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इलाहाबाद विश्वविद्यालय: पूरब के ऑक्सफोर्ड से अराजकता के अखाड़े तक

‘छात्र और शिक्षक का रिश्ता बल प्रयोग का नहीं होता. यह नैतिक बल का रिश्ता होता है. नैतिक बल का पतन हो गया है तो प्रोफेसर को पुलिस बुलानी पड़ रही है.’

‘छात्र और शिक्षक का रिश्ता बल प्रयोग का नहीं होता. यह नैतिक बल का रिश्ता होता है. नैतिक बल का पतन हो गया है तो प्रोफेसर को पुलिस बुलानी पड़ रही है.

Allahabad University Students Protest PTI
(फोटो: पीटीआई)

जब मैं इलाहाबाद के राणा प्रताप चौराहे पर बस से उतरा तो मुझे कुछ भी पुराना या अजीब नहीं लगा, सब कुछ वैसा ही था, जैसा आज के पांच या दस साल पहले था. वैसी ही सड़क, वैसी ही हवा, वैसे ही आपका ख्याल करके बगल से वाहन निकालकर गुज़रते हुए लोग.

मनमोहन पार्क, कटरा और यूनिवर्सिटी रोड जैसे चौराहे वैसे ही लड़कों को चाय पिलाने में व्यस्त थे. वैसे ही बन-मक्खन, समोसे और पकौड़े की दुकानें सजी थीं और छात्रों की भीड़ से घिरी हुई झांक रही थीं. सब कुछ वैसा ही जवान और उत्साह से भरा था.

लेकिन इलाहाबाद विश्वविद्यालय, जिससे इलाहाबाद की पहचान है, वह अकेला था जो वैसा ही नहीं था. उस रात वहां कैंपस के अंदर बमबाज़ी हो रही थी. विश्वविद्यालय की लॉ फैकल्टी, जो बड़ी संख्या में वकील और जज पैदा करती है, में हाल ही में बना अत्याधुनिक ऑडिटोरियम फूंक दिया गया था और हाई कोर्ट का निर्णय आ गया था कि गर्मी की छुट्टियों में हॉस्टल पूरी तरह खाली कर दिए जाएं.

यह 29 अप्रैल की रात थी. रात करीब 12 बजे भी बड़ी संख्या में छात्र सड़क पर उपद्रव कर रहे थे. पुलिस उनको उनसे भी कड़ी भाषा में जवाब दे रही थी. छात्रों ने सड़क पर तोड़फोड़ की तो पुलिस ने हॉस्टल में घुसकर तोड़फोड़ की. उग्र छात्रों से निपटने के लिए अर्धसैनिक बल बुला लिए गए हैं.

वे लाठी और बंदूकों से लैस हैं. हर शाम छात्र-छात्राएं विरोध मार्च निकालते हैं. पुलिस उनको रोकती है, लाठी भांजकर उनको तितर-बितर करती है. वे पिटते हैं, भागते हैं, कभी शांति-मार्च का हवाला देकर बच निकलते हैं. छात्रों का विरोध विश्वविद्यालय प्रशासन से है, लेकिन छात्रों को पाला बार-बार पुलिस और अर्धसैनिक बलों से पड़ता है.

जब मैं इलाहाबाद पहुंचा, 22 छात्र जेल में बंद थे और आमरण अनशन पर थे. जेल के बाहर सैकड़ों छात्र विरोध प्रदर्शनों में हिस्सा ले रहे थे. दर्जनों छात्र पुलिस की लाठी से घायल हो चुके थे. विरोध-प्रदर्शनों का सिलसिला चलते हुए एक पखवाड़े से ज्यादा हो चुका है.

‘कुलपति छात्रों से नहीं मिलते’

हमने जानना चाहा कि छात्रों को पुलिस लगाकर नियंत्रित करने से पहले विश्वविद्यालय प्रशासन ने उनसे वार्ता की या नहीं? छात्रसंघ की पूर्व अध्यक्ष ऋचा सिंह और मौजूदा अध्यक्ष रोहित मिश्रा या दूसरे छात्रों से जवाब मिला, ‘कुलपति छात्रों से नहीं मिलते. वे अपने पूरे कार्यकाल में छात्रसंघ या छात्रों की समस्या पर बात करने वाले किसी प्रतिनिधिमंडल से कभी नहीं मिले.’

