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कश्मीर और 370 से लेकर विभाजन तक नेहरू के प्रति भाजपा की नफ़रत झूठ की बुनियाद पर टिकी है

गृहमंत्री अमित शाह ने अगस्त 2019 में दिए एक भाषण में कहा था कि अगर नेहरू न होते, तो पाक अधिकृत कश्मीर भारत के कब्ज़े में होता. सच तो यह है कि अगर आज कश्मीर भारत का हिस्सा है तो यह केवल नेहरू के चलते ही है.

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जवाहरलाल नेहरू. (फोटो साभार: IISG/Flickr (CC BY-SA 2.0)

गृहमंत्री अमित शाह ने अगस्त 2019 में दिए एक भाषण में कहा था कि अगर नेहरू न होते, तो पाक अधिकृत कश्मीर भारत के कब्ज़े में होता. सच तो यह है कि अगर आज कश्मीर भारत का हिस्सा है तो यह केवल नेहरू के चलते ही है.

जवाहरलाल नेहरू. (फोटो साभार: IISG/Flickr (CC BY-SA 2.0)
जवाहरलाल नेहरू. (फोटो साभार: IISG/Flickr (CC BY-SA 2.0)

जवाहरलाल नेहरू के लिए संघ परिवार की नफ़रत पूरी तरह से समझ में आने लायक है. भारत के बंटवारे के वक्त वे गांधी के साथ कंधे से कंधा मिलाकर खड़े रहे और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ द्वारा पोषित/प्रोत्साहित नफ़रत बढ़ते ज्वार का मुकाबला उन्होंने पूरे साहस के साथ किया.

जैसा कि उत्तर प्रदेश के मुख्य सचिव रहे राजेश्वर दयाल ने अपने संस्मरण अ लाइफ इन अवर टाइम  में लिखा है, मुस्लिमों को पूरी तरह से मिटा देने की आरएसएस प्रमुख एमएस गोलवलकर की योजना पकड़ ली गई. दयाल के मुताबिक, अगर उन्हें गिरफ्तार कर लिया जाता, तो गांधीजी की जिंदगी बचाई जा सकती थी.

भारतीय जनता पार्टी भाजपा और आरएसएस आज भी गांधी को लेकर बहुत असहज महसूस करते हैं. लालकृष्ण आडवाणी ने संसद भवन के हॉल में वीडी सावरकर की आदमकद तस्वीर लगवाई- उस सावरकर की जिन्हें सुप्रीम कोर्ट के एक जज जस्टिस जेएल कपूर ने गांधी की हत्या की साजिश का एक सदस्य होने का दोषी करार दिया था.

सावरकर संघ परिवार के बाइबल का दर्जा रखनेवाली किताब हिंदुत्व  के लेखक हैं. संसद के हॉल में गांधी की तस्वीर के सामने उनकी हत्या के साजिशकर्ता की तस्वीर लगी हुई है. 1989 में नेहरू के प्रति भाजपा की नफरत की सीमा का तब मुझे अंदाजा लगा, जब मैं अपने मित्र जसंवत सिंह से मिला.

हम में से कुछ मित्रों को लगता था कि वे उदारवादी हैं. उन्होंने मुझसे मूर्ति तोड़ने वाले के लिए उर्दू शब्द पूछा. उर्दू में इसके लिए शब्द है बुतशिकन. उन्होंने बात को जारी रखते हुए मुझसे पहली बार कहा कि हमें तीन ‘मूर्तियों’ (बुतों) को जरूर से ढहा देना चाहिए- योजना और गुटनिरपेक्षता. उन्होंने तीसरे का नाम नहीं लिया. लेकिन साफतौर पर यह तीसरी मूर्ति धर्मनिरपेक्षता थी.

उन्होंने मुंबई में कारोबारियों की सभा के सामने अफसोस जताते हुए कहा कि भारत में तीन -‘जी’ को तिरस्कार की नजर से देखा जाता है- गाय, गंगा और गीता. उन्होंने इससे पहले कभी भी इस झूठ को बयान नहीं किया था.

नेहरू के प्रति नफ़रत को ऐतिहासिक मिथ्याओं के द्वारा भड़काया गया है. लेकिन सच्चाई कभी भी परिवार का गुण नहीं था. एक उदाहरण देकर अपनी बात कहूं, तो आडवाणी ने बिना किस्सी लज्जा के जनसंघ के भाजपा में नया अवतार ग्रहण करने के मामले में अपनी किताब माय कंट्री माय लाइफ (2008) में दो अंतर्विरोधी बातें कही हैं.

