लिंचिंग के आंकड़े जुटाने के बावजूद एनसीआरबी ने इसे जारी नहीं किया

साल 2017 की एनसीआरबी रिपोर्ट पूरे एक साल की देरी से जारी की गई है. इस रिपोर्ट में महिलाओं के खिलाफ अत्याचार के सबसे अधिक मामले उत्तर प्रदेश में दर्ज किए गए हैं.

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New Delhi: Social activists during 'Bharat Jodo: Do or Die' protest over the incidents of lynching, religious polarization and hate, at Parliament Street in New Delhi on Thursday, August 9, 2018. (PTI Photo/Manvender Vashist) (PTI8_9_2018_000280B)
प्रतीकात्मक तस्वीर (फाइल फोटो: पीटीआई)

साल 2017 की एनसीआरबी रिपोर्ट पूरे एक साल की देरी से जारी की गई है. इस रिपोर्ट में महिलाओं के खिलाफ अत्याचार के सबसे अधिक मामले उत्तर प्रदेश में दर्ज किए गए हैं.

New Delhi: Social activists during 'Bharat Jodo: Do or Die' protest over the incidents of lynching, religious polarization and hate, at Parliament Street in New Delhi on Thursday, August 9, 2018. (PTI Photo/Manvender Vashist) (PTI8_9_2018_000280B)
प्रतीकात्मक तस्वीर (फाइल फोटो: पीटीआई)

नई दिल्ली: राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो (एनसीआरबी) ने अपनी निर्धारित समयसीमा की एक साल देरी से सोमवार को अपने आंकड़े जारी तो किए लेकिन इनमें कुछ नए अपराधों से संबंधित आंकड़े जोड़ने के अपने वादे को निभा पाने वह असफल रहा.

मॉब लिंचिंग, प्रभावशाली लोगों द्वारा हत्या, खाप पंचायत द्वारा आदेशित हत्या और धार्मिक कारणों से की गई हत्या से संबंधित जुटाए गए आंकड़ों को प्रकाशित नहीं किया गया है.

अधिकारियों ने कहा कि मॉब लिंचिंग, प्रभावशाली लोगों द्वारा हत्या, खाप पंचायत द्वारा आदेशित हत्या और धार्मिक कारणों से की गई हत्या के नए सब-हेड के तहत एकत्र किए गए आंकड़े प्रकाशित नहीं किए गए हैं, जिसके परिणामस्वरूप 2017 की एजेंसी की रिपोर्ट में आंशिक देरी हुई है.

इंडियन एक्सप्रेस के अनुसार, नई रिपोर्ट ने बड़े पैमाने पर 2016 के संस्करण के तरीके का पालन किया है. हालांकि, एनसीआरबी ने राज्य के खिलाफ अपराधों और साइबर अपराधों की श्रेणी में सुधार को रोक दिया है.

एक अधिकारी ने कहा, ‘यह चौंकाने वाला है कि मॉब लिंचिंग आदि से जुड़े आंकड़ों को जारी नहीं किया गया. ये आंकड़े पूरी तरह से तैयार थे. केवल शीर्ष अधिकारियों को पता होगा कि ये आंकड़े क्यों नहीं जारी किए गए.’

एनसीआरबी के निदेशक ईश कुमार ने देश भर में मॉब लिंचिंग और हत्याओं की घटनाओं के कारण इन नए उप-वर्गों के तहत आंकड़ों को वर्गीकृत करने का फैसला किया था. मवेशियों की चोरी या तस्करी के संदिग्ध सामान, बच्चे को उठाने की अफवाहों, आदि सहित कई कारणों से लिंचिंग की घटनाएं हुई हैं. बहुसंख्यक मामलों में विशेष रूप से स्वयंभू गौ रक्षकों ने मुस्लिमों और दलितों को अपना शिकार अपनाया.

हाल ही में राष्ट्रीय स्वयं सेवक (आरएसएस) प्रमुख मोहन भागवत ने कहा था कि लिंचिंग पश्चिमी तरीका है और देश को बदनाम करने के लिए भारत के संदर्भ में इसका इस्तेमाल नहीं किया जाना चाहिए.

अल्पसंख्यकों के खिलाफ अपराधों को ढकने की कोशिश के रूप में उनके बयान की काफी आलोचना हुई. सत्तारूढ़ भारतीय जनता पार्टी के कई नेताओं ने लिंचिंग के मामलों में आरोपियों के लिए साफ समर्थन व्यक्त किया है, और सरकारी एजेंसियों को यह सुनिश्चित करने के लिए जांच पर नरमी बरतने का आरोप लगाया गया है कि किसी को भी दंडित नहीं किया गया है.