दरअसल, हॉस्टल में वैध और अवैध छात्रों के मसले पर विश्वविद्यालय का फैसला है कि सभी हॉस्टल को वॉश आउट किया जाएगा. छात्र इसका विरोध कर रहे हैं. प्रशासन का कहना है कि हॉस्टल में अवैध छात्रों ने अड्डा जमा लिया है. उनको हटाने के लिए हॉस्टलों को पूरी तरह खाली कराना ज़रूरी है.

छात्रों का तर्क है कि हॉस्टल में जितने लोग अवैध हैं, उनको विश्वविद्यालय प्रशासन ने खुद रखा है. यह उनकी नाकामी है. उन्होंने कभी यहां रेड नहीं डाली. उसकी कीमत हम क्यों चुकाएं? प्रशासन रेड डालकर उन्हें बाहर करे लेकिन परीक्षाओं के वक्त वैध छात्रों को परेशान न करे.

क्या हॉस्टल के अवैध छात्र इतने शक्तिशाली हैं कि विश्वविद्यालय प्रशासन रेड डालकर उन्हें बाहर नहीं कर सकता? मनोविज्ञान विभाग के अध्यक्ष रह चुके सीनियर प्रो. आरसी त्रिपाठी विश्वविद्यालय में छात्रों और शिक्षकों के बीच संवाद की समृद्ध परंपरा की तमाम कहानियां सुनाते हैं जब कुलपति या शिक्षकों ने अपनी सब बातें छात्रों से मनवाईं.

प्रो. त्रिपाठी का कहना है, ‘यह मसला छात्रों और विश्वविद्यालय प्रशासन के बीच का है, जिसे बातचीत करके आराम से सुलझाया जा सकता था लेकिन अब कुलपति शिक्षक होने से पहले प्रशासक है. वह सुरक्षा और गाड़ियों के काफिले के साथ चलता है. उस तक पहुंचना बेहद मुश्किल है. मुझे तो कभी मिलने की ज़रूरत नहीं पड़ी, लेकिन बाक़ी प्रोफेसर बताते हैं कि उनसे मिल पाना मुश्किल है.’

दुख जताते हुए प्रो. त्रिपाठी कहते हैं, ‘दरअसल, छात्रों और शिक्षक का रिश्ता बलप्रयोग का नहीं होता. वह नैतिक बल का रिश्ता होता है. वह नैतिक बल ही था कि छात्रसंघ शिक्षक कुलपति की बातें सुनता था, लेकिन प्रोफेसर भी उनकी बात सुनते थे. अब दोनों के बीच कोई संवाद नहीं है. नैतिक बल का पतन हो गया तो प्रोफेसर को पुलिस बुलानी पड़ती है. हमें वह दौर याद है जब छात्रों से घिरे कुलपति ने पुलिस को यह कहकर लौटा दिया था कि यह हमारे और छात्रों के बीच की बात है. हम निपटा लेंगे. आपकी कोई ज़रूरत नहीं है.’

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एक हॉस्टल के बाहर तैनात रैपिड एक्शन फोर्स (फोटो: पीटीआई)

कुलपति छात्रों से क्यों नहीं मिलते? इसका कारण हम नहीं पता कर सके. हम कुलपति के कार्यालय में गए. कार्यालय दोहरे लोहे के गेट के अंदर था, जिसमें कुलपति सुरक्षित थे. उसके बाहर बंद गेट के अंदर दो सुरक्षा गार्ड थे. हमने उन्हें अपना कार्ड दिया कि वे कुलपति से हमारे लिए समय मांग लें. संदेश आया कि कुलपति मीटिंग में हैं, समय मिलेगा तो आपको बुला लेंगे.

दिन बीत गया, उन्होंने नहीं बुलाया. हम अगले दिन फिर गए. उनके गार्ड ने कहा, आप तो कल भी आए थे. हमने कहा, हां लेकिन मुलाक़ात या बात नहीं हो सकी. आप फिर से पूछ लीजिए, आज शायद वे मिल लें, दो मिनट ही सही. वह एक मिनट में वापस आया और बोला, ‘नहीं मिलेंगे.’

