क़ादिर ख़ान: जिन्हें लेकर अपनी-अपनी ग़लतफ़हमियां हैं

क़ादिर ख़ान हिंदी सिनेमा में उस पीढ़ी के आख़िरी लेखक थे, जिन्हें आम लोगों की भाषा और साहित्य की अहमियत का एहसास था. उनकी लिखी फिल्मों को देखते हुए दर्शकों को यह पता भी नहीं चलता था कि इस सहज संवाद में उन्होंने ग़ालिब जैसे शायर की मदद ली और स्क्रीनप्ले में यथार्थ के साथ शायरी वाली कल्पना का भी ख़याल रखा.

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क़ादिर ख़ान हिंदी सिनेमा में उस पीढ़ी के आख़िरी लेखक थे, जिन्हें आम लोगों की भाषा और साहित्य की अहमियत का एहसास था. उनकी लिखी फिल्मों को देखते हुए दर्शकों को यह पता भी नहीं चलता था कि इस सहज संवाद में उन्होंने ग़ालिब जैसे शायर की मदद ली और स्क्रीनप्ले में यथार्थ के साथ शायरी वाली कल्पना का भी ख़याल रखा.

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क़ादिर ख़ान (फोटो साभार: ट्विटर)

क़ादिर ख़ान- फिल्म जगत का ऐसा नाम जिनको दुनिया अक्सर कॉमेडियन और किसी हद तक लेखक के तौर पर जानती है, अपनी ‘शनाख़्त’ से हमेशा महरूम रहे. दरअसल एक पटकथा-लेखक के तौर पर उनकी पहचान कई मानों में सीमित ही रही. शायद इसलिए उनके निधन के बाद उनको एक कॉमेडियन और विलेन वाले किरदारों के लिए ज़्यादा याद किया गया.

हालांकि उनकी लेखनी में सिर्फ़ फिल्मों वाली ख़ूबी नहीं थी. वो ऐसे लेखक हरगिज़ नहीं थे, जिनके संवाद सिर्फ़ अमिताभ बच्चन जैसे एक्टर की आवाज़ में सिनेमा प्रेमियों को भाते रहें और कई मौक़ों पर इसका इज़हार यूं भी हो कि, हम जहां खड़े होते हैं लाइन वहीं से शुरू होती है.

या फिर ये कि अपुन बहुत फेमस आदमी है, बड़ा-बड़ा पेपर में अपुन का छोटा-छोटा फोटो छपता है. और शायद आपको इसी तरह के कई और डायलॉग याद आ रहे हों, विजय दीनानाथ चौहान पूरा नामबाप का नामदीनानाथ चौहानमां का नामसुहासिनी चौहानगांव मांडवाउम्र 36 साल 9 महिना 8 दिन 16 वा घंटा चालू है.

या कर्मा में दिलीप कुमार के सामने अनुपम खेर का ये वाला मुकालिमा कि, इस थप्पड़ की गूंज सुनी तुमने, अब इस गूंज की गूंज तुम्हें सुनाई देगी

क़ादिर ख़ान की ऐसी लेखनी का एक लंबा सिलसिला है, और जब मैं उनकी लेखनी को इस तरह की या ऐसी लेखनी कह रहा हूं तो सिर्फ़ इस लिहाज़ के साथ कि ये बस उनकी क़लम का सिनेमाई जादू था. एक ऐसा जादू जिसमें बोलचाल की भाषा, उसकी लोकेशन और किरदारों की फ़ितरत का ख़याल बख़ूबी रखा गया.

लेखनी के इसी करिश्मे की बदौलत उन्होंने बॉलीवुड पर राज किया. अब आप जिस तरह चाहें उनके करिश्मे के क़सीदे पढ़ सकते हैं, लेकिन उनकी लेखनी का सिरा तब हाथ आता है जब हम उनके भीतर के पाठक को जानने की कोशिश करते हैं.

असल में ख़ास तरह के दर्शकों के बीच अपनी कॉमिक टाइमिंग के लिए मशहूर, इस अभिनेता को एक एंटरटेनर के तौर पर इतना एंजॉय किया गया कि उनको एक ‘अभिनेता’ के तौर पर कभी सीरियस लिया ही नहीं गया.