पृष्ठ 38 पर वे लिखते हैं कि 1980 के दशक में ‘जनसंघ भारतीय जनता पार्टी बन गया.’ लेकिन पृष्ठ 311 में वे लिखते हैं कि ‘भारतीय जनसंघ और जनता पार्टी, दोनों के साथ हमें अपने रिश्ते पर गर्व है, लेकिन अब हम एक नयी पार्टी हैं, जिसकी एक नयी पहचान है.’

यह एक बेशर्म झूठ है. भाजपा ने जल्द ही अपने सिद्धांतों में एक नयी चीज- ‘गांधीवादी समाजवाद’ का विकास किया. अटल बिहारी वाजपेयी ने सच बयान किया था, ‘हमने जनसंघ छोड़ा ही कब था?’

इसने आरएसएस को कुपित कर दिया, जो जनसंघ को फिर से जीवित करना चाहता था. वाजपेयी और आडवाणी को यह पता था कि संघ का नाम इस देश में कीचड़ के समान था. उसे 1984 की दो सीटों से 1989 में 89 सीटों तक की छलांग लगाने के लिए अयोध्या के विध्वंसकारी नारे की तलाश थी, जिसने राजीव गांधी ने खुले दिल से 1986 में उसे मुहैया करा दिया.

अगर ये लोग ऐसे मामलों में झूठ बोल सकते हैं, तो उनसे नेहरू के रिकॉर्ड के मामले में कुछ बेहतर की उम्मीद नहीं की जानी चाहिए. अगर आज कश्मीर भारत का हिस्सा है, तो यह लगभग पूरी तरह नेहरू की वजह से है. यह उनकी ही दूरदृष्टि थी कि उन्होंने कश्मीर के सबसे बड़े नेता शेख मोहम्मद अब्दुल्ला के साथ 1930 के हर दशक में एक आपसी समझदारी विकसित कर ली थी.

उन्होंने बंटवारे से पहले ही मई, 1947 में वायसराय माउंटबेटन को एक विस्तृत विज्ञप्ति लिखकर जम्मू कश्मीर पर अपनी दावेदारी पेश की थी. जबकि भाजपा के पूर्वज जनसंघ की दिलचस्पी सिर्फ जम्मू और इसके प्रतिनिधि प्रजा परिषद में ही थी.

1 जनवरी, 1952 को नेहरू ने एक कड़वा सच बयान किया था, जो आज भी भाजपा को परेशान करता है. हालिया महीने में भाजपा के व्यवहार ने नेहरू को सच साबित किया है. उन्होंने कहा था :

‘आप देख सकते हैं कि हमारी धर्मनिरपेक्ष नीतियों, हमारे संविधान का इससे बड़ा कोई अनुमोदन कुछ नहीं हो सकता है कि कश्मीर की अवाम हमारे साथ है. लेकिन आप बस कल्पना कीजिए कि क्या हुआ होता अगर जनसंघ या कोई दूसरी फिरकापरस्त पार्टी सत्ता में होती. कश्मीर की जनता कहती है कि वे फिरकापरस्ती से आजिज आ चुके हैं. वे ऐसे देश में क्यों रहना चाहेंगे, जहां जनसंघ और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ निरंतर उन्हें परेशान करते रहें? वे कहीं और चले जाएंगे और वे हमारे साथ नहीं रहेंगे.’ (एस गोपाल [सं.] सिलेक्टेड वर्क्स ऑफ जवाहरलाल नेहरू; खंड 17, पृ.78)

पटेल को भी जनमत संग्रह के वचन की जानकारी थी, जैसे उनके कैबिनेट सहयोगी श्यामा प्रसाद मुखर्जी को थी. हम नरेंद्र मोदी और उनके दाएं हाथ अमित शाह जैसे लोगों से सच की उम्मीद नहीं कर सकते हैं. वे न केवल अशिक्षित हैं, बल्कि उन्हें शिक्षित कर पाना नामुमकिन है.

शाह ने, जो अब केंद्रीय मंत्री हैं, ने 28 जून 2019 को लोकसभा में अपने भाषण में जो कहा उसे याद करना इसलिए जरूरी है क्योंकि यह नेहरू के खिलाफ भाजपा के सभी प्रमुख आरोपों को दोहराता है.