मैं उनके व्यस्त होने की उम्मीद कर रहा था. वे व्यस्त हो सकते हैं, लेकिन उनके संदेश में व्यस्तता का हवाला नहीं था. दो टूक संदेश था कि ‘नहीं मिलेंगे.’

एक दिन पहले मुझे छात्रसंघ के पदाधिकारियों ने एक अख़बार की कतरन उपलब्ध कराई थी. वह कुलपति रतनलाल हंगलू का छोटा सा इंटरव्यू था, जिसकी हेडिंग थी, ‘मेरी पहुंच बहुत ऊपर तक है. कोई मेरा कुछ नहीं बिगाड़ सकता.’ उनका जवाब सुनकर वह हेडिंग मेरी आंखों में कौंध गई. मैंने सोचा, एक विश्वविद्यालय के वीसी को यह बयान देने की ज़रूरत क्यों पड़ी होगी?

बहरहाल, कुलपति के कार्यालय के बाहर उनके मुख्य सुरक्षा अधिकारी, जिन्होंने अपना नाम नहीं बताया, यह कहकर कि नाम जानकर क्या करेंगे, ने हमें बताया, ‘कुलपति माननीय रतनलाल हंगलू जी शांतिप्रिय व्यक्ति हैं. कोई एक छात्र आए तो शांति से मिल ले. 50 की संख्या में छात्र हल्ला करते हुए आते हैं, तो छात्र नहीं मिलते.’

प्रो. आरसी त्रिपाठी कहते हैं, ‘कुलपति को शिक्षक भी होना चाहिए. वह अब शिक्षक नहीं है. वह प्रशासक है जो प्रशासकीय ढंग से विश्वविद्यालय चलाना चाहता है. बच्चों से बात की जा सकती है, लेकिन उन पर शासन कैसे किया जा सकता है?’

बातचीत के क्रम में एक शोधछात्र ने नाम न बताने की शर्त पर कहा, ‘प्रोफेसरों का एक ऐसा वर्ग है जो 2004 से 2014 तक जवाहरलाल नेहरू के गुण गाता था, वह विश्वविद्यालय के कुलपति से संबंध बनाए रखकर मलाई काटता था. आज वह बात-बात में योगी-मोदी करता है. वह कुलपति से अपने नज़दीकी संबंधों की सार्वजानिक घोषणा करता है. प्रोफेसरों का यह वर्ग तब भी नहीं पढ़ाता था, आज भी नहीं पढ़ाता है. ऐसे में वह छात्रों से किस आधार पर नैतिक आचरण की उम्मीद करता है.’

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रात में प्रदर्शन करने जाती छात्राएं (फोटो: कृष्णकांत)

उस शोध छात्र की दलील थी कि आप हमारा नाम छापेंगे तो हमें नुकसान हो सकता है. हमारी पीएचडी रोक दी जा सकती है, नियुक्ति रोकी जा सकती है. छात्र ने आगे कहा, ‘कुछ प्रोफेसर तो ऐसे हैं जो पूरे दिन प्रधानमंत्री और एचआरडी मिनिस्ट्री की निंदा करते हैं और शाम को कुलपति की हाज़िरी भी बजाते हैं. ऐसे में वह प्रगतिशील भी हो जाते हैं और कुलपति से भी बनी-बना रहता है.’

दरअसल, कुलपति के पास बहुत सी विवेकाधीन शक्तियां होती हैं. वह पद सृजित करने में इसका उपयोग करता है. इसके द्वारा वह लोगों को उपकृत कर सकता है. इसलिए कुलपति से नजदीकी रखने की जैसी होड़ मचती है, अकादमिक उपलब्धियों से ऐसी होड़ शायद ही मचती हो.

एक अन्य शोधछात्र ने बताया, ‘कुलपति से नजदीकी रखना बुरी बात नहीं है. आखिर वह कुल या परिवार का प्रमुख है. लेकिन अब प्रोफेसर देव या प्रोफेसर अमरनाथ झा जैसे कुलपति नहीं हैं जो विद्यार्थियों के लिए सुलभ हों. नये कुलपति ने दुर्लभता में अपनी शक्ति तलाश ली है. वे छात्रों से नहीं मिलते.’