फिर लेखनी तो पर्दे के पीछे वाली हक़ीक़त ठहरी. मगर क़िस्सा ये है कि 300 से अधिक फिल्मों में करतब दिखाने वाले और 250 से ज़्यादा फिल्मों में संवाद लिखने वाले ‘कॉमेडियन’, आर्टिस्ट और लेखक क़ादिर ख़ान बहुत ही गंभीर साहित्य के पाठक थे.

बात वही है कि हमारे यहां महमूद जैसे हास्य-कलाकार भी कम ही हुए, जिनको किसी भी नायक से ज़्यादा इज़्ज़त हासिल थी. वजह भले से दर्शक ही रहे हों, लेकिन इस हिस्से की ‘अदना’ सी कामयाबी क़ादिर ख़ान को भी मिली.

हां, आलोचना के नाम पर कुछ भी कह दीजिए मगर ये बात माननी पड़ेगी कि नायक और नायिकाओं के गिर्द बनने वाली टाइप-कास्ट फिल्मों की भीड़ में ‘नायक’ के साथ अगर किसी एक आर्टिस्ट की जोड़ी बन सकती थी तो वो यही थे.

मैंने इस बड़ी कामयाबी को ‘अदना’ कहने की जुरअत इसलिए की कि भले से वो कलाकार बड़े थे, मगर थे तो ‘कॉमेडियन’ ही. और कॉमेडियन को हमारे यहां एक्टर समझने की भूल नहीं की जाती. ख़ैर वो कॉमेडियन भी ऐसे थे कि उनके भद्देपन तक को लोगों ने पसंद किया.

बहरहाल, मैं बात कर रहा था उस क़ादिर ख़ान की जो बहुत ही गंभीर साहित्य के पाठक थे. वैसे साहित्य और गंभीर साहित्य के बीच की बहस भी एक को दूसरे से बेहतर साबित करने वाली तथाकथित बौद्धिक क़वायद है, जैसे कि यह कहना कि केवल हीरो ही एक्टर है.

ख़ैर क़ादिर ख़ान ने इस बहस में पड़े बग़ैर एक इंटरव्यू में उर्दू के बहुत ही मुश्किल-पसंद हास्य-व्यंग्यकार मुशताक़ अहमद यूसुफ़ी  का नाम लेते हुए ‘लेखक’ बनने के लिए यूसुफ़ी जैसे साहित्यकारों से भाषा की ऊंच-नीच सीखने की सलाह दी थी.

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दिलीप कुमार के साथ क़ादिर खान (फोटो साभार: ट्विटर)

ज़ाहिर है क़ादिर ख़ान, यूसुफ़ी साहब की लेखनी से प्रभावित होकर लेखक नहीं बने थे. लेकिन उनके कहे में जो बात है, वो ये कि भाषा पर उनकी अपनी गिरफ़्त किसी ऐसे साहित्यकार से कम नहीं थी, जिनको पढ़ पाना भी अच्छे-अच्छों के बस की बात नहीं.

ऐसे में उनकी फिल्म-नवेसी (लेखन) वाली सरलता से धोखा खाया जा सकता है. कहा जा सकता है कि वो दर्शकों की नब्ज़ समझते थे और किरदारों के हिसाब से लिखने में समर्थ थे.

हां, ये बात बिल्कुल सही है, लेकिन ये सरलता उनको फिल्म लेखनी वाली मजबूरी की देन नहीं थी. चूंकि लाऊड और ख़ास तरह की फिल्मों में भी उन्होंने भाषा की शुद्धता को बचाकर रखा था. दरअसल ख़ास तरह के परिवेश और एक जैसी मगर भिन्न भाषाओं की आग़ोश में पलने वाले क़ादिर ख़ान ने बेहद बुरे दिनों में भी बहुत कुछ अपने बड़ों की सोहबत से पाया था.

एक मस्जिद में इमामत करने वाले बाप के बेटे ने चटाई पर बैठकर तालीम हासिल की थी और बाद में झोपड़पट्टी के इसी बच्चे ने मंटो से भी प्रेरणा हासिल की थी.