कोई भी केंद्रीय मंत्री मोदी की तारीफों के पुल बांधे बगैर किसी भी विषय पर अपना मुंह खोलने में सक्षम नहीं है. यह राजनीतिक अश्लीलता कितने समय तक चलती है, यह देखने वाली बात है.

राज्यसभा में सोमवार को गृह मंत्री अमित शाह जम्मू कश्मीर से अनुच्छेद 370 खत्म करने का प्रस्ताव रखा. (फोटो: आरएसटीवी/पीटीआई)
5अगस्त 2019 को राज्यसभा में जम्मू कश्मीर से अनुच्छेद 370 खत्म करने का प्रस्ताव रखते गृह मंत्री अमित शाह. (फोटो: आरएसटीवी/पीटीआई)

विभाजन

चलिए हम पहले आरोप से शुरू करते हैं. पूरी कांग्रेस पार्टी, जिसमें पटेल भी शामिल थे, इसके हिस्सेदार थे. 2019 की कांग्रेस 1947 या 1944 की कांग्रेस नहीं है. 1944 में गांधी ने जिन्ना को जो फॉर्मूला दिया था, उसमें ‘लगे हुए मुस्लिम बहुल जिलों में’ जनमत संग्रह के बाद विभाजन की कल्पना की गई थी.

लेकिन सबसे बड़े विभाजक जनसंघ के संस्थापक मुखर्जी थे. वे अंग्रेजों के सहयोगी थे, जो गवर्नर को भारत छोड़ो आंदोलन को असफल करने के गुर बताया करते थे. अगर मसला विभाजन का नहीं होता, तो जिन्ना उनके साथ तीन घंटे तक बात नहीं कर सकते थे.’

1946 की कैबिनेट मिशन योजना भारत की एकता को बचाए रखने का आखिरी मौका थी. इसमें एक अखंड संघीय भारत की कल्पना की गई थी. जिन्ना ने इसे स्वीकार किया, मगर कांग्रेस इसके लिए तैयार नहीं हुई. मुखर्जी को यह बिल्कुल रास नहीं आया. वे विभाजन चाहते थे. 11 मई, 1947 को उन्होंने पटेल को लिखा था :

‘मैं उम्मीद करता हूं कि आखिरी घड़ी में मुस्लिम लीग द्वारा कैबिनेट मिशन योजना को स्वीकार करने की कोई संभावना नहीं है. अगर परिस्थितिवश जिन्ना ऐसा करने के लिए मजबूर हो जाते हैं, तो कृपया बंगाल के विभाजन के मसले को हटने मत दीजिए. अगर कैबिनेट मिशन की योजना के तहत जिस ढीले-ढाले केंद्र की कल्पना की गई है, वह स्थापित भी हो जाता है, तो भी हम बंगाल में बिल्कुल भी सुरक्षित नहीं रहेंगे. हम मौजूदा बंगाल को बांटकर दो प्रांतों के निर्माण की मांग करते हैं.’ (दुर्गा दास [सं.] सरदार पटेल्स कॉरेस्पोंडेंस, खंड 4, पृ. 40)

यानी देश का बंटवारा न होने की सूरत में भी बंगाल का धार्मिक आधार पर विभाजन किया जाना चाहिए. परिसंघ (फेडरेशन) की प्रकृति पर और/या पूर्वी बंगाल, सिंध, पंजाब, नॉर्थ-ईस्ट फ्रंटियर प्रोविंस और बलूचिस्तान जैसे प्रभावित प्रांतों पर इसका क्या असर होता, इसकी कल्पना असानी से की जा सकती है.

यूनियन कैबिनेट के सदस्यों के साथ शयामा प्रसाद मुखर्जी. (फोटो साभार: विकीमीडिया कॉमन्स)
यूनियन कैबिनेट के सदस्यों के साथ शयामा प्रसाद मुखर्जी. (फोटो साभार: विकीमीडिया कॉमन्स)

हिंदू राजनीतिज्ञों का एक धड़ा हमेशा से विभाजन का तरफदार था. लाजपत राय यह बात 1924 में ही कह चुके थे. मुखर्जी एक ऐसी कैबिनेट में क्यों शामिल हुए, जिसके नेताओं ने भारत के विभाजन को स्वीकार किया था?

ऐसा उन्होंने उतनी ही सहजता के साथ किया, जितनी सहजता के साथ वे बंगाल में फजलूल हक़ के मंत्रिपरिषद में शामिल हुए थे. वे जम्मू और कश्मीर का बंटवारा भी सांप्रदायिक आधार पर चाहते थे. वे अंदर से विभाजन के पैरोकार थे.