वे मुझसे भी नहीं मिले, वरना इस रहस्य से पर्दा ज़रूर उठता कि वे छात्रों से क्यों नहीं मिलते. वास्तव में मैं तस्दीक करना चाहता था कि कुलपति छात्रों से मिलकर समस्या क्यों नहीं जानना चाहते हैं?

एक हॉस्टल के अन्तःवासी ने कहा, ‘ऐसा कर वे दिल्ली और लखनऊ की सत्ता की नक़ल करते हैं और अपने को आम छात्र से दूर कर लेते हैं. फिर वे प्रोफेसरों के एक छोटे से गुट की सुनते हैं या अपने ओएसडी अमित सिंह की सुनते हैं.

कुलपति का कार्यालय कम यह सेना के ब्रिगेडियर का कार्यालय ज्यादा लगता है. कुलपति लोहे के दोहरे दरवाजों के अंदर सुरक्षित हैं, मुझे और मेरे दोस्तों को पीटा गया है.’ फिर वह छात्र अपना घायल पैर दिखाने लगता है. यह 1 मई 2017 की बात है. जगह अमरनाथ झा के नाम पर बने हॉस्टल से क़रीब मीटर दूर है.

कुलपति को कुछ छात्र मजाकिया लहजे में प्रोफेसर कमेटीलाल हंगलू भी कहते हैं. वे बात-बात पर कमेटी बना देते हैं. इसमें उनके ही लोग होते हैं. कमेटियों पर ऋचा सिंह कहती हैं, ‘कमेटियां समस्या को बनाए रखने और आपत्तियों को निपटाने का बहाना होती हैं. मैंने अध्यक्ष रहते हुए जितने मसले उठाए या तो उन पर ध्यान नहीं दिया गया, या फिर कमेटी बनाकर मामला रफा-दफा हो गया. कमेटी बन गई, मतलब उस मामले का कुछ नहीं होना है.’

स्थानीय डिग्री कॉलेज में तब्दील हुआ विश्वविद्यालय

इलाहाबाद एक समय तक सस्ता और सज्जन शहर माना जाता था. इस शहर में हिंदुओं के अलावा बंगाली, क्रिश्चियन, सिंधी और सिख हैं. एक बड़ी जनसंख्या मुसलमानों की है. बगल के जिलों के लोगों ने यहां मकान बनाए हैं और यहीं अब उनका सब कुछ है. इस शहर में देश के पुराने उच्च न्यायालयों में से एक इलाहाबाद उच्च न्यायालय है. यह देश का सबसे बड़ा हाईकोर्ट है. यहां पूरे देश से पढ़े-लिखे जज आते थे. अब भी आते हैं.

विश्वविद्यालय में महाराष्ट्र से तमिलनाडु, और आजादी से पहले पेशावर के लोग पढ़ने और पढ़ाने आते थे. इससे इलाहाबाद शहर और विश्वविद्यालय एक कॉस्मोपोलिटन जगह बन जाती थी. शहर की आबादी बढ़ गई है, लेकिन अपनी व्यापकता में यह शहर अब सिकुड़ गया है. यह आप विश्वविद्यालय में भी देख सकते हैं. इसके कारण विश्वविद्यालय एक स्थानीय डिग्री कॉलेज में तब्दील हो गया है.

नियुक्तियों में पिता-पुत्रवाद, गुरु-चेलावाद खूब चला. हालांकि पिछले कुलपति के समय दूसरे शहर और विश्वविद्यालयों के लोग भी फैकल्टी नियुक्त हुए हैं. अप्रैल 2017 में विश्वविद्यालय में वैकेंसी आई है. इसकी अंतिम समय सीमा 12 मई है. इसलिए असिस्टेंट प्रोफेसर बनने की आशा लगाए शोध छात्र अच्छाई-बुराई से निस्पृह हो चुके हैं और कुछ नहीं बोल रहे. फैकल्टी भी सीनियर पोजीशन के लिए कुलपति के आगे पीछे लगे हैं. नियुक्ति कुलपति को सबसे शक्तिशाली व्यक्ति में बदल देती है.

