के तहत दबने वाली नहीं हैं.’

यह पूछने पर कि अचानक देश के बहुत से विश्वविद्यालयों में इस तरह के अभियान कैसे देखने को मिल रहे हैं. एक छात्रा ने नाम न बताने की शर्त पर कहा, ‘कब तक लड़कियों को सुरक्षा का हवाला दे कर बंद किया जाएगा. ये हमारे मौलिक अधिकार हैं और अब हर कैंपस में यह अभियान फैलता हुआ दिख रहा है. इन बेतुके और भेदकारी नियमों को अब ख़त्म होना ही होगा.’

इसी तरह भोपाल में आरआईई की एक छात्रा ने कहा, ‘हम दिल्ली में छात्रों का अभियान देखते थे और आश्चर्य करते थे कि कितनी बेबाकी से वे प्रशासन से इन नियमों के ख़िलाफ़ लड़ाई कर पा रहीं हैं. हमें उनसे हिम्मत मिली है और अब ये अभियान छोटे शहरों में पहुंच चुका है. इन शहरों का माहौल दिल्ली से बहुत अलग है. यहां पर जीत मिलना पितृसत्ता पर सच में चोट है. हम अब डरेंगे नहीं ये लड़ाई बराबरी की लड़ाई है.’