इस बात का तज़्किरा (चर्चा) करते हुए उन्होंने कहा था, ‘मंटो ने मुझे सिखाया कि आइडियाज़ बड़े होने चाहिए लफ़्ज़ नहीं.’ हालांकि उनके जीवन में ये अवसर कम ही आए कि वो अपने आइडियाज़ को लिखें, अक्सर फिल्मों की डिमांड के नाम पर ही उन्होंने अपने शब्द ख़र्च किए और ख़ुद को बचाकर रखा.

इस तरह देखें तो उनकी सरलता कई तहों में लिपटी हुई नज़र आती है. गोया उनके पास अरबी थी, फ़ारसी थी, उर्दू थी, हिंदी थी, बॉम्बे की झोपड़पट्टी वाली बोलचाल थी और इन सबसे कहीं ज़्यादा साइंस और तकनीकी तालीम थी.

यूं क़ादिर ख़ान हिंदी सिनेमा में उस पीढ़ी के आख़िरी क़लमकार थे, जिन्हें आम लोगों की भाषा और साहित्य की अहमियत का एहसास था.

शायद इसलिए भी उनकी फिल्मों वाली सरलता ये बात बहुत आसानी से छुपा लेती है कि वो लिखते हुए ग़ालिब जैसे मुश्किल शायर की मदद लेते थे. और अपने स्क्रीनप्ले में यथार्थ के साथ शायरी वाली कल्पना का भी ख़याल रख लेते थे.

कम लोग इस बात से वाक़िफ़ हों कि क़ादिर ख़ान ग़ालिब की शायरी में घंटों सिर फोड़ते थे. एक-एक लफ़्ज़ में निहित अर्थों के साथ संघर्ष करना जैसे उनकी आदत थी.

अब ऐसे फिल्म-नवेस को बहुत आसानी से समझ लेने भर से उस पर एक ख़ास तरह का लेबल चस्पां करके कुछ भी कह देना आसान है, वो भी तब जब ये मालूम हो कि क़ादिर ख़ान घंटों यानी चुटकियों में डायलॉग लिख देते थे. लेकिन किसी शायर ने वो जो कहा है कि; सख़्त दुश्वार है आसान का आसां होना…

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अमिताभ बच्चन, अमजद खान और साथी अभिनेताओं के साथ क़ादिर खान (फोटो साभार: ट्विटर)

क़ादिर ख़ान के मामले में ग़ालिब तो ख़ैर एक मिसाल हैं, उन्होंने अल्लामा इक़बाल तक को गंभीरता से पढ़ रखा था. ऐसे में जब भी मैंने उनकी लेखनी को समझने की कोशिश की तो उनके भीतर के पाठक ने क़ादिर ख़ान के ‘क़ादिर’ (समर्थ) होने को साबित कर दिया.

अभी ज़्यादा दिन नहीं हुए जब मैं अपनी डायरी में हैरानी के साथ उनकी कही कुछ बातें नोट कर रहा था. तब शायद मुझे एहसास नहीं था कि एक फिल्म-लेखक हमारे ज़माने में भी ऐसा रहा है.

वो कह रहे थे, ‘मैं सआदत हसन मंटो (जिसको वो मिंटो कहते थे) से बहुत मुतासिर हूं. फ़िक्र तौंसवी, इब्राहीम जलीस, और मुशताक़ अहमद यूसुफ़ी’ (जिनका वो हिंदी में अनुवाद भी करना चाहते थे) उनकी किताब हद से ज़्यादा बेहतरीन है. मेरा ख़याल है हास्य और तंज़ में उनको कोई छू नहीं सकता. गोर्की, चेखव, सिडनी शेल्डन और आर्चर…’ जी ये वो कुछ ऐसे नाम हैं, जिनको वो लेखनी के लिए ज़रूरी क़रार देते थे.

यूं क़ादिर ख़ान, एक ऐसे लेखक और अभिनेता जिनके गंभीर पाठक होने को नज़रअंदाज़ करके सिनेमा हॉल में तालियां बजाई जा सकती हैं, बनते-बिगड़ते चेहरे पर लगातार हंसा जा सकता है, फूहड़पन की इंतिहाओं में छलांग लगाया जा सकता है, लेकिन भाषा की एक बड़ी परंपरा से क्या हासिल होता है, इसको समझने के लिए एकांत की ज़रूरत होती है.