शोधछात्र गौरव कहते हैं, ‘समाजवादी पार्टी के यादववाद पर स्वयं प्रधानमंत्री ने जनसभाओं में बात की. आखिर कोई हंगलू जी या अन्य वाइस चांसलरों के इस चरित्र पर बात क्यों नहीं करना चाहता है कि जब उन्होंने फैकल्टी की भर्ती में अन्य पिछड़ा वर्ग, अनुसूचित जातियों और जनजातियों की सीटें गोल कर दीं. नियुक्ति में वीसी से नज़दीकी ही नियुक्ति की गारंटी क्यों है? मामला कोर्ट से होकर आया है तब जाकर फैकल्टी रिक्रूटमेंट में अन्य पिछड़ा वर्ग, अनुसूचित जातियों और जन जातियों की सीटें दिख रही हैं.’

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विश्वविद्यालय का सीनेट हॉल (फोटो: कृष्णकांत)

‘छात्रवासों में गुंडे रहते हैं’

जब विश्वविद्यालय के छात्र अपने हॉस्टल बचाने के लिए आंदोलन कर रहे हैं, उसी समय उत्तर प्रदेश सरकार के कैबिनेट मंत्री सिद्धार्थ नाथ सिंह का बयान आया कि ‘विश्वविद्यालय के छात्रवासों में गुंडे रहते हैं.’

विश्वविद्यालय में गुंडे कहां से आए, इसके जवाब में हॉस्टल में रह रहे एक सीनियर छात्र ने कहा, ‘उन्हें यह भी बताना चाहिए ये गुंडे आए कहां से? सिद्धार्थ नाथ सिंह यह भी बताएं कि इन्हीं हॉस्टल से उनके प्रचार के लिए लड़कों का हुजूम गया था कि नहीं? वह यह भी बताएं कि हॉस्टल के वार्डन और सुपरिंटेंडेंट की जानकारी के बगैर कौन छात्र हॉस्टल में रहता है? यहां अगर गुंडे रहते हैं, तो गुंडों को पाला किसने है? वे किसकी शह पर बिना पढ़ाई के हॉस्टल में बने हुए हैं?’

छात्रसंघ की पूर्व अध्यक्ष ऋचा सिंह ने सिद्धार्थ नाथ सिंह के बयान की निंदा करते हुए कहा, ‘मंत्री जी को शायद पता नहीं है. छात्रावासों में अधिकांश वैध छात्र रहते हैं. अवैध छात्रों को बाहर किए जाने के पक्ष में हम भी हैं, पर अंतःवासियों को गुंडा कहा जाना उनकी नासमझी का प्रतीक है. उनका बयान यह भी दर्शाता है कि उन्हें आईएएस, पीसीएस की फैक्ट्री कहे जाने वाले विश्वविद्यालय के बारे में कुछ नहीं पता है.’

आवासीय विश्वविद्यालय के छात्र कमरे लेकर रहते हैं

विश्वविद्यालय में करीब 22 हज़ार छात्र रहते हैं, जिसमें दूरस्थ शिक्षा वाले छात्र शामिल नहीं हैं. छात्रावासों की क्षमता क़रीब तीन हज़ार है जिनमें छात्र-छात्राएं रहते हैं. विश्वविद्यालय के 15 हॉस्टल हैं जिनमें वैध-अवैध सब मिलाकर क़रीब सात हज़ार छात्र-छात्राएं रहते हैं. बाक़ी किराये पर कमरे लेकर बाहर रहते हैं. यह तब है जबकि इलाहाबाद देश का पहला आवासीय विश्वविद्यालय है.

विश्वविद्यालय को केंद्रीय दर्जा मिले 12 साल हो गए हैं, लेकिन एक भी नया हॉस्टल नहीं बना. विश्वविद्यालय अब तक यह नहीं सोच पाया है कि वह आवासीय परिसर है और उसके बच्चे कहां कैसे रहते हैं, डेलीगेसी फीस ज़रूर वसूली जाती है, लेकिन हॉस्टल से बाहर रहने वाले छात्रों को लेकर कोई नीति विश्वविद्यालय ने कभी नहीं बनाई.