जुलाई 2018 में केंद्रीय मंत्री हंसराज अहीर ने राज्यसभा को बताया था कि केंद्र के पास लिंचिंग की घटनाओं का कोई आंकड़ा नहीं है, क्योंकि एनसीआरबी इसे इकट्ठा नहीं करता है.

अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष (आईएमएफ) ने भी इस बात पर आपत्ति जताई थी कि कैसे भारत सरकार आंकड़ों को जारी करने पर रोक लगा रही है. आईएमएफ की 2018 के लिए विशेष आंकड़ा प्रसार मानक की वार्षिक अवलोकन रिपोर्ट में पाया गया है कि भारत आंकड़ों की सभी श्रेणियों में आईएमएफ द्वारा निर्धारित समय सीमा का पालन करने से पिछड़ गया.

क्या कहते हैं एनसीआरबी के आंकड़े

एनसीआरबी के नवीनतम आंकड़ों के अनुसार, 2017 में देशभर में संज्ञेय अपराधों के 50 लाख से अधिक मामले दर्ज किए गए जो कि साल 2016 के आंकड़ों से 3.6 अधिक हैं जब जब 48 लाख प्राथमिकी दर्ज की गई थी.

एनसीआरबी की रिपोर्ट में कहा गया है कि 2017 में हत्या के मामलों में 5.9 फीसदी की गिरावट दर्ज की गई. 2017 में 28,653 हत्याएं दर्ज की गईं, जो कि साल 2016 के 30,450 से कम है. हत्या के सबसे अधिक मामले विवाद (7,898 मामले) के कारण हुए जिसके बाद व्यक्तिगत प्रतिशोध या दुश्मनी (4,660) और लाभ (2,103) के मामले सामने आए.

2017 में अपहरण के मामलों में 9 फीसदी की वृद्धि देखी गई जब 95,893 मामले दर्ज किए गए थे जबकि 2016 में 88,008 मामले के दर्ज किए गए.

2017 में देश भर में महिलाओं के खिलाफ अपराध के 3,59,849 मामले दर्ज किए गए, जिसमें लगातार तीसरे साल भी वृद्धि हुई. 2015 में महिलाओं के खिलाफ अपराधों के 3,29,243 मामले और 2016 में 3,38,954 मामले दर्ज किए गए थे.

महिलाओं के खिलाफ अपराध के रूप में वर्गीकृत मामलों में हत्या, बलात्कार, दहेज हत्या, आत्महत्या, तेजाब हमले, महिलाओं के खिलाफ क्रूरता और अपहरण आदि शामिल हैं.

एनसीआरबी के आंकड़ों के अनुसार, महिलाओं के खिलाफ अत्याचार के सबसे अधिक मामले उत्तर प्रदेश (56,011) में दर्ज किए गए हैं. यूपी के बाद महाराष्ट्र में 31,979 मामले दर्ज किए गए. आंकड़े के मुताबिक, पश्चिम बंगाल में 30,992, मध्य प्रदेश में 29,778, राजस्थान में 25,993 और असम में 23,082 महिलाओं पर हुए अपराध के मामले दर्ज किए गए हैं.

हालांकि, दिल्ली में लगातार तीसरे साल महिलाओं के खिलाफ अपराध के मामलों में कमी आई. साल 2017 में 13076 एफआईआर दर्ज किए गए जो कि साल 2016 में 15310 और 2015 में 17222 से कम हैं.

असम ने 2017 में देश में उच्चतम अपराध दर 143 दर्ज की. अपराध दर प्रति एक लाख लोगों पर दर्ज अपराध होती है.

अपराध दर के मामले में ओडिशा और तेलंगाना दूसरे स्थान पर रहे जिनकी अपराध दर 94 रही, उसके बाद हरियाणा (88) और राजस्थान (73) का स्थान रहा.

एनसीआरबी के आंकड़ों के अनुसार सभी राज्यों में अरुणाचल प्रदेश, गोवा, हिमाचल प्रदेश, मणिपुर, मेघालय, मिजोरम, नागालैंड, सिक्किम, त्रिपुरा में केवल तीन अंकों में महिलाओं के खिलाफ अपराध दर्ज किए गए हैं., यहां तक कि देशभर के आंकड़ों में इनका एक फीसदी भी योगदान नहीं है.