फिर भी अमित शाह ने कहा, ‘बंटवारा किसने किया? हमने नहीं किया? किसने बंटवारे को अपनी सहमति दी? आज भी हम यह कहते हैं कि देश को धर्म के आधार पर नहीं बांटा जाना चाहिए. यह एक ऐतिहासिक गलती थी. यह हिमालय जैसी ऊंची और समंदर जैसी गहरी है. लेकिन हमने वैसी गलती नहीं की. गलती आपके द्वारा की गयी थी, आपकी पार्टी ने की है और आप इतिहास से भाग नहीं सकते हैं.’

कश्मीर में युद्धविराम

अमित शाह ने कहा, ‘युद्ध विराम की घोषणा करनेवाले प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू थे. अब वह हिस्सा पाकिस्तान है. आप हमें इतिहास पढ़ा रहे हैं, आरोप लगा रहे हैं, प्रेस कॉन्फ्रेंस कर रहे हैं, हम इसको या उसके विश्वास में नहीं लेंगे. बिना देश के गृह मंत्री और उप प्रधानमंत्री को विश्वास में लिए, जवाहरलाल नेहरू ने फैसला लिया है; अगर (औरों को) को विश्वास भी लिया जाता, तो पाक अधिकृत कश्मीर आज भारत के कब्जे में होता.’

यह पूरी तरह से झूठ है. पटेल के पत्राचार का खंड एक इस झूठ को बेनकाब कर देता है कि पटेल को विश्वास में नहीं लिया गया. अगर ऐसा किया जाता, तो यह पटेल जैसे बड़े कद के व्यक्ति के लिए कैबिनेट से इस्तीफा देने के लिए पर्याप्त वजह होता.

इस मामले में सारे तथ्य पेशेवर सैन्य इतिहासकार एसएन प्रसाद ने साक्षात्कारों और उपलब्ध दस्तावेजों के आधार पर पेश किए थे. वे रक्षा मंत्रालय के इतिहास विभाग के निदेशक थे.

रक्षा मंत्रालय के इतिहास विभाग ने 1987 में हिस्ट्री ऑफ ऑपरेशंस इन जम्मू एंड कश्मीर(1947-48) का प्रकाशन किया था. यहां इतिहास के पूरे विश्लेषण को जस का तस प्रस्तुत किया जा रहा है :

‘दिसंबर, 1948 में शत्रु पाकिस्तानी इनफैंट्री के दो डिविजन और तथाकथित आज़ाद कश्मीर आर्मी’ के एक इनफैंट्री डिविजन के साथ युद्ध के मोर्चे पर लड़ रहा था. इसमें पाकिस्तानी सेना की 14 इनफैंट्री ब्रिगेड या 23 इनफैंट्री बटालियन और ‘आजाद कश्मीर’ की 40 इनफैंट्री बटालियनो के अलावा 19000 स्टाउट्स और अनियमित सैनिक थे.

इनके मुकाबले में भारतीय सेना के पास जम्मू और कश्मीर में सिर्फ दो इनफैंट्री डिविजन, जिसमें 12 इनफैंट्री बिग्रेड शामिल थी; औपचारिक सेना और भारतीय राज्य पुलिस बल (इंडियन स्टेट फोर्सेज) की कोई 50 इनफैंट्री बटालियन के अलावा जम्मू कश्मीर मीलिशिया की 12 बटालियन (कुछ में सिर्फ दो कंपनियां थीं) और पूर्वी पंजाब मिलिशिया की दो बटालियन ही थी.

अगर तुलनात्मक शक्ति के बारे में ऊपर के आंकड़े को करीब-करीब सही माना जाए, तो यह साफ है कि जम्मू कश्मीर में दुश्मन संख्याबल के मामले में भारतीय सुरक्षा बल पर भारी था, और सिर्फ वीरता और कौशल और मामूली-सी वायुसेना के अमूल्य सहयोग की बदौलत ही भारतीय सेना युद्ध के मैदान में अपनी श्रेष्ठता कायम रख पाने में कामयाब हो सकी.