जीबी पंत शोध संस्थान में शोधछात्र विकास स्वरूप कहते हैं, ‘चूंकि सबको हॉस्टल नहीं है, इसलिए छात्र दो हिस्सों में बंटे हैं. पावरफुल और पावरलेस. जो हॉस्टल में है, वह पावरफुल है, जो बाहर है वह पावरलेस है. पावरफुल की श्रेणी में हैं शिक्षक, छात्रनेता, नेता, अपराधी और ठेकेदार. मठाधीश शिक्षक छात्रों से शक्ति ग्रहण करता है और अपनी राजनीति करता है. वह बाक़ी चारों को साधने की कोशिश में हैं. नये तरह का गुट पहले के पावरफुल गुट को तोड़ने के चक्कर में है, इसका कारगर तरीक़ा है वाश आउट. वाश आउट को उन छात्रों का नैतिक समर्थन हासिल है, जो हॉस्टल से बाहर है, क्योंकि उसे हॉस्टल नहीं मिला है. हालांकि, वाश आउट के बाद भी सबको हॉस्टल तो मिलने से रहा क्योंकि हॉस्टल तो है ही नहीं. इसके अलावा हॉस्टल के आवंटन में एक खास सामाजिक वर्ग का दबदबा रहा है. इसे तोड़कर हॉस्टल आवंटन पारदर्शी और सामाजिक न्याय पूर्ण बनाना होगा.’

पखवाड़े भर के उपद्रव के बाद यूपी सरकार ने जिला प्रशासन से रिपोर्ट तलब की है, केंद्र सरकार ने पूरे मामले पर कमेटी गठित कर दी है, लेकिन छात्रों से बात करने की कोई सूरत नहीं दिखी.

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कैंपस में तैनात पुलिस (फोटो: कृष्णकांत)

इतिहासकार प्रो. लाल बहादुर वर्मा कहते हैं, ‘इलाहाबाद विश्वविद्यालय को पूरब का आॅक्सफोर्ड कहा जाता है. अब उसकी हैसियत एक कॉलेज जैसी है. ऐसा इसलिए है कि संस्थाओं का पतन हुआ है. समाज का भी पतन हुआ है. जैसा समाज है, वैसे ही शिक्षक हैं, वैसा ही प्रशासन है. बात यह नहीं कि किसकी कमी से यह हालत पैदा हुई. बात यह है कि हम एक विश्वविद्यालय को बेहतरीन कैसे बनाएं. छात्र लाठी खा रहे हैं तो न शिक्षकों को इसकी चिंता है, न इलाहाबाद के लोगों को. विश्वविद्यालय से बाहर जो समाज है, उसको भी क्या चिंता है? ज़ो हो रहा है, उसके लिए हम सभी ज़िम्मेदार हैं.’

रिसर्चर डॉ. रमाशंकर सिंह कहते हैं कि इलाहाबाद विश्वविद्यालय में हॉस्टल का मामला केवल आवास का मामला भर नहीं है. यह शक्ति प्राप्ति करने का मामला है. आप देखें कि बीस हज़ार से ज्यादा की संख्या में छात्र हैं, जिसमें एक तिहाई से कम को छात्रावास उपलब्ध कराया जा सकता है. जिन छात्रों का एडमिशन हॉस्टल में हो जाता है, वे आत्मविश्वास से लबरेज, एक सामुदायिक जीवन में अपने आपको सुरक्षित पाते हैं. उनके सीनियर्स हैं जो उनके लिए हर जगह हैं, उनके जूनियर्स हैं जो हर जगह हैं.