इस एकांत में झांके बग़ैर लिखने वालों ने क़ादिर के फ़न को तराज़ू में तौल दिया. ऐसे लोग शायद आसान समझते हैं क़ादिर ख़ान होना?

बहरहाल, आज फिल्मों से भाषा का यही लुत्फ़ ग़ायब होता जा रहा है और क़ादिर ख़ान के भी वही डायलॉग याद रह गए हैं जिनकी बदौलत एक ख़ास तरह का किरदार अपनी गूंज के साथ पैदा होता था.

जबकि इन डायलॉग्स के गिर्द लिपटी उनके लिखने की प्रक्रिया को सामने रखा जाए तो अंदाज़ा हो कि बोलचाल की भाषा में भी क़ादिर ख़ान ने ज़बान की शुद्धता और नज़ाकत का किस क़दर ख़याल रखा. यहां क़ादिर ख़ान के जीवन में मनमोहन देसाई वाले प्रसंग को याद करें तब भी उनकी लेखनी की गंभीरता से परिचित हो सकते हैं.

दरअसल जब देसाई फिल्म ‘रोटी’ बना रहे थे तब वो उर्दू-लेखकों से बेज़ारी का इज़हार कर चुके थे. उस समय उनका मानना था कि ये उर्दू वाले सिर्फ़ भाषा जानते हैं और कुछ नहीं. उन्होंने ये तक कह दिया था कि, मुझे इस ज़बान से ही नफ़रत हो गई है.

उस वक़्त जब उनको अपनी रोज़मर्रा वाली ज़बान चाहिए थी तब क़ादिर ख़ान हबीब नाडियाड वाला की मार्फ़त देसाई के राब्ते में आए. और वो क़ादिर ख़ान की जिंदगी में पहला मौक़ा था जब उन्होंने एक बड़े फिल्मकार के सामने अपनी लेखनी पेश की.

क़ादिर ख़ान की लेखनी से प्रभावित होकर देसाई ने उनको अपना पैनासोनिक टीवी तोहफ़े में दे दिया था और उस समय जब वो महज़ 25 हज़ार पाने वाले लेखक थे, इनको एक लाख वाला क़लमकार बना दिया. इस पूरी घटना में भाषा ही वो चीज़ थी जिसमें उन्होंने देसाई के आईडिया को सरलता से लिख दिया था.

समझने वाली बात है कि अपनी सोच को आज़ादी से लिखने में उतनी दिक्क़त नहीं होती, जितनी किसी और की सोच को उसकी मांग के हिसाब से लिखने में हो सकती है, लेकिन यार लोग हैं कि क़ादिर ख़ान के लिखे पर सनद देते फिरते हैं, जबकि पैमाना ये होना चाहिए था कि किसने लिखवाया, किसके लिए लिखवाया और नतीजा क्या निकला और बस.

ख़ैर उसी ज़माने में देसाई के विरोधी समझे जाने वाले प्रकाश मेहरा के साथ भी क़ादिर ख़ान ने अपनी तरह का काम किया. उस वक़्त कोई भी लेखक या कलाकार दोनों में से किसी एक के साथ ही काम कर सकता था, लेकिन ये इनकी लेखनी का जादू था कि दोनों इन पर न्योछावर थे.

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अनुपम खेर और सलमान खान के साथ क़ादिर खान (फोटो साभार: ट्विटर)

क़ादिर ख़ान काम करने वाले आदमी थे, जो इस क़दर कामयाब होने के बाद भी ये मानते थे कि आदमी को कभी नंबर वन की कुर्सी पर नहीं बैठना चाहिए. फिल्मों को लेकर वो कहते थे, मेरे जीवन के संघर्ष में फिल्मों के संघर्ष का नाम नहीं है.

हालांकि काबुल से आने वाले इस पठान के बचपन में जिंदगी के घाव ज़्यादा हैं. बॉम्बे की सबसे गंदी झोपड़पट्टी में उन्होंने माता-पिता का तलाक़ देखा. मस्जिद में पढ़ाई की. सौतेले बाप के आने के बाद भी घर से ग़रीबी नहीं गई. लेकिन वो एक मां का यक़ीन था जिसकी वजह से फ़ैक्टरी में रोज़ाना 3 रुपए कमा लेने की चाहत के बावजूद क़ादिर ख़ान ने पढ़ाई को चुन लिया.