लेकिन इस बात में कोई संदेह नहीं हो सकता है कि किसी भी बड़ी जवाबी कार्रवाई के लिए जम्मू कश्मीर में ज्यादा भारतीय सैनिकों की दरकार थी…

जम्मू कश्मीर में और भारतीय सैनिक भेजने को लेकर असमंजस की स्थिति थी. पर्वतीय इलाके में इंफैंट्री के बगैर काम नहीं चल सकता था और भारतीय सेना की इंफैंट्री इकाइयां अन्य जगहों पर जरूरत के मुताबिक़ तैनात थीं. 1948 के अंत में भारतीय सेना के पास 127 इन्फेंट्री बटालियन थी जिनमें पैराशूट और गोरखा बटालियन और भारतीय सेना के लिए काम कर रहे प्रांतीय सुरक्षा बल शामिल थे.

हालांकि इसमें किलों की रक्षा में तैनात बटालियन और कंपनियां शामिल नहीं थीं. इन 127 बटालियनों में करीब 50 बटालियन पहले ही जम्मू कश्मीर में तैनात थी. 29 बटालियन पूर्वी पंजाब में थीं और भारत-पाकिस्तान सीमा के बेहद महत्वपूर्ण क्षेत्रों की रक्षा कर रही थीं.

19 बटालियन हैदराबाद के इलाके में तैनात थीं, जहां रजाकर अभी भी कानून और व्यवस्था के लिए खतरा बने हुए थे और सैन्य गवर्नर को उस क्षेत्र को शांत करने के लिए मजबूत सैन्य बल की दरकार थी. इस तरह से सरकार के हाथ में आंतरिक सुरक्षा, हजारों किलोमीटर लंबी सीमा की रक्षा और सामान्य रिज़र्व के तौर पर रखने के लिए सिर्फ 29 बटालियनें ही थीं.

अपने रिजर्व को पूरी तरह से खाली करके जम्मू कश्मीर के लिए ज्यादा सुरक्षा बल भेजे जा सकते थे, लेकिन ऐसा करना भी समस्या से खाली नहीं था, क्योंकि जम्मू कश्मीर में पूरी सेना की देख रेख सिर्फ एक रेल-मार्ग और एकमात्र सड़क से किया जाना था. यह सड़क लंबी और कमजोर थी और इस पर कई संकड़े पुल थे, जिनका इस्तेमाल काफी एहतियात के साथ ही किया जा सकता था.

बुनियादी सुविधाओं के हालात को देखते हुए भारत जम्मू कश्मीर में एक सीमा से ज्यादा सुरक्षा बल तैनात नहीं कर सकता था. लेकिन पाकिस्तान के सामने ऐसी कोई अड़चन नहीं थी. ऐसी कई सड़कें थीं, जो पाकिस्तान के सैन्य अड्डों को जम्मू कश्मीर की सीमा तक जोड़ती थीं और वहां से वास्तविक मोर्चे तक सड़क पर थोड़ी सी ही दूरी तय करके पहुंचा जा सकता था.

इसलिए पाकिस्तान के पास भारत की किसी कार्रवाई को रोकने के लिए अपने सैनिकों तक मदद पहुंचाने की राह में बुनियादी सुविधा संबंधी कोई दिक्कत नहीं थी. इसलिए जम्मू कश्मीर में भारतीय सेना को निश्चित और भारी बाधाओं के बीच काम करना था.

जम्मू कश्मीर की सीमा के भीतर स्थानीय कार्रवाई के द्वारा दुश्मन को निर्णायक ढंग से नहीं हराया जा सकता था. निर्णायक जीत के लिए पाकिस्तान को पंजाब के चौरस मैदान में युद्ध में लाना जरूरी थी. अंतिम निष्कर्ष में जम्मू कश्मीर की लड़ाई को लाहौर और सियालकोट में लड़ा और जीता जाना था, जैसा कि 1965 की घटनाओं ने साबित किया.

इसलिए अगर पूरे जम्मू कश्मीर को दुश्मन से आजाद कराना था, तो पाकिस्तान के साथ एक पूरा युद्ध लड़ा जाना जरूरी था. इस बात को लेकर शायद ही कोई संदेह हो सकता है कि एक पूरे पैमाने के युद्ध में पाकिस्तान को निर्णायक ढंग से शिकस्त दी जा सकती थी, हालांकि भारत और पाकिस्तान की सेना, दोनों ही उस समय विभाजन से जख्मी थीं और खुद को नए सिरे से संगठित कर रही थीं.’ (पृ. 373-375)

भारत ने घाटी, जम्मू और लद्दाख बचाया. 1948-49 में यह ‘पूरे पैमाने के युद्ध’ को झेल पाने की स्थिति में नहीं था.

संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में फरियाद

सैन्य स्थिति को देखते हुए युद्ध विराम अनिवार्य था. अगर भारत ने पहल नहीं की होती तो वहां पाकिस्तान पहले पहुंच गया होता भारत को प्रतिवादी बनाता. यह मसला सबसे पहले 8 दिसंबर, 1947 को लाहौर में उठा जब माउंटबेटन और नेहरू लियाकत अली खान से मिलने गए.

उन्होंने एक मसौदा समझौते पर चर्चा की. लियाकत अली खान मामले को यूएन में संदर्भित करने के लिए तैयार हो गए. माउंटबेटन ने नेहरू को इसके लिए राजी करने के लिए मनाना शुरू किया.

नई दिल्ली में इस बाबत चर्चा 21-22 दिसंबर, 1947 को शुरू हुई. काफी लंबे समय तक नेहरू पूरी सख्ती के साथ मामले को यूएन को संदर्भित किए जाने के खिलाफ थे. 22 दिसंबर तक वे इसके लिए राजी हो गए. इस मसौदे को गांधी ने अनुमोदित किया, जिन्होंने आजादी के विकल्प को हटा दिया. (एस गोपाल; नेहरू; खंड2; पृ.22)

बाद की आलोचनाओं के आलोक में इस बात को समझना जरूरी है कि चीजें बिगड़ क्यों गईं :

मैंने (माउंटबेटन ने) उन्हें (नेहरू को) सुरक्षा परिषद में भारत के के केस के इतना बिगड़ने के कारण के बारे में अपनी राय से अवगत कराते हुए कहा था कि इसका एक एक प्रमुख कारण यह था कि पाकिस्तानी प्रतिनिधि मंडल भारतीय प्रतिनिधि मंडल से बीस साबित हुआ.

न सिर्फ गोपालस्वामी आयंगर वहां भेजे जाने के हिसाब से पूरी तरह से गलत व्यक्ति थे- वे सामाजिक तौर पर अच्छी तरह से घुलमिल नहीं सकते थे और उनकी आवाज कर्कश और न सुनाई देनेवाली थी; इसके अलावा परदे के पीछे तैयारी करने के मामले में भारत के पास मोहम्मद अली की बराबरी का कोई नहीं था.

मैंने पंडित नेहरू से कहा कि प्रतिनिधिमंडल के लिए मेरी पसंद इसके नेता के तौर पर सर सीपी रामास्वामी, एचएम पटेल और संभवतः जनरल बुचर होते. मैंने यह सलाह दी कि अगर अगर एक स्थगन के बाद भारत वार्ता को आगे बढ़ाना चाहता है, तो मौजूदा दल के बजाय इस दल को भेजा जाना चाहिए. पंडित नेहरू ने कहा कि वे इस सलाह के बारे में सोचेंगे.’

भारत द्वारा भेजे गए एक और सदस्य गर्व से भरे हुए और किसी से न घुलने-मिलनेवाले एमसी सीतलवाड़ थे. यह आरोप अमित शाह की भाषण में नहीं आया, लेकिन भाजपा की चर्चाओं में इसका जिक्र आता है.

अनुच्छेद 370

यह अनुच्छेद जम्मू कश्मीर राज्य और संघ के बीच करार को प्रदर्शित करता है. इस पर मई, 1949 से अक्टूबर, 1949 तक चर्चा हुई. केंद्र की टीम में नेहरू और पटेल शामिल थे; कश्मीरी टीम में शेख अब्दुल्ला और मिर्जा अफज़ल बेग थे. इसे भारत की संविधान सभा द्वारा 17 अक्टूबर को अंगीकार किया गया.

नेहरू उस समय अमेरिका में थे. उनकी गैरहाजिरी में पटेल ने केंद्र की टीम का नेतृत्व किया और उन्होंने एम. गोपालस्वामी आयंगर के साथ मिलकर इसकी भाषा में बदलाव किया, जैसा कि 16 अक्टूबर और 3 नवंबर 1949 के पटेल के खत से उजागर होता है.

अमित शाह ने कहा, ‘यह संधि (विलय की संधि) सिर्फ जम्मू कश्मीर के साथ नहीं, बल्कि देश के 630 रजवाड़ों के साथ की गई. 630 रजवाड़ों के साथ संधि की गई और 370 इनमें से कहीं भी नहीं है. जवाहरलाल नेहरू ने एक जगह बातचीत की और वहां 370 आ गया.