वे कहते हैं, ‘यह आत्मविश्वास और सुविधा सबके लिए नहीं है. सबके लिए हॉस्टल ही नहीं है. ऐसे में एक बड़ी संख्या में छात्र और छात्राएं शहर में खुद किराया देकर कमरा लेते हैं. उनकी अलग दुनिया है. वे शक्तिहीन हैं, अकेले और असुरक्षित हैं. उनके कमरे हवादार नहीं हैं और हॉस्टल की तरह बड़े भी नहीं हैं. उन्हें दैनिक जीवन में अपने मकान मालिक से दबकर रहना होता है. जब चाहे मकान मालिक किराया बढ़ा देते हैं. कमरे पर ज्यादा दोस्त आ जाएं तो कहते हैं कि कमरा बदल लो. हॉस्टल में आप रात 12 बजे के बाद आ सकते हैं. वहां एक आजादी भाव है. मकान मालिक 10 बजे गेट बंद कर देते हैं. जो लड़कियां बाहर रहती हैं, उन पर पिता से ज्यादा उनके मकान मालिक पाबंदियां लगाते हैं.’

इस वाश आउट के समय के समय शहर में खुद किराया देकर कमरा लेकर रहने वाले छात्र इ़स आंदोलन से अलग हैं. यह बात सबसे ज्यादा इलाहाबाद प्रशासन और इलाहाबाद विश्वविद्यालय प्रशासन को पता है. उन्होंने अन्तःवासियों को बाक़ी छात्रों से अलग-थलग कर दिया है.

छात्रों की पढ़ाई के लिए जो हॉस्टल ज़रूरी हैं, वे अपराधीकरण का ज़रिया भी रहे हैं. ये अपराधियों की शरणस्थली हैं. ये छात्र राजनीति का गढ़ भी हैं. जिस छात्र नेता को दो हॉस्टल का समर्थन मिल जाए, उसकी जीत पक्की समझी जाती है. हर हॉस्टल में हर राजनीतिक दल की मौजूदगी है, लेकिन फिलहाल ये राजनीतिक दल चुप हैं.

हॉस्टल मिलेंगे कैसे जब हैं ही नहीं

प्रॉक्टर रामसेवक दुबे का कहना है, ‘वाश आउट के बाद जो भी वैध छात्र हैं सबको हॉस्टल मिलेगा.’ शोधछात्र अंकित कहते हैं, ‘वे सार्वजनिक रूप से झूठ बोल रहे हैं. जब विश्वविद्यालय के पास हॉस्टल हैं ही नहीं तो देंगे कहां से? हर साल विश्वविद्यालय में 9 हज़ार नये एडमिशन होते हैं. एक साथ 22 हज़ार छात्र रहते हैं. प्रॉक्टर साहब इन सब छात्रों को हॉस्टल कहां से देंगे?’

मज़े की बात यह भी है कि शिक्षा रोज़गार परक नहीं है, तो छात्र पढ़ाई पूरी करके जाएं कहां? प्रोफेशनल कोर्स गिने चुने हैं. बाक़ी छात्रों के लिए रोज़गार नहीं हैं तो वे पढ़ाई पूरी करके भी हॉस्टल में बने रहना चाहते हैं. देश भर में शिक्षा का बजट कम कर दिया है और विश्वविद्यालयों से कहा गया है वे स्वावलंबी बनें. विश्वविद्यालय ने नये सत्र से फीस बढ़ाने का प्रस्ताव पेश कर दिया है. नए सत्र की शुरुआत के साथ इस पर भी छात्र विरोध पर उतरेंगे.

नीतिगत अराजकता कैसे दूर हो

विश्वविद्यालय खुद अराजकता का शिकार है. प्रशासन चाहता है कि हॉस्टल वाश आउट हो जाए, लेकिन सेमेस्टर सिस्टम लागू होने के बाद एक जुलाई से तीस दिसंबर और एक जनवरी से 30 जून तक सेमेस्टर होता है. बीच के दो महीने यानी सेमेस्टर के बीच में विश्वविद्यालय प्रशासन हॉस्टल खाली चाहता है.

आर्ट फैकल्टी की डीन केएस मिश्र हैं. इसके पहले डीन के पद पर प्रो. सत्य नारायण थे. कुलपति रतनलाल हंगलू ने उन्हें हटाकर अगस्त, 2016 में केएस मिश्र को बना दिया. प्रो. सत्य नारायण हाईकोर्ट गए. हाईकोर्ट ने कुलपति के आदेश को निरस्त कर दिया. प्रो. मिश्र सुप्रीम कोर्ट गए लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने उनकी अपील को खारिज कर दिया. इसके बावजूद प्रो. मिश्र डीन की कुर्सी पर बने हुए हैं. प्रो. सत्य नारायण का कहना है कि डीन की नियुक्ति असंवैधानिक है, लेकिन वे कुर्सी नहीं छोड़ रहे हैं.