हर तरह के अभाव में डिप्लोमा इन सिविल इंजीनियरिंग, ग्रेजुएशन इन सिविल इंजीनियरिंगफिर पोस्ट ग्रेजुएट, क्या ये सब आसान था?

पढ़ने-पढ़ाने के दौरान वो ड्रामा भी लिखने लगे और एक ऑल इंडिया ड्रामेटिक कम्पटीशन ने उनकी क़िस्मत खोल दी. इस कम्पटीशन में उनके प्ले ‘लोकल ट्रेन’ को बेस्ट प्ले, बेस्ट राइटर, बेस्ट एक्टर और बेस्ट डायरेक्टर का अवॉर्ड मिला.

उस कम्पटीशन के जज साहिबान नरेन्द्र बेदी, रमेश बहल, कामिनी कौशल और राजिन्द्र सिंह बेदी थे. यहीं नरेन्द्र बेदी क़ादिर से प्रभावित हुए और अपनी फिल्म जवानी दीवानी के डायलॉग लिखवाये. इन सबके बावजूद क़ादिर ख़ान की लेखनी भी गुमनाम रह जाती, अगर वो ख़ुद एक्टर नहीं होते या अपने समय के बड़े एक्टर्स की भाषा और उच्चारण को इन्होंने ठीक नहीं किया होता.

हां ये सही है कि क़ादिर ख़ान को हम फिल्मों की वजह से जानते हैं, वरना वो शायद इस समाज में एक अच्छे टीचर की भूमिका में कहीं नेकियां बो रहे होते.

चूंकि फिल्म उनकी जिंदगी में एक हादिसे की तरह आई थी, इन बातों का उनको शदीद एहसास था इसलिए एक बार शाद अज़ीमाबादी के अंदाज़ में उन्होंने कहा था, ‘मैं आया नहीं लाया गया हूं, निकला नहीं निकाला गया हूं.’

जेनेरेशन-गैप को समझते हुए भी वो आज की फिल्म-लेखनी से बहुत ज़्यादा सहमत नहीं थे. अपने दरकिनार किए जाने का जश्न भी किताब लिखने, भाषा और उच्चारण को लेकर अपने प्रोजेक्टस, मुस्लिम समाज के पिछड़ेपन को दूर करने और इन सबसे कहीं ज़्यादा पढ़ने-पढ़ाने की अपनी ख़्वाहिशात के साथ सक्रिय थे, जो बाद में उनकी सेहत की वजह से कहीं रह गया.

क़ादिर ख़ान ने गुमनामी और मुफ़लिसी से शोहरत तक सफ़र तय किया और फिर गुमनाम हो गए. कई बार ख़बरों में दुनिया से रुख़सत कर दिए गए, लेकिन वो ऐसे अदाकार और लेखक थे जिनके बारे में बात करते हुए हमेशा लिखने वालों ने धोखा खाया.

बस और बस उनके मिडिल-क्लास दर्शक ही थे जिन्होंने अपने इस अदाकार को इतना पूजा कि जब उनकी लिखी पहली कॉमेडी फिल्म ‘हिम्मत वाला’ रिलीज़ हुई तो बड़े-बड़े बैनर पर सजे हीरो-हीरोइन के पोस्टर एक ही हफ़्ते में उतारने पड़े और रह गए चोटी वाले मुनीमजी, जो क़ादिर ख़ान थे.

उनकी इस कामयाबी को उन्हीं की नज़र से देखें तो उन्होंने एक बात कही थी कि, ‘राइटर के ज़ेहन में एक ऑडियंस होना चाहिए, उसके दिमाग़ के अंदर एक ऑडिटोरियम होना चाहिए और उसमें बैठी ऑडियंस का ज़्यादातर हिस्सा ग़रीब होना चाहिए.’

और अपने इस कहे में उन्होंने जिस तबके को बालकनी में जगह दी थी, आज वही तबका उनके फ़न को नुमाइश से अलग करने में नाकाम है. और बस नाम रह गया है लाखों दिलों के द ग्रेट आर्टिस्ट और लेखक और कई ‘नायकों’ के उस्ताद क़ादिर साहब का.

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