1947 में सभी रजवाड़ों द्वारा हस्ताक्षारित विलय की संधि ने गवर्नमेंट ऑफ इंडिया एक्ट, 1935 के तहत मोटे तौर पर एक संघीय व्यवस्था को स्वीकार किया. भारत स्वतंत्रता अधिनियिम, 1947 के तहत भारत ने इसे अपने कामचलाऊ (प्रोविजिनल) संविधान के तौर पर स्वीकार किया था.

सभी रजवाड़ों ने भारत के संविधान के भाग बी को स्वीकार किया. अकेले कश्मीर ने, जिसे अलग संधि के द्वारा मिलाया गया था, अनुच्छेद 370 के साथ संविधान को अंगीकार किया, जिसके लिए इसने केंद्र के साथ पांच महीने तक वार्ता की थी. लेकिन उसकी किस्मत में पांच साल बाद धोखा मिलना लिखा हुआ था.

A deserted road in Srinagar on Monday. Restrictions were in force across Kashmir and in several parts of Jammu. (REUTERS/Danish Ismail)
अनुच्छेद 370 हटाए जाने के बाद जम्मू कश्मीर के अधिकतर हिस्सों में बंद घोषित कर दिया गया था. (फोटो: रायटर्स)

हाशिये पर लिखे शब्दों का सहारा मुख्य पाठ के अस्प्ष्ट होने की सूरत में उसकी व्याख्या करने के लिए लिया जाता है. हाशिये की  टिप्पणियां मूल पाठ का स्थान नहीं ले सकती हैं. हाशिये पर लिखा गया ‘अस्थायी प्रावधान’ अनुच्छेद 370 के भाग्य का निर्धारण नहीं कर सकता है. यह व्यवस्था उपबंध (3) में की गई है, जो इस संबंध में फैसला लेने का अधिकार सिर्फ और सिर्फ कश्मीर के संविधान सभा को देता है.

जनवरी, 1957 में इसे औपचारिक तौर पर भंग किए जाने के बाद अनुच्छेद 370 केंद्र के लिए उपलब्ध नहीं रहा. नई दिल्ली के किसी नए नवाब द्वारा इसे खत्म कर देने का कोई विकल्प तो और भी कम रह गया.

लेकिन अस्थायी शब्द का इस्तेमाल क्यों किया गया? भारत की संविधान सभा में अनुच्छेद 370 के प्रस्तावक एम. गोपालस्वामी आयंगर ने यह समझा कि क्यों 17 अक्टूबर, 1949 को :

‘कश्मीर की स्थितियां, जैसा कि मैंने कहा है विशिष्ट हैं और विशेष व्यवहार की मांग करती हैं. मैं संक्षेप में इस बताऊंगा कि ये विशिष्ट हालात क्या हैं. पहली बात जम्मू कश्मीर राज्य की सीमा के भीतर एक युद्ध चल रहा है.

इस साल की शुरुआत में एक युद्धविराम पर सहमति बनी थी और यह युद्धविराम अब भी जारी है. लेकिन सूबे के हालात अभी भी असाधारण और असामान्य हैं. गर्द-ओ-गुबार अभी तक थमा नहीं है. ऐसे में यह जरूरी है कि राज्य का प्रशासन इन असाधारण स्थितियों के लिए तैयार रहे जब तक कि दूसरे राज्यों की तरह वहां जन-जीवन सामान्य नहीं हो जाता. राज्य के कुछ हिस्से अभी भी विद्रोहियों और दुश्मनों के हाथों में हैं.

हम जम्मू कश्मीर के मामले में संयुक्त राष्ट्र में हैं और अभी यह कहना संभव नहीं है कि हम इससे कब तक बाहर आ पाएंगे. यह तभी हो सकता है जबकि कश्मीर की समस्या का संतोषजनक समाधान निकल जाए.

मैं एक बार फिर दोहराना चाहूंगा कि भारत सरकार ने कश्मीर की जनता को कुछ मामलों में वचन दिया है. उन्होंने खुद से वादा किया है कि राज्य की जनता को इस बात का फैसला करने का मौका दिया जाएगा कि वे गणराज्य के साथ रहना चाहते हैं या इसके बाहर जाना चाहते हैं.

हमने जनता की इस इच्छा का जनमत संग्रह के जरिए पता लगाने का भी वचन दिया है. लेकिन इसकी शर्त है कि राज्य में शांतिपूर्ण और सामान्य हालात फिर से बहाल हो जाएं और पक्षपातरहित जनमत संग्रह की गारंटी ली जा सके. हम इस बात के लिए भी राजी हुए हैं कि संविधान सभा के माध्यम से जनता की इच्छा राज्य के संविधान और राज्य के मामले में केंद्र के अधिकार क्षेत्र को निश्चित करेगी.