प्रो. रामसेवक दुबे इलाहाबाद विश्वविद्यालय शिक्षक संघ के अध्यक्ष हैं, लेकिन वे ही प्रॉक्टर भी हैं. विश्वविद्यालय के इतिहास में यह पहली बार है कि जो व्यक्ति शिक्षक संघ का अध्यक्ष है, वही प्रॉक्टर भी है.

प्रॉक्टर रामसेवक दुबे आंदोलन में शामिल सभी छात्रों को चिह्नित कर रहे हैं. उन्होंने घोषणा की है कि सब छात्रों के मां-बाप से शिकायत करेंगे कि वे पढ़ाई की जगह आंदोलन कर रहे हैं.

छात्राओं के आंदोलन का नेतृत्व कर रहीं ऋचा सिंह कहती हैं, ‘वे प्रॉक्टर बनने की जगह अभिभावक बनने को आतुर हैं. वे विश्वविद्यालय की दुर्दशा पर ध्यान देने की जगह छात्रों को संस्कार सिखाने पर तुले हैं. उन्हें बताना चाहिए कि वे सबको हॉस्टल देने के बारे में क्यों नहीं सोच रहे?’

अप्रैल, 2014 में इलाहाबाद में प्रधानमंत्री के उम्मीदवार की हैसियत से नरेंद्र मोदी का भाषण हुआ था. उनका कहना था कि पूरब के आॅक्सफोर्ड को उसकी गरिमा वापस दिलानी है. जैसा कि रमाशंकर कहते हैं, ‘वे सत्ता में आए तो शिक्षा का बजट कम कर दिया. अब विश्वविद्यालय अपनी कमियों को भरने की जगह पैसा उगाहकर स्वावलंबी बनने पर तुला है.’

प्रो. लाल बहादुर वर्मा कहते हैं, ‘विश्वविद्यालय सिर्फ डिग्री लेने की जगह नहीं होती. वह पढ़ने सीखने के साथ नागरिक बनने की जगह होती है. वह प्रतिरोध का मंच भी होता है. वह सत्ता का विपक्ष भी होता है. वह ऐसे नागरिक तैयार करता है, जो देश की मेधा तैयार करते हैं. अब न हालत यह है कि विश्वविद्यालय की उस भूमिका को ही कोई मानने को तैयार नहीं है. पूरब का आॅक्सफोर्ड कहने के लिए है. उसकी गरिमा तार-तार हो चुकी है.’

प्रो. आरसी त्रिपाठी कहते हैं, ‘विश्वविद्यालयों को कंपनी की तरह नहीं चलाया जा सकता. शिक्षक और छात्रों को संवाद ख़त्म कर दिया. पठन-पाठन का माहौल ख़त्म कर दिया. सेमिनार और गोष्ठियों की परंपरा ख़त्म कर दी गई. विश्वविद्यालय कोई ऐसी जगह नहीं बची है, जहां कोई ख़ुद आना चाहता है. इसलिए प्रशासन को आने जाने का वक़्त तलब करना पड़ता है.’

बहरहाल, छात्रों के प्रदर्शन जारी हैं, रोज़ विरोध मार्च निकल रहे हैं. फोर्स तैनात है. प्रशासन अपने लोहे के सुरक्षित कार्यालय में सक्रिय है. संवाद ठप है. स्थानीय अख़बारों में घोषणा हो चुकी है कि 18 मई तक सभी हॉस्टल ख़ाली कराएंगे. छात्रसंघ अध्यक्ष जेल में बंद हैं.

छात्रसंघ और छात्रों के नेतृत्व का कहना है, ‘विश्वविद्यालय में अभूतपूर्व भ्रष्टाचार हुए हैं. पहले वीसी को हटवाकर उनकी जांच करवाएंगे. वरना आंदोलन जारी रहेगा.’ मतलब यह तय है कि इलाहाबाद विश्वविद्यालय सब कुछ सामान्य होने नहीं जा रहा है.