वर्तमान में प्रजा सभा के नाम से पुकारे जानेवाले विधानमंडल का वजूद समाप्त हो चुका है. जब तक राज्य में पूर्ण शांति बहाल नहीं हो जाती है, तब तक न ही उस विधानसमंडल को और न ही संविधान सभा को आहूत किया जा सकता है.

इसलिए हमें राज्य की सरकार के साथ ही बातचीत करनी है, जो, जैसा कि मंत्रिपरिषद में झलकता है, राज्य की सबसे बड़ी राजनीतिक पार्टी की राय को प्रकट करती है. जब तक संविधान सभा अस्तित्व में नहीं आ जाए, तब तक एक अंतरिम व्यवस्था ही संभव है, न कि वैसी व्यवस्था, जिसे एकबारगी दुसरे सूबों में मौजूद व्यवस्था के समकक्ष लाया जा सकता है.

जिस दृष्टिकोण का मैंने जिक्र किया है, वह अगर आपको याद है, तो यह यह निष्कर्ष निकाले बिना नहीं रहा जा सकता है कि मौजूदा समय में हम केवल एक अंतरिम व्यवस्था की ही स्थापना कर सकते थे. अनुच्छेद 306ए (यह मसौदे में उस अनुच्छेद का क्रमांक था, जिसे आखिरकार अनुच्छेद 370 बनना था.) सिर्फ एक अंतरिम व्यवस्था का निर्माण करने की कोशिश करता है.

यह तब तक ‘अंतरिम’ या ‘अस्थायी’ बना रहेगा, जब तक कि जनमत संग्रह नहीं हो जाता या ‘कश्मीर समस्या का एक संतोषजनक हल नहीं निकल जाता.’

23 जून, 1953 के कश्मीर में श्यामा प्रसाद मुखर्जी की मृत्यु

1968 में दीनदयाल उपाध्याय की पर जनसंघ जस्टिस वायवी चंद्रचूड़ के सामने जाली दस्तावेज और नाना देशमुख द्वारा झूठी मौखिक गवाही दिलवाने तक नीचे गिर गया. मुखर्जी की मृत्यु पर भी यह उसी स्तर तक नीचे जा गिरता है.

महत्वपूर्ण तथ्य यह है कि उनके सहायक बलराज मधोक ने नेहरू या अब्दुल्ला के खिलाफ अपनी किताब पोट्रेट ऑफ अ मारटायर (196-197) में ऐसा कोई आरोप नहीं लगाया. उनका इलाज डॉ. अली मोहम्मद द्वारा किया गया था, जो एक प्रतिष्ठित फीजिशियन थे. मधोक का आरोप हत्या का न होकर ‘इलाज में आपराधिक लापरवाही’ (पृ. 242) का है.

अमित शाह ने उत्तेजना में बहते हुए कहा, ‘आज अगर बंगाल भारत में है, तो वह श्यामा प्रसाद जी के योगदान की वजह से है, अन्यथा बंगाल भारत का हिस्सा नहीं होता.’

वे लाल चौक, श्रीनगर पर मुरली मनोहर जोशी के अभियान का जिक्र करते हैं; लालकृष्ण आडवाणी की उपस्थिति का जिक्र नहीं करते हैं, और नरेंद्र मोदी जी द्वारा अपनी जान जोखिम में डालने’- पूरी सुरक्षा के बावजूद- को जोड़ देते हैं. आखिर में शाह यह मानते हैं कि ‘जम्मू कश्मीर के लोगों और भारत के लोगों के बीच एक खाई है. लेकिन यह विश्वास क्यों नहीं बन सका?- क्योंकि शुरू से इस यह विश्वास कायम करने की दिशा में कुछ नहीं किया गया.’

8 अगस्त, 1953 को शेख अब्दुल्ला की गिरफ्तारी और 11 साल तक उन्हें कैद रखे जाने ने एक ऐसा जख्म दिया, जो आज तक हरा है. 5 अगस्त, 2019 को भाजपा द्वारा की गई कार्रवाई से होनेवाले नुकसान इससे ज्यादा होगा और ज्यादा स्थायी होगा.

(एजी नूरानी वकील और लेखक हैं.)

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